अध्यात्म में पैसा कमाना वर्जित?

Acharya Prashant

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अध्यात्म में पैसा कमाना वर्जित?
आप लोगों ने छवि बना ली है अध्यात्म की कि अध्यात्म का मतलब होता है, एक बंद कमरा, एक सुनसान जगह, और एक ऐसा आदमी, जिसे दुनियादारी की कोई तमीज़ नहीं है। कमाना भी एक युद्ध होता है। कमाने में एक पुरुषार्थ होता है, कर्मठता होती है। मैं दुनिया की दौड़ में फँस जाने को नहीं कह रहा हूँ। लेकिन मैं कह रहा हूँ कि अगर तुम्हारा बंधन ही आर्थिक है, तो उसकी काट भी तो आर्थिक ही रखनी पड़ेगी न। और आर्थिक काट दो तरह से रखी जाती है, एक तो जो फ़ालतू के ख़र्चे हों, वो बंद कर दो; और दूसरी यह कि आमदनी बढ़ा लो। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आचार्य जी, मैंने सुना है कि बीस साल पहले आपने अपने आईआईएम अहमदाबाद एमबीए के जस्ट बाद एक एक्सेल शीट बनाई थी; शायद “जर्नी टू अ फ़्री मैन” के नाम से। उस शीट में शायद कुछ आपकी प्लानिंग थी कि आप कितनी जल्दी अपने लोन सेटल करके फ़्री होना चाहते थे। तो मतलब, आप तो स्पिरिचुअल इंसान हैं तो स्पिरिचुअल जर्नी में फ़ाइनैंशियल प्लानिंग और दुनियादारी के कैलकुलेशन्स का क्या रोल होता है?

आचार्य प्रशांत: उसका शीट का नाम था “फ़्री मैन इन मार्च,” “जर्नी टू अ फ़्री मैन” नहीं था। बहुत पुरानी एक्सेल वो सेव करके अभी भी रखी हुई है। मेरी वो शीट बनी हुई थी कि मुझे कितनी जल्दी किस तरीके से अपना कर्ज़ा पटाना है। आप लोग क्या सोचते हो? हर चीज़ का जवाब बस ये है, अपने माहीं टटोले। वो शीट बनी हुई थी, “फ़्री मैन इन मार्च,” क्योंकि मैं जल्दी से जल्दी अपनी कॉरपोरेट जॉब छोड़ना चाहता था।

तो उसमें मैं अपने एक छोटे से छोटे ख़र्चे का हिसाब रखता था। एजुकेशन लोन था और कुछ मैंने कर्ज़े ले रखे थे, वो मुझे सब ख़त्म करने थे जल्दी से जल्दी। अब वो मैंने जल्दी नहीं ख़त्म किए होते, तो ये संस्था नहीं बनी होती आपकी। आपको मालूम है, लोगों के एजुकेशन लोन बीस-बीस साल चलते हैं, हाउस लोन की तरह आजकल। हमने सब ढाई-तीन साल में निपटा दिया।

छवि बनाई है आप लोगों ने। सुनिए, आप लोगों ने छवि बना ली है अध्यात्म की कि अध्यात्म का मतलब होता है, एक बंद कमरा, एक सुनसान जगह, और एक ऐसा आदमी जिसे दुनियादारी की कोई तमीज़ नहीं है। जिसको कह दो कि जाओ दुनिया में कुछ करके दिखाओ, तो उसकी टाँगें काँपने लगती हैं। या वो बोल देता है कि “नहीं, नहीं, नहीं, हमें तो कोई ज़रूरत नहीं है, हमारी कोई रुचि नहीं है।”

आप मेरी शीट के बारे में पूछ रहे हैं, तो मैं आपको ये भी बता दूँ कि मैं दुनिया में भी बहुत सारे तरीकों से अग्रणी रहा हूँ, विजेता रहा हूँ। और मैं यहाँ बस किन्हीं प्रवेश परीक्षाओं की बात नहीं कर रहा हूँ। बैंक से लोन लिया, तो जितनी अवधि का लोन था, उससे बहुत पहले मैंने उसे चुका दिया। आपने कभी बाइक में ₹10 का पेट्रोल डलवाया है? कुछ महीनों का एक अंतराल था जब मैं ₹10; और ये तब है जब मेरे पास एक अच्छी कॉरपोरेट जॉब थी आईआईएम के बाद। मैं एक-एक रुपया रोक रहा था।

मेरे कुछ दोस्तों ने एक स्टार्टअप शुरू करी थी। मैं दिन में जीई में काम करता था (जनरल इलेक्ट्रिक), और छह-सात बजे वहाँ से फ़्री होकर मैं चला जाता था, और वो जो स्टार्टअप थी मैं उसमें काम करता था। और वो काम चलता था रात में एक बजे तक, दो बजे तक। उसके लिए मैं दिल्ली जाता था, जॉब मेरी गुडगाँव में थी। बाइक से जाता था और वहाँ से काम ख़त्म करके रात में दो बजे मैं वापस गुडगाँव आता था, और बिना जूते उतारे मैं लेट जाता था।

छोटी सी मेरी एक आप चारपाई बोल लीजिए, वो थी। उसमें जूते बाहर लटक रहे होते थे, पाँव ऐसे। मैं वैसे ही उठता था ऑफ़िस चला जाता था। ऑफ़िस, सुशांत लोक में मेरा फ़्लैट था वहाँ से मुश्किल से दस मिनट की दूरी पर था, वहाँ चला जाता था। एक घंटे का लंच ब्रेक होता था उसमें मैं वापस आ जाता था, आधे घंटे फिर नींद पूरी कर लेता था। फिर वापस चला जाता था। पाँच-छह घंटे की नींद रात में, आधे घंटे की बीच में दोपहर में।

वीकेंड पर काम न करना पड़े, इसलिए वीकडे पर ही मैं और ज़्यादा काम करके निपटा देता था। उसमें एक और मेरा स्वार्थ रहता था, अगर आठ-नौ बजे तक काम करके निपटा दो, तो आठ बजे वहाँ नीचे कैन्टीन में खाना मिलना शुरू हो जाता था। वहीं खाना भी खा लेता था, वो खाना मुफ़्त होता था। वहाँ से बाइक उठाकर दिल्ली, वहाँ काम किया। वहाँ से फिर वापस।

और वीकेंड्स पर क्या करता था, सैटरडे संडे? ये तो *वीकडेज़ की बात हो गई। तो वो, जिसको आप लोगों ने एचआईडीपी (होलिस्टिक्स इंडिविजुअल डेवलपमेंट प्रोग्राम) के रूप में जाना, मैं जाकर के उसके ट्रायल्स और टेस्टिंग करता था कॉलेजेस में, पढ़ाता था। और पूरे हफ़्ते का कोर्स, चूँकि मैं दो ही दिन में पढ़ाता था तो एक दिन में छह घंटे-आठ घंटे पढ़ाया करता था। ये था, “फ़्री मैन इन मार्च।”

फ़्री मैन इन अ पर्टिक्युलर ईयर भी नहीं, मैंने ये नहीं कहा था कि फ़्री मैन इन 2006 ऑर 7। महीना पकड़ा था कि इस महीने में मुझे अपने आपको आज़ाद कर देना है। और कैसे आज़ाद कर देना है? बंधन दुनिया से ही जुड़ने से बने हैं न। दुनिया में गया था एजुकेशन लेने के लिए, तो चढ़ गया भारी एजुकेशन लोन। तो दुनिया से फिर कैसे निपटना है, इसकी तमीज़ होनी चाहिए।

अब नहीं लगता है पर मेरे समय में, जो लोग थोड़े पुराने होंगे वो जानते होंगे, गैस का सिलेंडर भी लग जाता था कारों में; सस्ता पड़ता था। मैंने वो भी करा है। अरे माने सिलेंडर लगाने की एजेंसी नहीं खोली थी, कल को कुछ भी छाप दो कहीं क्या पता। क्योंकि ये दुनिया कैसी है उससे निपटना है मुझे।

कौन-सी आंतरिक मुक्ति होगी, अगर बाहर मैं ख़ुद ही बंधन पाल करके बैठा हुआ हूँ।

अब मुझे बंधन सिर्फ़ काटने नहीं थे, जल्दी काटने थे। बहुत अच्छी सैलरी मिल रही थी, पर वो सैलरी इसलिए नहीं थी कि मैं उसको भोग लूँ, वो सैलरी इसलिए होती थी कि वो आती थी तो उसमें से थोड़े-से पैसे बस छोड़ के, बाक़ी सब मैं बैंक को दे आता था कि ये लोन जल्दी ख़त्म करो, मुझे कुछ और करना है; मुझे नहीं यहाँ कॉर्पोरेट में रहना। और मुझे दुनिया को जानना था, तो जितने अलग तरीके के अनुभव हो सकते थे, लिए। इसलिए भी कि एक कंपनी से दूसरी कंपनी जाने में एक हाइक मिलती है, वो भी तो था ही।

और दूसरा ये कि मुझे कंसल्टिंग में जाना था। कंसल्टिंग में जाकर एक साल में चार अलग-अलग इंडस्ट्रीज़ को जान लिया मैंने। मैंने कहा, जानो और मुक्त हो जाओ। पता चल गया यहाँ मामला क्या है, खेल कैसे चलता है। जिस खेल का पता नहीं हो, उस खेल में हारोगे कि नहीं हारोगे? जानना ज़रूरी होता है।

दुनिया में विजय होना सीखो। मुझे यहाँ पर हरंतों और भगोड़ों की फ़ौज नहीं बनानी है। न मैं भागा हूँ, न मैं हारा हूँ, न मुझे भागते हुए और हारते हुए लोग अच्छे लगते हैं। न मैं कभी मजबूरी का रोना रोता, न मुझे मजबूर लोग अच्छे लगते हैं।

आप लोग मेरे पास आते हो, बोल देते हो कि हमारे पास पैसा नहीं है, ये नहीं है, हम तो ₹500 भी नहीं दे सकते, अरे ₹1000। ये इस तरह की बातें करते हो। मेरे सामने ऐसी बात करोगे, मैं एक मिनट में कह दूँगा, “इनको निःशुल्क ले लो।” पर जितनी बार मैं ये बात सुनता हूँ, आपके लिए मेरे मुँह का स्वाद कसैला हो जाता है। क्यों हम ऐसी ज़िंदगी जी रहे हैं कि हमारे पास ₹500-1000 भी नहीं है? वो भी दुनिया के सबसे ऊँचे काम के लिए। क्यों ऐसी ज़िंदगी?

मैं नहीं कह रहा हूँ कि वो व्यक्ति झूठ बोल रहा है कि वो आर्थिक दृष्टी से मजबूर है, बिल्कुल ऐसा हो सकता है कि वो सचमुच मजबूर हो, उसके पास सचमुच पैसे न हों। मेरा सवाल ये है, तुम्हारे पास पैसे क्यों नहीं हैं? और ये सवाल कोई आध्यात्मिक गुरु आपसे नहीं पूछता, पर मैं पूछ रहा हूँ, क्योंकि ज़िंदगी का बहुत ज़रूरी सवाल है। तुम ऐसे क्यों हो कि तुम्हारे पास ऊँची से ऊँची चीज़ के लिए भी धनाभाव है? क्यों नहीं कमाना जानते?

और ठीक है, करोड़पति बनना एक अलग बात होती है, पर आज जैसी दुनिया है और जैसी अर्थव्यवस्था है, उसमें एक सम्मानजनक कमाई करना भी अगर तुम्हें मुश्किल हो रहा है तो तुम्हें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए न। मैं अपने हाथों से प्रतिदिन, हमारे यहाँ पर एक इनबॉक्स है उसमें मेल आती हैं। रोज़ कभी दो, कभी पाँच, कभी और ज़्यादा। यहाँ ये राघव बैठा हुआ है, मैं इसको ख़ुद ही भेज देता हूँ कि “राघव, अप्रूव; राघव कर दो।”

लोग इतना-इतना बड़ा निबंध लिख के भेजते हैं अपनी मजबूरियों का, कि हमारा ऐसा है, मैं पूरा पढ़ता भी नहीं। मैं कहता हूँ कि अगर ये वाक़ई लिख रहे हैं इतना, तो तुम इनको सब निःशुल्क दे दो; दो निःशुल्क, दो निःशुल्क।

लेकिन मैं जितना पढ़ता हूँ, उतना कोई मेरे मन में पुलक थोड़ी उठती है। कोई लाख रुपये महीने की बात होती और आप अपनी असमर्थता बताते, तो समझ में आती बात। एक बहुत छोटी-सी राशि भी आपके पास नहीं है जीवन का उच्चतम ज्ञान पाने के लिए, तो फिर आपको पूछना पड़ेगा कि आप जगत को लेकर के इतने असमर्थ क्यों हो? दुनिया से लड़ने का जज़्बा क्यों नहीं है आपमें?

कमाना भी एक युद्ध होता है और कमाने का मतलब ज़रूरी नहीं है कि लालच या भोग हो। अभी बताया मैंने कि मैं कमाता था, और उस समय पर आज से बाईस-चौबीस साल पहले अगर ₹60,000 मेरे हाथ में आता था, तो ₹55,000 जाकर बैंक को दे आता था। कमाने का मतलब ज़रूरी नहीं होता कि भोग है, पर कमाने में एक पुरुषार्थ होता है, कर्मठता होती है। और जो बात कमाने पर लागू होती है कि संघर्ष, वही बात दुनिया के हर युद्ध में लागू होती है।

वो, दिनकर जी का बड़ा अच्छा है, भाव कुछ ऐसा है कि तप और रण, ये दोनों सूरमाओं के ही काम होते हैं। और जो तामसिक व्यक्ति होता है, क्लीव, वो न तप कर सकता है और न रण कर सकता है। कुछ ऐसे ही शुरू होता है, कि “तप और रण होते ये दोनों सूरमाओं के ही काम।” और आगे की कुछ पंक्तियाँ अभी याद नहीं आ रही।

खेल सारा बेटा पैसे का है। एक मज़ेदार बात बताऊँ, पैसा कहाँ तक जाता है? बड़े जो अख़बार भी हैं, जिन्होंने मान लो मुझे लेकर कोई अपमानजनक बात छाप दी है, वो ख़ुद अपनी ओर से फ़ोन करके कह रहे हैं: “थोड़ा इतना पैसा दे दीजिए, तो ये डिलीट कर देंगे और ये लिंक हटा देंगे।” सब पैसे के लिए ही किया जाता है।

जो लोग मेरे ख़िलाफ़ भी ये सब करते हैं, तुम्हें क्या लगता है कि उनकी आस्था पर प्रहार हो रहा है? नहीं, उनकी आस्था पर नहीं, उनके पेट पर प्रहार हो रहा है, उनके लालच पर प्रहार हो रहा है। ये वही लोग हैं जो अंधविश्वास की दुकान चलाते हैं, उन्हीं दुकानों से अपनी पत्नियों के लिए गहने लेके आते हैं। ये मुझ पर प्रहार न करें, तो इनके बच्चों की फीस नहीं जाएगी और बीवी को साड़ी नहीं आएगी। इनकी ये हालत है। दुनिया को समझना सीखो; आस्था युद्ध नहीं है, अर्थ युद्ध है।

दो देशों में लड़ाई हो, उनमें से जो ज़्यादा बड़ी अर्थव्यवस्था होगी, 99% संभावना है वही देश जीतेगा। दो देशों में लड़ाई हो रही हो, जानना चाहते हो कौन-सा देश जीतेगा? बस ये देख लो कि जीडीपी किसका ज़्यादा है। ज़्यादा बड़ी जो इकॉनमी होगी, वही देश जीतेगा। और इकॉनमी ऐसे ही नहीं बड़ी हो जाती है।

गलत मत समझ लेना, मैं दुनिया के रंग में रंग जाने को नहीं कह रहा हूँ, मैं दुनिया की दौड़ में फँस जाने को नहीं कह रहा हूँ, मैं दुनिया की चक्की में पिसने को नहीं कह रहा हूँ। लेकिन मैं कह रहा हूँ, कि अगर तुम्हारा बंधन ही आर्थिक है, तो उसकी काट भी तो आर्थिक ही रखनी पड़ेगी न। और आर्थिक काट दो तरह से रखी जाती है, एक तो जो फ़ालतू के ख़र्चे हों, वो बंद कर दो; और दूसरी ये कि आमदनी बढ़ा लो।

एक तो ये ही बहुत अच्छा है सामने:

युद्ध नहीं जिनके जीवन में वे भी बहुत अभागे होंगे या तो प्रण को तोड़ा होगा या फिर रण से भागे होंगे। जीवन के पथ के राही को क्षणभर भी विश्राम नहीं है कौन भला स्वीकार करेगा जीवन एक संग्राम नहीं है।

ये पूरा ही बहुत सुंदर है।

दीपक का कुछ अर्थ नहीं है जब तक तम से नहीं लड़ेगा दिनकर नहीं प्रभा बाँटेगा जब तक स्वयं नहीं धधकेगा।

~ अर्जुन सिसोदिया

दुनियादारी सीखो, दुनिया में जितना सीखो; आपको ही जिताने के लिए मैंने ये सारा खेल रचा है, मेरी आँखों के सामने ही हारोगे और रोज़ हारोगे, तो मुझे कैसा लगेगा? मैंने कहा था, “फ़्री मैन इन मार्च।” फ़्री* होकर मुझे क्या करना था? मैं तो फ़्री हो गया, मैं फ़्री इसी लिए होना चाहता था ताकि आपको फ़्री कर सकूँ। अब आप अनफ़्री रहे-रहे, “आचार्य जी आप मेरी जान हो।” कुछ नहीं है उसमें।

अभी बोल दिया तो कितनी बद्दुआएँ आ रही होंगी। मैं क्या करूँ, मेरा तो इतिहास ही रहा है दिलों को तोड़ने का। हर दिशा से आरोप ही यही रहा है, कि ये बंदा किसी के प्यार की क़ीमत नहीं करता।

मुझे मत बताओ कि मैं अच्छा हूँ इसलिए तुम मुझसे प्यार करते हो, तुम अच्छे हो जाओ। मुझे मत बताओ कि मैं प्यार के क़ाबिल हूँ, आप अपनी पूरी काबिलियत पा लो।

आपकी जीत में ही मेरा गौरव है। जाइए, संघर्ष करिए। जहाँ भी हैं आप, जिन भी बंधनों में उलझे हुए हैं, उनको तोड़िए, जूझिए। गलत शहर में फँसे हैं तो शहर छोड़िए। गलत नौकरी में हैं तो नौकरी छोड़िए। गलत मान्यताओं में हैं तो मान्यता छोड़िए। दुकान चलाते हैं, आमदनी नहीं हो रही, तो और जूझकर मेहनत करिए। गलत ख़र्चे पाल रखे हैं, तो गलत ख़र्चे छोड़िए।

ये थोड़ी है, कि “आचार्य जी, हमने बैठकर आपका सत्र सुन लिया।” सत्र, सत्र के लिए नहीं है; सत्र ज़िंदगी के लिए है, ज़िंदगी बदलनी चाहिए। मैं ज़िंदगी में आपको जूझते हुए और जीतते हुए देखना चाहता हूँ। और जो लोग मेरे पास गीता के लिए आए हैं, बस, और ज़िंदगी के लिए नहीं आए, उनको ज़िंदगी तो नहीं ही मिलेगी उन्हें गीता भी नहीं मिलेगी।

एक बहुत बड़ा वर्ग है इस गीता कम्युनिटी पर जो कहता है, “नहीं, हम तो बस यहाँ पर एक अकैडमिक एक्सरसाइज़ करने आए हैं।” अकैडमिक एक्सरसाइज़ क्या है? कि गीता एक टेक्स्ट-बुक है, और हमें उसका इंटरप्रिटेशन इनसे समझना है क्योंकि ये थोड़ा-सा अलग, रोचक और शायद गहरा अर्थ दे देते हैं। तो वो सुनने आए हैं, ज़िंदगी-वग़ैरह से हमें कोई मतलब नहीं। इन लोगों को मैं कह देता हूँ, ज़िंदगी तो तुम्हें वैसे भी बदलनी नहीं है। तुम यहाँ गीता के लिए आए हो, तुम्हें गीता भी नहीं मिलेगी; न ज़िंदगी मिलेगी, न गीता मिलेगी। गीता भी सिर्फ़ उनको मिलेगी, जो ज़िंदगी से जूझने को तैयार हों गीता की रोशनी में।

मैं कोई संस्कृत साहित्य का शिक्षक हूँ क्या? या हिंदी लिटरेचर का? कि तुमको यहाँ बैठकर संदर्भ-प्रसंग-भावार्थ बता रहा हूँ, एक-एक पंक्ति का। जान लगाकर के प्रयास करो, उसके बाद परिणाम जो भी आता है, उसको जीत मानो। पर बंदा जुझारू चाहिए। मैं छोटा था, तभी से टीवी पर कोई भी मैच आ रहा होता था, मैं बहुत जानूँ भी न, वहाँ पर मेरी कोई रुचि भी न हो, लेकिन उसमें जो भी अंडर-डॉग होता था मैं उसके साथ हो जाता था। समझ में आ रही है बात?

मान लो ग्रैंड-स्लैम है विम्बलडन है, ये सब आया करते थे, दूरदर्शन पर भी आते थे। अब सेमीफाइनल आ रहा है और उसमें मैच चल रहा है माइकल चांग और बोरिस बेकर का। माइकल चांग का नाम न सुना होगा आप में से बहुत लोगों ने। वो लड़का-सा था। तो मैं बस ये देख लूँ कि रैंक किसकी नीचे है, सीडिंग किसकी नीचे है। और जो नीचे वाला है, मैं उसके साथ हूँ।

मेरे साथ होने से कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता, पर मज़ा तो तब आता है जब अंडर-डॉग जीते। जो पहले से ही ऊपर बैठा हुआ है, वो जीत रहा है, तो उसकी तरफ़दारी करके मुझे क्या मिलेगा? और मैं गौरव से कह सकता हूँ, कि अपनी ज़िंदगी में भी जो लड़ाइयाँ लड़ी हैं सब अंडर-डॉग होकर लड़ी हैं, और बहुत-सी जीती भी हैं। अंडर-डॉग होकर, ये है कि अगर हार भी गए तो शर्म कैसी? और टॉप-डॉग होकर, अगर जीत भी गए तो फ़क्र कैसा? आप सब अंडर-डॉग्स हो।

कभी बिल्ली-कुत्ते की लड़ाई देखी है? बिल्ली छोटी होती है, पर बिल्ली कुत्ते की लड़ाई देखना, इतने चाँटे मारती है कुत्ते को, पट-पट-पट; वैसे, छोटे हैं पर कूद-कूदकर मारेंगे। यानी, पंचिंग अबव वनज़ वेट। मज़ा भी तभी आता है। और लाज की बात भी ज़्यादा तब होती है जब वो छोटे-से पिट जाता है।

मैं किसी व्यक्ति को पीटने की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं ज़िंदगी की बात कर रहा हूँ।

जहाँ भी हो, अपनी औकात से ज़्यादा बड़ा पंगा लो।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आचार्य जी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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