
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम नेहा है और मैं पिछले तीन सालों से आपको सुन रही हूँ। गीता सत्रों में भी मैं डेढ़ साल से हूँ आपके साथ, और काफ़ी कुछ सीखने को मिल रहा है। पर मेरी एक जिज्ञासा थी, आचार्य जी, तो वो मेरा एक प्रश्न था वो मैं आपसे पूछना चाह रही थी।
आचार्य जी, मेरा प्रश्न यही था कि मैं बार-बार आकर एक जगह फँस जाती हूँ कि प्रेम बड़ा है या बोध। अगर बोध नहीं है तो क्या करने योग्य है, वो समझ नहीं आता, और अगर प्रेम नहीं है तो हम अपनी भलाई करने जाते हैं और अपने आप को ही नरक में झोंक देते हैं। तो मेरी जिज्ञासा थी।
आचार्य प्रशांत: छोड़िए है न, क्या जिज्ञासा का क्या करना है? कह रही हैं अध्यात्म में भी दो मार्ग होते हैं। कौन से दो मार्ग होते हैं?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग।
आचार्य प्रशांत: छोड़िए न क्या। मारो सब मार्गों को। ये कुछ बढ़िया-सी चीज़ रखी हुई है, मैं मस्त पीता हूँ। आपके पास भी कुछ रखा हो आप भी पिएँ।
मैं इसको मस्त क्यों कह रहा हूँ? आहा-हा-हा! क्या रंग है! ये हरा रंग है, ये नीला रंग है (चाय के कप की ओर इंगित करते हुए)। क्या इसकी चिकनी-चिकनी सतह है! और ये हरा रंग देखकर मुझे पता है क्या याद आता है? मेरी बीती हुई ज़िंदगी की हरियाली। आहा-हा-हा-हा, क्या दिन थे, क्या हरियाली थी, क्या फल थे, क्या फूल थे! आहा-हा-हा! और ये है, इसमें इतनी खुशबू है, आहा! और इसका रंग भी बढ़िया है, पीला-पीला सा है। मस्त इसको मैं पीता हूँ, क्या करना है जिज्ञासा का कि प्रेम बड़ा है कि बोध बड़ा है कि ज्ञान मार्ग-भक्ति मार्ग, क्या ये सब बातें हैं।
कुछ होने लग गया पेट में (चाय का एक घूँट लेते हुए)। थोड़ा मौका दीजिएगा, पेट हल्का करके आता हूँ, फिर जवाब दूँगा। भागिएगा मत। क्यों? मुझे प्यार आ रहा था इस पर बहुत ज़्यादा (कप की ओर इंगित करते हुए)। सब कुछ अच्छा था, ऐसे चिकना-चिकना और गोल-गोल, आहा-हा-हा! मन इंद्रियाँ सब आसक्त हो गए बिल्कुल, आँखें, और बजाओ तो ऐसे जैसे जलतरंग बज रहा हो। आहा-हा-हा! क्या बज रहा है, क्या बज रहा है! बजाते चलो। कान भी खुश है, नाक भी खुश है, ज़ुबान भी खुश है, आँखें भी खुश हैं, सब खुश हैं। लेकिन गुड़-गुड़-गुड़-गुड़-गुड़-गुड़-गुड़, ये क्या हो गया! इस ज़ालिम ज़माने से प्यार बर्दाश्त नहीं होता।
(खाँसने का अभिनय करते हुए), क्या चला गया अभी इधर (गले में)? आँखों को भी प्यार हो गया था, स्मृति को भी इस पर प्यार आ रहा था, नाक को भी इस पर प्यार आ रहा था, खाल को भी इस पर प्यार आ रहा था, और अब पता नहीं मुझे क्या आ रहा है। अरा-रारा-रा!
ये कहलाता है बिना बोध का प्यार, इसके नतीजे में मिलते हैं पतले दस्त। भागिएगा नहीं, अभी आया! अरे हम प्रेमी हैं, हमसे बुद्धि की बात मत करो। जहाँ बुद्धि भी लिखा होगा हम उसको भावना कर देंगे, जज़्बात कर देंगे। बुद्धि को भक्ति बना देंगे, अरे अभी आया!
बिना जाने प्यार करोगे तो फिर बस पतली टट्टी, यही मिलेगा। जब तुम कुछ जानते ही नहीं इसमें क्या है तो तुमने काहे इसे ग्रहण करा? बस इसलिए कि बहुत सब सुंदर-सुंदर, आहा-हा-हा! कल्पना। कल्पना तो खूब थी, कि हरा रंग है तो हरे रंग का तो ये अर्थ होता है और नीला रंग फलानी चीज़ का प्रतीक होता है और सूचक होता है और पीले रंग से ये उपमा उठती है। जानते कुछ हो नहीं और प्रेमी बन गए। तो फिर गुड़-गुड़-गुड़-गुड़-गुड़, ये होता है बिना ज्ञान का प्रेम; पता कुछ नहीं था, आशिक़ी पूरी थी। ज्ञान कुछ नहीं, जज़्बात पूरे, समझ ज़रा भी नहीं और भावनाओं का पूरा उबाल।
मुझे बताओ न, तुमने बिना समझे किसी को दिल दे कैसे दिया? किसी को स्वीकार कर कैसे लिया? किसी के सामने झुक कैसे गए? कुछ होठों से छू कैसे लिया? बिना समझे तुमने जीवन जी कैसे लिया? रंग देखकर के, रूप देखकर के, सुगंध सूँघकर के, भावनाओं पर, उद्वेगों पर, उठी भीतर से हॉर्मोन की लहर, बायोकेमिकल इंपल्सेस और तुम उन पर जिए जा रहे हो। या किसी ने कहानी बता दी कि जहाँ कहीं भी नीला, पीला, हरा और पीला एक साथ देखना, जान लेना कि तुम्हें तुम्हारी ज़िंदगी की मोहब्बत मिल गई है आज। और पीला माने तो आम होता ही है, पीला दिखा नहीं कि भक्तजन फिसले। दशहरी, बदामी, अल्फोंजो।
तुम्हें पता है दुनिया में जो सबसे ज़हरीले साँप होते हैं और कीड़े होते हैं, कुछ मेंढक भी ज़हरीले होते हैं, कुछ ये जो स्पाइडर्स होते हैं न, ये भी ज़हरीले होते हैं, मकड़े। उनमें से ज़्यादातर ऐसे होते हैं जो ज़बरदस्त तरीके से रंगीन होते हैं। कई बार तो कहा भी जाता है कि जो साँप या इन्सेक्ट (कीड़ा) जितना रंगीन और आकर्षक दिखाई दे, संभावना उतनी ज़्यादा है कि वो ज़हरीला होगा। पर तुम्हें तो प्यार आ जाएगा, क्योंकि आँखों को इंद्रधनुष बड़ा भाता है। भाता है न?
ये होता है बिना जाने छूने का नतीजा। दोबारा छूने के लिए बचोगे भी नहीं, तो बताओ तुम्हें ये प्रश्न भी कहाँ से आ गया, जवान हो, पढ़ी-लिखी हो, कि प्रेम बड़ा या बोध। ये कैसी बात है! बिना बोध के प्रेम कर कैसे लोगे? किससे कर लोगे, किस आधार पर कर लिया, रंग देखकर? फिर पूछ रहा हूँ, इंद्रियाँ तो इतना ही जानती हैं। या स्मृति, या परंपरा, या सुनी-सुनाई बात, या एक अंधेरी लहर जिसका तुम न उद्गम जानते न अंत। और फिर गुड़-गुड़-गुड़-गुड़।
बहुत मासूम सवाल कर रहा हूँ, बहुत समझदार हूँ नहीं पूछ रहा हूँ आपसे। जिसको तुम समझते नहीं, उसके प्रति तुममें प्रेम आ कहाँ से गया? बताओ। और जहाँ कहीं तुम प्रेम का दावा करते हो, हम पूछ रहे हैं, समझते कितना हो? क्या जानते हो? और नहीं जानते तो किससे प्रेम कर रहे हो?
मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता (कप की ओर इंगित करते हुए)। आप सबसे पहले मुझसे क्या पूछेंगे, “क्या पी रहे हैं?” और मैं जानता ही नहीं क्या पी रहा हूँ। मैं बोलूँगा, बस मैं कुछ ऐसा पी रहा हूँ जो अवचनीय है, शब्दातीत है, पर मेरे हृदय को झंकृत करता है। मैं जानता उसके बारे में कुछ नहीं, पर उससे मेरे दिल में झंकार उठती है। ये कोई बात है? इस बात पर तो बस गुड़-गुड़-गुड़-गुड़ होगा। समझ में आ रही है बात?
अब बता दो, प्रेम पहले आएगा कि बोध पहले आएगा?
श्रोता: बोध।
आचार्य प्रशांत: अब मैं बिल्कुल विपरीत छोर पर ले चलता हूँ। ये भी नहीं पसंद है, ये भी नहीं पसंद है (कप के रंगों की ओर इंगित करते हुए और चाय को सूँघकर घिनाने जैसा अभिनय करते हुए)। लेकिन मुझे पता चला कि जो दिल की बीमारी है न मुझे, ये इलाज है उसका। बताओ, पियूँगा कि नहीं? और जैसे-जैसे ठीक होने लगने लगूँगा इससे प्यार करने लगूँगा कि नहीं? और ये प्यार अब सार्थक होगा कि नहीं?
समझने के बाद जो प्यार आता है वो अल्पायु भी नहीं होता और उपयोगी भी होता है।
और समझे बिना जो प्यार किया जाता है वो बुलबुले की तरह होता है, वो फटेगा ही फटेगा। जैसे कच्ची उम्र की आशिक़ी, जैसे मूर्खता में की गई अंधभक्ति, बहुत दिन चलती नहीं है, टूट के गिरती है। समझ में आ रही है बात?
और ये दूसरी चीज़ है, इसकी शुरुआत कमज़ोर होगी क्योंकि मेरी इंद्रियाँ, मेरी भावनाएँ, मेरा अतीत सब चिल्ला रहे होंगे कि इसको मत पियो, हटाओ-हटाओ, बेकार है। लेकिन मैं समझ गया हूँ कि इससे दिल ठीक होगा मेरा, तो मैं इसको पियूँगा और दिल ठीक होने लगेगा, सिर्फ़ प्रेम ही नहीं उठेगा, सम्मान उठेगा अब। मैं नमित हो जाऊँगा। ये दूसरा प्रेम है जो बोध-जनित होता है। अब बताओ, पहले क्या आएगा; बोध कि प्रेम?
श्रोता: बोध।
आचार्य प्रशांत: पहले बोध ही आएगा। लेकिन अब और उससे आपको आगे की एक बात बताता हूँ। यहाँ तक समझ में आ गया, तो बिल्कुल एकदम साफ़ है?
चलो, अब उससे और आगे की बात बताता हूँ। बोध के बाद प्रेम आता है, ये ठीक है। अब और बताता हूँ, बोध से पहले भी एक प्रेम आता है, वो प्रेम होता है स्वयं के प्रति। अगर मुझमें स्वयं के प्रति प्रेम ही न हो, तो मैं इसे जानने की कोशिश क्यों करूँ (कप की ओर इंगित करते हुए)? मैं कहूँगा, नुकसान होता रहे तो होता रहे, मौज आ रही है न, रंग अच्छा है न, चार पल के लिए ही सही मौज कर ले।
सबसे पहले तो एक भीतरी प्रेम होना चाहिए स्वयं के प्रति, उसको तुम कह सकते हो अहंकार का आत्मा के लिए प्रेम। वो सबसे पहले आता है।
जब मैं तुम लोगों से कहा करता हूँ न, तुम लोगों ने वो पोस्टर ही बना दिया था, कि प्यार के बिना कुछ नहीं हो सकता, पगले। याद है? प्यार के बिना…, और सबसे पहले तो प्रेम ही आता है पगले। कहा था न? वहाँ पर मेरा प्रेम से आशय है वो परम प्रेम, वो भीतरी प्रेम जो अहम् का आत्मा के प्रति होता है। वही वास्तविक मायने में सेल्फ-लव है; मैं जो उच्चतम और अधिकतम और सुंदरतम हो सकता हूँ, वो मुझे होना है, ये है आत्म-प्रेम। जब वो होता है तो व्यक्ति कहता है, बिना बोध के आगे नहीं बढ़ूँगा। क्योंकि मुझे ऊँचे से ऊँचा, सुंदर से सुंदर और बेहतर से बेहतर और शुद्ध से शुद्धतर होना है। तो मैं बिना बोध के आगे नहीं बढ़ूँगा।
तो परम प्रेम कहता है, बोध होना चाहिए। और जब बोध होता है तो फिर तुम जान जाते हो बाहर का कौन-सा विषय प्रेम का अधिकारी है। तो सबसे पहले परम प्रेम, फिर बोध और फिर साधारण सांसारिक प्रेम। समझ में आ रही है बात?
अब आप लोग कहते हो न, आचार्य जी बातें समझ में नहीं आती। समझ में नहीं आती, माने बोध नहीं हो रहा। तो बोध क्यों नहीं होता बताओ? क्योंकि बोध की क्या शर्त है?
श्रोता: प्रेम।
आचार्य प्रशांत: पहले आंतरिक प्रेम, परम प्रेम होना चाहिए, वो आपके पास अगर नहीं है तो मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता।
आंतरिक प्रेम, परम प्रेम का अर्थ होता है: भीतरी तौर पर ऊँचा, बेहतर, सुंदर और शुद्ध होने की अभिप्सा। अगर वो आप में है ही नहीं, तो मैं आपको कुछ भी बताता रहूँ, आप मुझे क्यों सुनोगे, गुनोगे? आप कहोगे, आप कह रहे होंगे कुछ भी, हमें बेहतर होना ही नहीं है।
ये बैठ के माइक के सामने रोज़ घंटों करते रहते हैं, ऐसे करो, वैसे करो, ज़िंदगी बेहतर होगी। अरे हमें ज़िंदगी बेहतर करनी ही नहीं है। तो माने यहाँ तो परम प्रेमी अनुपस्थित है। यहाँ तो अहंकार ऐसा है कि आत्मस्थ होना ही नहीं चाहता। जब वो होना ही नहीं चाहता तो फिर बोध नहीं आएगा, और जब बोध नहीं आएगा तो फिर सड़ा हुआ सांसारिक प्रेम आपके जीवन पर छाएगा। बिना बोध के यही करोगे कि किसी भी साँप को गले में डाल लोगे, कहोगे, अरे कितना रंगीन है।
तो प्रेम ऐसी चीज़ है जो बोध के पहले भी चाहिए और बोध के बाद भी आती है। बोध से पहले कौन-सा प्रेम चाहिए? सेल्फ-लव, परम प्रेम, आंतरिक प्रेम। और जब बोध होता है तो फिर उसके होने से आप जान जाते हो कि दुनिया में कौन-सा विषय है आपके प्यार के लायक। नहीं तो जैसे सब आप उल्टे-पुल्टे रिश्ते बनाते हो न दुनिया में, चाहे वो पारिवारिक स्तर पर हो, चाहे सामाजिक, चाहे राजनैतिक, चाहे धार्मिक, हर जगह हमें पता ही नहीं होता प्यार किससे करना है। न जाने कहाँ जाकर दिल दे आते हैं, न जाने कहाँ निवेशित हो जाते हैं। और फिर कहते हैं, कि अब तो रिश्ता बन गया, अब क्या करें, हम तो फलाने के प्रेमी हैं, फलाने के भक्त हैं, फलाने को पूजते हैं, फलाने को नमित हैं।
तुमने कुछ समझा भी था, या बस यूँ ही जाकर के दिल दे आए और सर झुका आए? अच्छे से जान लो, बिना समझे न प्यार किया जाता, न सर झुकाया जाता, ये अंधा प्रेम है फिर। अंधभक्ति है, कि ये जानते कुछ नहीं हैं, पर कुछ जाने बिना (हाथ जोड़कर सिर झुका आना)। तुम किसके सामने ये कर रहे हो? क्या कर रहे हो? तुम कौन हो जो ये सब कुछ कर रहे हो? तुम्हें कुछ नहीं पता, बस कर रहे हो। तो फिर तुममें और पशु में अंतर क्या है? वो भी बिना जाने बहुत कुछ करता रहता है। कुछ आ रही है बात समझ में?
देखो, ख़ुद को प्यार करना बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है, इसीलिए हम अपने दुश्मन होते हैं। हम ख़ुद को बर्बाद कर लेते हैं, जिसकी भी ज़िंदगी बर्बाद हो, तुम पाओगे उसने ख़ुद ने ही करी। क्योंकि ख़ुद को प्यार करोगे तो जानना पड़ेगा, जानना मेहनत का काम है, ध्यान देना पड़ता है। नेति-नेति करनी पड़ती है, न जाने कितनी व्यर्थ चीज़ों को छोड़ना पड़ता है, और ज़िम्मेदारी अपनी, अपने ऊपर लेनी पड़ती है। मेरी ज़िंदगी, मेरा प्यार, मेरा हृदय, अतः मुझे ही जानना पड़ेगा। मेरे कर्मों की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर है, मेरे ऊपर है।
ज़्यादातर लोग ये करना नहीं चाहते। वो क्या करते हैं, कि ये है बड़ी प्यारी चीज़ (कप की ओर इंगित करते हुए), क्यों प्यारी चीज़ है? क्योंकि मुझे एक कहानी पता है कि अब ये जो है, मेरे सारे कर्म अपने ऊपर ले लेगी, मेरी सारी मनोकामनाएँ पूरी कर देगी। ये धार्मिकता होती है अधिकांश लोगों के लिए। उनकी धार्मिकता उन्हें भीतरी तौर पर सशक्त नहीं बनाती, वो उनकी दुर्बलता को और कवच पहना देती है। वो और दुर्बल हो जाते हैं। वो कहते हैं, अब हमें क्या करना है? हमारे लिए तो अब जो करेगा भगवान करेगा। और हमें तो भगवान से प्यार है न, तो भगवान हमारी मनोकामनाएँ पूरी करेंगे। हमें प्यार है। हमने बस…।
तुमने बिना जाने ये क्या कर डाला! भगवान तो एक ही जगह होते हैं और वो ये है, हृदय। और सच्चे भगवान तक पहुँचने का मार्ग एक ही होता है, आत्मवलोकन और अहंकार का मिथ्यात्व देख लेना। उसकी जगह तुमने बाहर जाकर के कहीं अपनी पसंद के भगवान को प्रक्षेपित कर दिया और वास्तविक भगवान को भूल गए। संतों ने, ज्ञानियों ने इतनी बार समझाया,
मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।
तुम्हारे हृदय में है भगवान, नहीं तो कहीं नहीं है। लेकिन तुम न जाने कहाँ-कहाँ जाकर के। और ये आदिकाल से चला है, आज की बात नहीं कि कुछ नई-ताज़ी घटना है। और ये पूरी दुनिया में चला है, कोई ऐसे नहीं कि भारत की बात। और इसके नतीजे बड़े घातक हुए हैं, इसके नतीजे ये हुए हैं कि हम कमज़ोर हो गए हैं। इसके नतीजे हुए हैं, कि हम चापलूस हो गए हैं।
ये है (कप की ओर इंगित करते हुए), अगर मेरी मनोकामनाएँ सब इसने पूरी करनी हैं तो सारा काम तो इन्होंने करना है। और मुझे क्या करना है बस? चापलूसी। मैं जाकर के बस कहूँगा, तुम महान हो, तुम विश्व की जान हो, मैं तुम्हारा दास हूँ और मैं तुम्हारा स्तुतिगान करूँगा। काम सारा तुम कर दो, और काम भी तुम क्या करोगे? वो चुपके से चालाकी से मैं निर्धारित करूँगा। तुम्हारा काम है, मेरी कामना पूरी करना।
ये क्या है?
फिर हम ऐसे हो गए हैं कि भारत अपना पुरुषार्थ खो बैठा है। फिर हम ऐसे हो गए हैं कि अब हम ख़तरा नहीं उठा सकते, कि कर्मठता और जीवट हममें नहीं बचा है। कुछ नया कर पाने का ख़तरा तो हम एकदम ही नहीं उठाते।
हम भारत से बाहर भी चले जाते हैं, जानते हो, हम तब भी कुछ नया नहीं कर पाते। आप जिनको देखते हैं न, आप कहते हो, कि अरे बहुत सफल है, अमेरिका चला गया है, यहाँ है यूरोप, कनाडा में और ऐसा कर रहा है, वैसा कर रहा है। वो भी ज़्यादातर लोग बस उन कामों में सफल हैं जो बंधे-बंधाए हैं, जो ढर्राबद्ध हैं। इनोवेशन वाले काम तो हम भारत क्या, भारत से बाहर जाकर भी नहीं कर पाते। जहाँ कुछ नया करना है, वहाँ हम भारत देश से बाहर भी निकल जाते हैं तो भी नहीं कर पाते।
आप जिन भारतीय मूल के लोगों को जानते हैं न, कि वो बाहर जाकर बड़ी कंपनियों के सीईओ वग़ैरह बन गए हैं, वो भी इसलिए बन गए हैं, क्योंकि वो ऑपरेशन्स में मंजे हुए हैं, इनोवेशन में नहीं। कि जो काम चल रहा है, हम उसको अच्छे से चला लेंगे। मशीन बनी हुई है, उसको देखते रहेंगे और सही समय पर उसमें तेल डालते रहेंगे और कोई पुर्जा ख़राब हो रहा है तो उसको रिप्लेस करते रहेंगे। ये सब कर सकते हो।
ये कोई छोटा सवाल नहीं है, कि बोध पहले आता है या प्रेम पहले आता है। जहाँ बोध नहीं होता और जीवन की वरीयताएँ बिना बोध के तय की जाती हैं, तो परिणाम व्यक्ति के लिए और राष्ट्र के लिए, विश्व के लिए बहुत दूरगामी होते हैं। भारत ज्ञान का पालना रहा है और अध्यात्म का मतलब ही होता है, स्वयं को जानना।
पर भारत ने ज्ञान का ऐसा अपमान, ऐसा उपहास करा कि आपको कोई आज धार्मिक आदमी मिल जाए तो ये पक्का होगा कि ये तो ज्ञान को सम्मान नहीं ही देता होगा। कोई आपको मिले, वो कहे मैं नास्तिक वग़ैरह हूँ, मुझे धर्म से कोई लेना-देना नहीं, वो ज्ञान को सम्मान दे लेगा। पर धार्मिक आदमी मिले तो कहेगा, नहीं साहब, ज्ञान वग़ैरह की बातें हमसे मत करो। हम तो भगवान को मानने वाले हैं, हमारा ज्ञान से नहीं, मानने से काम चलता है। मानने से। हम तो मान्यताओं पर चलने वाले लोग हैं, जबकि धर्म का अर्थ ही है ज्ञान। समझ में आ रही है बात ये?
ये जो व्यक्ति दुनिया को समझेगा नहीं, सोचो वो कैसे चलेगा। वो दूसरों की फिर अनुकंपा पर, रहमो-करम पर ही तो चलेगा न। हम ऐसे बन गए हैं। जब मैं न स्वयं को जानता, न जगत को जानता, तो फिर बस मैं आश्रित बन के जीता हूँ किसी साहूकार का, किसी जमींदार का। और भगवान को भी मैंने किसी आसमान पर ऐसे ही स्थापित कर दिया है, जैसे वहाँ बैठकर के वो सबसे बड़े जमींदार हों।
भगवान का वास्तविक स्थान क्या है? ये (हृदय की ओर इंगित करते हुए)। और भगवान का वास्तविक नाम क्या है? आत्मा। उसकी जगह हमने कह दिया नहीं, वहाँ बैठे हुए हैं और वहाँ बैठकर के वो अखिल संसार का संचालन कर रहे हैं। उन्हें क्या पड़ी है, आत्मा तो अकर्ता होती है।
इतना बड़ा ब्रह्माण्ड है, उसमें इतना कुछ हो रहा है। तुम हो कौन कि भगवान तुम्हारी निजी ज़िंदगी में व्यक्तिगत दिलचस्पी लेंगे भाई? और तुम जाकर कह रहे हो, आप मेरे लिए ऐसा, आप मेरे लिए वैसा। ये वैसी-सी बात है कि हम यहाँ बैठे हुए हैं, बरसात चल रही है और बरसाती कीड़े हैं हज़ारों-लाखों की संख्या में इधर-उधर हो रहे हैं, और वो सोच रहे हैं कि हम इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि कोई हम पर ध्यान दे रहा होगा और हमारी कामनाओं की फ़िक्र कर रहा होगा।
बरसाती कीड़े देखे हैं, इतने-इतने जो होते हैं (छोटे-छोटे), या चींटियाँ। और चींटियाँ सोच रही हैं हम इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि कोई, यदि बारिश की जो बूंदें गिर रही हैं और एक-एक बूंद के हज़ार-हज़ार टुकड़े हो रहे हैं, वो सोच रहे हैं कि हम इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि…।
ये सब तब होता है। जब आप जानते ही नहीं हो कि अस्तित्व क्या है? अहम् क्या है? आत्मा क्या है?
ज्ञान कोई मार्ग नहीं होता बेटा, ज्ञान ही धर्म है। और प्रेम ज्ञान से अलग नहीं होता।
अभी क्या बोला? परम प्रेम के बिना ज्ञान आ ही नहीं सकता। परम प्रेम आता है, तभी फिर ज्ञान आता है और फिर उस ज्ञान से आप जान जाते हो कि संसार में किससे प्रेम करना है।
प्रेम और ज्ञान कोई अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं, कि बोलो कि एक ज्ञान मार्ग है और एक भक्ति मार्ग है। ज्ञान में सब समाया हुआ है। और ज्ञान से अलग होकर के अगर कोई मार्ग है तो फिर वही गुड़-गुड़ होगी बहुत ज़ोर की, जो भारत में लगी हुई है। कि ज्ञान कुछ नहीं, पर हम दिल दे चुके सनम। किसको दे दिया दिल? न-न, वो सब पता नहीं। बस हम दिल दे चुके सनम। किसको दिल दे दिया? क्यों दे दिया? किसको दे दिया वो भी हटाओ, किसने दे दिया ये भी नहीं पता। न उसका पता, न अपना पता। कह रहे हैं, आई लव यू। एक छोर पर ‘आई’ बैठा है, एक छोर पर ‘यू’ बैठा है। न यू का पता, न आई का पता। और लव की डुगडुगी बजा रहे हो। समझ में आ रही है बात?
1947 में भारत आज़ाद हुआ। न जाने कितने देश उसी समय पर या हमारे बाद बल्कि आज़ाद हुए। पूरा जो दक्षिण-पूर्व एशिया है पूरा, और चीन और उस तरफ़ इज़राइल, ये सब हमारे साथ-साथ ही आज़ाद हुए थे। इज़राइल आज़ाद नहीं हुआ था, निर्मित हुआ था। लेकिन हमारे साथ-साथ ही बिल्कुल।
हम? “नहीं, नहीं, नहीं, कोई है आसमानों पे जो हमारा काम कर देगा। सारे काम करना उसका काम है। मेरा क्या काम है?” (हाथ जोड़कर भजन करने का अभिनय करते हुए)। तो ले लो फिर।
हाँ, एक चीज़ में भारत सबसे आगे, वही चापलूसी। वो लगभग हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गई है। रीढ़ नहीं है किसी के पास। झुकने को, गिरने को, शत-शत नमन करने को, दंडवत लेट जाने को हम पूरे तैयार हैं। ये होता है जब बोध नहीं होता। क्योंकि जब बोध नहीं है तो तुम्हें किसी दूसरे पर आश्रित होना ही पड़ेगा। तो लेटोगे ही फिर, कि मालिक बचा लो।
कमज़ोरी को हमने वर्च्यू बना लिया शील बोल के, विनय बोल के, मर्यादा बोल के कि बस कमज़ोर रहें अब। और बल तो एक ही होता है, क्या? ज्ञान। हम बाहुबल की तो बात कर नहीं रहे, वो तो किसी में भी हो सकता है। गोरिल्ला में भी बहुत होता है। बल तो एक ही होता है: ज्ञान।
इज़राइल क्यों इतना आगे है? इतना सा है (छोटा)। सब क्षेत्रों में आगे है। किसी भी तरह की टेक्नोलॉजी हो, हथियार हमें इज़राइल से लेने पड़ते हैं, वो इतना सा है। और हमारे बाद बल्कि बना है, चीन को देख ही रहे हो। क्योंकि बल तो बस ज्ञान से ही आता है। चेतना का स्वभाव बोध है, भाव नहीं।
अच्छा, एक बात बताओ नेहा। कोई पड़ा होता है अस्पताल में बिस्तर पर तो कब बोलते हो कि अब ये पूरी तरह अनकॉन्शियस है? जब उसमें बोध नहीं होता या जब उसमें भाव नहीं होता?
प्रश्नकर्ता: सर, भाव नहीं होता।
आचार्य प्रशांत: जब भाव नहीं होता तब बोलते हैं अनकॉन्शियस है? माने कि जब वो आँसू नहीं बहा रहा या कि जज़्बात नहीं दिखा रहा, तब बोलते हो अनकॉन्शियस है।
प्रश्नकर्ता: नहीं-नहीं-नहीं, जब बोध नहीं होता है।
आचार्य प्रशांत: कोई पड़ा है बिस्तर पर बिल्कुल, और तुम उसका नाम पुकारो, वो जवाब न दे तो तुम बोलते हो अनकॉन्शियस है। ठीक है न? अनकॉन्शियस है। तो चेतना का रिश्ता फिर किससे है? बोध से है। चेतना का स्वभाव भावना नहीं है, कि मेरी भावना आ रही है कि मुझे बस ये है। क्यों है? नहीं जानते। मान्यता है, हमारे यहाँ सब मानते हैं तो हम भी मानते हैं।
चेतना का स्वभाव मान्यता नहीं है। चेतना का स्वभाव जानना है, बोध है, ज्ञान है।
कोई दो मार्ग नहीं होते, एक ही मार्ग है और उस मार्ग में सब समाया हुआ है। ज्ञान और प्रेम का बड़ा आत्मीय रिश्ता है। बिना प्रेम के ज्ञान नहीं हो सकता भाई, तो प्रेम कोई ज्ञान से अलग चीज़ कैसे हो गई। और प्रेम को ज्ञान से अलग करके देख लो कि तुमने क्या बंटाधार करा है। फिर याद रखो, गुड़-गुड़-गुड़-गुड़, प्यार हो गया है इससे और ज्ञान कुछ नहीं इसका, तो फिर गुड़-गुड़- गुड़-गुड़ ही होगी।
आ रही है बात समझ के?
बिना जाने एक कदम ज़िंदगी में आगे मत बढ़ाना। मैं कभी तुमसे पूछता हूँ, प्यार आ रहा है मुझ पर? पूछता हूँ? तुझसे पूछा, दिल मचल रहा है मेरे लिए? (श्रोता की ओर देखते हुए), कभी पूछा? तुझसे पूछा, जज़्बात उफन रहे हैं मेरे लिए? पूछा? तुमसे कहा, नमित और समर्पित होना चाहते हो मुझे? तुमसे पूछा, भक्त हो क्या तुम मेरे? पूछा?
सिर्फ़ एक सवाल पूछता आया हूँ सदा से, और वही एक सवाल कीमती है, क्या? “आ रही है बात समझ में?” क्योंकि चेतना का स्वभाव है समझना। भावना की हिलोरे मारना, नमित हो जाना, गिर जाना, झुक जाना, समर्पित हो जाना, ये सब बाद की बातें हैं।
बोध होता है तो सही नमन और सही समर्पण अपने आप हो जाता है।
नहीं तो सोचो, कहीं भी जाकर समर्पित हो जाओगे। जब तुम कुछ जानते ही नहीं तो तुम कहाँ जाकर समर्पित हो गए? कहीं नहीं, जहाँ मम्मी जी समर्पित थीं, वहीं बेटी जी भी समर्पित हो गई। क्योंकि घर की परंपरा थी कि फलानी जगह समर्पित होना होता है, तो हम भी समर्पित हो गए। पता कुछ नहीं है, ऐसे समर्पण का क्या अंजाम होगा? बोलो, गुड़-गुड़-गुड़-गुड़।
कभी भी ये सवाल उठे न, कि ज्ञान मार्ग, कि प्रेम मार्ग, कि प्रेम पहले कि बोध पहले, बस ये याद कर लेना कि बिना बोध के अगर इससे प्यार कर लिया तो न जाने क्या पी लिया (कप की ओर इंगित करते हुए), और अब न जाने क्या बहाओगे।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।