अगर कोई NCR में रह रहा है लगातार, तो उसकी उम्र से दस–पंद्रह साल गए — निश्चित रूप से गए। हमको सिखाया नहीं गया है कि क्या कीमती है। गुड लाइफ़ इसमें नहीं है कि हवा साफ़ है, पानी साफ़ है, सेहत अच्छी है, लाइब्रेरी में जाकर पढ़ने को मिल रहा है। गुड लाइफ़ इसमें है कि तुम मेरा माल खरीदो। जब तक हम वो सीमा नहीं तय कर देते कि भाई, इससे ज़्यादा कंज़म्प्शन की किसी भी आदमी को ज़रूरत नहीं है, तब तक ये AQI वगैरह बढ़ता ही रहेगा। लोग बस ये कहते हैं कि “मैं तो नहीं मरा न, और अभी तो नहीं मरा न; आगे मरेंगे तो देखा जाएगा।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न भारत की प्रदूषित हवा के बारे में है। मैं अमेरिका में शार्लेट नाम का शहर है वहाँ रहती हूँ और मैं कुछ सालों के बाद भारत आई हूँ। और मैं लैंड की थी दिल्ली में इसी महीने और जैसे ही मैं एयरपोर्ट के बाहर निकली तो मुझे साँस लेने में बहुत परेशानी हो रही थी, मेरे गले में खराश हो रही थी और चेस्ट पेन और मेरी आँखों से पानी निकल रहा था। फिर मैंने AQI चेक किया दिल्ली का और जहाँ से मैं आई हूँ, तो जहाँ मैं थी वहाँ पर 30–40 AQI रहता है पॉल्यूशन ट्रैकर पर, और दिल्ली में उस दिन 2000 के भी ऊपर था, कुछ-कुछ इलाकों में तो 2400 था। तो 40 से 2400 पर आकर मेरे शरीर पर बहुत प्रभाव पड़ा और मैंने देखा कि जो वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन है उस पर ये लिखा था कि इतनी प्रदूषित हवा में सबकी ज़िंदगी से बारह साल कम हो सकते हैं अगर लोग ऐसी प्रदूषित हवा में रहेंगे।
तो मेरे लिए ये बहुत चौंकाने वाली बात थी जब मैंने मीडिया में देखा कि इसको लेकर क्या चर्चा हो रही है, तो यही सिर्फ़ यही बातें हो रही थीं कि कौन-सी सरकार बनेगी, कौन-सी सरकार गिरेगी और कुछ IPL की चर्चा, मतलब किसी और विकसित देश में ऐसी प्रदूषित हवा होती तो वो पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी हो जाती। क्योंकि वो सीधे-सीधे बेसिक ह्यूमन राइट का वायलेशन है। तो मैं ये देखकर बहुत ज़्यादा हैरान हुई कि यहाँ पर जो आम आदमी है वो अपने बहुत ही मूल अधिकार को लेकर गंभीर नहीं है।




