आप लोगों ने छवि बना ली है अध्यात्म की कि अध्यात्म का मतलब होता है, एक बंद कमरा, एक सुनसान जगह, और एक ऐसा आदमी, जिसे दुनियादारी की कोई तमीज़ नहीं है। कमाना भी एक युद्ध होता है। कमाने में एक पुरुषार्थ होता है, कर्मठता होती है। मैं दुनिया की दौड़ में फँस जाने को नहीं कह रहा हूँ। लेकिन मैं कह रहा हूँ कि अगर तुम्हारा बंधन ही आर्थिक है, तो उसकी काट भी तो आर्थिक ही रखनी पड़ेगी न। और आर्थिक काट दो तरह से रखी जाती है, एक तो जो फ़ालतू के ख़र्चे हों, वो बंद कर दो; और दूसरी यह कि आमदनी बढ़ा लो।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आचार्य जी, मैंने सुना है कि बीस साल पहले आपने अपने आईआईएम अहमदाबाद एमबीए के जस्ट बाद एक एक्सेल शीट बनाई थी; शायद “जर्नी टू अ फ़्री मैन” के नाम से। उस शीट में शायद कुछ आपकी प्लानिंग थी कि आप कितनी जल्दी अपने लोन सेटल करके फ़्री होना चाहते थे। तो मतलब, आप तो स्पिरिचुअल इंसान हैं तो स्पिरिचुअल जर्नी में फ़ाइनैंशियल प्लानिंग और दुनियादारी के कैलकुलेशन्स का क्या रोल होता है?
आचार्य प्रशांत: उसका शीट का नाम था “फ़्री मैन इन मार्च,” “जर्नी टू अ फ़्री मैन” नहीं था। बहुत पुरानी एक्सेल वो सेव करके अभी भी रखी हुई है। मेरी वो शीट बनी हुई थी कि मुझे कितनी जल्दी किस तरीके से अपना कर्ज़ा पटाना है। आप लोग क्या सोचते हो? हर चीज़ का जवाब बस ये है, अपने माहीं टटोले। वो शीट बनी हुई थी, “फ़्री मैन इन मार्च,”




