अर्जुन की विशेषता उनकी पूर्णता में नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उनकी ईमानदारी में थी। उन्होंने अपने भ्रम, भय, मोह और संदेहों को छिपाया नहीं, बल्कि उनका सामना किया। दूसरों की तरह किसी पक्ष से चिपकने के बजाय उन्होंने निष्पक्ष होकर देखने की इच्छा दिखाई और अपने से ऊँची बुद्धि के मार्गदर्शन को स्वीकार किया। वास्तविक श्रेष्ठता त्रुटिहीन होने में नहीं, बल्कि सीखने, बदलने और सत्य के लिए अपने अहंकार से ऊपर उठने की क्षमता में है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा आज का सवाल है कि स्कूल में हमारा एक सब्जेक्ट है, “वैल्यूज़ प्लस,” जिसमें मेरी टीचर ने बोला कि अर्जुन एक सुपीरियर इंसान है। अर्जुन इतना सुपीरियर होता, तो फिर श्रीकृष्ण ने उसको भगवद्गीता क्यों एक्सप्लेन किया?
आचार्य प्रशांत: बेटा, इस अर्थ में बोला होगा कि बाक़ी जो सुनने वाले थे न, उनसे सुपीरियर है। सुपीरियर इस सेंस में नहीं कि इतना सुपीरियर है कि गीता की ज़रूरत ही नहीं। सुपीरियर इस तरह से कि जो बाक़ी लोग हैं, वह तो गीता सुनने में कोई रुचि ही नहीं दिखा रहे थे। बाक़ी सब जो हैं, वह तो अपना-अपना हिसाब, अपने-अपने रथ, अपने-अपने सारथी, अपने-अपने इरादे लेकर बैठे हुए थे।
अर्जुन सुपीरियर हैं क्योंकि सबसे पहले उन्होंने एक बहुत बड़ा ख़तरा उठाया, श्रीकृष्ण को अपना सारथी बनाने का। सारथी समझते हो? चैरिटियर, जो आपका रथ चलाते हैं। ये छोटा-मोटा ख़तरा नहीं होता न। यह एक सिंबॉलिक




