अर्जुन में क्या था जो बाक़ी में नहीं?

Acharya Prashant

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अर्जुन में क्या था जो बाक़ी  में नहीं?
अर्जुन की विशेषता उनकी पूर्णता में नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उनकी ईमानदारी में थी। उन्होंने अपने भ्रम, भय, मोह और संदेहों को छिपाया नहीं, बल्कि उनका सामना किया। दूसरों की तरह किसी पक्ष से चिपकने के बजाय उन्होंने निष्पक्ष होकर देखने की इच्छा दिखाई और अपने से ऊँची बुद्धि के मार्गदर्शन को स्वीकार किया। वास्तविक श्रेष्ठता त्रुटिहीन होने में नहीं, बल्कि सीखने, बदलने और सत्य के लिए अपने अहंकार से ऊपर उठने की क्षमता में है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा आज का सवाल है कि स्कूल में हमारा एक सब्जेक्ट है, “वैल्यूज़ प्लस,” जिसमें मेरी टीचर ने बोला कि अर्जुन एक सुपीरियर इंसान है। अर्जुन इतना सुपीरियर होता, तो फिर श्रीकृष्ण ने उसको भगवद्गीता क्यों एक्सप्लेन किया?

आचार्य प्रशांत: बेटा, इस अर्थ में बोला होगा कि बाक़ी जो सुनने वाले थे न, उनसे सुपीरियर है। सुपीरियर इस सेंस में नहीं कि इतना सुपीरियर है कि गीता की ज़रूरत ही नहीं। सुपीरियर इस तरह से कि जो बाक़ी लोग हैं, वह तो गीता सुनने में कोई रुचि ही नहीं दिखा रहे थे। बाक़ी सब जो हैं, वह तो अपना-अपना हिसाब, अपने-अपने रथ, अपने-अपने सारथी, अपने-अपने इरादे लेकर बैठे हुए थे।

अर्जुन सुपीरियर हैं क्योंकि सबसे पहले उन्होंने एक बहुत बड़ा ख़तरा उठाया, श्रीकृष्ण को अपना सारथी बनाने का। सारथी समझते हो? चैरिटियर, जो आपका रथ चलाते हैं। ये छोटा-मोटा ख़तरा नहीं होता न। यह एक सिंबॉलिक बात होती है कि आपने उनको अब अधिकार दे दिया है कि वो आपकी दिशा तय करेंगे। वो आपकी जगह तय करेंगे, आप कहाँ खड़े हो वो तय करेंगे, किधर को जाओगे वो तय करेंगे।

तो इसलिए *सुपीरियर है, क्योंकि आम आदमी श्रीकृष्ण को यह हक, यह राइट्स देना नहीं चाहता। आम आदमी ने, माने जो कॉमन मैन होता है, उसने अपना चैरिटियर किसको बना रखा होता है?

प्रश्नकर्ता: एक और आम आदमी को।

आचार्य प्रशांत: या ऐसे कह लो, ख़ुद को ही, अपने ही रेप्लिका को, अपनी ही मिरर इमेज को बना रखा होता है।

तो ये छोटी-मोटी बात नहीं है। यह सुपीरियरिटी की बात है कि आप पीछे बैठे हो और आपने श्रीकृष्ण को हक़ दे दिया है कि, "तुम देखो, आप चलाओगे।" और श्रीकृष्ण वो हैं जो किसी के काबू में नहीं आते, ठीक? जिनका कोई मालिक नहीं है, है न? श्रीकृष्ण उनका सिंबल है कि वो, जो इतना मुक्त है कि उसका अब कोई मालिक नहीं हो सकता। श्रीकृष्ण उसको रिप्रेज़ेंट करते हैं।

तो जिसका कोई मालिक नहीं हो सकता, अगर वो आपका रथ चलाएगा, इसका मतलब क्या है?

आपका रथ अब आपका नहीं रहा। तो यह बड़ी साहस की, करेज, डेयरिंग की बात है कि आप कह दें कि, "श्रीकृष्णा, आप बैठ जाइए यहाँ।" किसी और की हिम्मत ही नहीं पड़ी ये करने की। तो इसलिए अर्जुन को सुपीरियर बोला होगा आपकी टीचर ने। और भी रीज़ंस हैं। बाक़ी सब अपने-अपने पक्ष में, अपनी साइड में खड़े हो गए थे, लड़ाई के लिए।

जितने भी योद्धा थे न, वॉरियर्स, उधर के उधर खड़े हो गए, इधर के इधर खड़े हो गए। ऐसे अर्जुन अकेले थे, जिन्होंने कहा कि मैं एक पार्टीशन व्यू नहीं लेना चाहता। पार्टीशन व्यू माने, इस पार्टी में बैठकर के मैं व्यू नहीं लेना चाहता। मैं इस पक्ष में, एक तरफ़ खड़ा होकर के, व्यू नहीं लेना चाहता। उन्होंने कहा, "मेरा रथ बीचोंबीच ले चलो। मैं न्यूट्रल व्यू लेना चाहता हूँ।"

किसी ने भी नहीं कहा कि मुझे दोनों आर्मीज़ के बीच में ले चलो। तो अर्जुन अकेले थे, जिन्होंने कहा कि, "आई वांट टू ऑब्ज़र्व बोथ फ्रॉम अ डिस्टेंस।" मुझे दोनों को देखना है, मध्यस्थ होकर देखना है। बात समझ में आ रही है? “दोनों के मध्य में खड़े होकर के, निष्पक्ष होकर के देखूँगा।” और क्योंकि निष्पक्ष होकर के वो इन दोनों को देख सकते थे, इसीलिए फिर वो जब गीता आगे बढ़ती है, तो निष्पक्ष होकर, न्यूट्रल होकर के, ख़ुद को भी देख पाते हैं।

और यही पूरी गीता का पर्पस है। आप बिल्कुल न्यूट्रल होकर के, उसको डिटैचमेंट बोलते हैं, आप बिल्कुल न्यूट्रल होकर के अपने आप को देख पाओ। आप अपने आप को ऐसे नहीं देखो, जैसे आप किसी चीज़ को बेईमानी के साथ देखते हो, डिज़ायर के साथ देखते हो। है न? तो फिर कभी सच नहीं बोलते उसके बारे में। नहीं बोलते न? जब किसी चीज़ को लेकर डिज़ायर आ जाती है, तो फिर उसको लेकर के सच बोलना मुश्किल हो जाता है। है न?

अपने आप को भी थोड़ी दूर से देखना होता है, ताकि आप अपने बारे में सच जान सको। तो अपने आप से दूरी बनाने की शुरुआत गीता में शुरू में ही हो जाती है, और वो रिक्वेस्ट अर्जुन की थी। वो श्रीकृष्ण का इंस्ट्रक्शन नहीं था। वह अर्जुन की रिक्वेस्ट थी कि, "मुझे दोनों सेनाओं के मध्य ले चलिए।" तो इसलिए अर्जुन को सुपीरियर बोला होगा।

और भी बहुत कारण हैं अर्जुन को सुपीरियर बोलने के। बाक़ी तो सब लड़ने को तैयार ही थे, किसी को कोई डाउट था ही नहीं। अर्जुन अकेले थे, जिनको यह दर्द उठ रहा था। ऐसे pangs उठ रहे थे कि वहाँ पर ये सब मेरे ब्लड रिलेटिव्स हैं और टीचर्स हैं, और बाक़ी सब। तो इनको मारना पड़ेगा। ठीक है? तो अर्जुन ही अकेले हैं, जिन्होंने कुछ ओवरकम करा है इस वॉर में इंटरनली। इस वॉर में कोई हारा, कोई जीता, पर इंटरनल ग्रोथ तो अर्जुन की ही हुई, इसलिए अर्जुन सुपीरियर है।

इसमें एक पक्ष जीत रहा है, एक पक्ष हार रहा है। पर एक ही व्यक्ति है जो ऊँचाई पा रहा है। इधर हारने वाले, इधर जीतने वाले पर ऊँचाई पाने वाला तो एक ही व्यक्ति है। और उसने वो ऊँचाई इसलिए पाई है क्योंकि उसने ऊँचाई चुनी है। श्रीकृष्ण को छोड़कर भागना बहुत आसान था अर्जुन के लिए। और बीच-बीच में अर्जुन परेशान भी होते हैं। श्रीकृष्ण को यह भी बोलते हैं कि, "श्रीकृष्ण, आप मुझे मिसलीड कर रहे हैं।" ऐसे भी बोलते हैं। पर उन्होंने श्रीकृष्ण को छोड़ा नहीं।

इतनी सारी बातें श्रीकृष्ण ने उनसे बोलीं। गीता में 700 श्लोक हैं। अर्जुन ने बहुत पेशेंटली सारी बातें सुनीं। जबकि वो सारी बातें अर्जुन की ईगो को अच्छी तो नहीं लग रही थीं। हर्ट कर रही थीं।

आपको कोई बताए कि तुम्हें अपने बेस्ट फ्रेंड से जाकर लड़ाई करनी पड़ेगी, तो बुरा तो लगता है न? या कि अपने ब्रो से ही जाकर के…, बुरा तो लगता ही है। तो अर्जुन को भी ये सब बातें बुरी लग रही थीं। लेकिन अर्जुन ने फिर भी वह बातें सुनीं, सही और समझीं, इसलिए अर्जुन सुपीरियर है।

और उसके बाद फिर 18 दिनों तक उन्होंने जमकर के लड़ाई भी करी। जबकि उनकी इनिशियल स्टेज ये थी कि उनको बहुत डाउट्स थे और इल्लुज़ंस भी थे, अटैचमेंट्स भी थे। हाँ, उन्हें बुरा भी लग रहा था। और इसके अलावा उनके अपने कॉन्सेप्ट्स थे कि कास्ट ऐसी होती है, और वुमेन का कास्ट में यह रोल होता है। ये सब उनके अपने इस तरीके के बिलीफ़्स थे।

पर श्रीकृष्ण के समझाने पर उन्होंने इन सब बातों को अलग रख के लड़ाई लड़ी। तो इसलिए किसी की बात मान लेना, अपने से ऊँचा कोई बात समझाए, उसकी बात मान लेना इतना आसान नहीं होता है।

और जो अपने से ऊँचे की बात मान ले, वो ख़ुद भी ऊँचा हो जाता है। तो अर्जुन इसलिए सुपीरियर थे।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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