बार-बार लक्ष्य छोड़ देने का कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि गलत और उधार लिए हुए लक्ष्य हैं। जिन उद्देश्यों का जन्म प्रेम, समझ और आत्मबोध से नहीं होता, वे बोझ बन जाते हैं। सही लक्ष्य भीतर की स्पष्टता से निकलता है और वही व्यक्ति को स्वाभाविक समर्पण देता है। इसलिए प्रेरणा खोजने से पहले स्वयं को जानना, आत्म-अवलोकन करना और यह समझना ज़रूरी है कि वास्तव में हमारे लिए क्या मूल्यवान है।
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प्रश्नकर्ता: पूछा है, आचार्य जी, “हमें सब पता होता है कि हमारे लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा है। हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए क्या करना है। मगर फिर भी हम वह नहीं कर पाते। हर बार एक नया लक्ष्य तय करते हैं, नया जोश होता है, नई प्लानिंग करते हैं, मगर कुछ दिन या देर बाद यह सब फिर से जस का तस हो जाता है। ऐसा मेरे साथ कई सालों से हो रहा है। कुछ थोड़ी-बहुत सफलता तो मिली है, लेकिन उच्चतम स्तर पर अभी तक नहीं पहुँच पाया हूँ। कृपया मार्गदर्शन करें।"
आचार्य प्रशांत: कौन है? किनका है? तुम सवाल की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हो, ज़िंदगी की कैसे लोगे? सवाल अपना मानस-पुत्र होता है, उसको लावारिस नहीं छोड़ते। जिन लक्ष्यों को आज तक बनाया, उनकी ज़िम्मेदारी ली थी? ली होती, तो छोड़ कैसे देते? या बस ऐसे ही लावारिस पैदा कर दिए थे?
प्रेम में जो कुछ आता है, व्यक्ति कृतज्ञ अनुभव करता है उसकी ज़िम्मेदारी लेने को। और दबाव में और भ्रम में जो कुछ आएगा, तुम काहे उसकी ज़िम्मेदारी लेना चाहोगे, भाई? यूँ ही कोई लक्ष्य बन गया, इधर-उधर के प्रभावों के कारण, मन की किसी लहर के चलते कोई उद्देश्य बना लिया, तो तुम उस उद्देश्य के साथ इंसाफ़ करोगे नहीं, क्योंकि तुम उसके साथ इंसाफ़ करना चाहोगे ही नहीं। उस लक्ष्य में तुम्हारा सरोकार ही कितना है, उस लक्ष्य में तुम्हारी आंतरिक आत्मीयता ही कितनी है। वह लक्ष्य तुम्हारा है ही कितना, भाई। वह तो यूँ ही बन गया था।




