मेरी मर्ज़ी! क्या सच में?

Acharya Prashant

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मेरी मर्ज़ी! क्या सच में?
आप कहते हैं मेरी मर्ज़ी, मेरे फैसले, मेरी दौड़। पर क्या सच में? अगर हर बार वही नौकरी, वही पैसा, वही तुलना, वही बेचैनी चुन रहे हैं, तो यह मर्ज़ी है या पुरानी आदत? हम नई मंज़िल चाहते हैं, पर चलते पुराने रास्तों पर हैं। जो पहले भी चैन न दे पाया, उसी के नए रूप के पीछे भागते रहते हैं। जीवन तब बदलता है, जब आदमी पहली बार पूछता है, मैं सच में चाहता क्या हूँ? यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: गाइज़, एक बार फिर से जोरदार तालियों के साथ स्वागत! मतलब, एक अलग एनर्जी आई थिंक। आप में से कितने लोग आचार्य जी को लाइव पहली बार देख रहे हैं? तो मैं चाहता हूँ कि हम सब जब यहाँ से जाएँ, कुछ न कुछ लेकर जाएँ और जीवन भर उसे याद रखें। एक ज़िम्मेदारी आप सबकी, आचार्य जी, अक्सर जब हम किसी साथ बैठते हैं, किसी हस्ती के साथ, तो हम इंट्रोडक्शन देते हैं, बट आपके बारे में इतना कुछ है कि इंट्रोडक्शन मैं नहीं लिख पाया। अब लास्ट में इस सेशन के आप सबसे मैं चाहूँगा कि कुछ न कुछ आप कहें, एक वर्ड, एक लाइन, कुछ शब्द। और वही आई थिंक इंट्रोडक्शन हो सकता है, क्योंकि जो हम सीख के जाएँगे। बहुत-बहुत स्वागत है आपका।

सर, सबसे पहले तो जो मेरे दिमाग में एक प्रश्न आपको जब भी मैं देखता हूँ आता है, कि जब हम 'आचार्य' शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो हमको लगता है कि कोई बहुत भारी-भरकम कपड़ों में कोई साधु जैसा शख्स चला आ रहा होगा; और आप सबको भी ऐसा ही लगता था? बट आप कहीं न कहीं हमारे जैसे लगते हैं, हम सबके जैसे लगते हैं और इसीलिए शायद हमारे दिलों तक पहुँचते भी हैं। तो आपने यह वेशभूषा क्यों चूज़ की कि “मैं वह ट्रेडिशनल आचार्य नहीं रहूँगा, आई विल बी लाइक अ मॉडर्न वन जिससे मैं ज़्यादा कनेक्ट कर पाऊँ?”

आचार्य प्रशांत: आचार्य माने तो बस टीचर होता है, सिखाने वाला। जिनको सिखा रहा हूँ, वो आज के हैं। उनके सामने भी मैं इसीलिए बैठ पा रहा हूँ क्योंकि उनके समय का हूँ, आज का हूँ। हमारी भाषा भी आज की है, यह माइक भी आज का है। तो ताज्जुब की बात तो यह है कि कोई पुराने कपड़े पहनने का ख़्याल भी कैसे कर लेता है।

जब सब कुछ आज का है। हमारी समस्याएँ, जिनको हम सुलझाना चाहते हैं, वो भी आज की हैं। ज़िंदगी हम आज जी रहे हैं; हमारे सुख-दुख, हमारी आशाएँ, उनका सब हमें आज अनुभव हो रहा है। तो मैं कपड़े एक हज़ार साल पहले के क्यों पहनूँ? लेकिन चूँकि यह एक परंपरा सी चली आ रही है बहुत-बहुत पीछे जीने की, तो इसलिए हमें लगता है कि “साहब, आपने आम लोगों जैसे, आज के वर्तमान के कपड़े/वेशभूषा क्यों पहन रखी है?”

नहीं तो यही सवाल आप एक डॉक्टर से या इंजीनियर से नहीं पूछते हैं। यही सवाल आप एक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर से भी नहीं पूछते हैं, क्योंकि वहाँ ज़ाहिर सी बात लगती है, आज का इंसान है, आज की चुनौतियों से जूझ रहा है: क्लाइमेट चेंज आज की चुनौती है, पशुओं पर जो क्रूरता हम कर रहे हैं वह आज की चुनौती है, प्रजातियों का विलुप्त होना आज की चुनौती है। ये जो सब वैश्विक युद्ध हैं और तमाम तरह के विभाजन हैं, और जातिवाद है, ये सब आज की चुनौतियाँ हैं। जब सारा काम आज का है, सारी चुनौतियाँ आज की हैं, इंसान आज का है, शिक्षक आज का है, छात्र आज का है, तो कपड़े हज़ार साल पहले के क्यों हों?

प्रश्नकर्ता: एक कहीं आपके किसी इंटरव्यू में, आपके किसी पॉडकास्ट में मैंने यह सुना, आपने बोला, “मैं उदंड हूँ और हर किसी को कहीं न कहीं उदंड होना चाहिए।” मतलब सवाल पूछना चाहिए। तो यह उदंडता जो है, यह कहीं न कहीं आप आज जो इतने लाखों-करोड़ों लोग आपको सुनते हैं, इवन लाइव सेशंस जो होते हैं, एक-एक लाख लोगों का लाइव सेशन होता है; तो आप लोग भी जो अपना सवाल न पूछ पाएँ, वो लाइव सेशंस के ज़रिए भी आज रात को भी होगा तो अपने सवाल पूछ सकते हैं। तो उदंडता ने आपको कितनी मदद की और कितना उदंड इंसान को होना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: नहीं देखिए, ज़िंदगी में जो कुछ भी ऊँचा है, सुंदर है, अच्छा है, प्यारा है, अगर आपको उसका साथ देना है, उसके सामने सर झुकाना है, उसके साथ वफ़ा, निष्ठा निभानी है, तो जो कुछ बेकार का है, झूठ है, फ़रेब है, नकली है, कृत्रिम है, उसका विरोध करना तो सीखना पड़ेगा न?

तो जो भ्रामक है, जो भय से अपना काम चलाना चाहता है, उसका विरोध करना ज़रूरी है, अगर हम ईमानदारी से यह कहना चाहते हैं कि हम आदमी सच्चे हैं। नहीं तो यह बड़ी विचित्र बात हो जाएगी कि एक ओर तो कह रहे हो कि “सच्चाई अच्छी चीज़ होती है और इतने ऊँचे-ऊँचे सद्गुण होते हैं, मैं उन सबसे प्यार करता हूँ, ऊँचाइयों से वफ़ा निभाता हूँ,” और दूसरी ओर जाकर जहाँ झूठ, फ़रेब, शोषण, अत्याचार यह सब चल रहा है, वहाँ भी विनम्र और शालीन बने हुए हो। तो विनम्रता और शालीनता वहीं शोभा देती है जहाँ उसका सही स्थान है, बाक़ी जगहों पर सर और आवाज़ दोनों को उठाना आना चाहिए। जो आदमी सौ गलत जगह सर झुकाकर आ गया है, वह उसके बाद जाकर आदर्शों के सामने सर झुकाए, मंदिर में सर झुकाए, यह शोभा नहीं देता। कोई आदमी कहे कि “मैं आ रहा हूँ सत्य को समर्पित होने” और झूठ के आगे वह सौ बार पहले ही बिका हुआ है, तो वह सत्य को क्या समर्पित हो जाएगा।

तो समर्पण और विद्रोह हमेशा साथ-साथ चलेंगे। जो विद्रोही नहीं हो सकता, वह समर्पित नहीं हो सकता। और जो उदंड नहीं हो सकता, वह विनम्र भी नहीं हो सकता।

तो झूठी विनम्रता में हम फँसकर न रह जाएँ, इसलिए मैंने कभी कहा होगा कि उदंडता ज़रूरी है। जब और खुल जाता हूँ तो मैं कहा करता हूँ सबसे कि बदतमीज़ी सीखो!

प्रश्नकर्ता: सर, मेरे ऑफिस के नीचे कई बार वो छोटा-मोटा मेला लग जाता, तो वहाँ पर एक कोट दिखा मुझे, जो मैंने ख़रीद लिया और अपने डेस्क पर पिन कर दिया। उसमें लिखा था, “कर्मा वोंट डू एवरीथिंग…” हम कहते हैं न कर्मा, कर्मा पर बात करेंगे आचार्य जी सामने हैं तो। “कर्मा वोंट डू एवरीथिंग, लर्न टू इंसल्ट पीपल समटाइम्स।”

तो मैं आपके थॉट्स इस पर ज़रूर जानना चाहूँगा।

आचार्य प्रशांत: देखिए, यह सब 'पॉप फिलॉसफी' है और यह बड़ा नुकसान कर जाती है। यद्यपि इसका जो भाव है, वह मैं समझ रहा हूँ। जिन्होंने यह कहा है, वो यह कहना चाहते हैं कि साहब, ऐसा नहीं है कि अगर कोई आदमी शोषक है, एक्सप्लॉइटर है, बुरा है, तो उसका कर्मफल ही उसको सज़ा दे देगा। उसी को 'कर्म' यहाँ पर कहा जा रहा है। कई लोग जो यह भाव लेकर बैठ जाते हैं न कि “अरे! वह बुरा आदमी है, उसको तो उसका कर्मदंड ख़ुद ही मिल जाएगा, हमें कुछ करने की ज़रूरत नहीं है।” तो ऐसे लोगों को सिखाने के लिए यह जो आपने अभी कोट बोली वो कही गई है कि नहीं-नहीं, कर्मा वोंट डू इट, तुम्हें ख़ुद जाकर उसको इंसल्ट करना होगा या जो भी जस्टिस है, वह तुम ख़ुद डिलीवर करो। कुछ उस तरह की बात है।

तो भाव शायद ठीक है, लेकिन इसमें जो दर्शन है, वह गड़बड़ है। कर्म तो वैसे भी कभी कुछ नहीं करता, करने वाले का नाम ही कर्ता है, द डूअर। परिभाषा ही करने वाले की यही है कि उसका नाम है 'डूअर'। कर्म मतलब तो 'डीड' है, अब डीड क्या करेगी? “तो कर्मफल आपको मिल जाएगा, आपने बुरा काम करा है तो भविष्य में कभी।” यह आम धारणा है। लेकिन यह धारणा भी गड़बड़ है और कई बार इस धारणा को भगवद्गीता के साथ भी जोड़ दिया जाता है और वह बात भी गड़बड़ है। भगवद्गीता ऐसा कुछ नहीं कहती कि तुमने आज अगर गलत काम करा है तो भविष्य में परिणाम मिलेगा या आज तुमने अच्छा काम, पुण्य करा है तो भविष्य में तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। भगवद्गीता ऐसा कुछ नहीं कहती है।

भगवद्गीता वास्तव में कर्म की अपेक्षा कर्ता को प्रमुखता देती है। उसी की बात करती है। कर्ता अगर बोराया हुआ है, विक्षिप्त है, पागल है, तो वह जो कुछ भी करेगा वह गलत ही होगा, अशुभ ही होगा। मैं अगर ठीक नहीं हूँ, मेरा दिमाग एकदम अभी नशे में है, विक्षिप्त हूँ मैं, तो मैं सीधे चलूँ, दाएँ चलूँ, बाएँ चलूँ, पीछे चलूँ, किधर को भी चलूँ, मैं लड़खड़ा कर गिरूँगा ही। मैं अपना कर्म बदलता रहूँगा, कर्म की दिशा बदलता रहूँगा, लेकिन मैं जिस भी दिशा जाऊँगा, लड़खड़ाऊँगा, गिरूँगा, चोट खाऊँगा और दूसरों को भी चोट दूँगा। मान लीजिए मैं गाड़ी चला कर जा रहा हूँ, तो ख़ुद चोट लगे न लगे पर दूसरे को चोट दे दूँगा। तो बात कर्म की नहीं होती, बात कर्ता की होती है। मेरी हालत क्या है?

और अक्सर अपनी ही हालत से मुँह चुराने के लिए हम "कर्म कर्म कर्म कर्म" चिल्लाने लग जाते हैं, क्योंकि कर्म सदा उस दिशा में होता है न, एक्शन रिक्वायर्स एन ऑब्जेक्ट। ऑब्जेक्ट सारे बाहर होते हैं। आप जो भी कर्म करते हैं वह किसी विषय से संबंधित होता है। विषय सब उधर होते हैं। तो कर्म की बात करना माने विषय पर ध्यान देने लग जाना और विषय पर आपने जैसे ही ध्यान देना शुरू कर दिया, वैसे ही आप अपनी ओर देखना बंद कर देते हैं।

तो भगवद्गीता का भी जो संबंध कर्म से जोड़ दिया गया है, उसके पीछे भी अहंकार की साज़िश है। कर्म की इतनी बात करो, इतनी बात करो कि कर्ता कभी तस्वीर में आने ही न पाए। और कर्ता कौन है? कर्ता, 'डूअर' है कौन? अहंकार, ईगो। तो ईगो ख़ुद को बचाने के लिए डीड की बात करेगा, एक्शन की बात करेगा, डूअर और एक्टर की बात कभी नहीं करेगा।

कर्मफल भविष्य में नहीं मिलता है। कर्ता की स्थिति ही उसका पुरस्कार होती है या उसकी सज़ा, उसका दंड होती है। मैं नहीं जानता और न जानने के कारण मैं गड़बड़ कर रहा हूँ। गड़बड़ का दंड मुझे पहले ही मिल गया। एक तरह से कर्मफल कर्म से पहले ही हासिल हो गया। मैं ईर्ष्यावश, जलन में आकर के मुझे लगे कि आप बहुत सुंदर हैं, आप बहुत खूबसूरत हैं, बहुत लोग आपको मानते हैं, आपके पास पैसा बहुत है, सम्मान बहुत है; मैं ईर्ष्या से जल रहा हूँ भीतर। ईर्ष्या से जल के मान लीजिए यहाँ कुछ हथियार रखा है, मैं उस हथियार से आपको मार दूँ। मुझे कर्मफल आगे नहीं मिलेगा, पहले ही मिल चुका है। वह जो जलन है वह तो मुझे पहले ही अनुभव हुई न? उसके बाद मैंने आपकी हानि की। तो कर्मफल तो कर्म से भी पहले आ गया।

चोरी की सज़ा चोरी के बाद नहीं मिलती। चोरी की सज़ा यह होती है कि चोरी करने से पहले ही आप चोर बन चुके होते हैं। चोर पहले आता है, फिर वह चोरी करता है। अब चोरी की और क्या सज़ा मिलेगी, चोर तो बन ही चुके हो। लेकिन अहंकार को बड़ा अच्छा लगता है यह कहना कि कर्मफल कर्म के बाद मिलेगा, उसमें बड़ी सुविधा हो जाती है। अब मान लीजिए आपने कर्म कुछ कर डाला, चोरी कर ली, कहीं से आकर मज़े ले लिए, घूस ले ली, कुछ कर लिया। अब अपने आप को आप तर्क दे सकते हैं कि कर्म फल तो पाँच-सात साल बाद मिलेगा न, पाँच-सात साल तो मज़े ले लूँ! और क्या पता पाँच-सात साल में मैं मज़े लेकर, खा-पी के मर ही जाऊँ, तब तो फिर मुझे कभी कर्मफल मिलेगा ही नहीं। तो कर्मफल को भविष्य में लंबित करना, धकेल देना, यह भी अहंकार की साज़िश है।

कर्मफल भविष्य में नहीं मिलता, कर्मफल तो कर्ता की स्थिति का ही दूसरा नाम है। इस अर्थ में कर्मफल तो कर्म से भी पहले मिल जाता है, तो कोई भी इस गुमान में न रहे, इस खुशफ़हमी में न रहे कि कर्म का फल एक साल बाद मिलेगा, दो साल बाद मिलेगा या अगले जन्म में मिलेगा। कर्म का फल तो कर्म करने से पहले ही मिल गया। कर्ता पर ध्यान दीजिए, कर्म पर नहीं। यह गीता का संदेश है।

प्रश्नकर्ता: यह बहुत मुझे लगता है बड़ी खूबसूरत बात बहुत अच्छे तरीके से समझाई आचार्य जी ने। मतलब अक्सर हमारी सोच तो यही होती है न कि यार अभी कर देता हूँ, बाद में देखी जाएगी। कुछ होगा नहीं होगा, बाद में हनुमान जी को प्रसाद चढ़ा देंगे, मान जाएँगे। आधे लोग तो यह भी करते हैं कि बजरंगबली को रख दिए भाई हमने ₹11 और मामला सेट है।

आचार्य प्रशांत: देखिए, इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन पर दुनिया का सारा झूठ और सारे बाज़ार चलते हैं। और कितना बुरा कर लिया हमने कि गीता के सिद्धांत को भी हमने क्विक ग्रेटिफिकेशन में सहायक बना लिया। हम क्या कह रहे हैं? हम कह रहे हैं कि यह कोई ऐसी चीज़ रखी है जो ख़राब हो सकती है, इसके मज़े तो तुम अभी ले सकते हो पर इसका दुष्परिणाम तुमको दो साल बाद मिलेगा। तो भीतर से तुरंत तर्क क्या आएगा? मज़े तो अभी ले लो न, दो साल बाद की बाद में देखेंगे। और यही बात हमने एक आध्यात्मिक सिद्धांत बना दी कि परिणाम तो बाद में मिलेगा। होना यह चाहिए था कि हम समझते कि परिणाम बाद में नहीं मिलता। परिणाम त्वरित होता है, इंस्टेंटेनियस होता है, अभी मिलता है। कर्म से पहले ही कर्ता की स्थिति आ जाती है, तो परिणाम तो तत्काल मिल जाता है। पर इस बात को अहंकार ने दबा दिया। गीता ने यह बात साफ़-साफ़ समझाने की कोशिश की, पर हमने गीता का अर्थ भी बिगाड़ दिया, विकृत कर दिया और वही बिगड़ा हुआ अर्थ जो है वह समाज में प्रचलित हो गया।

प्रश्नकर्ता: अच्छा, अब आप लोगों से मेरे दो-तीन सवाल हैं और रिस्पॉन्स ज़रूर चाहिए। ठीक है? क्योंकि उसके बाद जो सवाल होगा वह आप ही के सबके काम का होगा। आप में से कौन है जो चाहता है कि आप या आपकी फैमिली में से कोई, आपके बच्चे, भाई-बहन आईआईटी में चले जाएँ? कोई नहीं चाहता? आईआईएम में चले जाएँ? यूपीएससी क्रैक कर लें? आईएएस बन जाएँ?

आचार्य जी, आपने तीनों चीजें करी। फिर आपके जीवन में एनएसडी ने कुछ दस्तक दी, आपने कुछ प्ले किया और आपका रुख जो है वह कहीं न कहीं मुड़ गया। तो इस पर बात थोड़ी सी कम होती है। मतलब अक्सर हम जो मिडिल क्लास लोग होते हैं, वह सोचते हैं आईआईटी चले गए मतलब जीवन…, आईआईएम चले गए तो, आईएएस बन गए तो सात पीढ़ियाँ तर गईं। मतलब अक्सर लोग इसी तरह की बातें करते हैं, बट आपने सब कुछ किया। फिर वह क्या पॉइंट था, व्हेन यू थॉट कि नहीं यार, मतलब यह नहीं, मेरी दिशा तो कुछ और ही है?

आचार्य प्रशांत: आप मेरे लिए बहुत महंगा खाना ले आएँ, बहुत महंगा खाना, फाइव स्टार से मंगाया है आपने। कुछ ऐसा रॉयल स्प्रेड मंगा दिया, ₹20,000 का। गजब बात! मैं क्या उसको सिर्फ़ इसलिए खाता जाऊँ क्योंकि वह महंगा माना जाता है दुनिया के बाज़ार में? मैं उसको देखूँ या ख़ुद को देखूँ?

अब ठीक है, कोई चीज़ है वह दुनिया के बाज़ार में बहुत कीमत रखती है। कीमत होगी भी उसकी। मैं ख़ुद उन इंस्टिट्यूशन्स से निकला हूँ, बहुत उनकी इज़्ज़त करता हूँ, सीखा है वहाँ पर। लेकिन मुझे ख़ुद को देखना है न। डिग्री मेरे लिए है, नौकरी मेरे लिए है, वो मुझसे बड़े नहीं हो गए। आप जो कुछ भी करते हो अपने लिए करते हो न? क्योंकि शुरुआत ही होती है अपनी बेचैनी से। जीवन की शुरुआत ही होती है एक रोने से, चीख से; वह भीतरी बेचैनी का द्योतक होती है।

तो होगी कोई बहुत महंगी चीज़, अगर उससे मेरा पेट नहीं भर रहा तो मैं ख़ुद को दिलासा कैसे दे सकता हूँ कि इतनी महंगी चीज़ मुझे ज़िंदगी में मिल रही है, अब रुक जाओ यहीं पर? होगी महंगी चीज़, और है महंगी चीज़, ऊँची चीज़ है, बहुत अच्छी चीज़ है, पर वह मेरे लिए है और मुझे उस पर रुक नहीं जाना है। अगर वह मुझे मिली है तो मुझे देखना है किस हद तक वह मेरे काम आ सकती है, कैसे मेरे काम आ सकती है। मैं प्रमुख हूँ। प्रत्येक व्यक्ति प्रमुख है अपने लिए, और है तो है ही। आप जिनको अपना कहते हैं, हम उनको भी आप मानते इसीलिए हैं क्योंकि 'अपना' कहते हैं। है न? तो हर बात में होता तो 'मैं' ही है न? इस 'मैं' का ख़याल रखना पड़ता है।

ठीक है, बहुत अच्छी नौकरी मिल रही है, तो मिल रही है तो करके देखें भी तो। क्या करूँ? ज़बरदस्ती ख़ुद को समझा लूँ कि यहाँ चैन मिल गया, संतुष्टि मिल गई? दिख रहा है कि दुनिया की क्या हालत है। दिख रहा है कि कितनी असमानता है। दिख रहा है पृथ्वी का क्या हो रहा है, पशु-पक्षियों का क्या हो रहा है। दिख रहा है कि हर आदमी जल रहा है। मैं कैसे अपने आप को एक टेक जॉब में, या ब्यूरोक्रेटिक जॉब में, या मैनेजीरियल जॉब में, एक खाँचे में, ग्रूव में डाल दूँ और कह दूँ कि मेरी ज़िंदगी सार्थक हो गई?

उन कामों की मैं बुराई नहीं कर रहा। वो काम बहुत अच्छे हैं, पर वे काम करने वाले फिर हज़ारों लोग भी हैं। आईआईटी से मैं कोई अकेला नहीं निकला। यूपीएससी में हर साल अब आठ सौ- हज़ार लोग सिलेक्ट हो रहे हैं। तो ये सब चीजें ऐसी नहीं हैं कि जिनको करने वाले दूसरे नहीं हैं। पर दूसरा एक काम है जिसको करने वाला मुझे कोई दिख नहीं रहा था और मेरी नज़र में वह दुनिया का सबसे ज़रूरी काम था, तो मैंने वह उठाया। जो ज़रूरी होगा वही करूँगा न। जो मुझे ज़रूरी दिखाई दिया वह मैं कर रहा हूँ।

प्रश्नकर्ता: एक चीज़ और, इससे मुझे एक सवाल और मेरे दिमाग में आया जो हम सबके दिमाग में रहता है। मेरे ऑफिस में आचार्य जी, वह ऐसी बिल्डिंग है जहाँ पर दस-बारह ऑफिस हैं। जब सब लोग लंच में नीचे आते हैं न, सब एक दूसरे से पूछ रहे होते हैं, "तेरे यहाँ पर वैकेंसी है? तेरे यहाँ पर वैकेंसी है?" आप में से कितने लोग अपनी जॉब से सेटिस्फाइड हैं? हाथ खड़ा कीजिएगा। कितने सेटिस्फाइड नहीं हैं?

आचार्य प्रशांत: बाक़ी सब।

प्रश्नकर्ता: नहीं नहीं, कुछ न्यूट्रल भी होते हैं, तो कहते हैं चल रहा है। तो यह जो चीज़ होती है, हम सेटिस्फाई क्यों नहीं हो पाते हैं? मतलब यह ह्यूमन नेचर है? जो हैं भी, उन्हें भी लग रहा होगा कि नहीं यार, बॉस तो कुछ करता-वरता तो है नहीं, बेकार में दो लाख इसको मिल रहे हैं, आता है, दो बार चाय पीता है, मीटिंग करता है, चला जाता है। तो यह जो सेटिस्फेक्शन लेवल है हमारा एज ह्यूमन बीइंग्स, कहीं न कहीं जब मेरी तनख्वाह बीस हज़ार थी तो मुझे लगता था यार जिस दिन पचास हो जाएगी न भाई, उस दिन तो जीवन मतलब स्वर्ग बन जाएगा। बट जब तक पचस्य पहुँची तब तक तो मुझे लगा कि पचास की वैल्यू ही नहीं है। यह सेटिस्फेक्शन क्यों नहीं है हमारे अंदर?

आचार्य प्रशांत: क्योंकि हमें सेटिस्फेक्शन से ज़्यादा एज़म्प्शन प्यारा होता है। इसको देखेंगे तो मज़ेदार सी बात है। अगर मुझे सचमुच सेटिस्फेक्शन चाहिए होता, तो मैंने ईमानदारी से पूछा होता कि डिस-सेटिस्फेक्शन क्या चीज़ है और किसको है? जिसको डिस-सेटिस्फेक्शन बुरा लगेगा, वह बाक़ी सब कुछ छोड़ के हाथ धोकर के इस डिस-सेटिस्फेक्शन के पीछे लग जाएगा न, यह बेचैनी बला क्या है? उठती कहाँ से है? आती कहाँ से है? किसको आती है?

पर हमें डिस-सेटिस्फेक्शन उतना बुरा नहीं लगता, हमें संतुष्टि से, चैन से, पूर्णता से बहुत प्यार नहीं है। उससे ज़्यादा प्यार है हमें हमारी मान्यताओं से। हमें चैन तो चाहिए पर चैन से ज़्यादा हमें हमारी मान्यताएँ प्यारी हैं। कौन सी मान्यता? कि "चैन उधर है"। चैन चाहिए पर 'उधर' से चाहिए, चैन फिर भले ही न मिले लेकिन जाना 'उधर' है। तो बताओ हमें ज़्यादा प्यारा क्या है? चैन या संसार?

संसार से चैन तो मिल नहीं रहा। अभी आपने कहा नहीं मिल रहा, किसी को नहीं मिल रहा, लेकिन फिर भी हर आदमी भाग संसार की ओर ही रहा है। तो बताओ संसार प्यारा है या चैन प्यारा है? ईमानदारी से चैन या सैटिस्फेक्शन या संतुष्टि अगर हमें चाहिए होती, अगर हमें उनसे प्यार होता, तो कभी तो हम अपने इस एज़म्पशन को परखते, टेस्ट करते कि चैन उधर मिलना भी है क्या? पर कभी नहीं परखेंगे क्योंकि वह ज़्यादा प्यारा है, चैन प्यारा नहीं। चैन भले न मिले, उधर ही भागना है, उधर ही मुँह मारना है, उधर ही गिरना है, उधर ही खून बहाना है, उधर ही मर जाना है।

जिस ऑब्जेक्ट के पीछे आप आज भाग रहे हैं, उसके ही किसी संस्करण, किसी वेरिएंट के पीछे आप पूरी ज़िंदगी भागे हैं। यहाँ कोई एकदम बच्चा नहीं है कि जिसको कोई अनुभव न हो। सबको खूब अनुभव है। आज आपकी जो इच्छाएँ हैं, जो आपके टारगेट्स हैं, वह कोई नए नहीं हैं। वो रिसाइकिल्ड हैं बस। आपने अतीत में जो चाहा था उसी का एक नया एडिशन, संस्करण, वेरिएंट, रूप, नया नाम लेकर के, नई कहानी लेकर के फिर आपके सामने आया और आपने कहा, अब मुझे यह चाहिए, अब मुझे वह चाहिए। जो पहले मिला था वही दोबारा मिलेगा। और पहले क्या मिला था? हम शर्तिया तौर पर कह सकते हैं कि चैन नहीं मिला था, बेचैनी ही मिली थी। क्यों? क्योंकि पहले चैन मिल गया होता तो आज भी दौड़ क्यों रहे होते?

पहले जिसके पीछे दौड़े उससे बेचैनी मिली, अब जिसके पीछे दौड़ रहे हो वो मूलतः पहले वाले विषय जैसा ही है। तो जो पहले परिणाम मिला, वही तो मिलेगा न? हमारे यहाँ पर गीता कम्युनिटी के जो लोग हैं वह जानते हैं।

हम कहा करते हैं कि पुराने रास्तों पर चलते हुए नई मंजिल तक कैसे पहुँच जाओगे?

पर हमें पुराने ही रास्तों पर चलने का और पुराने ही गड्ढों में गिरने का शौक है। जिसे चैन चाहिए होगा न, वह गिरने का शौकीन नहीं रह जाता; वह चैन का प्रेमी बन जाता है। वह फिर यह नहीं कहता कि भागना तो उधर को ही है, भले ही वहाँ पर चोट मिलती हो, धोखा मिलता हो, दुख मिलता हो, पर जाऊँगा तो मैं दुनिया के बाज़ारों के पीछे ही। नई नौकरी चाहिए, नया घर चाहिए, नया रिश्ता चाहिए, नए बाज़ार चाहिए। कई बार तो नया देश चाहिए, नया बैंक अकाउंट चाहिए, और ज़्यादा इज़्ज़त चाहिए, ये चाहिए, वो चाहिए, सौ तरह की चीज़ें चाहिए। सब किधर चाहिए? उधर चाहिए। चाहने वाला कौन है और वह सचमुच क्या माँग रहा है, इस पर ध्यान ही नहीं देना है।

जैसे घर में कोई छोटा बच्चा हो और वह रो रहा है, और माँ-बाप इतने अनाड़ी हैं कि कभी उसको डीजल पिला रहे हैं, कभी उसको पेंट से नहला रहे हैं, कभी उसको धूप में खड़ा कर रहे हैं, कभी कुछ कर रहे हैं, कभी कुछ कर रहे हैं। अनाड़ी इतने हैं कि बस यह नहीं समझना चाह रहे हैं कि बच्चा चाह क्या रहा है। हमारे भीतर भी बैठा है कोई जो लगातार बिलख रहा है। हम उसकी ओर नहीं देख रहे हैं। हम दुनिया की ओर देख रहे हैं कि दुनिया में और क्या हासिल कर लूँ। अरे! दुनिया में जो हासिल करना था वो आपने बहुत किया, और ब्रह्मांड इतना बड़ा है कि आप अपनी शेष आयु और हासिल करते हुए भी बिता दें, तो भी कुछ हासिल नहीं कर पाएँगे। जो कुछ भी हासिल करेंगे वो पुराने जैसा ही होने वाला है।

तो अब क्यों नहीं ज़रा दूसरी दिशा देख लेते? उधर की जगह इधर देखने लग जाते, मैं हूँ कौन? मुझे सचमुच चाहिए क्या? और जो अभी तक पाया है, क्या मैं उसको अपनी उपलब्धि, अपना अचीवमेंट बोल भी सकता हूँ? या मैं झूठ-मूठ ही फ़क्र करता रहता हूँ, झूठ-मूठ ही गिनाता रहता हूँ कि ये देखो, ये सब मेरी अचीवमेंट्स हैं। उनसे क्या सचमुच मुझे कुछ मिला है? जब यह ह्यूमिलिटी आती है न, यह विनम्रता कि मैंने आज तक यह सब जो इकट्ठा करा, उससे बहुत ज़्यादा कुछ भीतरी तल पर मिला नहीं है, तब आदमी की ज़िंदगी की दिशा बदलती है। तब आदमी पुराने ही चक्र को और ज़्यादा नहीं घुमाता, पुराने ही रास्तों को और नहीं दोहराता। पर हम ऐसा कर नहीं रहे, तो हम कहते रहते हैं कि हमें चैन चाहिए। हमें चैन नहीं चाहिए, हमें भटकाव चाहिए। वही मिल रहा है जो चाहिए।

प्रश्नकर्ता: अच्छा, एक चीज़ जिसकी चर्चा आपसे बहुत कम होती है या शायद नहीं हुई। मैं चाहूँगा कि अभी मैं आपका शेड्यूल मुझे देखा मैंने तो मेरा दिमाग चकरा गया कि मतलब आप यहाँ, कभी वहाँ, अभी इसके बाद आपका एक सेशन है जहाँ पर बहुत एक लाख लोग जो हैं ऑनलाइन जुड़ेंगे। आप फिल्में देखते हैं?

आचार्य प्रशांत: कभी-कभार।

प्रश्नकर्ता: एनएसडी जो हमारी बात अधूरी रह गई थी। एनएसडी से आपके पास आईआईएम, आईआईटी में आया था कि हमारे पास आइए और आपने प्ले करना भी शुरू किया था, तो उसका जीवन पर कुछ प्रभाव रहा आपके?

आचार्य प्रशांत: देखिए, खासकर एनएसडी से ऐसा मेरा कोई संबंध नहीं रहा है। हाँ, एनएसडी के कुछ पास-आउट्स रहे हैं जिनसे मित्रता रही है। पर एज एन इंस्टीट्यूशन, एनएसडी से मेरा कोई रिश्ता नहीं रहा है। जितने मैंने प्लेस करे थे, खासकर आईआईएम में, वह मेरी ही स्थिति की अभिव्यक्ति थे। तो जो मैं ख़ुद को देख रहा था और जैसा मैं दुनिया को अनुभव कर रहा था, उसी चीज़ को मैं मंच से सबको दिखाना चाहता था।

आयोनेस्को का 'राइनोसोरस' था, ‘द थिएटर ऑफ द एब्सर्ड’ है। पूरा शहर ही जानवर बना जा रहा है और एक इंसान है जिसको कुछ समझ में नहीं आ रहा यह सब क्या हो रहा है। अंततः वह अपने आप को अकेला पाता है और उसके सामने यह द्वंद्व है कि क्या उसे भी भीड़ में शामिल होकर के जानवर बन जाना है सबकी तरह, या कि अकेलेपन का ख़तरा उठाना है। आयन रैंड का था 'नाइट ऑफ जनवरी 16', 'पगला घोड़ा' बादल सरकार का। यह सब मैं करता जा रहा था और अपने ही व्यक्तित्व की परतें उतारता जा रहा था सबके सामने।

बहुत कुछ ऐसा है जो जब आप अपने चेहरे से और अपने व्यक्तित्व से बोलते हैं, तो शायद उतना अर्थपूर्ण नहीं होता जितना जब आप किसी और किरदार के माध्यम से बोलते हैं। तो मेरे लिए वो काम मेरे नाटकों ने करा। फरवरी-मार्च के महीने में आईआईएम में प्लेसमेंट होता है और जनवरी 22-24 के बीच में हमने एक साथ दो नाटक करे थे। दोनों का डायरेक्शन मैंने किया था, दोनों का स्क्रिप्ट सिलेक्शन मैंने करा था। एक हिंदी में था, एक इंग्लिश में था और दोनों में ही लगभग केंद्रीय भूमिका मैं ही निभा रहा था। वह मेरा विद्रोह था और वह मेरा दर्द था। एक व्यवस्था है, मैं उसका हिस्सा नहीं बनना चाहता था, पर मैं पा रहा था कि कोई दूसरा रास्ता सूझ नहीं रहा है। तो अपनी स्थिति को, अपने गुबार को मैं इस तरह से अभिव्यक्त कर रहा था। उन्होंने हाँ, बहुत बिल्कुल मदद करी मेरी और उसमें अभिनय तो था ही, अपनी आवाज भी थी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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