सपने: शरीर छुट्टी पर, मन ड्यूटी पर

Acharya Prashant

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सपने: शरीर छुट्टी पर, मन ड्यूटी पर
आप सपनों से परेशान होकर जागते हैं, फिर भी उन्हें पूरे दिन ढोते रहते हैं। अगर गड़बड़ी सपने में थी, तो उसे जागृत जीवन में क्यों लाना? वर्तमान जीवन अपने आप में पूर्ण है, पर आप उससे बचने के लिए बीते भ्रमों को पकड़े रहते हैं। सपने कामनाओं से जन्म लेते हैं; जितना उन्हें पकड़ोगे, उतना वे आपको पकड़ेंगे। छोड़ दो, तभी स्पष्टता आएगी। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम दिव्यांशु है। मेरा प्रश्न है कि आपने अवचेतन और अचेतन की बात करी थी। और पिछले काफ़ी दिनों से कुछ चीज़ें चल रही हैं मन में, नींद के समय पर ख़ासकर, सपने ऐसे होते हैं, और जिनके मेरे शरीर पर भी असर कई बार दिखते हैं। कई बार परेशान होकर उठता हूँ, सुबह जागता हूँ, काम पर आने से पहले, और उसका असर मेरे काम और मेरे शरीर, दोनों पर दिखता है। कभी सिरदर्द भयानक, असह होता है। और तो मैं ये समझ नहीं पाता हूँ कि इसमें मुझे क्या करना चाहिए, और मैं काफ़ी दिनों से इसके बारे में पूछने का आपसे प्रयास भी कर रहा था।

आचार्य प्रशांत: सपनों में कुछ गड़बड़ आती है।

प्रश्नकर्ता: जी, कई बार, कभी किसी से लड़ाई-झगड़ा, कुछ ऐसा।

आचार्य प्रशांत: सपनों में गड़बड़ आती है, है न?

प्रश्नकर्ता: जी सर।

आचार्य प्रशांत: तो गड़बड़ सपनों में आती है। तो सपनों में गड़बड़, माने गड़बड़ सपनों में। सपनों में कुछ गड़बड़ है, तो माने गड़बड़ कहाँ है? सपनों में। तो अभी सपना ले रहे हो क्या? तो अभी गड़बड़ क्यों है?

प्रश्नकर्ता: वही समझ नहीं पाता हूँ कई बार।

आचार्य प्रशांत: समझने की तो कोई बात ही नहीं है, सपना तो बीत गया, तो गड़बड़ क्यों ढो रहे हो? सपनों में गड़बड़; तो सपना नहीं, तो गड़बड़ नहीं। अभी सपना चल रहा है? तो गड़बड़ कैसे?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये होता भी है कि ये पता है मुझे कि मैं जानता हूँ कि ये मैंने सपना देखा।

आचार्य प्रशांत: यही गड़बड़ है न, कि तुमको पता है सपना अभी भी। ये सत्र चल रहा था। इसमें तुम्हें सपना क्यों पता था? आपकी किसी की भी समस्या ये नहीं है कि आपको कुछ कम पता है। सारी समस्या ये है कि आप वो भी पता रखते हो, जो पता रखने की ज़रूरत बिल्कुल भी नहीं है। अरे, सपनों की बात थी, सपनों में बीत गई। अभी भी क्यों पता रखे हो उसको? क्यों पता रखे हो? क्योंकि जो सामने है, उससे बचना है। जो सामने है, उससे बचना है, तो जो कुछ पीछे था उसको पकड़ना है। नहीं तो जो यहाँ हो रहा है, वो अपने आप में पर्याप्त है।

जीवन किसी भी पल अपने आप में परिपूर्ण है, पर्याप्त है। तो तुम सपना क्यों याद रख रहे हो?

तुम्हारे सामने संत कबीर बैठे हैं; तुम्हारे सामने ज़िंदगी खुली हुई है; बहुत कुछ है जो सवाल कर रहा है, जवाब माँग रहा है, चुनौतियाँ हैं उनको उत्तर देना है। इतना कुछ है जो तुम्हारे प्रेम के लिए आतुर है। उसकी जगह तुमने पकड़ क्या रखा है?

प्रश्नकर्ता: सपना।

आचार्य प्रशांत: अब ये बताओ स्वार्थ क्या है?

प्रश्नकर्ता: नहीं समझ पाता आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: उसके बिना ज़िंदगी चलती है? हैं? बंदर ने हाथ डाल दिया। किसमें?

श्रोता: मधुमक्खी के छत्ते में।

आचार्य प्रशांत: और फिर कह रहा है, समझ नहीं पाया कि हाथ क्यों डाला था। बिना समझे डाला होगा?

चूहा जाकर फँस गया। कहाँ?

श्रोता: चूहेदानी में।

आचार्य प्रशांत: और फिर कह रहा है, समझ नहीं आ रहा, मैं अंदर क्यों घुसा था। बिना समझे घुसा होगा? कामना है, कुछ और क्या है। सपनों का संबंध कामना के अलावा किसी बात से होता है? और चूँकि उनका संबंध कामना से होता है आड़े-तिरछे तरीके से, इसीलिए तुम जागृत अवस्था में भी सपने को लेकर घूम रहे हो। क्योंकि उसका रिश्ता कामना से है। नहीं तो सपने बढ़िया बात है, आ गए सपने आए अच्छी बात है।

सपना कब आया था? जो सो रहा था, उसको आया था। इसीलिए वेदान्त, जो सपना देख रहा होता है उसको नाम ही दूसरा दे देता है। अभी तुम जो खड़े हो न, तुम अभी सपने के, स्वप्नावस्था के, अनुभवता हो ही नहीं। तुम्हारा नाम है, वैश्वानर। और जिसने सपना देखा था, उसका क्या नाम होता है?

श्रोता: तैजस।

आचार्य प्रशांत: तैजस। वो दूसरा है। ये बात क्यों कही होगी ऋषियों ने? ताकि तुम्हें समझ में आए कि वो दूसरा था, तो सपना भी उस दूसरे का था न। मेरा थोड़ी सपना था, मैं काहे को ढो रहा हूँ? पड़ोसी को सपना आया था। पड़ोसी का क्या नाम था?

श्रोता: तैजस।

आचार्य प्रशांत: मेरा क्या नाम है?

श्रोता: वैश्वानर।

आचार्य प्रशांत: तो हम दोनों के अलग-अलग नाम हैं, तो हम दोनों अलग-अलग हैं। तो उसका सपना मैं क्यों ढो रहा हूँ?

तुम वो हो ही नहीं जिसको सपना आया था, तो छोड़ो उसको, अपना काम देखो। अब समझ में आ रहा है कि सपना क्यों याद रखना है? ताकि अपना काम न देखना पड़े। कामचोरी बड़ा बवाल है, न जाने और कितने तरीके की चीज़ें पैदा करता है।

सपना तुमसे पूछ के तो आता नहीं, तो तुम्हारे ऊपर फिर क्या बाध्यता है कि तुम उसको याद रख रहे हो? अरे, अपना शुभचिंतक होता, सगा-संबंधी, यार-दोस्त, रिश्तेदार होता, तो पूछ के आता, अनुमति लेता। ये वाला आए कि ये अच्छा वाला दिखाएँ; बताओ, क्या है गुजिया लेके आएँगे, क्या करें? सपना ऐसे ही घुस आता है। जो ऐसे ही घुसा है, वो कौन है? वो कौन है? या तो चोर है, या अजनबी है, या कुछ होगा। शुभेच्छु नहीं है ये तो तय है, ऐसे ही घुस गए। अरे, घुस गया तो घुस गया, तुझे ढोऊँगा थोड़ी मैं। तुझे ढोऊँगा थोड़ी।

एक बार आँख खुल जाती है तो दुनिया दूसरी हो जाती है। चेतना दूसरी हो जाती है। अभी स्वप्न-अवस्था नहीं है, तुम जागृत हो। अब ये दूसरा संसार है, इसमें अपना काम करो ना। और फिर जादू होता है, जो सपनों को पीछे छोड़कर के अपना सहज काम करते हैं, उनके साथ पहले तो ये होता है कि उनके सपने सीधे हो जाते हैं और फिर आगे ये होता है कि उनको सपने आने बहुत कम हो जाते हैं।

जो अपने सपनों को जितना महत्त्व देगा, वो सपनों का उतना शिकार बनेगा। जो जगने के बाद भी सपनों की जितनी ज़्यादा बात करेगा, वो पाएगा उसे उतने ज़्यादा सपने आ रहे हैं। तुम कितना आगे बढ़ रहे हो, उसका एक प्रमाण ये भी होता है, तुम्हारे सपने सीधे हुए कि नहीं? और फिर एक समय आता है जब सपने आने ही बिल्कुल कम हो जाते हैं, सुषुप्ति, गहरी नींद।

सपना माने अपूर्ण कामना। अपूर्णता कम से कम है तो फिर सपना भी कम से कम है। और जब कामना दहक रही होती है तो सपना भी दहकता है। और चूँकि सपना कामना को लेकर के है, इसीलिए जगने के बाद भी फिर उसको याद रखोगे, दोहराओगे, उसके बारे में इधर-उधर बातचीत करोगे।

बहुत सारे विशेषज्ञ बैठे रहते हैं जो सपनों का अर्थ बताते हैं। ऐसा नहीं कि उन सपनों में अर्थ होता नहीं, बिल्कुल होता है, क्योंकि सपने का संबंध कामना से है। तो अगर सपनों का विश्लेषण करो तो तुम्हें तुम्हारी कामनाओं के बारे में पता चलेगा। पर कामनाएँ तो हैं ही सारी मूर्खता की। तो जो बात पता चलेगी, वो भी वही होगी?

श्रोता: मूर्खता की।

आचार्य प्रशांत: तो उस बात को पता करके भी कोई विशेष लाभ नहीं, कि है? गंभीरता देखो, “सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं।”

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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