आस्ट्रेलिया आतंकी हमलाः जब मान्यताएँ टकराती हैं

Acharya Prashant

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आस्ट्रेलिया आतंकी हमलाः जब मान्यताएँ टकराती हैं
इतिहास में जो बड़े-से-बड़े नरसंहार हुए हैं, उनमें से न जाने कितने बस इसी बात पर हुए हैं कि तू अपना धर्म परिवर्तन कर, और मान कि मेरा धर्म सच्चा है। नहीं तो मैं तेरे गाँव में आग लगा दूँगा, तुझे मार दूँगा, महिलाओं का बलात्कार कर दूँगा, सारी संपत्ति लूट लूँगा। ये सब करूँगा। ये सब क्यों? क्योंकि तू मेरी बात नहीं मानता, तू काफ़िर है। क्या है ये? मान्यता का मतलब ही है हिंसा। जहाँ मान्यता होगी, वहाँ हिंसा होगी ही होगी। मान्यता है तो हिंसा है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा सवाल जो है, हाल ही में कुछ हुए हादसों के रिलेटेड है। जो अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में जो सिडनी में हुआ था, बॉन्डी बीच में जो मास फायरिंग हुई थी। और इन केसेस में, एटलीस्ट अमेरिका वाले केस में तो पता नहीं चला उनके बैकग्राउंड के बारे में, बट सिडनी के केस में वो जो दो व्यक्ति थे, बाप-बेटे, वो सालों से मतलब ऐसे आम लोगों की तरह ही जी रहे थे।

वैसे बहुत सारे केसेस आजकल देखने को मिल रहे हैं जहाँ पर ऐसा लगता है कि ये लोग हम जैसे आम लोगों की तरह ही जी रहे होते हैं, बट पता नहीं इनके अंदर ऐसे क्या चल रहा होता है। इनके अंदर की ऐसी मूल भावना क्या होती है जो ऐसे कदम उठा लेते हैं, जो ऐसे हमें लगता ही नहीं कि ऐसा व्यक्ति कर सकता है। तो मैं इन लोगों की मानसिकता के बारे में समझना चाहता हूँ।

आचार्य प्रशांत: कितनी अच्छी बातें कर रहे थे, तुम क्या पूछ रहे हो। टिंडर बॉक्स समझते हो क्या होता है? क्या होता है? इन्फ़्लेमेबल माल भरा हुआ है एक जगह पर, लकड़ियाँ और सूखा सब। ठीक है? उसको ऐसे देखो तो लगेगा कुछ भी नहीं है, प्यारी-सी चीज़ रखी हुई है। ऐसे जलती माचिस फेंकने की देर होती है वो सब भभक जाता है।

आप जिसको सामान्य या नॉर्मल बोलते हो, वो नॉर्मल होता नहीं है न। सिर्फ़ अभी आग दिख नहीं रही है तो आपको लगता है कि नॉर्मल सी है, मामला सामान्य है।

एक भजन गाते थे जिसमें संत कबीर बोलते हैं, “आग बुझी मत जान?” किसी ने गाया, बोलो।

श्रोता: “आग बुझी मत जान, दबी है राख में।”

आचार्य प्रशांत: “आग बुझी मत जान, दबी है राख में।” तो वैसे हम बैठे होते हैं यहाँ पर, हमें लगता है कि यहाँ तो सब शांत ही है; कुछ नहीं है। कुछ नहीं है ऊपर-ऊपर से राख दिख रही है तो लगता है कि सब ठीक है। उस राख के नीचे आग है।

ज़्यादातर लोग राख के नीचे ही ज़िंदगी बिता देते हैं, तो उनकी आग कभी भभक कर बाहर नहीं आती। और कुछ लोगों की ज़िंदगी में कुछ मान्यताएँ ऐसी आ जाती हैं, धार्मिक मान्यता हो सकती है उदाहरण के लिए, या कोई विचारधारा हो सकती है, या कोई स्थिति या संयोग हो सकता है कि उनकी आग कूद करके बाहर ही आ जाती है और आसपास भी काफ़ी कुछ जला देती है।

जब जला देती है तो फिर हम इस भाषा में प्रश्न करते हैं, कि इन लोगों के साथ क्या समस्या है? जैसे तुमने करा। वो समस्या इन लोगों के साथ या उन लोगों के साथ नहीं है, वो समस्या मानवता के साथ ही है। बस कुछ वर्ग ऐसे हो सकते हैं जिनको मान्यताएँ वो मिल गई हैं जिनमें आग ज़्यादा संभावना रखती है प्रकट होने की, वरना वो आग है तो सब में ही। उसी आग को बुझाने के लिए अध्यात्म होता है।

क्या आग है? वो आग है जो जीव को, अहंकार को, भीतर ही भीतर जलाए दे रही है। पर वही आग अहंकार का प्राण भी है, वही आग उसको खा रही है, और वही आग उसकी ज़िंदगी भी है। वो आग न रहे तो उसको लगेगा मैं ठंडा हो गया, मैं मुर्दा हो गया। अब आग जलती रहे इसके लिए ईंधन चाहिए न। तो ईंधन के तौर पर वो क्या करता है? वो पूरी दुनिया को अपनी आग में झोंक लेता है।

ये जो कंज़्यूमरिज़्म है, ये और क्या है? भीतर की आग जलती रहे, इसके लिए पूरी दुनिया भीतर डाल लूँगा। सारे पेड़ काट के डाल दूँगा ताकि वो जलते रहें। भीतर की आग है।

वही रिलीजियस एक्सट्रीमिज़्म है; वही बदले की आग है; वही पैसा कमाने की आग है; वही वासना की आग है; है तो मूलतः वही। और जहाँ कहीं विचारधारा अध्यात्म से जितनी विहीन होगी, वहाँ वो आग उतना भड़क कर बाहर आएगी। बहुत जगहों पर वो आग बाहर सिर्फ़ इसलिए नहीं आती क्योंकि आप दबा के रखते हो उसको। आप दबा कर रखोगे तो भीतर-ही-भीतर कम-से-कम आपको तो खाएगी ही। इतना तो करेगी न। जो दबाकर भी नहीं रखेंगे, उनकी आग उनको भी खाएगी और पूरी दुनिया को भी खाएगी।

पर न तो उसको दबाना समाधान है, न उसको भड़काना समाधान है। उसको समझना समाधान है। समझना कोई चाहता नहीं।

प्रश्नकर्ता: सूक्ष्म रूप से हम सब में होती है वो, और स्थूल रूप में जब दिखाई देने लगता है तो हम कह देते हैं कि वो अबनॉर्मल है। सूक्ष्म रूप से जो होती है, उसको हम नॉर्मल मान लेते हैं।

आचार्य प्रशांत: जो आप अच्छे काम भी करते हो, सिर्फ़ इसलिए करते हो क्योंकि माहौल ऐसा है कि वो काम आपको परंपरा से मिल गए। ठीक है न? परंपरा कहती है बकरे को खाना चलेगा तो आप खा लेते हो। वो आपको हिंसा जैसी बात लगती ही नहीं। यही आप किसी ऐसी जगह पैदा हुए होते या ऐसे समाज में जहाँ मुर्दे को खाना भी अनुमत होता, तो आप वो भी खा लेते। आपको बुरा क्यों लगता?

बकरे को खाने या न खाने का भी फ़ैसला आपने तो करा नही, वो तो माहौल ने करवाया आपसे। वैसे ही आप सोचिए, किसी ऐसी जगह पैदा हुए होते जहाँ मुर्दे खाए जाते हैं, कि इतने लोग मरते हैं, इनका माँस व्यर्थ क्यों जाए। अभी ताज़ा-ताज़ा मरा है, इसको खा ही लो। बात तो तार्किक भी लग रही है। इतने इंसान हैं, इतनी मौतें रोज़ होती हैं, उनको खा ही लो। क्या बुराई है? तो आप खा लेते। निस्संदेह खा लेते।

बिल्कुल हो सकता है, और यदि मुझे सही स्मरण है तो इतिहास में कुछ ऐसे क़बीले, समुदाय रहे भी हैं जहाँ मुर्दों को खाने का भी रिवाज़ था। वो खा भी लेते थे। इसके आगे और बढ़ा लो। आप ऐसी जगह पैदा हुए होते जहाँ इंसान को ही खाना चलता था, स्वीकार्य था, आप वो भी कर लेते। और ये बात बुरी नहीं मानी जाती थी क्योंकि चलती थी। तो आप जब कहते हो कि कुछ लोग ज़्यादा गड़बड़ कर रहे हैं, आप कम गड़बड़ कर रहे हो; आप कम गड़बड़ सिर्फ़ इसलिए कर रहे हो क्योंकि आपके माहौल में उतना ही चलता है। आपका भी माहौल दूसरा होता तो आप भी वही सब कुछ कर रहे होते जो कोई और कर रहा है। बात आ रही है समझ में? कोई सीमा थोड़ी है। कोई सीमा है क्या?

आदमी की जो एथिक्स है, वो तो आदमी के भीतर से निकलनी है। अगर समाज ऐसा हो जाए जिसमें इंसानों को खाने की आज़ादी हो और यही नॉर्म हो और सब लोग यही कर रहे हों, तो सब लोग यही करेंगे। और वो बात किसी को भी विचित्र या ऑड नहीं लगेगी, ठीक वैसे जैसे आज आपको बकरा खाना अजीब नहीं लगता।

कोई आपसे पूछे, आपने क्या ख़ुद फ़ैसला किया था बकरा खाने का? तो आप कहोगे, “ख़ुद तो नहीं करा, माहौल ने करवा दिया।” तो वैसे ही आप इंसान को खाने का भी फ़ैसला कर सकते हो। आपका माहौल आपसे ये करवा सकता है। इसी तरह से अगर कुछ लोगों को ये माहौल दे दिया जाए, ये विचार दे दिया जाए कि धर्म की ख़ातिर दूसरों को मारना ठीक है, तो वो मारना शुरू कर देंगे। ये फ़ैसला उनका अपना नहीं है। ये फ़ैसला उनके माहौल का है; ये फ़ैसला विचारधारा का है; ये फ़ैसला उनकी परंपरा का है।

हमारी तो तथाकथित अच्छाई भी हमारी नहीं है। वो कहाँ से आ रही है? माहौल से। और हमारी तो जो तथाकथित बुराई है, वो भी हमारी नहीं है। वो कहाँ से आ रही है? माहौल से। हमारा तो कुछ भी नहीं है, और ये असली बुराई है। आपकी अच्छाई भी आपकी नहीं है। इससे बुरी बात क्या हो सकती है? आप जो अच्छे काम करते हो, सही-सही बताना, क्या इसलिए करते हो कि आप जानते हो कि इसमें कुछ अच्छाई है, या इसलिए करते हो क्योंकि सामाजिक तौर पर उस काम को अच्छा माना जाता है? बोलो, जल्दी बोलो।

श्रोता: सामाजिक।

आचार्य प्रशांत: अच्छा, आपके भीतर एक मान्यता भर दी जाए। हमारे यहाँ तो सब खूब चलता ही है कि पिछले कर्मफल और पुनर्जन्म और पाप धोना, चलता है न? आपके भीतर यह डाल दिया जाए कि आप किसी को अगर दुखी देखो, बीमार देखो, घायल देखो, कलपता देखो, संतप्त देखो, तो उसका इसमें कल्याण है, क्योंकि उसके ऊपर जो पाप चढ़ा हुआ था, उसकी पीड़ा से उसका पाप कट रहा है। आपके भीतर ये मान्यता भरी जा सकती है कि नहीं? बोलिए। जल्दी बताइए।

(श्रोता हाँ में सिर हिलाते हुए)।

भरी जा सकती है न; कि अगर कोई आदमी दर्द में है, तकलीफ़ में है, तो वास्तव में उसके पाप कट रहे हैं। उसके साथ कुछ ठीक ही हो रहा है।

अब आपने देखा, कहीं पर सड़क पर दुर्घटना हो गई। आदमी पड़ा हुआ है, उसका ख़ून बह रहा है। आप उसको अस्पताल पहुँचाओगे क्या? आपको देखेगा कोई और तो कहेगा, “इन लोगों के साथ क्या समस्या है? ये एक मरते आदमी को अस्पताल भी नहीं पहुँचा सकते।” पर आप तो वही कर रहे हो जो आपको आपकी विचारधारा ने सिखाया है। और आपको एक कारण भी दे दिया गया है कि अगर उसका ख़ून बह रहा है, उसको दर्द हो रहा है, तो उसके साथ अच्छा हो रहा है। वो पुराना पापी है। उसके पाप धुल रहे हैं। हमारा कुछ भी हमारा नहीं होता।

इसी तरीके से अगर आपको बता दिया जाए कि जो सड़क पर पड़ा हुआ है अगर आप उसको उठाकर अस्पताल पहुँचा दोगे, सहायता कर दोगे तो आपके पाप धुल जाएँगे; तो दंगे हो जाएँगे। जहाँ कहीं भी सड़क दुर्घटना हुई होगी, वहाँ आठ-दस आपस में एक-दूसरे को पेल रहे होंगे। बताओ क्यों? “मैं लेके जाऊँगा अस्पताल।” “मैं लेके जाऊँगा।” घूँसा-लात सब चल रहा है। एक-दूसरे को पीट रहे हैं कि इसे अस्पताल कौन ले जाएगा? क्योंकि जो अस्पताल लेकर जाएगा, सबसे ज़्यादा पाप?

श्रोता: उसके धुलेंगे।

आचार्य प्रशांत: उसके धुलेंगे। आप कहोगे, कितने सहृदय लोग हैं। कितने अच्छे लोगों का समाज है ये। एक-दूसरे से मुका-लात कर रहे हैं ताकि परोपकार कर सकें। ये परोपकार क्या इनका अपना है? नहीं। इनको मान्यता दे दी गई। और वो आदमी जो ख़ून बहते को सड़क पर छोड़ रहा है, ये क्रूरता क्या उसकी अपनी है? ये क्रूरता उसको दे दी गई मान्यता में। तो बुराई क्या है? बुराई क्या है? बुराई है मान्यता पर चलना। और जहाँ मान्यता होगी, वहाँ हिंसा होगी ही होगी। मान्यता है तो हिंसा है।

आप कह सकते हैं, नहीं, मान्यता ये भी तो हो सकती है अच्छाई करो, बढ़िया आदमी रहो, नेकी करो; तो हिंसा क्यों होगी? नहीं, तब भी होगी। क्योंकि जब मान्यता होगी, तो मान्यता का स्रोत हमेशा किसी आसमानी ताक़त को बताया जाएगा। तभी तो आप मान्यता मानोगे, नहीं तो आप मानोगे क्यों किसी बात को। आपको कहा जाएगा, ये मान्यता ऊपर से आई है। आज्ञा उतरी है। तो आपको किसी ऊपर वाले की कल्पना करनी पड़ेगी न, जिसने आपको सारी मान्यताएँ दी हैं।

अब आपने अपनी मान्यताओं के लिए अपना ऊपर वाला बनाया। इधर के लोग बैठे हैं, इन्होंने अपनी मान्यताओं के लिए अपना ऊपर वाला बनाया। इनका ऊपर वाला एक कहानी है। उस कहानी में कुछ किरदार हैं। ये हुआ, वो हुआ, ऐसा है। ये मोड़ है, ये रंग है। इनकी कहानी में भी कुछ किरदार हैं। ऐसा हुआ, वैसा हुआ। इतने दिन में दुनिया बनी। उसने यह फ़रमान जारी किया, फिर ऐसा किया; उसके ऐसे रंग हैं, ऐसा है, वैसा है। ये दोनों कहानियाँ आपस में कभी मेल खाएँगी नहीं, तो हिंसा तो होगी न। जहाँ मान्यता है, वहाँ हिंसा है।

ये कोई संयोग थोड़ी है कि जो गोली चला रहा है, वो मुसलमान है। जो मारे जा रहे हैं, वो यहूदी हैं। सब मान्यताओं का जो स्रोत है, वो तो रचयिता ईश्वर को ही माना जाता है न। और मेरा ईश्वर तुम्हारे ईश्वर से अलग है। मान्यता का मतलब ही है हिंसा।

दुनिया से हिंसा तब तक नहीं हट सकती, जब तक ये मान्यतावादी धाराएँ रहेंगी, जहाँ पर कहानियाँ हैं। “गॉड ने ऐसा कहा,” “भगवान ने ऐसा कहा,” “रब ने ऐसा कहा,” “अल्लाह ने दुनिया ऐसे बनाई।” जब तक ये कहानियाँ रहेंगी, तब तक दुनिया से हिंसा नहीं हट सकती।

प्रश्नकर्ता: सर, बेहोशी में जो कुछ भी किया जाए, तो वो विक्षिप्तता ही होगी फिर।

आचार्य प्रशांत: और क्या है?

प्रश्नकर्ता: तो इसको टैकल करने के लिए जो भी स्थूल कर्म कर लिए जाएँगे।

आचार्य प्रशांत: कर्म से कर्ता का उद्धार कभी नहीं होता, हमने बहुत बार कहा है।

कोई कर्म कर लो, उससे कर्ता का उद्धार नहीं हो जाएगा। कर्ता को कर्म नहीं, ज्ञान उबारता है।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम नीरज कुमार है, और मैं अभी केरल में हूँ। और यहाँ पर एक आर्किटेक्चर कॉलेज है, उसमें शिक्षक हूँ। और मैं गीता समागम से पिछले लगभग एक साल से जुड़ा हूँ।

मेरा जो सवाल है, वो अभी इसके फ़ॉलो-अप में ही है। मेरा सवाल भी इसी विषय से संबंधित है। जो ये रिसेंट हमला हुआ है ऑस्ट्रेलिया में, या कहीं भी ये जो हमले होते हैं, ये हमले कैसे हम लोग कह देते हैं कि ये लोग बड़े अमानवीय हैं और नफ़रत से भरे हुए हैं। और फिर मैं सोच रहा था कि क्या सच में ऐसा है कि ये जो नफ़रत है, ये क्या बाहर से आ रही है? या ये अंदर से आ रही है? और जैसा अभी डिस्कस हो भी रहा था कि ये बहुत ही छोटी-छोटी चीज़ें, जिनको हम मान लेते हैं शायद वो छोटी चीज़ें नहीं हैं पर ये वहाँ से निकल कर आ रही हैं।

जैसे कि हम लोग कितना भेदभाव करते हैं, ख़ुद में और दूसरे लोगों में। कहते हैं कि ये तो अलग हैं, ये हमसे अलग हैं। और जैसे धर्म के आधार पर हम करते हैं, या समुदाय के आधार पर करते हैं, या नाम के आधार पर करते हैं।

तो कहीं-न-कहीं ये जो लड़ाई है, शायद ये जो हम कहते हैं “अस वर्सेस देम” ये कहीं-न-कहीं जो लड़ाई है। और शायद ये जो हम आतंकवादी हमले बोलते हैं, शायद ये जो सोच है, हमारे अंदर जो ये इंडिविजुअलिस्टिक सोच है, हम ह्यूमैनिटी का पार्ट ख़ुद को मानते ही नहीं हैं। एक इंडिविजुअलिस्टिक अप्रोच से हम रहते हैं। तो कहीं-न-कहीं ये सबसे आई थिंक सबसे ख़तरनाक मैनिफ़ेस्टेशन है। जो ये विकृत सोच है हमारी।

आचार्य प्रशांत: “माय बिलीफ़ इज़ द ट्रुथ।” पता नहीं इतनी ईमानदारी कब आएगी अलग-अलग धर्मों और मज़हबों को मानने वालों में कि वो बिलीफ़ को बिलीफ़ बोलना शुरू कर दें और स्टोरी को स्टोरी बोलना शुरू कर दें। हम बिलीफ़ को ट्रुथ और स्टोरी को फ़ैक्ट बोलते हैं। बस यहीं सारी लड़ाई शुरू हो जाती है।

मेरी पाक किताब में लिखा हुआ है फलानी कहानी। वहाँ लिखा है, तो ट्रुथ है। अरे भाई, ठीक है लिखा है। इतना हम मान देंगे, लिखा है। ये फ़ैक्ट है कि लिखा है; चलो, इतना है, ट्रुथ मत बोलो न उसको। फिर दूसरे आ जाएँगे, हमारी पवित्र पुस्तक में तो दूसरी कहानी लिखी है। फिर तीसरे आ जाएँगे, हमारी होली बुक में तो जेनेसिस ऐसे बताया गया है। फिर चौथे आएँगे वो कहेंगे, हम तुमसे हज़ार साल पहले के हैं। यूनिवर्स की जो जीनियोलॉजी है, वो ये है। और ये बातें कभी मेल नहीं खाएँगी। अब एक-दूसरे का सिर नहीं फोड़ोगे तो क्या करोगे? फिर कोई और आ गया, जो कह रहा है कि साहब, ये सब कुछ नहीं है। इधर-उधर की बात, बिग बैंग से शुरू हुआ था। तो सब मिलकर उसको मारेंगे। कहेंगे, नास्तिक कहीं का।

ज़रा-सी ईमानदारी चाहिए, कि ठीक है, तुम्हें कोई बात माननी है तो मान लो; पर यह कहो न कि मान्यता है, यह मत कहो कि सत्य है। इतना ही है और इससे ज़्यादा; पर ये मान लिया तो अहंकार को बड़ी चोट लगती है, कि हमारे सब पुरखे वग़ैरह बेवकूफ़ थे क्या? उन्होंने तो बोला कि ये सच है। सच नहीं है। जी साहब, सच नहीं है मान्यता है। ठीक है, मान्यता है, किसी उद्देश्य से हो सकता है आपको ये कहानी बताई गई हो। ये भी हो सकता है कि किसी अच्छे उद्देश्य से आपको ये कहानी बताई गई हो। लेकिन अच्छे उद्देश्य से भी अगर कहानी बताई गई है, तो है तो कहानी।

अब तुम किसी के पीछे डंडा लेकर पड़े हो कि तू मेरी वाली कहानी क्यों नहीं मानता? ये तो विक्षिप्तता है, पागलपन है। मेरे हिसाब से आठ आसमान होते हैं। ये यहाँ बैठी हैं, इनके हिसाब से पाँच होते हैं। और मैंने यहाँ छुपा रखा है डंडा, और दे-दनादन, दे-दनादन, कि तूने कैसे बोल दिया कि पाँच आसमान होते हैं, आठ आसमान नहीं होते? ये तो तूने मेरे गॉड का अपमान कर दिया। ये तो तूने ब्लासफ़ेमी कर दी। मैं मारूँगा तुझको।

तुम पागल-वागल हो गए हो। आठ आसमान, पाँच आसमान, क्या कर रहे हो? कोई कह रहा है पृथ्वी जानवर ने बनाई। कोई कह रहा है पृथ्वी के ऊपर एक बहुत बड़ी चादर फैली हुई है। किस दुनिया में रह रहे हो? किस ज़माने में रह रहे हो? कोई आज भी मान रहा है कि पृथ्वी के चारों ओर सूरज घूम रहा है। क्या है? और फिर इस बात के लिए तुम किसी की गर्दन काटने को तैयार हो।

जो तुम्हारी बात न माने, उसको तुम कभी काफ़िर बोलते हो, कभी नास्तिक बोलते हो, कभी इन्फ़िडेल बोलते हो। पूरा होलोकॉस्ट तुमने यही बोलकर कर डाला। इतिहास में जो बड़े-से-बड़े नरसंहार हुए हैं, उनमें से न जाने कितने बस इसी बात पर हुए हैं कि तू अपना धर्म परिवर्तन कर और मान कि मेरा धर्म सच्चा है। नहीं तो मैं तेरे गाँव में आग लगा दूँगा, तुझे मार दूँगा, महिलाओं का बलात्कार कर दूँगा, सारी संपत्ति लूट लूँगा। ये सब करूँगा। ये सब क्यों? क्योंकि तू मेरी बात नहीं मानता, तू काफ़िर है। क्या है ये? पागलपन।

और शोषण बस मारने में ही नहीं होता है। मेरी मान्यता है कि फलाना वर्ण फलाने दूसरे वर्ण से ऊपर का होता है। तो तुम सब मिलकर, जो ऊपर वाला वर्ण है, उसकी सेवा करो। और इस तरह का शोषण चलेगा दो हज़ार साल। और जो न माने इसको, उसको कहो कि तू धर्म का अपराधी है। क्योंकि जो धार्मिक पुस्तक में बात लिखी है, वो तू मान नहीं रहा है। क्या है? क्या है ये?

जो बात तथ्य से मेल न खाती हो, उसकी ख़ातिर तथ्य को झुठलाओगे क्या? किसी किताब में कोई बात लिखी है जो तथ्य से, फ़ैक्ट से मेल ही नहीं खा रही, तो तुम फ़ैक्ट को झूठ बोल दोगे या उस किताब को अलग रख दोगे? किताब को अलग खिसका दो, भाई। उस किताब के जिन पन्नों में, जिन अध्यायों में, जिन हिस्सों में ऐसी बातें लिखी हों, उनको ठुकरा दो। क्योंकि वो बातें तथ्य से मेल नहीं खा रही हैं; ख़त्म। पर हम फिर कह देते हैं, होली बुक। अब होली बुक है, तो उसका एक अक्षर भी हम मान नहीं सकते कि गलत होगा।

साहब, दो हिस्से होते हैं सब पुरानी किताबों के। एक हिस्सा होता है जो वास्तव में होली होता है। वो टाइमलेस हिस्सा है; वो कालातीत हिस्सा है; वो निस्संदेह होली है। उसमें वो बातें हैं जो कभी झूठ नहीं होने वाली। और दूसरा जो हिस्सा होता है, उसमें वो बातें होती हैं जो टाइम-डिपेंडेंट होती हैं। काल-सापेक्ष बातें हैं वो। जब उनका काल बीत गया तो वो बातें भी बीत गईं, अब उन बातों पर ध्यान मत दो।

पर हम डरे हुए लोग हैं। हमको लगता है कि अगर हमने पुरानी किसी भी बात का एक शब्द भी ठुकराया, तो कहीं सारी ही पुरानी बातें न ठुकरानी पड़ें। क्यों सारी बातें क्यों ठुकरानी पड़ेंगी? जिस विवेक से हम देख पा रहे हैं कि क्या छोड़ने लायक है, उसी विवेक से हम ये भी देख पा रहे हैं कि क्या अपनाने लायक है। और उसे अपनाएँगे ही नहीं, उसके आगे सर भी झुकाएँगे। जो कालातीत है, उसको वैसे नहीं अपनाएँगे जैसे एक शर्ट अपनाई जाती है, कि अपने इस्तेमाल के लिए पहन ली। उसको ऐसे अपनाएँगे जैसे समर्पण किया जाता है अपना। उसको बस अपनाया नहीं है, उसके आगे झुक गए हैं, उसको नमन करा है। और आगे आकर बोलूँ तो उसी में जाकर के विलीन हो गए हैं। मिट गए हैं।

दोनों बात आनी चाहिए। जो किसी किताब में लिखी व्यर्थ की बात को किनारे नहीं कर सकता, वो फिर उसी किताब में लिखी असली बात के आगे पूरा समर्पण भी नहीं कर पाएगा। असली बात के आगे पूरा समर्पण करो, फिर उसमें ज़रा-भी कोताही नहीं होनी चाहिए। फिर ये नहीं कहना कि 99%। 99% नहीं, 101%। और जो बात दिखे कि ये किसी वजह से उस समय पर बोल दी गई होगी, इट्स अ मैटर ऑफ़ टाइम ऐंड सर्कमस्टैंस उसका फिर टोटल रिजेक्शन होना चाहिए। उसको कितना मानेंगे? 1% भी नहीं; 0%।

हम सब कुछ ही मानते हैं, कितना-कितना? आधा-आधा। हम व्यर्थ की बात भी मान लेते हैं, कितनी? आधी। और जो शुद्धतम और उच्चतम बात है ग्रंथों की, वो भी मान लेते हैं, कितनी? आधी। क्योंकि हम डरे हुए लोग हैं, हमारे पास विवेक नहीं है। हमें कुछ भी दिखाई नहीं देता, तो हम हर चीज़ में 50-50 हैं। कुछ लिखा है, संस्कृत में लिखा है तो आधा तो मान ही लो।

और कुछ भी हमसे पूरा माना नहीं जाता, क्योंकि पूरा मानने के लिए भीतर पूरापन होना चाहिए। पूरा कुछ मानने के लिए उस मानी जा रही चीज़ की पूरी समझ होनी चाहिए। पूरा हमें कुछ भी समझ में आता नहीं, तो पूरा हम फिर कुछ मानते भी नहीं। न पूरा हम कुछ ठुकरा पाते। हम हर चीज़ में 50-50 हैं।

मानो तो पूरा, और जो मानने लायक है, सिर्फ़ उसी को मानो। जब मानो तो पूरा मानो, क्योंकि उस मानने के पीछे अब ज्ञान है, बोध है। माना नहीं है, जाना है। शत-प्रतिशत अब मानेंगे। जाना है, इसलिए मानेंगे। और जो ठुकराया है, वो पूरा ठुकराएँगे, शत-प्रतिशत ठुकराएँगे। क्यों ठुकराएँगे? जाना है, इसलिए ठुकराएँगे। हम कहते हैं, रिस्क कौन ले? अब लिखा है तो ठीक ही होगा। मतलब ठीक है, क्या जाता है मान लो, थोड़ा-बहुत मान लो।

कोई-कोई सुरमा ऐसे निकलते हैं कि जो ठुकराने लायक है, उसको भी पूरा मान लेते हैं। फिर वो जाकर इधर-उधर हत्याकांड कर देते हैं। फिर हमें लगता है, ये कहाँ से आ गया?

प्रश्नकर्ता: मैं भी इसी, जो आपकी बात में, मैं सोच रहा था, कि जो हमारी ये पीढ़ी है आज के समय में, जिसमें हमारे पास आज के समय में साइंस के सिद्धांत हमारे फ़िंगर-टिप्स पर अवेलेबल हैं। हम किसी भी बात को जानना चाहें साइंटिफ़िक रूप से, तो हम बहुत आसानी से जान सकते हैं। और उसके बाद में हम लोग इस तरह की मान्यताएँ भी, बिलीफ़ सिस्टम में भी रहते हैं। तो मुझे लगता है शायद भविष्य में हमारी जो जनरेशन है, वो शायद ऐसी हिपोक्रेट जनरेशन जानी जाएगी, जिसके पास विज्ञान के सिद्धांत भी थे, उसके बाद में भी हम लोग बिलीफ़ सिस्टम में विश्वास कर रहे थे।

आचार्य प्रशांत: नहीं, हमें विज्ञान कुछ नहीं पता है। कोई हिपोक्रेसी का ख़तरा नहीं है हमारे ऊपर। कोई भी नहीं बोलने वाला कि आप ऐसे हिपोक्रिट थे कि साइंस जानते थे, फिर भी सुपरस्टिशस थे। क्योंकि हम साइंस?

श्रोता: जानते ही नहीं।

आचार्य प्रशांत: अब यहाँ हम सब लोग बैठे हुए हैं। मैं दसवीं की साइंस के सवाल दे दूँ, तो कितने लोग हल कर पाएँगे? अब से करना ये, गीता परीक्षा में दो सवाल साइंस के। साधारण न्यूटोनियन फ़िज़िक्स वग़ैरह, बेसिक केमिस्ट्री, और एक-आध सवाल गणित का।

ये आपको बड़ा भारी भ्रम हो गया है कि लोग साइंटिफ़िकली एजुकेटेड हैं। क्या एजुकेटेड हैं? क्या आता है किसी को? साइंस के नाम पर क्या आता है? हम टेक्नोलॉजी के कंज़्यूमर्स हैं बस। हम साइंस नहीं जानते। हम टेक्नोलॉजी के कंज़्यूमर्स हैं। ये जो मोबाइल फ़ोन है; वो दिखाओ। कुछ भी पता हो कैसे काम करता है? कोई बता दे कैसे काम करता है, कुछ भी पता है क्या? बताओ कैसे काम करता है? हम उसके कंज़्यूमर हैं, बस। हमें साइंस थोड़ी पता है। आप कार चलाते हो, कार कैसे काम करती है? नहीं बता पाओगे।

वो इंजन है, सिलेंडर है, पिस्टन है, क्या हो रहा है वहाँ पर? गाड़ी कैसे बढ़ गई? ये क्या हुआ? वो तो तेल था, गंधाता था। उससे 120 की स्पीड कैसे आ गई? कैसे आ गई? ये प्लेन है। प्लेन में बैठकर आप आ जाते हो। वो अच्छी बात है, वहाँ पर बैठ के आप एयर होस्टेस को बुला के ऑर्डर वग़ैरह दे रहे हो, या कि आपने जाकर के फ़्लाइट की टिकट बुक करा ली, सीट सेलेक्ट कर ली। आपको टेक्नोलॉजी यूज़ करनी आती है, वो ठीक है। ठीक है न? वेब चेक-इन कर लिया। ये टेक्नोलॉजी यूज़ करनी आती है।

पर कोई पूछे कि जेट इंजन काम कैसे करता है, वो आप थोड़ी बता पाओगे। फिर सुपरस्टिशन आता है। जन-जन तक टेक्नोलॉजी का फ़ायदा पहुँचाने की कोशिश में हमने साइंटिफ़िकली इलिटरेट लोगों को भी टेक्नोलॉजी का लाभ दे दिया। उसे कुछ नहीं पता साइंस पर टेक्नोलॉजी के मज़े ले रहा है वो। है न? तो बस यही है। हमें भी भ्रम हो गया, एज़ इफ वी नो साइंस। क्या वी नो साइंस? कुछ नहीं।

प्रश्नकर्ता: इस तरह तो हम लोग साइंस से और दूर हो गए।

आचार्य प्रशांत: हाँ, और क्या है।

प्रश्नकर्ता: इस तरह तो हम सिर्फ़ टेक्नोलॉजी के कंज़्यूमर हो गए। लेकिन उससे और दूर हो गए हैं, क्योंकि अभी तो जो साइंस के उपकरण हैं, वो इतने सोफ़िस्टिकेटेड हैं कि उनको समझ पाना भी अपने-आप में बहुत बड़ा टास्क है।

आचार्य प्रशांत: देखिए, बेसिक साइंस भी नहीं है लोगों की समझ में। बहुत सारे लोग तो दसवीं के बाद पढ़ते भी नहीं हैं। और दसवीं में मुश्किल से 40-50% लाकर; अपना बोर्ड वैसे ही कर दिया गया है कि कुछ भी हो, उसको निकाल दो, फ़ेल कोई नहीं होना चाहिए। साइंस किसको आती है?

कल देवेश जी कह रहे थे कि आईटी इंडस्ट्री ने बची-खुची साइंस भी खा ली। क्योंकि पहले तो फिर भी होता था कि थोड़े जो ब्राइट माइंड्स थे, वो बेसिक साइंसेज़ की ओर चले जाते थे। अब तो वो जाकर के कोडिंग कर रहे हैं। वो भी बिल्कुल लो-एंड कोडिंग। उसको हम बोलते हैं टेक जॉब। उसमें टेक भी कुछ नहीं है और साइंस तो है ही नहीं। कुछ नहीं है, ऐसा ही है बस।

जेन-ज़ी अपने से जो पहले वाली पीढ़ी थी, उससे ज़्यादा अंधविश्वासी हैं। जो मिलेनियल्स थे, उन्होंने तो फिर भी बहुत सारी सामाजिक कुप्रथाओं को और अंधविश्वासों को ठुकरा दिया था। लेकिन अभी जो ये हैं, 25 साल वाले इनकी पीढ़ी में अंधविश्वास बहुत तेज़ी से वापस आया है।

जेन-ज़ी से पहले क्या मिलेनियल्स ही आएँगे न? कौन आएगा? उनसे पहले क्या आते हैं, एक्स?

श्रोता: जेन-एक्स।

आचार्य प्रशांत: है न, जेन-एक्स आता है। जो मिलेनियल्स बैठे हैं, वो सब हाथ खड़ा करें अपना। क्या आपके समय में एस्ट्रो उतना ही प्रचलित था जितना इस पीढ़ी में है? बोलिए।

ये जो टेक्नोलॉजी एज है न इसमें सुपरस्टिशन ने ज़बरदस्त वापसी करी है। क्योंकि टेक्नोलॉजी साइंस को खा गई है। जेन-ज़ी साइंटिफ़िकली इलिटरेट है, इन्हें कुछ नहीं आता। बस ये है कि कैंपस से उठकर के सॉफ़्टवेयर में जॉब मिल गई। ठीक है अपना पड़े हुए हैं, डॉलर कन्वर्ज़न से सैलरी मिल जाती है।

उनके लिए स्पिरिचुअलिटी का मतलब ही हो गया है, एस्ट्रो, ज्योतिष। “मैं अपना ऑरा शार्प कैसे करूँ?” हँसिया ले, उसको पत्थर पर घिस, और फिर उससे अपने ऑरा को काट। “आई फ़ील माय जीएफ इज़ नाउ एक्स्यूडिंग अ डिफ़रेंट काइंड ऑफ़ वाइब। मैं क्या करूँ? ये आकर पूछ रहे हैं, कौन-सा पत्थर पहनूँ? पानी किस तरफ़ रख दूँ घर में? कोई मेंढक चलता है। मेंढक, कछुआ, वो पूछ रहे हैं कि मेंढक का कैसे, कितना बड़ा मुँह होना चाहिए? कछुआ छत पर टाँगूँ कि नहीं टाँगूँ?”

ये जेन-ज़ी है हमारी हिंदुस्तान की। जो भी हो वो छुई-मुई, जो भी है। क्या करें? विद्या का तो अभाव था ही। अब अविद्या का भी अभाव है। और एक तरह से जो ये पूरी क्लाइमेट कैटस्ट्रॉफ़ी है, ये उसी का रिफ़्लेक्शन है। अंदर-बाहर दोनों ही दिशाओं में कुछ नहीं पता।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आचार्य जी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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