आप कहते हैं मेरी मर्ज़ी, मेरे फैसले, मेरी दौड़। पर क्या सच में? अगर हर बार वही नौकरी, वही पैसा, वही तुलना, वही बेचैनी चुन रहे हैं, तो यह मर्ज़ी है या पुरानी आदत? हम नई मंज़िल चाहते हैं, पर चलते पुराने रास्तों पर हैं। जो पहले भी चैन न दे पाया, उसी के नए रूप के पीछे भागते रहते हैं। जीवन तब बदलता है, जब आदमी पहली बार पूछता है, मैं सच में चाहता क्या हूँ?
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प्रश्नकर्ता: गाइज़, एक बार फिर से जोरदार तालियों के साथ स्वागत! मतलब, एक अलग एनर्जी आई थिंक। आप में से कितने लोग आचार्य जी को लाइव पहली बार देख रहे हैं? तो मैं चाहता हूँ कि हम सब जब यहाँ से जाएँ, कुछ न कुछ लेकर जाएँ और जीवन भर उसे याद रखें। एक ज़िम्मेदारी आप सबकी, आचार्य जी, अक्सर जब हम किसी साथ बैठते हैं, किसी हस्ती के साथ, तो हम इंट्रोडक्शन देते हैं, बट आपके बारे में इतना कुछ है कि इंट्रोडक्शन मैं नहीं लिख पाया। अब लास्ट में इस सेशन के आप सबसे मैं चाहूँगा कि कुछ न कुछ आप कहें, एक वर्ड, एक लाइन, कुछ शब्द। और वही आई थिंक इंट्रोडक्शन हो सकता है, क्योंकि जो हम सीख के जाएँगे। बहुत-बहुत स्वागत है आपका।
सर, सबसे पहले तो जो मेरे दिमाग में एक प्रश्न आपको जब भी मैं देखता हूँ आता है, कि जब हम 'आचार्य' शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो हमको लगता है कि कोई बहुत भारी-भरकम कपड़ों में कोई साधु जैसा शख्स चला आ रहा होगा; और आप सबको भी ऐसा ही लगता था? बट आप कहीं न कहीं हमारे जैसे लगते हैं, हम सबके जैसे लगते हैं और इसीलिए शायद हमारे दिलों तक पहुँचते भी हैं। तो आपने यह वेशभूषा क्यों चूज़ की कि “मैं वह ट्रेडिशनल आचार्य नहीं रहूँगा, आई विल बी लाइक अ मॉडर्न वन जिससे मैं ज़्यादा कनेक्ट




