दुनिया के बारे में तो तुम्हें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ही खूब पढ़ा देती है। तुम कौन हो, कैसे हो, मन क्या चीज़ है, इसके बारे में कुछ नहीं बताती। तो इसीलिए अपूर्ण है ये व्यवस्था। देखो कि बच्चे को उसका सारा मानसिक भोजन कहाँ से मिल रहा है। तुम्हें बच्चे को कुछ नया सिखाने की ज़रूरत तो है, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा बड़ी ज़रूरत है उन सब रास्तों को रोकने की, जिनसे ज़हर बच्चे में प्रवेश करता है। जो-जो कर सकते हो, सब कुछ करिए। यही वास्तविक अध्यात्म है, यही वास्तव में पुण्य का काम है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जिद्दू कृष्णमूर्ति जी की एक बुक पढ़ रहा हूँ। उसमें वो कई बार वर्णन करते हैं कि अभी का जो करेंट एजुकेशन सिस्टम है, वो गलत जा रहा है। तो वो कह रहे हैं, एजुकेशन सिस्टम ऐसा होना चाहिए जिससे हम फ्री हो सकें। तो वो एजुकेशन सिस्टम क्या है, जिससे कैसे फ्री हुआ जा सके और क्या पढ़ाया जाए?
आचार्य प्रशांत: दुनिया के बारे में तो तुम्हें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ही खूब पढ़ा देती है। तुम कौन हो, कैसे हो, तुम्हारी प्रक्रियाएँ कैसे चलती हैं, मन क्या चीज़ है, इसके बारे में कुछ नहीं बताती। तो इसीलिए अपूर्ण है ये व्यवस्था। गलत इसीलिए है क्योंकि अपूर्ण है, इसे पूर्णता चाहिए। पूर्णता इसमें तब आएगी जब इसमें आत्मज्ञान भी शामिल होगा।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे शिक्षा व्यवस्था की बात हो रही थी कि उसमें अपने बारे में कुछ बताते नहीं। लेकिन एक बात दिमाग में आती है कि जैसे हम आपके सामने सत्र में बैठे हैं, और आप हमें बता रहे हैं, सुन रहे हैं, समझ रहे हैं। लेकिन अगर व्यवस्था में लागू किया जाए, तो उसके हिसाब से लोग रहेंगे, शिक्षक रहेंगे जो ग्रंथों को पढ़ेंगे पढ़ाएँगे। फिर वो व्यवस्था धीरे-धीरे बन जाती है जो बन चुकी है और बनी है; जो बताते तो सत्य के बारे में हैं, बताते तो वही हैं जो ग्रंथ कह रहे हैं। लेकिन वो बन जाती है कट्टर पंथिता या सत्य पंथिता के नाम पर कट्टर पंथिता।




