भावनाओं से कर्मयोग तक

Acharya Prashant

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भावनाओं से कर्मयोग तक
जो रोना-चिल्लाना हो रहा है, देख लो कि सब देह के कारण हैं। शरीर के हॉरमोन करवा रहे हैं। जान लो कि तुम उनके कर्ता नहीं हो — यह कर्मसंन्यास हो गया। दूसरा तरीका यह है कि यह सब किसी ऊँचे उद्देश्य को समर्पित कर दो; हँसेंगे तो उस ध्येय के लिए, रोएँगे तो उस ध्येय के लिए — यह कर्मयोग है। श्रीकृष्ण कहते हैं — इन दोनों में कर्मयोग श्रेष्ठ है। तुम्हारी चित्त की तमाम वृत्तियों के साथ रिश्ता बड़ा गहरा है। तुम्हारे लिए उनसे संबंध तोड़ना मुश्किल हो जाएगा, इसीलिए कर्मयोग ज़्यादा आसान तरीका है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कभी-कभी जैसे क्रोध या कुछ भी आता है। इमोशन का जो खेल होता है, तो अभी मतलब आने से पहले पता चलता है कि ये आने वाला है, तो कहीं-न-कहीं जो विवेक है वो बोलता है कि ख़ुद को देखो और स्थिर हो जाओ। क्योंकि ये तुम्हें अफेक्ट करने वाला है और तुम इसी के ऊपर प्रभावित होकर एक्शन करोगे। लेकिन वो चीज़ फिर भी मुझे अफेक्ट ही करता है, उस जगह में अनछुए नहीं रह पाती हूँ। उसके मुताबिक मेरा अभी भी रोना हो जाता है या फिर चिल्लाना हो जाता है। तो इससे कैसे मन को एकदम स्थिर माना जाए? मतलब जो चल रहा है चल रहा है मुझे उससे क्या लेना-देना है।

आचार्य प्रशांत: दो तरीके हैं, या तो ये देख लो कि ये जो रोना हो रहा है, चिल्लाना हो रहा है ये सब देह के कारण हैं। प्रकृति की बात है, मनुष्य की देह धारण करी है, स्त्री की देह धारण करी है, चीखना-चिल्लाना-रोना ये सब चलता रहता है इंसानी करतूतें हैं। काफ़ी कुछ तो इसमें स्त्रैण है।

दूसरा ये तरीका है कि ये रोना चिल्लाना सब किसी महत् उद्देश्य को समर्पित कर दो। कह दो ऊर्जा तो मुझ में बहुत है ही, बहुत इच्छाएँ बहुत हैं, बहुत कामना है, तो जब कामना करनी ही है तो किसी ऊँची चीज़ की करूँगी। ज़ोर लगाना ही है, चीख-पुकार करनी ही है तो जो ऊँचे से ऊँचा हो सकता है उसके लिए करूँगी।

पहली विधि को 'कर्मसंन्यास' कहते हैं, दूसरी विधि को 'कर्मयोग' कहते हैं। पहली विधि कह रही है कि ये जो कुछ भी कर्म हो रहे हैं, जान लो कि तुम उसके कर्ता हो ही नहीं। उनके तुम थोड़े ही कर्ता हो उनकी कर्ता तो प्रकृति है। उनके कर्ता तो वो सब प्रभाव हैं, जो तुम्हारे ऊपर पड़े हैं।

प्रश्नकर्ता: हाँ, ये अनुभव होता है हमको।

आचार्य प्रशांत: कह दो कि ये मैं थोड़े ही कर रही हूँ ये तो शरीर करवा रहा है, शरीर के हॉरमोन करवा रहे हैं। भीतर के रसायन करवा रहे हैं, जो मेरा अतीत रहा है वो अतीत करवा रहा है। जो मुझ पर सामाजिक प्रभाव पड़े हैं, धार्मिक प्रभाव पड़े हैं, शैक्षणिक प्रभाव पड़े हैं वो सब मुझसे करवा रहे हैं तो मैं तो इनकी कर्ता हूँ ही नहीं, होने दो इनको। मैं पैदा ही ऐसी हुई हूँ कि बात-बात पर मेरे आँसू निकल आते हैं, तो बहने दो इन आँसुओं को, मेरे थोड़े ही हैं आँसू। किसके आँसू हैं ये? शरीर के आँसू हैं ये। मैं पैदा ही ऐसी हुई हूँ कि आँसू निकल पड़ते हैं, तो अब बह रहे हैं आँसू तो बहो! तुम्हारा काम है बहना, बहो! जैसे शरीर से अन्य इतनी सारी चीज़ें बहती हैं वैसे आँसू भी बह रहे।

जैसे बाक़ी चीज़ों के बहने पर हम आपत्ति तो नहीं करते न, कि मल-मूत्र का त्याग करने गए हैं और वहाँ विचार कर रहे हैं, कि अरे! इतना कुछ बह क्यों रहा है। बह रहा है तो बह रहा है, इंसान पैदा हुए हो, जीव पैदा हुए हो तो ये सब तो शारीरिक क्रियाएँ चलती रहेंगी। तो वैसे ही आँसू बहे तो कह दो ये मल-मूत्र की तरह ही है। इसके बहने में हमारा कोई योगदान नहीं, हम इन आँसुओं के कर्ता हैं ही नहीं। भीतर से रसायन उठते हैं और आँसू आ जाते हैं। ये कर्मसंन्यास हो गया।

कर्मयोग क्या हुआ?

कि रो तो रही हूँ, पर अब किसी ऊँची चीज़ के लिए रोऊँगी। जलेबी के लिए नहीं रोऊँगी। कोई बहुत-बहुत ऊँचा ध्येय बनाएँगे और बस उसी ध्येय के लिए रोते जाएँगे। हँसेंगे तो उस ध्येय लिए, रोएँगे तो उस ध्येय के लिए। ये कर्मयोग हो गया। जो कुछ भी है अब हमारे लिए नहीं है उसके लिए है। ये कर्मयोग है। तो जो तरीका सुहाता हो उसको कर लो।

श्रीकृष्ण से पूछोगे, तो श्रीकृष्ण कहेंगे, तरीके तो दोनों अच्छे हैं, कर्मयोग ज़्यादा अच्छा है, स्वयं कहते हैं गीता में।

अर्जुन ने यही पूछा था कि आपने ज्ञानयोग भी बता दिया, सांख्ययोग भी बता दिया, कर्मयोग भी बता दिया तो अब बताइए 'कर्मसंन्यास' और 'कर्मयोग' में से श्रेष्ठ कौन है? तो श्रीकृष्ण कहते हैं इन दोनों में से श्रेष्ठ है – कर्मयोग।

क्योंकि तुम्हारा आँसुओं के साथ रिश्ता बड़ा गहरा है, क्रोध के साथ और चित्त की तमाम वृत्तियों के साथ रिश्ता बड़ा गहरा है। तुम्हारे लिए थोड़ा मुश्किल हो जाएगा ये कहना कि ये तो शरीर का काम है, मेरा काम है ही नहीं। तुमने संबंध बड़ा ज़ोर से जोड़ लिया है, उस संबंध को जल्दी से तोड़ नहीं पाओगे। तो उससे ज़्यादा आसान तरीका ये है कि क्रोध करेंगे तो किसी ऊँची बात पर क्रोध करेंगे। छोटी-छोटी बातों पर क्रोध नहीं करेंगे।

कह रही हो चीखना-चिल्लाना-रोना हो जाता है। ठीक है चीखना-चिल्लाना-रोना चलता रहे, छोटी बात पर नहीं चलेगा, ऊँची से ऊँची बात पर चलेगा। अर्जुन से कहते हैं श्रीकृष्ण, अर्जुन अपने सारे कर्मों को मुझे अर्पित कर दे। इस बात का मतलब समझते हो? जो कुछ कर, मेरे लिए कर और मेरे लिए माने किसके लिए? श्रीकृष्ण माने अनंतता, श्रीकृष्ण माने ऊँचा शिखर, अब जो भी कुछ कर, किसी ऊँचाई के लिए कर। टुच्चा जीवन मत बिता। बाण चलाना ही है तो इसलिए मत चला कि चिड़िया मारनी है कि हिरण मारना है। अब अगर बाण चलाना है तो धर्म की रक्षा के लिए चला। आ रही है बात समझ में? कर्मयोग पसंद आ रहा है?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: बढ़िया है।

प्रश्नकर्ता: अगर चुनाव करना हो आचार्य जी जीवन में दो चीज़ों के बीच। तो आदमी दिमाग का इस्तेमाल करके कर तो लेता है, लेकिन थोड़ा आगे जाकर उसको लगता है कि शायद वो नहीं करना चाहिए था।

आचार्य प्रशांत: दिमाग का नहीं, श्रीकृष्ण का प्रयोग करके चुनाव करो, सत्य का प्रयोग करके चुनाव करो। पूछो कि चुनाव करना है दो राहों में, कौन सी राह श्रीकृष्ण की ओर जा रही है। जो राह श्रीकृष्ण की ओर जा रही हो उसको चुन लो। दिमाग क्या लगाओगे, दिमाग में तो भूसा भरा रहता है। दिमाग लगाकर चुनाव करोगे तो भूसा भूसे को चुन लेगा, भूसे की तरफ़ ही बढ़ जाओगे।

श्रोता: जैसे कि जो साधारण चुनाव करना होता है कि दसवीं पास कर ली, अब कॉमर्स करना चाहिए कि साइंस करना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: हाँ तो पूछो न कि इसमें से किस राह पर श्रीकृष्ण हैं। और श्रीकृष्ण माने क्या? बंसी-बजैया श्रीकृष्ण नहीं, शांतिस्वरूप श्रीकृष्ण, सत्यस्वरूप श्रीकृष्ण। “किस राह पर सत्य मिल जाएगा? किस राह पर शांति है? और किस राह पर मैं भय के कारण चलना चाहता हूँ?” जिधर भय है वहाँ श्रीकृष्ण तो नहीं हैं। तो देख लो कि दो चुनाव हैं सामने और कौन से चुनाव के साथ भय जुड़ा हुआ है।

जहाँ भय जुड़ा हुआ है उससे हट जाओ। जहाँ सत्य जुड़ा हुआ है, शांति जुड़ी हुई है, प्रेम जुड़ा हुआ है उस रास्ते पर चल दो।

ऐसे करते हैं चुनाव।

श्रोता: कभी चुनाव करने के बाद लगता है, वो रास्ता ठीक था।

आचार्य प्रशांत: तो बदल दो चुनाव।

श्रोता: इसका मतलब वो गलत चुनाव है?

आचार्य प्रशांत: क्या पता गलत है, क्या पता सही है। पर इस वक़्त अगर यही लग रहा है कि पहले गलती हो गई तो अब सुधार कर लो। फिर गलती हो गई हो, फिर सुधार कर लेना। जीव हो, जीव तो गलतियाँ करेगा ही, जीव जैसे अभिशप्त है गलतियाँ करने के लिए वैसे ही जीव को ये वरदान भी उपलब्ध है कि गलतियाँ करने के बाद सुधारता भी चले। एक बार सुधारा, पता चले फिर गलती हो गई तो फिर सुधारो। तुम्हारे पास और विकल्प क्या है?

किसी भी गलती से मोह का नाता मत बना लेना कि गलत राह पर चल दिए और अब गलत राह से ही मोह हो गया है, तो अब इसी पर चलते जाएँगे। भले ही जान रहे हैं कि राह गलत है, लेकिन अब इससे बड़ा गठबंधन हो गया है, अब तो राह को नहीं छोड़ेंगे। ये बेवकूफ़ी मत करने लगना। जहाँ जानो कि गलती हुई, वहाँ रास्ता बदलो।

प्रश्नकर्ता: एक बात आपसे शेयर करनी थी, कि अभी चुनाव की बात हो रही थी। तो काफ़ी दिनों से ही मन में ख़्याल आ रहा था, कि मैं आपसे शेयर करूँ और अपार और कुन्दन सर को बताया भी कि ज़्यादातर समय ऑफ़िस में या तो खाली इधर-उधर बकवासबाज़ियों में बीतता था या फिर घर पर आकर के ऐसे ही खाली समय बीतता था। तो मन में आ रहा था, कि अब ये बात तो थी ही कि सार्थक कहीं-न-कहीं जीवन बीते।

ये काफ़ी दिनों तक मन में उथल-पुथल चलती रही। तो बात ये आई कि मैं कविता लिखता हूँ। तो कविता ऐसी जो आधारभूत रूप से मैं काफ़ी हद तक ठीक लिख सकूँ, जो मुझे अद्वैत से मिलता है और जो और कवि हैं। तो फिर मैंने अपनी कविताओं को और उनकी भी कविताओं को लिखकर और फिर पढ़कर उसको यूट्यूब पर डालना शुरू किया।

शुरू में मुझे ये डर लग रहा था कि मैं गलत कर रहा हूँ या सही कर रहा हूँ। लेकिन उससे मुझे काफ़ी हद तक तृप्ति मिलती थी ऑफ़िस में, क्योंकि पूरा समय फिर मैं व्यस्त होने लगा और घर पर भी आकर उसी व्यस्तता में बीतता है। तो कुन्दन सर से शेयर किया, फिर अपार से शेयर किया। तो आपसे ये बता रहा हूँ। चुनाव कैसे होना चाहिए इसमें और मैं इस रास्ते पर कैसे आगे बढ़ सकता हूँ?

आचार्य प्रशांत: कर तो लिया है चुनाव, बढ़ते रहो आगे इस पर। अच्छा है, कविता लिखो, डालते रहो। इसमें अभी अनिर्णित क्या है? अभी दुविधा कहाँ पर है? कविता का अर्थ है कुछ कह रहे हो। निस्सरत है न कविता, पैदा हुई है, बच्चे की तरह है। कहाँ से आ रही है? बस ये देखना है तुमको कि तुम्हारे शब्द किस स्रोत से आ रहे हैं — सच्चाई से आ रहे हैं या झूठ से आ रहे हैं। सच्चाई से जितना आएँगे, उतना उन शब्दों को लिखने से तुम्हारा रेचन होगा और उतना ही वो शब्द पढ़ने वाले के लिए उपयोगी होंगे।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो काम मैं कर रहा हूँ अभी ऑफ़िस में, उसका जो नेक्स्ट लेवल है, जैसे कुछ कॉम्पिटिटिव लेवल पर, उसमें चैलेंजेज़ हैं कि आगे मुझे वो चैलेंजेज़ के लिए तैयारी करनी है और प्रिपेयर करना है। तो आचार्य जी, ये करते समय मुझे ये भी लगता है कि जैसे आज हमारा सत्र हुआ था तो बात ये हुई कि मुक्ति और जागना और जगाने की बात हुई। और सत्र में, कैंप में आने के बाद भी मुझे ऐसा लगा कि ये चीज़ें भी बहुत ज़्यादा कीमती हैं जीवन के लिए।

आचार्य जी, लेकिन जब मैं अपने काम में जाता हूँ तो मुझे वो भी पसंद है, लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि दोनों में से चुनना किसको है। तो मैं समझ नहीं पाता था, आचार्य जी, वो चीज़।

आचार्य प्रशांत: देखो, अभी तुम्हारी अभी ये स्थिति नहीं है कि तुम दोनों में से एक को चुनने की बात करो। दोनों में से एक को चुनने की बात वो करे जो दूसरे का पूर्ण परित्याग करने की स्थिति में आ गया हो।

एक तरफ़ तुम्हारे सांसारिक कार्यक्रम हैं, तादातम्य हैं, जो तुमने मन में जाले बुन रखे हैं वो हैं, तुमने तमाम तरीके के जो घरौंदे बना रखे हैं वो हैं, और दूसरी तरफ़ सत्य है। इन दोनों को अलग-अलग रखकर देख रहे हो और इन दोनों के मध्य चुनाव करना चाहते हो। अब ये तो स्पष्ट है कि दो में से किसी एक को छोड़ना है अगर, तो सत्य को तो छोड़ सकते नहीं — स्वभाव-विरुद्ध हो जाएगा। तो फिर सवाल ये पूछ रहे हो कि क्या अपना सब जो अतीत है, देहभाव है, तमाम तरीके के मोह और भ्रम हैं, उन सबको छोड़ दूँ?

छोड़ सकते हो तो छोड़ दो, पर मेरे देखे तुम्हारी वो स्थिति नहीं है कि तुम एक झटके में छोड़ पाओगे। तुम्हारी अभी न उतनी नियत है न उतनी तैयारी। तो ये मत पूछो कि इन दोनों में से कौन सा एक चुनूँ? तुम्हे तो बीच का रास्ता निकलना पड़ेगा।

मुक्ति यकायक भी घट सकती है, अकस्मात भी घट सकती है, तत्काल, इसी पल भी घट सकती है, लेकिन फिर पात्र की तैयारी पूरी होनी चाहिए न?

उसे हाज़िर होना चाहिए कि जो भी कीमत अदा करनी पड़ेगी, अदा करूँगा, लेकिन मुक्ति तो इसी पल चाहिए। इतनी अभी तुम्हारी तैयारी नहीं है। तुमने अभी इतनी गहरी सहमति नहीं दी है मुक्ति को, तो बीच का रास्ता निकालो। बीच का रास्ता ये है कि जो तुम्हारा वर्तमान संसार है, उसकी सीमा की ओर बढो। अर्थात उसके भीतर बने रहते हुए भी, सत्य के कैसे निकट आ सकते हो, ये कोशिश करो। समझ रहे हो?

प्रश्नकर्ता: मतलब काम भी करता रहूँ और भजन में भी लगा रहूँ।

आचार्य प्रशांत: और कोई तरीका नहीं है। उसके बाद अगर तुम्हारे भजने में सच्चाई होगी तो ख़ुद ही तुम्हारे काम का स्वरूप बदलेगा फिर तुम्हें ये भी दिखाई देगा कि काम ज़रूरी नहीं है कि वैसा ही होता है जैसा अभी तुम अपने दफ़्तर इत्यादि में कर रहे हो।

अंधेरा फैलाना ही काम नहीं होता, रोशनी फैलाना भी बहुत बड़ा काम होता है तो कई तरह के काम होते हैं। और ऐसा नहीं है कि जो अंधेरा फैलाते हैं, उन्हीं का घर चलता है और जो रोशनी का काम करते हैं, वो भूखों मरते हैं। परमात्मा इतना कठोर नहीं है कि उन्हीं पर आघात करे जो उसके प्रेमी हैं। वो परीक्षा लेता है, लेकिन परीक्षा इसलिए नहीं लेता कि तुम टूट ही जाओ। परीक्षा लेता है ताकि तुम और ज़्यादा सुपात्र होकर आगे निकलो और परीक्षा में सफल हो पाओ।

तो अगर हृदय से भजोगे तो काम अपने आप बदलने लगेगा, फिर तुम्हें दिखाई देगा कि सत्य और कर्म दो अलग-अलग चीज़ें नहीं होती, फिर तुम्हें दिखाई देगा कि आध्यात्मिक जीवन और सांसारिक जीवन अलग-अलग नहीं होता।

अगर आध्यात्मिक जीवन सच्चा है तो अध्यात्म ही सांसारिक जीवन का निर्धाता बन जाता है। अध्यात्म और संसार और जीवन सब एक हो जाते हैं।

अभी तो तुम जहाँ हो, जिस हालत में हो उसी हालत में जो अधिकतम कर सकते हो, वो करो। इसी को मैंने कहा कि अपने संसार की सीमा की ओर बढ़ो और उन सीमाओं को चुनौती भी दो। कहो कि मुझे अधिकतम करना है, अभी मैं इस संसार से बाहर नहीं जा सकता तो इसके भीतर बने हुए ही, यहीं रहते हुए ही जो मैं ज़्यादा से ज़्यादा कर सकता हूँ, वो मुझे करना है। फिर आगे की राह अपने आप स्पष्ट होती हुई चलेगी, बदलाव आने हैं अपने आप आएँगे।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जब विदेश जाता हूँ, तो वहाँ माँसाहार खाना पड़ जाता है क्योंकि शाकाहारी भोजन वहाँ आसानी से नहीं मिलता, तो क्या ये सही है?

आचार्य प्रशांत: अब दुनिया में कौन ऐसी जगह है जहाँ तुम्हें शाकाहारी चीज़ें नहीं मिलती भाई? फल भी नहीं मिलते हैं उन जगहों पर? कौन सी ऐसी जगह है जहाँ लोग फल भी नहीं खाते?

प्रश्नकर्ता: फल से उतना पेट नहीं भरेगा।

आचार्य प्रशांत: फल से पेट काहे नहीं भरेगा? पाँच-छ: दिन की बात है एक के बाद एक फल खाओ। या पाँच-छ: दिन पूरी वसूली करनी है कि बाहर गए हैं तो अब।

प्रश्नकर्ता: मतलब माँसाहार गलत ही होता है न!

आचार्य प्रशांत: घर पर तुम अपने बच्चे के साथ प्रेमपूर्ण रहो, और उसको बैंकॉक ले जाकर पीटना शुरू कर दो तो सही हो जाएगा?

प्रश्नकर्ता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: प्रेम तो प्रेम है न। जब बच्चे से तुम्हें घर में प्रेम है तो बैंकाक में उसे पीटना कैसे शुरू कर दोगे। तो जो जानवर जो पशु घर में अभक्ष्य है, घर में नहीं खाया जा सकता। तो बाहर जाकर उसकी हत्या करना कैसे शुरु कर दोगे? कैसे कर दोगे भाई?

प्रश्नकर्ता: दोस्त बताता है, कि ये लोग जो यहाँ रहते हैं ये तो बचपन से यही खाते हैं, तो ये लोग दुष्ट हो गए और तू ही अच्छा हो गया?

आचार्य प्रशांत: वो क्या हो गए ये छोड़ो, तुम अपने लिए 'धर्म' का पालन करो। बहुत सारी चीज़ें हैं जो तभी पता चलती हैं जब तुम्हारे परिवेश के, तुम्हारे माहौल के बाहर वाला कोई आकर तुमको बताए। क्योंकि तुम्हारे परिवेश में तो वो बातें अब स्वीकृत हो चुकी हैं। वो बातें अब रोज़मर्रा की हो चुकी हैं, तो बड़ा मुश्किल होता है उन बातों से आगे देख पाना।

अगर कोई एक ऐसे देश में पैदा हुआ है जहाँ सब माँस ही माँस खाते हैं तो उसके लिए ये बहुत मुश्किल है अपनी ही आत्मिक रोशनी से देख पाना कि माँसाहार अपराध है। तो समझना होगा उस बात को कि वो नहीं देख पाएगा। ठीक वैसे जैसे तुम भारत में हो, तुम्हें ये देख पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है न, कि इतना शोर-शराबा कर रहे हैं ये गलत कैसे है? तुम्हें नहीं समझ में आता। तुम गंदगी फैलाते चलते हो सड़क पर, तुम्हें नहीं समझ में आता। पर विदेशी जब यहाँ आते हैं, तो उन्हें तुरंत दिख जाता है, कि ये गलत है! ये कितना शोर करते हैं, कितनी गंदगी करते हैं, है न?

तो कुछ बातें, कोई विदेशी ही समझ सकता है। अगर तुम थाईलैंड जा रहे हो तो वहाँ के लिए तुम विदेशी हुए। वो लोग खा रहे होंगे लगातार माँस, पर वो नहीं समझ पाएँगे कि माँस खाने में क्या दोष है। ठीक वैसे ही, जैसे भारतीय नहीं समझ पाता की गंदगी फैलाने में क्या दोष है। कहीं भी पान की पीक मार दी। विदेशी आता है, देखता है, हैं! पान की पीक मार दी! वो अचंभित होकर खड़ा हो जाता है। विदेशी आता है वो देखता है सड़क के बीच में गाय, कुत्ते घूम रहे हैं, वो ठहर जाता है और फ़ोटो लेनी शुरू कर देता है। कहता है सड़क के बीच में सांड बैठा हुआ है। ये हो कैसे गया? तुमको ये बड़ी साधारण बात लगती है, तुम कहते हो ये तो यहाँ आम बात है, रोज़मर्रा का किस्सा है। कुछ बातें विदेशी ही समझ पाता है।

तो ये बात तुम्ही समझ पाओगे कि ये जो इतना माँस खा रहे हैं, इसमें क्या दोष है? ख़ुद भी समझो, उन्हें भी समझाओ। जैसे भारतीय आदमी विदेशियों से तमाम तरह की बातें सीखते हैं न, उसी तरीके से जब भारतीय विदेश में जाए, तो उसको बहुत सारी बातें उन विदेशियों को सिखानी भी चाहिए। उल्टा नहीं करना चाहिए कि विदेश गए तो विदेशियों के सारे दोष ग्रहण कर लिए। ये वैसी ही बात होगी जैसे कोई विदेशी भारत आए और भारत से वो एक ही चीज़ सीख कर जाए, कि गंदगी कैसे फैलानी है और पान की पीक कैसे मारनी है।

अभी जब यूरोप दौरा करा था मैंने तो मुझे ऐसी कोई भी समस्या नहीं पेश आई थी कि शाकाहारी भोजन नहीं मिल रहा बल्कि शाकाहारी तो छोड़ दो, वीगन आउटलेट्स, वीगन रेस्टॉरेंट जितने यूरोप में हैं उतने भारत में कहीं नज़र नहीं आते। मैं नहीं दूध-दही और तमाम तरीके के पशु पदार्थों का सेवन करना चाहता हूँ। भारत में बड़ी मुश्किल हो जाती है। मैं कहूँ कि कुछ ऐसा बता दो भाई जिसमें दूध-दही-घी न पड़ा हो। यहाँ मिलता ही नहीं। यूरोप में बड़ी सुविधा थी। वहाँ खोजो तो हर बाज़ार में एक-दो दुकानें मिल जाती थीं जो वीगन सामग्री ही बेच रही होती थीं।

कौन सा देश है जहाँ तुम कह रहे हो कि?

प्रश्नकर्ता: क्या होता है, किसी के साथ गए वहाँ, आयल रिफाइनरी भी शहर से 200 किलोमीटर दूर होता है, वहाँ उनका अपना ही मेस अपना किचेन होता है तो उनके हिसाब से ही खाना पड़ता है, तो स्थिति में दिक़्क़त होती है।

आचार्य प्रशांत: कोई बात नहीं फल खाओ फल।

प्रश्नकर्ता: हाँ! मैं अपने साथ ले जाता हूँ।

आचार्य प्रशांत: ले मत जाओ, वहाँ फल अच्छे मिलते हैं। वहाँ वो वाले फल मिलेंगे जो भारत में मिलते भी नहीं। त्रिनिदाद एंड टोबागो की बात कर रहे हो न? वहाँ तो ट्रॉपिकल इक्वेटोरिअल बड़े-बड़े फल मिलते हैं।

प्रश्नकर्ता: संयम खो देता हूँ।

आचार्य प्रशांत: संयम खो देते हो? ठीक है, एक बार खो देते हो फिर संयमित हो जाओ। जो खो दिया वो तो लौट कर नहीं आएगा। जो सामने है उसका ख़्याल करो, एक बार जो गलती करी उसको दोहराओ मत, गलती का भी पूरा-पूरा इस्तेमाल कर लो! गलती क्या बुरी है, अगर वो दोबारा न हो। फिर गलती में क्या बुराई है? फिर तो गलती को धन्यवाद देना चाहिए कि अच्छा हुआ तू हुई। तेरे होने से मुझे पता लग गया कि तू हो सकती थी, मेरे भीतर छुपी बैठी थी। पर अब तू हो गई है तो तेरे होने के कारण ही तुझ पर पूर्ण विराम लगाता हूँ।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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