हमारी खाल का रंग क्या है? हमारी हाइट क्या है? हमारा जेंडर क्या है? हम किस घर में पैदा हुए? इनका हम कुछ नहीं कर सकते। तो अगर इसको लेकर आपको तनाव होता है या ईर्ष्या होती है, तो इसका मतलब है कि जो प्राकृतिक चीज़ें हैं, उससे ज़्यादा आइडेंटिफ़ाइड हैं। ऐसी चीज़ से हमें आइडेंटिफ़ाई ही नहीं करना है, जिसमें हमारा कोई रोल ही नहीं है। हमारा बस कहाँ चलता है? हमारे चुनाव में। चेतना का काम है चुनाव करना, आप अपने चुनावों की फ़िक्र करो कि मैं सजग रहूँ और ज़िंदगी में सही चुनाव करती चलूँ।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, इससे पहले मैं कुछ कहना चाहूँगी कि आपके आने से मेरी ज़िंदगी पूरी बदल गई। मैं हरियाणा के एक छोटे से गाँव से आई हूँ। आपके सेशन लगातार देखती हूँ, मतलब आप मेरी ज़िंदगी बन गए हो आचार्य जी। बस मेरी इच्छा ये रहती है कि मैं आपकी गुड लिस्ट में आऊँ। जैसे होता है न, जैसे अभी है, मुझे बड़ी जेलस फ़ील हो जाती है वहाँ। जब मुझे हमेशा लगता है कि आचार्य जी, मुझे भी जानें; हालाँकि मेरे काम अभी ऐसे नहीं हैं।
और इस किताब से मेरा क्वेश्चन है सर, “इफ़ यू वांट टू लिव विदाउट फ़ियर, यू मस्ट इन्वेस्टिगेट योर डिपेंडेंट।” सर, आई वांट टू लिव विदाउट फ़ियर, बट आई डोंट नो हाउ टू रिकग्नाइज़ माय डिपेंडेंट एंड हाउ कैन आई ओवरकम इट। इवन आई ऑल्सो फ़ील लाइक आई एम लेस देन अदर्स इन एव्री एस्पेक्ट। लाइक माई हाइट इज़ शॉर्ट, आय ऐम नॉट गुड ऑर नथिंग, लॉट्स ऑफ़ थिंग्स आर देयर। आई फ़ील कि मैं नहीं किसी चीज़ के लिए अच्छी हूँ। मैं हर चीज़ में हर किसी से कम हूँ। एक हीन भावना रहती है आचार्य जी, हर चीज़ को लेकर। वो फिर जेलसी में बदल जाती है।
आचार्य प्रशांत: जो चीज़ें प्रकृति ने दी हैं, उसको लेकर कोई शिकायत नहीं करी जा सकती, क्योंकि उसमें हमारा कोई




