महिलाओं में गिल्ट की भावना

Acharya Prashant

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महिलाओं में गिल्ट की भावना
‘मुझे किसी की फीलिंग्स नहीं हर्ट करनी है। मुझसे मम्मी-पापा के आँसू नहीं देखे जाते। मैं गिल्टी फील करने लगती हूँ।’ गिल्टी फील करना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है लेकिन सही वजह से गिल्टी फील करो न। असली गलती यह है कि आप अपना जीवन व्यर्थ कर रही हैं। न ज्ञान है, न कला है, न कौशल है, न अनुभव है, कुछ नहीं है, दुनिया देखी नहीं है। महिला वग़ैरह आप बहुत बाद में हैं, सबसे पहले आप इंसान हैं और इंसान होने का मतलब ही होता है कि चेतना होना। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न ये था कि आपसे ये समझने को मिलता है कि बॉडी आइडेंटिफिकेशन उसी से पैट्रिआर्की, ये किसी भी लड़की के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं। पर मुझको ये भी दिखता है कि ये जो गिल्ट होता है कि मैंने अपने लिए कुछ कर लिया, तो रिस्पॉन्सिबिलिटी छोड़ दी, अपने लिए कर रही हूँ सिर्फ़, सेल्फ़िशनेस का जो गिल्ट होता है, ये उससे भी बड़ा मुझे लगता है कि दुश्मन है। तो इस गिल्ट की जो फ़ीलिंग होती है, गिल्ट की, ये कहाँ से और इससे छूटा कैसे जाए? कि मैंने अपनी रिस्पॉन्सिबिलिटीज़ छोड़ दी अपनी, या दूसरों से मतलब ज़्यादा नहीं है।

आचार्य प्रशांत: किसकी तरफ़ रिस्पॉन्सिबिलिटी?

प्रश्नकर्ता: जैसे एक गृहणी है वो कह रही है कि मैं अब घर का काम ज़्यादा नहीं करूँगी। मैं अब अपने लिए इंडिपेंडेंटली काम करूँगी। तो वो कह रही है कि मैंने अब रिस्पॉन्सिबिलिटी छोड़ दी अपने घर की मैं अब अपने लिए कर रही हूँ, तो गिल्ट आ जाता है।

आचार्य प्रशांत: देखो, रिस्पॉन्सिबिलिटी छोड़ने पर तो गिल्ट जायज़ है। गिल्ट का मतलब होता है, दोष। गिल्ट का मतलब होता है गलती है। जो दोषी होता है उसको बोलते हैं गिल्टी। ठीक है? तो अपराधभाव, गिल्ट; अगर सचमुच आपने अपनी रिस्पॉन्सिबिलिटी, माने अपना जो वास्तविक कर्तव्य है वो छोड़ा है, तो आप दोषी हैं।

और ये बात अच्छा करा कि उठा दी, ये बात बहुत महिलाओं की रहती है। कि उनको बता भी दो कि सच्चाई क्या है, उनको दिखने लग जाए स्वयं भी कि सच्चाई क्या है, तो भी उनको ये रहता है कि “मुझे किसी की फ़ीलिंग्स नहीं हर्ट करनी है। और मेरी वजह से कोई बेचारा रो पड़ा, तो मैं बहुत गिल्टी फ़ील करती हूँ।”

कहें, तुम ये क्यों तमाम तरह के बंधनों में और नरक में पड़ी हुई हो? कह रहे हैं, “क्योंकि मेरे पेरेंट्स ऐसा चाहते हैं।” अरे! पेरेंट्स ऐसा चाहते हैं तो तुम उस पर कुछ कर क्यों नहीं कर सकती विरोध? बोलती हैं, “मैं करती हूँ। मैं जब करती हूँ तो मम्मा रोना शुरू कर देती है। तो फिर मुझे बड़ा गिल्टी फ़ील होता है। तो फिर मैं नहीं करती कुछ। मुझसे मम्मा-पापा के आँसू नहीं देखे जाते, मैं गिल्टी फ़ील करने लगती हूँ।” अब भले ही वो बहुत मूर्खतापूर्ण कारणों से रो रहे हों, मम्मा-पापा, लेकिन गिल्टी बहन जी अनुभव करने लगती हैं। वो दिक़्क़त हो जाती है।

वैसे ही बच्चों को लेकर होता है। उनको बोलो कि “तुम्हारा जन्म इसलिए थोड़ी है कि बस तुम घर में ही पच-मरो।” बोलती है, “नहीं, वो मुझे सब लोग बोलते हैं कि तुमने बच्चों की ज़िम्मेदारी ठीक से नहीं उठाई है। तुम * वर्किंग वुमन* हो, तो देखो तुम्हारे बच्चों को माँ की ममता नहीं मिल रही है। तो फिर मुझे बड़ा गिल्टी फ़ील होता है। मुझे तो प्रमोशन भी मिल रहा था, मैंने प्रमोशन रिजेक्ट कर दिया। क्योंकि मैं ज़्यादा टाइम घर को देना चाहती थी। मुझे दूसरे शहर में ज़्यादा रिस्पॉन्सिबिलिटी की जॉब मिल रही थी, मैंने वो भी रिजेक्ट कर दी, क्योंकि बच्चे हैं न और हस्बैंड हैं। वो तो मैं क्या बताऊँ, मुझ पर कितना डिपेंडेंट रहते हैं। वो तो मेरे हाथ के अलावा किसी के हाथ की चाय पीते ही नहीं।”

वो दूसरों के हाथ का क्या-क्या पीते हैं ये सैटरडे नाइट को होता है, तुमने कभी जाकर देखा नहीं। बोले, “नहीं, वो तो कहते हैं कि देखो अगर मेरे कपड़े तुमने प्रेस नहीं किए हैं, तो मुझे उसमें तुम्हारे हाथ की ख़ुशबू नहीं आती, तो मैं पहनूँगा नहीं।” अच्छा, तो नंगे चले जाएँगे? वैसे ही फ़ादर-इन-लॉ हैं। वो बोलते हैं, “सुबह-सुबह साढ़े चार बजे मुझे तेरे ही हाथ की चाय चाहिए, और मैं उनको नहीं देती तो वो पीते नहीं हैं और फिर मुझे बड़ा गिल्टी फ़ील होता है।”

ये क्या चल रहा है! हमें गिल्ट का मतलब भी पता है क्या? मतलब भी पता है गिल्ट का? गिल्ट तब है जब तुमने अपनी रिस्पॉन्सिबिलिटी न पूरी करी हो। तो माने अपने-आप को गिल्टी कहने, न कहने के लिए सबसे पहले अपनी रिस्पॉन्सिबिलिटी पता होनी चाहिए न। पता होनी चाहिए! और सचमुच आपका कर्तव्य क्या है, इसके लिए आपको पहले ये पता होना चाहिए कि आप सचमुच कौन हो। नहीं तो आप अपनी सारी रिस्पॉन्सिबिलिटीज़ बस दुनिया से ही उठा लोगे, कि दुनिया ने बता दिया आपकी ये रिस्पॉन्सिबिलिटी है तो आपको पूरी करनी है।

आपको कैसे पता कि उनको साढ़े चार बजे सुबह-सुबह चाय देना आपकी रिस्पॉन्सिबिलिटी है? ये कैसे पता आपको? आपको समाज ने, परिवार ने और फ़िल्मों ने नहीं बताया होता, तो क्या आपको पता होता? आपको दिख नहीं रहा है कि ये जिसको आप अपनी रिस्पॉन्सिबिलिटी समझ रहे हो, इसमें कहीं भी कोई बोध या रियलाइज़ेशन नहीं है। सिर्फ़ इंडॉक्ट्रिनेशन है, कंडिशनिंग है।

आपके ऊपर एक लड़की या महिला होने के नाते ये बात थोप दी गई है, कि तुम अच्छी तभी हो जब तुम ये-ये सब करो। अगर तुम कहीं बाहर न निकलो, कुछ न करो, अपने आपको घर में ही खपा दो बिल्कुल, तो तुम देवी हो। तो तुम देवी हो! देवी तो तुम हो पर शर्तें हैं उसके साथ, कंडिशनली हो तुम देवी। अगर तुम अपने लिए कुछ करने लग गईं, तो फिर तुम देवी नहीं हो। फिर तुमको बोलेंगे कि ये तो राक्षसनी है, चुड़ैल है।

ये जो संस्कृतिवादी लोग हैं, जानते हो ये लोग जिन किताबों का हवाला देते हैं, पुरानी धार्मिक किताबों का, वो कहते हैं कि “महिला के लिए पति के अलावा और कोई कर्तव्य है ही नहीं।” तो अब बताओ और रिस्पॉन्सिबिलिटी क्या बची तुम्हारी फिर?

“न कृष्ण के प्रति कोई कर्तव्य है, न राम के प्रति, न धर्म के प्रति, न समाज के प्रति, तुम्हारा कोई कर्तव्य नहीं है। तुम्हारा एकमात्र कर्तव्य है, पतिपरायणता।” ये शब्दशः लिखा हुआ है और आज तक हिन्दू समाज इसी पर चलता रहा है। कह रहे हैं, “स्त्री को तो गुरु की भी ज़रूरत नहीं है। पति ही गुरु है।” और कहा गया है कि “ऐसे गुरु लोग नरक में जाकर गिरते हैं जो स्त्रियों को शिक्षा देते हैं, क्योंकि स्त्री को शिक्षा नहीं देनी चाहिए। स्त्री को शिक्षा सिर्फ़ और सिर्फ़ उसका पति दे सकता है।”

उनके अनुसार मैं नरक का बड़ा भागी हूँ। अभी तो यहाँ पर एक-तिहाई आप ही लोग बैठी हुई हैं। वहाँ से आ रहा है आपका कॉन्सेप्ट ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी; उन किताबों से आ रहा है और उन परंपराओं से आ रहा है। पर आप ये समझते नहीं, आपको लगता है कि आपने जो कॉन्सेप्ट ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी पकड़ा है वो आपके भीतर से आ रहा है। नहीं, वो भीतर से नहीं आ रहा है। देखो तो कि कहाँ से आ रहा है।

और इसीलिए अलग-अलग देशों में, अलग-अलग कालों में ये जो रिस्पॉन्सिबिलिटी का कॉन्सेप्ट है, ये अलग-अलग होता है। अमेरिकन महिला से पूछो, “टू हूम ऐंड व्हाट एक्ज़ैक्टली इज़ योर रिस्पॉन्सिबिलिटी?” उसका उत्तर एक आएगा। ईरानी से पूछो तो दूसरा आएगा; चीनी से तीसरा आएगा; और भारतीय से पूछो तो एकदम अलग। और भारत में भी एक उत्तर-पूर्व चले जाओ। जहाँ मैट्रिआर्कल सोसाइटीज़ हैं, वहाँ पूछोगे तो वहाँ एकदम अलग उत्तर आएगा। तो भारत में भी एक उत्तर नहीं आना है।

भारत में भी किसी बड़े शहर की किसी कामकाजी शिक्षित महिला से पूछो तो एक उत्तर आएगा, और किसी ग्रामीण इलाके की सीधी-सादी अशिक्षित महिला से पूछो, तो एकदम दूसरा उत्तर आएगा। तो ये जो उत्तर हैं, ये कहाँ से आ रहे हैं? निश्चित रूप से हमारे हृदय से तो नहीं आ रहे हैं। हमारी जो रिस्पॉन्सिबिलिटी, जिसको हम कर्तव्य कहते हैं, वो हमारे हृदय से तो नहीं उठते। वो हमको जो पाठ पढ़ा दिया गया है वहाँ से उठते हैं न। तो अगर वो पूरी रिस्पॉन्सिबिलिटी है आपके ऊपर बाहर से थोप दी गई है, तो वो आपकी कैसे हो गई?

जो चीज़ आपके ऊपर बाहर से डाल दी गई है, आप मुझे बताइए न, वो आपकी कैसे हो गई? श्रीकृष्ण तो कहते हैं श्रीमद्भगवद्गीता में कि एक ही तुम्हारा कर्तव्य है, “मेरी तरफ़ आना; मामेकं शरणं व्रज। और बाक़ी सारे कर्तव्यों को तुम त्याग दो। बाक़ी जितने भी कर्तव्य हैं, उनका तुम परित्याग करो, एक ही तुम्हारा कर्तव्य है।” जब एक ही तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम श्रीकृष्ण, यानी सत्य, माने ब्रह्म की ओर जाओ, तो ये बाक़ी सारे कर्तव्य तुमने कहाँ से उठा लिए? तुमने पति को परमेश्वर कैसे बोल दिया और ये सब बाकी बातें, कि ये करना, वो करना?

देखो, बच्चों के प्रति एक तो प्राकृतिक ममता होती है, वो समझ में आती है। वो सब स्त्रियों में होगी। वो तो लिंग की बात है, आप स्त्री पैदा हुए हो, वो तो पशुओं की मादाओं में भी होती है। गाय को देखो, बछड़े के प्रति ममता दिखाएगी। हिरनी को देखो, वो अपने शावक के प्रति ममता दिखाएगी। पक्षियों में जो माँ होती है, वो ला-ला करके अपने बच्चों को दाना चुगा रही है।

तो कुछ तो वो बायोलॉजिकल होती है, लेकिन अगर वो बायोलॉजिकल मात्र होती तो भारतीय माँ में इतनी ज़्यादा कैसे पाई जाती, हाइपर ममता? चीनी माँ में क्यों नहीं पाई जाती? जापानी माँ में क्यों नहीं पाई जाती? अमेरिकन माँ में क्यों नहीं पाई जाती? माने वो सिर्फ़ बायोलॉजिकल नहीं है, वो सोशल भी है।

आपमें ये जो ममता का कॉन्सेप्ट डाल दिया गया है, वो बेसिकलि कंडीशन्ड है, सोशल है। नहीं तो वो दुनियाभर की महिलाओं में एक-सा पाया जाता न? ममता दुनिया भर की महिलाओं में होती है, पर भारतीय महिलाओं में बहुत ज़्यादा उग्र होती है, उग्रवादी ममता, गज़ब ममता।

तीस-तीस, पैंतीस-पैंतीस साल के हो गए हैं, वो बेरोज़गार घर में पड़े हुए हैं, माँ की ममता अभी थम ही नहीं रही है। कह रहे हैं, “माँ है न! माँ है।” और वही ममत्‍व जो है आपने उसको बहुत आदरणीय बना दिया है। जो जितनी ममता दिखाए, आप उतना कहते हो, देवी-समान माँ है। एकदम बैल जैसा इसका लड़का है, लेकिन आज भी उसकी दिन-रात सेवा करती है। क्या ममता है! गज़ब ममता है!

तो गिल्टी फील करना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन भाई, बहन, सही वजह से गिल्टी फील करो न! गलती करी हो, भीतर अपराध-भाव उठे, ठीक भी है। क्या गलत हो गया? सही बात है। गलती करी थी, अपराध-भाव आ रहा है तो तुम स्वीकार कर रहे हो गलती हुई।

अगर स्वीकार कर रहे हो कि गलती हुई, तो शायद सुधार करोगे; उसमें कोई दिक़्क़त नहीं, अपराध-भाव में, गिल्ट में। लेकिन तुमको पता ही नहीं है कि तुम्हारी असली गलती क्या है, और झूठ-मूठ की गलती में तुम कह रहे हो, “हाय! हाय! आई एम गिल्टी।” तो ये तो बड़े मज़ाक की बात हो गई। असली गलती जो हो रही है उसका देवियों को कुछ पता ही नहीं होता है।

असली गलती ये है कि आप अपना जीवन व्यर्थ करे दे रही हैं। न ज्ञान है, न कला है, न कौशल है, न अनुभव है, कुछ नहीं है। दुनिया देखी नहीं है।

लड़के मज़ाक बनाते हैं। आप वहाँ पर जाओ, इंस्टाग्राम वग़ैरह पर, वहाँ “दीदी ओ दीदी” लिखकर या “पापा की परी” लिखकर के आपको दो-सौ ऐसे मिल जाएँगे वीडियो, जिसमें वो दिखा रहे हैं कि उसको स्कूटी चलाना नहीं आता। उसको स्कूटी दे दी है, तो वो कहीं जाकर दरवाज़े पर चढ़ गई स्कूटी लेकर।

या कि एक दिखाया था कि उसको स्कूटी दे दी है, तो वो ले गई एक आदमी को; बुज़ुर्ग अंकल जा रहे थे, उनको पीछे से टक्कर मारी। तो वो थोड़ा गिरे-से, फिर ये भी गिर गईं, तो उन्होंने गिरने के बावजूद इनको उठा दिया और आगे को चले। जब वो आगे को चले तो इन्होंने जाकर उनको फिर से ठोक दिया। और उस पर मिलियन्स में व्यूज़ हैं, लाइक्स हैं। ये सब चल रहा है। ये आपकी असली गिल्ट है कि आपको स्कूटी चलाना भी नहीं आता। लेकिन इस बात का आपको कोई एहसास नहीं है, इसको आप समझती हैं “हमारी क्यूटनेस है। हमें कुछ नहीं आता।”

वो लड़के फिर और वीडियो बनाते हैं। कहते हैं, “ये देखो, स्टार्ट कर रही हैं;” वो स्टार्ट करने की जगह स्टैंड पर किक मार रही है। और दुनिया भर के लड़के आकर उसमें मज़े ले रहे हैं, कमेंट कर रहे हैं, कि ये कहती हैं कि हम लड़कों की बराबरी करेंगे और ये स्कूटर लेकर निकली और उसका जो स्टैंड है, उसमें किक मार रही हैं और कह रही हैं, “स्टार्ट नहीं हो रहा, स्टार्ट नहीं हो रहा।”

आधे से ज़्यादा जो लड़कियों को लेकर के ह्यूमर होता है, वो ह्यूमर वास्तव में, आप उसे ग़ौर से देखेंगे तो वास्तव में जो ह्यूमर है, फीमेल-सेंट्रिक ह्यूमर; वो यही दिखा रहा होता है कि कितनी बेवकूफ़ है। वो जो फीमेल-सेंट्रिक ह्यूमर, है वो बस यही दिखा रहा होता है कि देखो कितनी बेवकूफ है। ये है न गिल्ट की बात।

उसमें ह्यूमर जैसा कुछ नहीं है, वो पूरी नारी-जाति का अपमान किया जा रहा है। लेकिन तब आपको समझ में नहीं आता, तब आप भी हँस देती होंगी। आप भी उसमें कमेंट करके नीचे लिख देती होंगी, “वेरी गुड” या इमोजी स्माइली वाला बना दिया; या उसमें दिखा देंगे कि देखो, ये कितनी बॉडी-सेंट्रिक है।

उसमें एक ऐसे ही शुरू हुआ, “माय वाइफ़ ऑन पीरियड्स।” फिर दिखाते हैं उसमें कि वो पागल हो गई है, वो चिल्ला रही है। दिखाया कि अब वो तीन-गुना लोड उठा लेती है, उसकी स्पीड तीन-गुनी हो जाती है और वो तीन-गुना ज़्यादा चिल्लाती है। और फिर वो अचानक तीन-गुना ज़्यादा रोना शुरू कर देती है। देखो कैसी हार्मोनल स्विंग्स हैं उसकी।

और उसको इतने मज़ेदार तरीके से दिखाया है कि सब हँस रहे हैं, “हा, हा, हा।” और उसमें लड़कियाँ भी आकर कह रही हैं, “हाँ, ये तो सही बात है।” मज़े ले रही हैं। यही है गिल्ट की बात, कि अगर आप अपने शरीर को नहीं पहचानती हैं और शरीर में से जो आवेग उठते हैं, आप उसका ग़ुलाम बन जाती हैं; और इसी बात का जो पुरुष-समाज है, वो फिर फ़ायदा भी लेता है, मज़े भी उठाता है।

लेकिन ये नहीं समझ में आता कि यही असली *गिल्ट है। आप बस इतना कर लो कि सोशल मीडिया पर महिलाओं को लेकर जो बातें हो रही हैं या जो वीडियो, उनको देख लो और उनमें बताओ कि उसमें कहाँ आपके ज्ञान की बात हो रही है, बताओ? कहाँ बात हो रही है?

और फिर बहुत सारे निकल आते हैं, वो अपने-आप को कहते हैं, “हम एंटी-फेमिनिस्ट हैं।” वो सोशल मीडिया पर अभी बहुत प्रसिद्ध हैं। भारत में भी हैं, विदेशी भी हैं। उनका काम ही यही है कि वो दिन-रात महिलाओं को एकदम शाब्दिक तरीके से पीट रहे हैं। कह रहे हैं, “ये देखो, ये फेमिनिस्ट बनती है। ये हमारी बराबरी करने आएगी, इसको आता क्या है!” और उनको बहुत तालियाँ मिलती हैं।

खेद की बात जानते हो क्या है? आधे से ज़्यादा बातें जो वो कह रहे हैं, उनमें कहीं-न-कहीं, कुछ-न-कुछ तथ्य होता है। वो कहते हैं, “ये महिलाएँ ऐसी बनती हैं। बताओ, दुनिया के आधे से ज़्यादा काम ऐसे हैं जिनमें एक भी महिला नहीं पाई जाती, क्योंकि वो ऐसे काम करना ही नहीं चाहतीं। फिर ये कहती हैं, इन्हें पुरुषों की बराबरी करनी है। हम क्यों इनको बराबरी का दर्ज़ा दें?” और वो खूब मज़ाक उड़ाते हैं।

गिल्ट होनी चाहिए महिला को, कि वो ऐसे मज़ाक का पात्र बनी। और वो जो बात कभी भी मज़ाक की होती है न, अगर वो पूरी तरह झूठी होती तो मज़ाक नहीं बन पाती। कोई चीज़ जोक भी तब बन पाती है जब उसमें थोड़ा-बहुत सच ज़रूर होता है।

तो ये लोग जो महिलाओं का उपहास उड़ाते हैं, ये लोग उपहास उड़ाने में जो बातें बोलते हैं, उनमें कहीं-न-कहीं थोड़ा-बहुत सच होता है। इस बात पर गिल्ट होनी चाहिए न महिलाओं को, लेकिन इस पर गिल्ट नहीं है। गिल्ट इस बात पर है, कि “अरे, अरे, अरे! वो बुआ के लड़के की फूफी की ताई की सास की शादी थी।” सास की शादी? हो सकती है चलो, हम लिबरल लोग हैं; सास की भी शादी हो सकती है। तो मैं वहाँ जा नहीं पाई न सिंगिंग के लिए।” अब इस बात की बड़ी गिल्ट है कि, “ऑफिस में मीटिंग थी, इसलिए बुआ की ताई के फूफा के लड़के की सास की शादी में मैं जाकर नाच नहीं पाई।” इस बात की गिल्ट है।

ये गिल्ट की बात है?

न कर्म का पता, न धर्म का पता, न दीन का पता, न दुनिया का पता , उसकी कोई गिल्ट नहीं रहती है।

तब तो बिल्कुल आप महिलाओं का आत्मविश्वास देखिए, घोर आत्मविश्वास, एकदम ऐसे! कुछ नहीं पता, लेकिन आत्मविश्वास भरपूर है। जिस चीज़ पर गिल्ट होनी चाहिए, उस पर नहीं होती; और जहाँ गिल्ट की कोई ज़रूरत नहीं है, वहाँ बड़ी गिल्ट रहती है। कारण? रिस्पॉन्सिबिलिटी का कॉन्सेप्ट ही क्लियर नहीं है। इंपोर्टेड है रिस्पॉन्सिबिलिटी।

दुनिया से उठा लिया है कर्तव्य का सिद्धांत, बोध से नहीं आ रहे हैं अपने कर्तव्य। हर इंसान के निश्चित रूप से कर्तव्य होते हैं। और होते हैं, बच्चे के प्रति भी होते हैं, अपने पति के प्रति भी होते हैं, माँ-बाप के लिए भी होते हैं, दोस्त-यार के लिए भी होते हैं, इन सबके लिए कर्तव्य होते हैं। मैं नहीं इंकार कर रहा हूँ कि कर्तव्य बिलकुल नहीं होते; पर आपका कर्तव्य वास्तव में कितना है, किस दिशा में है, किसके प्रति है, ये जानने के लिए अपनी आँखें तो खुली होनी चाहिए न।

कोई मेरी बात को ये न समझे कि मैं कह रहा हूँ, कि बच्चे को उठाकर कूड़ेदान में डाल दो; और बच्चे को देखना एकदम ज़रूरी नहीं है। नहीं ये नहीं कह रहा हूँ मैं! मैं तो कहता हूँ, माँ होना बड़ी ज़िम्मेदारी का काम है। एक बच्चे को बड़ा करना ऐसा ही है जैसे आप क्रिएटर हो गए, रचयिता हो गए; बहुत ज़िम्मेदारी का काम है।

लेकिन ज़िम्मेदारी की हमारी परिभाषा ही विकृत है। हम नहीं जानते हैं। बच्चे के प्रति भी हम अपनी ज़िम्मेदारी क्या मानते हैं? उदाहरण के लिए; अगर हम माँ हैं तो हम कहते हैं कि बच्चे के लिए हमारी ज़िम्मेदारी है, “उसको अच्छे से खिला-पिला दिया; शरीर बढ़िया चल रहा है उसका। देखो कैसे उसके गुदगुदे हाथ-पाँव और पेट है। कुलू-कुलू-कुलू!” गोरा-गोरा एकदम, कंघी कर दी, तेल-वेल लगा दिया अच्छे से। ये हो गई बच्चे के प्रति ज़िम्मेदारी।

और सब कहते हैं, “देखो कितनी अच्छी माँ है! देखो इसका बेबी कितना हेल्दी है।” पूरा पाँच किलो ओवरवेट। “क्या मस्त बेबी है इसका, एकदम गुदगुदा ऐसे, उठाकर खेलो खिलौना है।” हमें लगता है हम बहुत अच्छी माँ हैं। अब उस बच्चे की चेतना विकसित हो रही है कि नहीं हो रही, हमें नहीं पता।

माँ की बच्चे के प्रति गहरी ज़िम्मेदारी है। पर ज़िम्मेदारी क्या सिर्फ़ शरीर तक ही रहेगी कि उसको तेल कंघी कर दिया, बढ़िया खाना-वाना खिला दिया, या वास्तविक ज़िम्मेदारी होगी कि उसका मन कैसा हो रहा है? बोलो। पर माँ को अपने ही मन का कुछ नहीं पता वो बेबी के मन का क्या ख़्याल रखेगी? उसका जैसे अपने ही बस शरीर से ताल्लुक रह गया है। वैसे ही वो बच्चे के भी बस शरीर से ही ताल्लुक रख पाती है। इसलिए सेल्फ नॉलेज आत्मज्ञान इतना ज़रूरी होता है।

महिला वग़ैरह आप बहुत बाद में हैं। सबसे पहले आप इंसान हैं और इंसान से पहले आप चेतना हैं। इंसान होने का मतलब ही होता है कि चेतना होना। कॉन्शियसनेस हैं आप।

ये महिला-वहीला तो सब ठीक है। दो जेंडर होते हैं, उसमें से एक आपका है, वो ठीक है। वो कोई बहुत बड़ी बात नहीं हो गई। कॉन्शियसनेस के प्रति आपका जो कर्तव्य है, वो आपने कभी समझा क्या? वो समझा? किसी के प्रति हमें कोई कर्तव्य नहीं पता है, कुछ नहीं। अपने जीवन में जब आपने न ज्ञान को महत्त्व दिया, न कौशल को महत्त्व दिया, तो आपकी छोटी बेटी हुई है, आप उसके जीवन में इन चीज़ों को महत्त्व दे पाएँगी? बताइए।

मैं माँ से पूछूँ, फिर वही बात, कि तुमने यात्राएँ कितनी करी? माँ कहे, “कुछ नहीं करी।” तुमने बाज़ार भी देखें ठीक से? “नहीं, वो भी नहीं देखे।” व्यापार कैसे किया जाता है, तुम्हें कुछ पता है? ये जो पूरा कॉर्पोरेट वर्ल्ड है कैसे चलता है? “नहीं।” बड़े-बड़े राष्ट्रों का अर्थशास्त्र कैसे चलता है, तुम्हें कुछ पता है? “नहीं, कुछ नहीं पता है।”

अच्छा कला के क्षेत्र में कुछ तुम्हें आता है? चित्रकारी आती है? पेंटिंग आती है? गिटार बजाना आता हैं? नाचना आता है? “नहीं, कुछ नहीं आता।” खेल के क्षेत्र में कुछ आता है? खेलना, कूदना, बैडमिंटन, टेनिस, स्विमिंग कुछ आता है? आज तक रैकेट ही नहीं पकड़ा, स्विमिंग पूल में छुआ नहीं पानी। जब आपको ये सब नहीं पता, तो आप अपनी बिटिया को ये सब कैसे दे दोगे, बताओ न मुझको?

जिस घर में माँ के हाथ में कभी गिटार नहीं था, वो अपनी बेटी के हाथ में गिटार कैसे सौंप पाएगी? मुश्किल होगा। सौंप सकती है, पर मुश्किल होगा। तो पहला कर्तव्य आपका किसके प्रति? आप बच्चे की भी अगर भलाई चाहती हैं, तो पहला कर्तव्य आपका किसके प्रति है, बोलो? अपने प्रति है। आप अपने ही जीवन का उत्थान नहीं कर पाईं, तो आप दूसरों के प्रति क्या उत्थान करेंगी।

गिल्ट होनी ही चाहिए निश्चित रूप से; पहली गिल्ट ये होनी चाहिए कि आपने अपना जीवन बर्बाद किया है। उस गिल्ट की जगह सौ तरह की और गिल्ट रखने का क्या मतलब है। पहला दोष तो ये होना चाहिए न, कि मैं स्वयं के प्रति अपराधी हूँ। मुझे जन्म मिला था अपनी आंतरिक संभावना को साकार करने के लिए, मूर्त करने के लिए और मैं चूक गई। मैं चूक गई! मुझे ये जो पूरे संसाधन मिले थे, समय मिला था, मैं इनका कोई सदुपयोग नहीं कर पाई। मैंने अपनी ज़िंदगी बस व्यर्थ करी है। ये गिल्ट होनी चाहिए, ये गिल्ट है नहीं।

और इसका भी खूब मज़ाक उड़ता हैं। आप जाओ मीडिया पर, वो जाएँगे, वहाँ पर क्यूट लुकिंग सेक्सी लड़कियाँ होंगी, दो घूम रही होंगी बिल्कुल। और उनके पास जाएँगे और उनसे पूछेंगे अच्छा ज़रा बताना, कि रावण के भाई का क्या नाम था? तो फिर वो लड़कियाँ क्यूट-सा हसेंगी और बोलेंगी, ‘डूर्योडन’ और हा, हा, हा करके हसेंगे सब, और हो जाएगा कि देखो लड़कियाँ कितनी बेवकूफ़ होती हैंं। इन्हें रावण के भाई का नाम नहीं पता। और ये सब ज़्यादातर चीज़ें लड़कियों पर ही बनाई जाती हैं। और लड़कियों को भी बड़ा मज़ा आता है कि देखो हम तो इतने क्यूट हैं, कि सब हम पर हँस रहे हैं।

इस बात की गिल्ट क्यों नहीं हो रही है कि रावण के भाई का नाम नहीं पता? अपना सामान उठवाना है तो किसी लड़के को दे देना है। गिल्ट होनी चाहिए न कि अपने बाजुओं में दम नहीं है। होनी चाहिए कि नहीं? बड़ा अच्छा लगता है कि “भाया सामान उठा देना।” क्यों उठाए वो तुम्हारा सामान। तुम्हारी प्रजाति, तुम्हारी ही उम्र का समवयस्क इंसान है वो, और सामान कोई ऐसा तो है नहीं कि सत्तर किलो का है। साधारण दस- बीस किलो भी दूसरे को बोल रही हैं, उठा देना। और आप नहीं भी बोलो तो भी पुरुष जान गए हैं कि “इससे कुछ न उठ रहा, ये तो चिट्टियाँ कलाइयाँ हैं। इससे कुछ न उठ रहा।” ज़िंदगी में इसने कभी चार बार डंबल नहीं करे इसने, कुछ नहीं करा है। तो वो ख़ुद ही फिर आकर उठा लेते हैं और बोलते हैं फिर कि हम शिवल्रस हैं। क्यों?

जहाँ पर आपका असली दोष है उसको पहचानो न। उसको पहचाने बिना तो बड़ी समस्या है। वो फिर आप ऐसी जगहों पर अपनेआप को गुनाहगार मानोगे जहाँ आपने कोई गुनाह करा ही नही है। जहाँ गुनाह करा है, वहाँ आपको पता ही नहीं कि आपने क्या करा है।

थोड़ा-सा आप अगर अध्ययन करेंगे तो उसमें आपको दिखाई देगा। मालूम है क्या? कि ये जिसको आप पितृसत्ता बोलते हैं, पैट्रिआर्की बोलते हैं; आपके सवाल में वो शब्द आया था पैट्रिआर्की, वो पैट्रिआर्की खड़ी हुई है महिलाओं के दम पर। पैट्रिआर्की को पुरुष नहीं चला रहे हैं, पैट्रिआर्की को महिलाएँ ही चला रही हैं। और महिलाओं का ऐसा दिमाग ख़राब करा गया है कि वो ख़ुद ही सोच रही हैं कि यही चीज़ हमारे लिए अच्छी है। इस बात की गिल्ट होनी चाहिए न कि तुम ख़ुद उस व्यवस्था को चला रही हो, तुम ख़ुद अपनी सबसे बड़ी दुश्मन हो। उसकी होनी चाहिए भीतर गिल्ट। उसकी गिल्ट है नहीं।

ज़िम्मेदारी उठाना सीखिए। गिल्ट वग़ैरह ठीक है, पहले ज़िम्मेदारी तो उठाओगे न। जो वास्तविक ज़िम्मेदारी है अपनी उसको पहचानिए और असली ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए जितना भी कष्ट झेलना पड़ता है उसे झेलिए। उसके बिना बात नहीं बनेगी। समझ में आ रही है बात? और झूठ-मूठ की ज़िम्मेदारियों को पहचानिए भी और उनसे कोई लेना-देना मत रखिए।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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