
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा नाम अमृता सिंह है। मैं पंजाब से हूँ। मैंने आपको तीन महीने पहले ही सुनना शुरू किया है, गीता पढ़ने के लिए। मैं पहले माफ़ी चाहती हूँ, मेरी हिंदी बहुत अच्छी नहीं है।
आचार्य प्रशांत: नहीं-नहीं, बोलिए।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा सवाल ये है कि जैसे मैं पंजाब से हूँ, तो ये धरती को गुरुओं और पीरों की धरती माना गया है। यहाँ गुरु नानक देव जी हुए हैं, गुरु रविदास जी, सारे संत कबीर। इनकी गुरुवाणी हमारे पास है। तो इन्होंने तो अंधविश्वास को बहुत ज़्यादा काटा है, किसी ने, जैसे आपने कहा, लाठी से भी काटने की कोशिश की; और गुरु नानक देव जी ने बड़े प्यार से काटने की कोशिश की। तो फिर भी हम देखते हैं कि देहाती, देहात तक का एरिया है, गाँव का जो इलाका है, वहाँ पर आज भी ऐसी चीज़ें होती हैं। किसी में “माता” आ गई, तो वो अपने बालों को घुमाते हैं; कोई कुछ, कोई कुछ, ऐसी बहुत सारी बातें होती हैं यहाँ पर।
तो ऐसा फिर भी हमारे भीतर क्या है कि अगर हम वैज्ञानिक तथ्य भी उनके सामने रख देते हैं, तो वो मानते ही नहीं हैं उस चीज़ को? दिखाई भी देता है, वो मानता ही नहीं है। और जहाँ तक मैंने गीता आपसे सीखी है, तो ये तो बहुत सरल-सी बात है, सिर्फ़ “अहम्” को ही हम संबोधित करते हैं। तो जो हमें बताया गया है गुरुओं द्वारा, वो तो जीवन बहुत ही सरल है, उसमें तो किसी तरह का अंधविश्वास नहीं रखना।
तो हम अपना जीवन ख़ुद इतना जटिल क्यों करते हैं जबकि रास्ता तो सरल है? हमें कुछ भी मानना नहीं है, ऐसी कोई भी रूढ़िवादी चीज़ को नहीं मानना है। तो ऐसा क्या है हमारे अंदर जो सरल जीवन भी जीना नहीं चाहता?
आचार्य प्रशांत: पहला अंधविश्वास अहंकार ख़ुद है, अंधविश्वास माने झूठ। पहला अंधविश्वास अहंकार ख़ुद है; द ईगो इज़ द फर्स्ट सुपरस्टिशन। और उसको अगर अपने आप को बनाए रखना है, तो उसे सौ और अंधविश्वास मानने पड़ते हैं। कहावत सुनी होगी न, एक झूठ को बचाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं। वैसे ही अहंकार को बचाने के लिए सौ झूठ मानने पड़ते हैं।
अहंकार क्या है?
अहंकार वो जिसकी अपनी कोई हस्ती नहीं, जब तक वो बाहरी सहारे न ले। उसी को अहंकार बोलते हैं न? जिसको किसी बाहरी सहारे की ज़रूरत नहीं, उसका क्या नाम होता है? निरालंब, आत्मा, है न? अहंकार माने वो ‘मैं’ जो बिना बाहरी सहारों के उसकी जान चली जाएगी। अब मैंने एक बाहरी सहारा पकड़ रखा है, कि “मैं बहुत अच्छे परिवार से आती हूँ, मैं तो साहब बड़े ख़ास ख़ून की हूँ, हमारे ऐसे थे हमारी पीढ़ी में हमारे पूर्वज ऐसे थे वैसे थे।” ठीक है ये, ये अहंकार है, क्योंकि ये किसी बाहरी चीज़ पर टिका हुआ है। अपने कोई दम नहीं, तो ये किसी दूसरी चीज़ पर, किस चीज़ पर टिक हुआ है? अतीत पर, अतीत की मान्यता, परंपरा; इन पर टिक हुआ है। ये झूठ हो गया।
अब ये झूठ है, अब अगर तुम इस चीज़ पर टिके हुए हो, कि तुम बहुत अच्छी जगह से आ रहे हो, बहुत अच्छे तुम्हारे आसपास के लोग हैं, बहुत बढ़िया तुम्हारे पूर्वज थे;” तो वो सब जो माना करते थे, वो तुम्हें मानना पड़ेगा न। एक झूठ को बचाने के लिए?
श्रोता: सौ झूठ।
आचार्य प्रशांत: वो सब तुम्हें मानना पड़ेगा। अंधविश्वास को छोड़ने का मतलब होता है, बहुत सारी और चीज़ें भी छोड़ना; वो सब जो तुम गुरूर पाले बैठे हो, वो सब जो तुम झूठे रिश्ते पाले बैठे हो, वो सब भी अंधविश्वास के साथ छूटेंगे न। तो अहंकार इसीलिए नहीं छोड़ता अंधविश्वास को, उसके बहुत सारे सहारे गिर जाएँगे।
एक आदमी की पूरी ज़िंदगी चल रही है फ़ैंटेसी पर, झूठ पर, कल्पना पर। उदाहरण के लिए, वो बाप की संपत्ति में से भाई का हक़ मारना चाहता है, ये बोलकर कि “भाई ने ऐसा कर दिया, भाई ने वैसा कर दिया।” जो कि पूरी तरह से झूठ बात है, पर वो हक़ मारना चाहता है क्योंकि उसके भीतर लालच है। हक़ उसने मार भी लिया है और अब मौज कर रहा है उस संपत्ति पर। उसकी पूरी ज़िंदगी फिर किस चीज़ पर चल रही है एक? झूठ पर चल रही है न। ये आदमी तथ्यों के प्रति क्या नज़रिया रखेगा, जब इसकी पूरी ज़िंदगी ही झूठ की वजह से मौज मार रही है। इसने एक झूठ बोला है, क्या झूठ बोला है? कि “मेरे बाप की संपत्ति पर भाई का हक़ नहीं है, या बहन का हक़ नहीं है।” ये बोलकर उसने सबका हक़ मार लिया, अब मौज कर रहा है।
इसकी पूरी ज़िंदगी किस पर चल रही है?
श्रोता: झूठ पर।
आचार्य प्रशांत: तो ये आदमी अब तथ्यों के प्रति अपनी दृष्टि कैसी रखेगा? तथ्यों के प्रति इसकी नज़र, इसका रुख, क्या होगा? क्या ये बहुत सम्मान देगा तथ्यों को? अगर इसने तथ्यों को सम्मान दिया, तो इसे ये भी मानना पड़ेगा कि उस संपत्ति पर भाई का और बहन का, सबका हक़ था। और इसने झूठ बोला है, इसने बेईमानी करी है, मानना पड़ेगा न?
तो जिनकी ज़िंदगी झूठ पर चल रही होती है, वो तथ्यों से बहुत बचा करते हैं, और ऐसे ही लोग अंधविश्वासी होते हैं।
अंधविश्वास आपकी ज़िंदगी में अकेले नहीं आ जाता। अंधविश्वास का मतलब होता है, बीमारियों का बहुत बड़ा कुनबा आपके भीतर बैठा हुआ है। और जिसके भीतर बीमारियों का कुनबा बैठा होगा, उसे अंधविश्वासी होना पड़ेगा। क्योंकि अंधविश्वास की एक ही काट होती है या कहिए पहली काट, वो होती है तथ्य। लेकिन तथ्य अहंकार के लिए ख़तरनाक होते हैं।
“मैंने अपनी बीवी को दबा रखा है, मैं उसे काम पर नहीं भेजता हूँ।” क्यों? “अरे उसे कुछ आता-जाता नहीं है, बाहर निकलेगी कुछ कर नहीं पाएगी, वो मुसीबत पैदा करेगी, कमाई भी ज़्यादा नहीं। कमाएगी कम, मुसीबत ज़्यादा लाएगी; इसलिए मैं उसे कहीं जाने नहीं देता। मैंने कहा घर पर रह और ये सब कर।” उसकी पूरी ज़िंदगी इस झूठ पर चल रही है।
इस आदमी में तथ्यों के प्रति सम्मान होगा क्या? आप बताइए, होगा? तथ्यों के प्रति अगर सम्मान आ गया, तो सबसे पहले जो वो घर में कर रहा है वो कर नहीं सकता। तो ये आदमी जहाँ-कहीं भी फ़ैक्ट्स पाएगा, उनको लात मारेगा। और जहाँ-कहीं भी फ़ैंटैस्टिक इमेजिनेशन पाएगा, ये उसका क़ायल हो जाएगा। कहेगा, “वाह! हाँ, यही बात है।”
अंधविश्वास में पड़ना माने, पहली बात, हाइलि इगोइस्टिक होना और दूसरी बात फ़ैक्ट्स के प्रति डिस्मिसिव होना; अहंकारी होना और तथ्यों के प्रति तिरस्कार-अनादर से भरा हुआ होना। नहीं तो अंधविश्वास चल ही नहीं सकता। जिस आदमी ने अपने भीतर ये रुझान पैदा कर लिया है, ये निष्ठा पैदा कर ली है कि कुछ भी हो रहा होगा साहब, हमें सच्चाई जाननी है उसकी; हम बात की जड़ तक जाते हैं और सच्चाई लेकर आते हैं, उसको आप कैसे कर लोगे, कि हाँ…।
अरे बच्चे को स्मॉल-पॉक्स हुई है, वो कह रहा है, “माता आई है इसको, और पाँच दिन तक इसको फलाने तालाब की मिट्टी का पानी छान-कर पिलाओ, और पाँचवें दिन इसको कुछ और पिला देना। वो पीली दाल का, काला कद्दू का, सरसों का बीज का, पपीते का, ये करा देना; और जाकर बाबा जी को चढ़ा देना और बाबा जी को एक हज़ार एक रुपए दे देना, फिर माता नहीं आएँगी।
ये बात कौन मान सकता है? थोड़ा विचार करो, सोचो, इस भद्दी बात पर कौन-कौन यक़ीन कर सकता है? सिर्फ़ ऐसा आदमी, जो अपनी ज़िंदगी के किसी भी पहलू में तथ्यों के लिए इज़्ज़त नहीं रखता। वरना वो मान ही नहीं पाएगा। आप अगर ऐसे आदमी हो, जो एक सच्ची ज़िंदगी जीते हो, कुछ भी होता है, पूछते हो, “क्या बात है? कैसा है? इसके जड़ तक जाना है जिज्ञासा करनी है, हाँ साहब, और क्या है? बताइए, समझाइए।” आप ऐसे अगर आदमी हो और आपसे कोई कहेगा, ये चेचक नहीं है, ये सब नहीं है, ये तो माता निकली है और तालाब की पीली मिट्टी का काला पानी सरसों में, ये सब कर के। तो आप सवाल पूछोगे न?
पर आप सवाल नहीं पूछ रहे हो। इससे पता क्या चल रहा है? इससे पता चल रहा है कि आपकी पूरी ज़िंदगी झूठ में बीत रही है। पूरी ज़िंदगी आप झूठ में क्यों बिता रहे हो? क्योंकि आपकी शुरुआत ही झूठ से हो रही है। आप अपने बारे में सोचते हो, वही झूठ है। उसको बचाने के लिए आप हर तरीके के झूठ को प्रश्रय देते हो।
जो लोग तथ्य से जितना घबराते होंगे, वो उतने ज़्यादा अंधविश्वासी होंगे। और इसमें कोई ज़रूरी नहीं कि आप बेपढ़े-लिखे हो, अशिक्षित हो, अनपढ़ हो, तो ही आप ऐसे हो सकते हो। आप आधुनिक होकर, पढ़े-लिखे होकर भी घोर अंधविश्वासी हो सकते हो। बस आपका अंधविश्वास अँग्रेज़ी किस्म का होगा, वही सब ऑरा, वाइब्स, मिस्टिकल एनर्जीस, नेगेटिव फ़ोर्सेज़, फ़्लाइंग स्नेक्स, वो सब। समझ में आ रही है बात?
बात पढ़े-लिखे होने की नहीं है, बात आंतरिक झूठ की है। जिस आदमी ने झूठ से जितना नाता जोड़ लिया होगा, जिस आदमी ने झूठ से जितनी मौज मार ली होगी, वो अब सच में कैसे जाएगा? बोलो। कैसे जाएगा?
मुझे लत लग गई है बकरे के ख़ून के स्वाद की; लत लग गई है और बकरा मेरे यहाँ कटता है और वजह ये है कि बकरा कटता है तो देवी खुश होती हैं। और जब बकरा कटता है न, तो देवी स्वयं प्रसन्न होती हैं और प्रकट होती हैं और आती हैं। हम देखते हैं हर बार आती हैं, देवी आती हैं। वो फलानी औरत है; वो नाचा करती है; उस पर देवी चढ़ती हैं। मेरा स्वाद लग गया है, मेरा स्वार्थ लग गया है, मैं मौज मार रहा हूँ। किस चीज़ पर? ख़ून पर, माँस पर। झूठ के साथ अब मेरा स्वार्थ जुड़ गया है, मैं ये झूठ अब छोड़ ही नहीं सकता।
तो वो मुझे माँस मिलता रहे इसके लिए मैं कहूँगा, कि “हाँ, सचमुच उस औरत पर देवी चढ़ा करती हैं। ये अंधविश्वास नहीं है, ये सच्चाई है।” झूठ के साथ आप, यानि कि आप जहाँ भी अंधविश्वास को पनपता देखो, वहाँ आपको बहुत सतर्क हो जाना चाहिए। वो लोग बड़े गड़बड़ हैं। वो ऐसा नहीं कि बस एक गलत काम कर रहे हैं; उनका केंद्र गड़बड़ है। वो लोग ही गड़बड़ हैं, वहाँ से हटो पहले तो दूर हटो, वो कुछ भी कर सकते हैं। जितना गहरा अंधविश्वास, समझ लो उतने गड़बड़ लोग।
आपके घर में, ख़ानदान में, दोस्त-यारी में किसी का रिश्ता-विश्ता हो रहा हो, और जहाँ रिश्ता हो रहा हो, वो लोग आपको किसी पहलू में अंधविश्वासी दिखें, कोशिश करिएगा वो रिश्ता न हो। क्योंकि जहाँ अंधविश्वास है, वहाँ बड़े से बड़ा अपराध हो सकता है; कुछ भी हो सकता है। जो जगह झूठ पर पनप रही है, उस जगह कुछ भी, कोई भी गलत हरकत हो सकती है।
अंधविश्वास कोई अकेली चीज़ नहीं होता, दोहरा रहा हूँ, अंधविश्वास भीतरी बीमारियों का पूरा एक कुनबा होता है। जहाँ अंधविश्वास होगा, वहाँ पूर्वाग्रह होंगे; वहाँ डर होंगे; वहाँ हिंसा होगी; वहाँ अप्रेम होगा। जितनी तरीके की बीमारियाँ और बदतमीज़ियाँ हो सकती हैं, वो सब उस घर में होंगी, उस जगह होंगी जहाँ अंधविश्वास चलता होगा। ऐसे घरों से, ऐसे लोगों से सावधान। अंधविश्वास कोई छोटी-मोटी बीमारी नहीं है, फंडामेंटल बीमारी है। क्यों? बिकॉज़ द ईगो इज़ द फंडामेंटल सुपरस्टिशन।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज सत्र में आपने बोला कि नियत बदली जा सकती है, है न। तो ख़ुद की नियत को और कैसे साफ़ किया जाए, जैसे हर दिन के जो पल-पल के चुनाव होते हैं?
आचार्य प्रशांत: यमाचार्य बता तो रहे हैं; आत्मज्ञ।
प्रश्नकर्ता: संगति।
आचार्य प्रशांत: आप तरीका पूछ रहे हो और तरीके में कारणता शामिल होती है न। अगर मैं आपको कोई विधि बता पाऊँ, पूछ रहे हैं, “कैसे? हाउ टू, हाउ टू डू इट? गिव मी अ मेथड।” अ मेथड वुड ऑलवेज़ बी प्रेडिकेटेड ऑन अ कॉज़। मेथड डिमांड्स कॉज़ेलिटी, कि ऐसा करोगे तो ऐसा हो जाएगा, हेंस दिस इज़ द मेथड। इसमें मेथड नहीं चलता है। इसमें वो चलता है वो, क्या?
प्रश्नकर्ता: प्रेम।
आचार्य प्रशांत: वो कैसे वो तो। कहते हैं न, “आचार्य जी, इनका कोई परंपरा-प्रदत्त गुरु तो था ही नहीं।” तुम्हारे पास तो है न, तुम्हारे पास तो हो सकता है कि ज़िंदा वाला हो, तब भी तुमने उससे कुछ नहीं सीखा। मुझे ज़िंदा कोई नहीं मिला। लेकिन फिर भी मुझे प्रेम आता है। तुम्हें क्या पता मेरा उनसे क्या रिश्ता है! उस रिश्ते ने सिखाया। ज्ञान नहीं सिखाता, रिश्ता सिखाता है। अब विधि क्या बताएँ तुम्हें?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे पल-पल के चुनाव होते हैं। अब आपसे सत्रों में मिलते हैं या फिर ऐसे संगति होती है, है न। तो दिन भर के जो चुनाव होते हैं, उसमें जब ख़ुद के ऊपर देह हावी हो, तो उस समय तो नियत।
आचार्य प्रशांत: देह कैसे हावी हो जाती है? तुमसे दूनी देह तो मेरी है, हावी, भारी; होनी चाहिए तो इधर होनी चाहिए। देह अपना काम करती रहती है; आप करिए जो आपको करना है, क्या बताऊँ मैं। ये बैठे हुए हैं, इनके साथ आज अभी 8:00 बजे तक तो इनके साथ था। यहीं पर बैठ के चल रही थी। उसके बाद भाग के गया, थोड़ा-सा टेनिस खेला। फिर गया, बैठा, बात करी। वहाँ से भाग के यहाँ आया। देह ही है चल ही रही है।
प्रश्नकर्ता: जैसे ऐसे होता है कि श्रेय और प्रेय के चुनाव होते हैं सामने। तो आपसे तो यही सीखा है कि भाई।
आचार्य प्रशांत: हाँ, तो श्रेय को प्रेय बना लो न। जहाँ श्री है, उसी को प्रिय कर लो; श्री को प्रि कर लो। गंदा वाला प्यार अपने-आप होता है, क्या बोला है? यूँ तो सचेत चुनाव होता है, तुम चुन लो; जो श्रेय है, उसी को प्रेय मान लेंगे, चुन लिया। हर चीज़ में तो तुम लोगों को चॉइस चाहिए, तुम्हारी पीढ़ी तो चॉइस की दीवानी होती है न, तो इसमें भी चॉइस करो न। कुछ भी ऑटोमैटिक क्यों होने दे रहे हो? श्रेय है, प्रेय है सामने, बोलो कि आई चूज़ श्रेय। वैसे तो हर चीज़ में कहते हो कि नो, नो वन शुड हैव चॉइसेस इन लाइफ़; तो यहाँ पर भी चॉइस रखो।
जो सही है, उससे प्यार करना सीखो। शरीर सबका टूटता है, नींद सबको आती है। कुछ ख़ास नहीं हो रहा है, कि शरीर ऐसे, शरीर वैसे; तुम कहाँ हो उसमें? कुछ तुम भी चुनोगे या बस शरीर ही चुनता रहेगा?
कोई अलग नहीं होता शरीर के मामले में। तुम्हारा और सब जितने हम सब लोग बैठे हैं, सबका डीएनए 99.999… हम सब भाई-बहन हैं वास्तव में आपस में। सब बिल्कुल एक ही डीएनए के हैं। इतना-सा (थोड़ा) अंतर होगा कहीं पर उससे फिर किसी की नाक छोटी, किसी की लंबी हो जाती है। इतना-सा अंतर होगा वरना सब एक जैसे हैं। वो भी वही हैं हमारे जैसे, जिनको महापुरुष बोलते हैं। वो अलग कैसे हो गए? उन्होंने चुना था। शरीर तो सबका एक जैसा है, कोई ख़ास नहीं होता बाबा, कोई बिल्कुल ख़ास नहीं होता। एकदम कोई फ़र्क़ नहीं होता।
आपको यहाँ बैठ के सबकी शक्लें ऐसी अलग-अलग दिखती हैं, जाकर विज्ञान से पूछो। वो कहेगा कि छठे-सातवें डेसिमल पर जाकर के इनके डीएनए में कोई अंतर आता है; नहीं तो बिल्कुल जो इनका है वही इनका है, भाई-बहन हैं। आदमी-औरत का भी एक जैसा, कोई अंतर नहीं है। अफ्रीका का उठा लो, अमेरिका का उठा लो; अंतर चुनाव में होता है, चुनो।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, चुनाव में ऐसे कैसे पता चलेगा कि एक लोकधर्म वाली बात ही बना ली है, कि बस ख़ुद के लिए नियम बना लिए।
आचार्य प्रशांत: लोकधर्म चुनना पड़ता है क्या?
प्रश्नकर्ता: मतलब ऊपरी अनुशासन बना लिया कि ऐसे करना है, ऐसे नहीं करना है।
आचार्य प्रशांत: क्या बोलूँ, बताओ? देखो, मैं तुम लोगों को तर्क से समझाता हूँ, मैंने ख़ुद कभी थोड़ी तर्क से समझाया है। अब तुम लोगों को सीधी बातें सीधाई से समझ में नहीं आतीं तो मुझे इतना बोलना पड़ता है। मैंने ख़ुद से कभी थोड़ी इतना बोला है। मुझे तो मेरे मालिकों ने इशारा कर दिया, मैं तो इशारे पर चलने वाला हूँ। तुम इशारे पर चलने वाले लोग नहीं तो तुम्हें ये-वो, कहाँ गया वो चेस्ट प्रेस?
मैं बड़ी मेहनत लगा के आप लोगों के सवालों का जवाब देता हूँ, क्योंकि मेरे पास कोई जवाब है नहीं। आप लोगों को लगता है कि मेरी ख़ासियत ये है कि मैं बड़े अच्छे तार्किक जवाब दे देता हूँ। वो जवाब तो बड़े प्रयास से निकलते हैं। मुझे जो कुछ मिला है, वो जवाबों से थोड़ी मिला है। किसी ने इतने दिल से मुझसे कोई बात कही है, मेरी औक़ात क्या है कि मैं उसको मानूँ नहीं। बस ये है। इतने में अगर समझ में आता है, तो आ जाए; नहीं आता तो नहीं आता। और जिसको इतने में नहीं आता, उसको मैं अभी इतनी बड़ी गीता दे दूँगा तो भी न समझ में आए।
मेरे लिए तो यही काफ़ी रहा है कि कोई थे जो इतने प्यार से मुझसे कुछ बोल गए हैं, इतना मैं कठोर नहीं कि मैं उसको ठुकरा दूँ, बात ख़त्म। क्या पड़ी थी किसी को कि मेरे लिए इतना कुछ छोड़ के जाता। मैं मानवता के पूरे इतिहास का कर्ज़दार हूँ। उन्होंने दिया है, मैंने लिया है; मेरे लिए इतना ही काफ़ी है। मेरी हैसियत क्या कि मैं उनसे जाकर ज़बान लड़ाऊँ, मैं तर्क करूँ। मैं कहूँ, “मेरे इस सवाल का जवाब दोगे, तब मैं तुम्हें आचार्य मानूँगा।”
मैं कौन हूँ? मैं गधहवा हूँ, मैं शर्तें थोड़ी रखूँगा उनके सामने। मैं उनसे ये थोड़ी कहूँगा कि मैं इतना ख़ास हूँ कि मैं सवाल करूँगा, तुम जवाब दोगे। मेरी क्या हैसियत, मैं उन पर सवाल करूँ। मैंने तो सवाल करके नहीं सीखा कभी। मुझे तो ये पता है कि जहाँ प्रेम मिला मुझे, वहाँ मैंने सर झुका दिया। उसमें कुछ अगर ज्ञान होना था, तो ज्ञान हो गया। मैं उनके सामने सवाली बनकर, इन्वेस्टिगेटर या इंटेरोगेटर बनकर थोड़ी बैठा था। मैं तो ऐसे ही बैठता हूँ बच्चे की तरह; “आज नई बात बता दी, मज़ा आ गया।”
मुझे भरोसा है कि उनकी नियत ठीक है, मुझे भरोसा है उन्हें प्रेम है। तो फिर उनकी वो बातें भी, जो विरोधाभासी हैं, जो विसंगत लगती हैं, मैं उनको भी एक दूसरी दृष्टि से देख पाता हूँ। तुम्हें क्या लगता है, उपनिषदों में विरोधाभास नहीं भरे हैं? तुम्हें क्या लगता है, श्रीमद्भगवद्गीता में विरोधाभास नहीं है? क्रिटिक्स आते हैं, कहते हैं, “गीता में ये है, गीता में वो है, गीता में ये बुराई है, गीता में ऐसा है।” तुम्हें गीता की जितनी बुराइयाँ पता हैं, उससे सौ गुना ज़्यादा मुझे पता है! पर मुझे गीताकार पर भरोसा है।
लोग आते हैं, कहते हैं, “उपनिषदों में, आपको पता है ये चीज़ भी है, ऐसा लिखा है, वैसा लिखा है।” तुमने क्या उपनिषद् पढ़े? मुझसे पूछो न, तुम वहाँ जितने छेद निकाल रहे हो, मैं दस और निकाल के दे दूँगा। लेकिन मुझे ऋषियों की नियत पर भरोसा है। उन्होंने मुझे भ्रमित करने के लिए उपनिषद् नहीं दिए हैं। वो मेरी भलाई चाहते थे, इसलिए बोल रहे थे। तो जहाँ विरोधाभास दिखेगा भी, उसको मैं थोड़ी संवेदनशीलता के साथ देखूँगा।
मुझे पता है, कुछ बातें काल-सापेक्ष होती हैं। मुझे पता है, जो बोल रहे हैं, वो भी इंसान ही हैं। इंसान कभी एक दिशा से बोलता है, कभी दूसरी दिशा से बोलता है; कभी एक को बोल रहा है, कभी दूसरे को बोल रहा है; कभी एक तरह का मौका है, कभी दूसरी तरह का मौका है। सब काल की बातें होती हैं। आदमी वहाँ से समझता है। जिससे समझ रहे हो न, उसके साथ एक चीज़ होती है, वहाँ से बात समझ में आती है। वो चीज़ अगर नहीं है, आ रहा है माल अभी देखो। तीस-चालीस हज़ार पन्ने जब तक नहीं हो जाएँगे, मैं तो नहीं मरूँगा। ये मैं अपने पीछे तुम लोगों के लिए चुटकुला छोड़ के जाऊँगा, “ज्ञान; लो, जो कर सकते हो करो इसका।” कितने पन्ने का निकलेगा? लाख पार करेगा कि नहीं करेगा? करेगा, पक्का करेगा।
700 श्लोक हैं, दो घंटे के हिसाब से 1400 घंटे। 1400 घंटे और 2 मिनट का एक पन्ना होता है। तो कितने पन्ने हो गए ये? 72,000? 1400 × 60 ÷ 2, कितने हुए?
श्रोता: 42,000।
आचार्य प्रशांत: दिल तोड़ दिया यार, सिर्फ़ 42,000 पन्ने! अभी और मेहनत करनी पड़ेगी, है न। क्या मिलेगा तुम्हें 42,000 पन्नों से? जिसको जो मिलना होता है, कई बार एक पल में मिल जाता है। नहीं तो पन्ने छानते रहना।
प्रश्नकर्ता: हेलो आचार्य जी। आपने जो एक चीज़ सत्र में कही थी, कि तर्क किसी भी चीज़ को मतलब गलत से गलत चीज़ को तर्क से लोग प्रूव करने का ट्राइ करते हैं; लाइक ओवर-रैशनलाइज़ेशन। तो उसमें अभी मेरे को एक केस आया है, कि विजय माल्या का। सबको पता है कि वो काफ़ी पैसे ले के भाग गए, बट अभी उन्होंने रीसेंटली एक पॉडकास्ट किया था जिसमें उन्होंने बहुत सारे तर्क दिए, कि “नहीं, मैंने गलत नहीं किया है कुछ। और मैंने सारे पैसे लौटा दिए।” एंड लॉट ऑफ़ थिंग्स। उसके मैं कमेंट्स देख रहा था, देयर आर लॉट ऑफ़ पीपल विच आर लाइक “हाँ, ये सही है; कि अब जब सारा हो ही गया पेमेंट तो इसमें ख़राब बात क्या है?”
"सो आई वज़ जस्ट सीइंग, यस, दिस पॉइंट ऑफ़ इंटेंट इज़ वेरी इम्पॉर्टेंट;” कि इंटेंट सही नहीं है। ईवन इफ़ इट टर्न्स आउट कि उन्होंने जो पैसे दे दिए, बट द इंटेंट वज़ ऑल्वेज़ रॉंग, ईवन दैन, ऐंड थिंक ईवन नाउ। लेकिन एक सोसायटी पर भी बहुत बड़ा सवाल है, कि समवन हू हैज़ मनी एंड समवन हू हैज़ पावर, आई थिंक सोसायटी हैज़ अ विलिंगनेस टू फ़ॉरगिव देम मच मोर क्विक्ली। उनके लिए थोड़े अलग रूल्स होते हैं, रादर दैन कॉमन मैन।
यही मैं बस बोलना चाहता था कि आर वी लाइक, कैरेक्टर समहाउ इज़ बिकमिंग लेस इम्पॉर्टेन्ट दैन मनी?
आचार्य प्रशांत: बिकमिंग माने क्या? कभी पीछे सतयुग था जब कैरेक्टर, व्हटएवर इट मीन्स, वज़ मोर इम्पॉर्टेन्ट दैन मनी? तुम भी उसी मिथ से आ रहे हो न; पहले सतयुग था एंड नाउ थिंग्स आर डिटीरियोरेटिंग, सो कैरेक्टर इज़ बिकमिंग लेस इम्पॉर्टेन्ट दैन मनी। बिकमिंग माने क्या?
आत्मवलोकन यही होता है न बेटा, मन की वृत्ति शब्दों में प्रकट हो जाती है। अरे भैया, पंद्रह-बीस हज़ार करोड़ लेके तुम्हें भागने को मिले, तुम भी भाग जाओगे। इसमें ऐसा क्या हो गया कि लोगों को गुस्सा नहीं था, ईर्ष्या थी। जिस पॉडकास्ट की बात कर रहे हो उसके कितने मिलियन व्यूज़ हैं? तीन-चार-दस मिलियन हो गए, कितने हो गए?
श्रोता: पच्चीस।
आचार्य प्रशांत: फिर? तुम भी कुछ जाकर बोलो अपनी ज्ञान की बात, देखें कितने अठारह व्यूज़ आएँगे। मतलब क्या है इस बात का? किसने दिए वो व्यूज़? आम आदमी ने। आम आदमी यही चाहता है, सबको यही चाहिए। हाँ, ऊपर-ऊपर से अपना लोकधार्मिक नैतिकता होती है तो दिखा दो, “बड़ा बुरा आदमी है, गंदा आदमी है।” आदमी तो तुम्हें भी वही बनना है, द किंग ऑफ़ गुड टाइम्स।
चाहिए तो सबको वही है, बेटा। ये जो असली बात है वो मानो न, वो फ़्लेम लाइफ़स्टाइल; किंगफ़िशर एयरलाइंस देखी थी कैसी थी? मस्त। लोग एयर-होस्टेसेस के लिए एयरलाइन चुनते थे, सचमुच। एक्स्ट्रावेगेंट सब ख़र्चे, ये-वो बियर, लिकर दुनिया भर की इंडस्ट्रीज़। इनका कैलेंडर आता था किंगफ़िशर कैलेंडर। पता नहीं अब आता है कि नहीं आता है, क्या मस्त होता था। अपने लिए थोड़ी निकालते थे कैलेंडर, तुम्हारे लिए निकालते थे। तो फिर तुम्हें भी वही सब चाहिए। इसको ऐसे क्यों दिखा रहे हो, कि “अरे कलियुग आ गया, कलियुग!” कुछ नहीं आ गया, मौज सबको हमेशा से मारनी थी, आज भी मारनी है। यही जानवर की जात होती है, वही तो हैं हम सब। और कौन है?
यहाँ रोटी रखी हो, तुम्हारी रोटी है तुम भूखे हो, कुत्ता आ जाए ले कर नहीं चला जाएगा? या कुत्ता ये सोचेगा कि तुम भूखे हो? तो जानवर और क्या करता है, अपना पेट देखता है। वैसे ही जो इंसान जानवर जैसा होता है, वो किसी का भी पैसा लेकर निकल सकता है। तुम्हारा खाना रखा होता है, बंदर आके लेके नहीं भाग जाता? जानवर ऐसे ही होता है। वैसे ही तुम किसी का पैसा ले अगर भाग गए तो इसमें तुमने कौन-सी बड़ी गिरी हरकत कर दी। तुमने बस वही कर दिया जो तुम हमेशा से करते आए हो, जंगल से करते आए हो। ऐसे क्यों बोलते हो, “हॉ! पुरातन काल बहुत अच्छा था।”
पुरातन काल में भी ये सब तो हमेशा से हुआ है। देवता लोग होते थे, वो ऋषि-मुनियों की पत्नियाँ लेकर भागे हुए हैं। जानते हो? ये सब पौराणिक कथाएँ हैं, बाक़ायदा दर्ज हैं। विजय माल्या उनमें से ही किसी के भक्त होंगे। जहाँ कहीं किसी की चोरी पकड़ में आ गई, एकदम एक मैसिव आउटरेज, “कितना बुरा आदमी है, कितना बुरा आदमी है!” और तुम कैसे आदमी हो? तुम्हें भी वही होना है, बस तुम पीछे रह गए। पूरा लोकधर्म ही यही है कि वही हो जाओ, बस तुम उस रेस में पीछे रह गए हो। होना तो तुम्हें भी वही है। इतना इंडिग्नेशन, “हॉ! इतना गलत काम किया!”
यहाँ दो ही तरह के लोग हैं: एक वो, जो सफलतापूर्वक चोरी कर ले गए। दूसरे वो, जिनकी अभी हिम्मत नहीं हो रही या जिनको मौका नहीं मिल रहा। यहाँ ऐसा कोई नहीं है कि जिसको मौका भी मिल रहा हो और साहसी भी हो और चोर न हो। मिथ्याचारी याद है न, क्या परिभाषा दी थी श्रीकृष्ण ने? बाहर-बाहर से नैतिक बनता है और भीतर उसके कामनाएँ धुआँ छोड़ रही होती हैं। और बाहर से ऐसे, “नहीं-नहीं पराया धन, परायी स्त्री पर नज़र मत डालो।”
हमने कहा था, इससे बेहतर कौन होता है? सरलकाम; तुम सरलकाम बन जाओ, पहले ये मान लो कि हाँ हैं, कामनाएँ हैं। उसके बाद आगे का शायद आगे का कुछ हो पाए। हम तो छद्मकाम हैं, हैं सब कुछ और दिखाएँगे ऐसे कि “नो नो टच मी नॉट।” क्यों राघव? वो दूसरा वाला कहाँ है? बात दूर तक जा चुकि है, सार्वजनिक हो रही है।
पहले सरलकाम हो जाओ, पर सरलकाम नहीं हो पाओगे; सरलकाम माने जिसकी कामनाएँ हैं और एकनॉलेज करता है। सरलकाम हो जाओगे तो दुनिया क्या बोलेगी? “कैरेक़्टरलेस, चरित्रहीन है, देखो, खुलेआम बोल रहा है कि कामनाएँ हैं, शर्माता भी नहीं।” और लड़की है तो ख़ासतौर पर, “निर्लज्ज कहीं की, बेहया, कुल्टा;” और वो जो शब्द शुरू होता है आर से, खट से।
अभी पंजाब में एक इन्फ्लुएंसर थी, उसको गोली मार दी, कि “ये देखो, ये सब पुरुषों को ख़राब कर रही है इंस्टाग्राम पर।” वो जो भी कर रही थी, उसके व्यूज़ कौन देता था? वो जो भी कर रही थी, उसका कंज़म्पशन कौन करता था? पुरुष ही करते थे न? पुरुष ने उसको गोली मार दी, कि “देखो, ये पूरे समाज को भ्रष्ट कर रही है, नंगई फैला रही है।”
हमारे दोगलेपन का कोई हिसाब है? वो जो भी कर रही थी, पुरुषों के लिए कर रही थी, वही देख रहे थे। वही उनमें से एक ने तो बोला हुआ था, “मैंने साधारण भी रील डालकर देखी है, हज़ार व्यूज़ भी नहीं आते और नंगी हो जाती हूँ तो मिलियन से पहले नहीं रुकते, तुम ही ऐसे हो तो मैं क्या करूँ?” और उसको जाकर उसका गला वला घोंट दिया, उसको मार दिया।
पाकिस्तान में ज़्यादा होता था, भारत में भी होने लगा। जिनको चरित्रहीन बोलते हो, अनैतिक बोलते हो, चोर बोलते हो, स्वयं क्या उनसे बहुत अलग हो? बोलो। बस जिस राह पर तुम थोड़ा बहुत और चोरी-छुपे चलते हो, उस राह पर वो बहुत आगे निकल गए और खुलेआम बेधड़क निकल गए। तो जलते हो, कि नहीं? फ़ैंटेसी तो वही हैं। लिव लाइफ़ किंग-साइज तो सभी को चाहिए, कि नहीं चाहिए? अभी मौका मिल रहा होता मौज मारने का, तो मेरे सामने बैठे होते? और जिनको मिल रहा है, वो यहाँ बैठे भी नहीं हैं।