चार्ली चैप्लिन की कॉमेडी होती है, उसमें वो बेचारे हमेशा गिर रहे होते हैं, पिट रहे होते हैं। मज़ा आता है या नहीं आता है? कितना हँसते हो। और अपने साथ हो जाता है तो? अपने साथ भी जब हो, तो यही मानो, दूसरे के साथ हुआ है। मैं सब कुछ ऐसे ही लेता हूँ, जैसे चार्ली चैप्लिन के साथ हो रहा हो, मेरे साथ नहीं हो रहा। आई टेक नथिंग पर्सनली। जितना दुनिया पर आश्रित रहोगे, दुनिया उतनी चोट मारेगी। और दुनिया पर आश्रित नहीं हो, तो दुनिया के भाँति-भाँति के रंग उल्लास की बात बन जाते हैं।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं लगभग चार साल से आपको सुन रहा हूँ और जीवन में बहुत सारे बदलाव आए हैं, बहुत सारी चीज़ें बदली हैं। उसका एक रिज़ल्ट ये है कि पत्नी और बच्चे साथ में बैठे हैं सत्र में।
आचार्य जी, आज के सत्र से जुड़ा एक जीवन का नरक मेरा बना हुआ है, जो सुधार नहीं पा रहा हूँ। क्योंकि कोई भी कॉन्वर्सेशन होता है तो मैं बहुत आवेग में आ जाता हूँ, रिप्लाई उसका करता हूँ बिना सोचे, जैसा आप बोल रहे थे। बाद में वो बात कुछ कल्पना में सोच लेता हूँ और रिप्लाई चाहे मेरे साथ काम करने वाले मेरे कलीग हों, चाहे पत्नी हो या बच्चे या किसी से। अभी सत्रों में जोड़ने की बात होती है, कोई नहीं मानता है बात, तो मैं उखड़ पड़ता हूँ, कहर भर जाता हूँ। ये बात सुधार हो ही नहीं रही। बाद में गिल्टी होती है, सोचता हूँ, लेकिन फिर अगले दिन वही चीज़ शुरू हो जाता है। ये सुधार मैं कर नहीं पा रहा हूँ, इस पर मुझे राय दीजिए, मैं इस चीज़ को कैसे सही करूँ?
आचार्य प्रशांत: आपने कहा, पत्नी है, बच्चे हैं। बच्चे जैसे हो जाइए। देखिए, बच्चों में आश्चर्य का भाव कितना रहता है, वंडरमेंट कितना रहता है। आप अपने बच्चे को कहीं पर ले जाएँ, मान लें चिड़ियाघर ले गए, वहाँ तरह-तरह की मछलियाँ हैं, जीव-जंतु हैं, हिरण दौड़ रहे हैं, ये सब चल रहा है। एक के बाद एक ये सब आ रहे हैं, ऐसा ही होता है न चिड़ियाघर में, ये है, अब ये है, अब ये देखो।




