हर बच्चा विद्रोही ही पैदा होता है; ये आदर, सम्मान, संस्कृति, सभ्यता, तमीज़, तहज़ीब — ये सब जो शब्द हैं, बच्चों को बचाकर रखो इनसे। उसके ऊपर नियम-कायदे मत लगाइए — “यहाँ बैठो, ऐसे करो, चलो-चलो, सीधे हाथ से खाना खाया करो।” बच्चों में ज़िंदगी होनी चाहिए, अनुशासन नहीं; प्राण होना चाहिए। बच्चा चाहिए एकदम जिसमें भीतर ज़िंदगी इतनी है कि छलक रही है, बाँधें नहीं बंध रहा, समेटे नहीं सिमट रहा — ऐसा होना चाहिए बच्चा।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा ये प्रश्न था कि मेरा एक जगह पर मन क्यों नहीं लगता है? जैसे मैं पढ़ाई करती हूँ, तो उस समय भी मेरा मन नहीं लगता है। तो मैं अपना मन एक जगह पर कैसे लगाऊँ?
आचार्य प्रशांत: ये तो विकट प्रश्न है, इसका क्या? बेटा, तुम्हारी उम्र में मन एक जगह लगना भी नहीं चाहिए। तुम्हें तो बहुत-बहुत सारे रास्ते, विकल्प, चुनाव दिखाई देने चाहिए और तुम्हें सब पर प्रयोग करना चाहिए, सबको आज़माना चाहिए। क्यों कोई तुम्हारे ऊपर चढ़कर बोले कि ये जगह है, इसी विषय में मन लगाओ। क्यों बोले? हाँ ये ज़रूर हो सकता है कि तुमको दस चीज़ें दिखाई गईं, उनमें एक पर, दो पर तुमको प्यार आ गया और वहीं जाकर तुम्हारा मन बैठ गया, वो अलग बात है। पर ज़बरदस्ती नंबरों के लिए, माँ-बाप की इज़्ज़त के लिए यहाँ भी मन लगाओ, वहाँ भी मन लगाओ, मन है कि बाज़ार है कि वहाँ कुछ भी लगा दो?
समस्या सिर्फ़ तब होती है जब जो चीज़ आप जानते हो कि सही है और सच्ची है, आप वहाँ भी मन न लगाओ, ये समस्या है। पर ये तो कोई बात नहीं है कि कहीं भी मन लगा दो। क्यों लगा दें भाई? ये क्या आग्रह है? ये भी वही पुरानी बात है न, ये फलानी चीज़ है, इसमें मन लगाना ही चाहिए। नहीं लग रहा तो नहीं लगाएँगे। कौन सा ये कर्तव्य है? किसकी ये देवज्ञा है कि हर जगह मन लगाओ ही लगाओ? नहीं लगाना भाई। नहीं लगाना, तो नहीं लगाना।




