प्रेम ऐसी चीज़ है जो बोध के पहले भी चाहिए और बोध के बाद भी आती है। बोध से पहले कौन-सा प्रेम चाहिए? मैं जो उच्चतम और सुंदरतम हो सकता हूँ, वो मुझे होना है; ये है आंतरिक प्रेम, परम प्रेम। परम प्रेम कहता है, बोध होना चाहिए और जब बोध होता है, तो फिर उसके होने से आप जान जाते हो कि दुनिया में आपके प्यार के लायक कौन-सा विषय है। तो सबसे पहले परम प्रेम, फिर बोध और फिर साधारण सांसारिक प्रेम।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम नेहा है और मैं पिछले तीन सालों से आपको सुन रही हूँ। गीता सत्रों में भी मैं डेढ़ साल से हूँ आपके साथ, और काफ़ी कुछ सीखने को मिल रहा है। पर मेरी एक जिज्ञासा थी, आचार्य जी, तो वो मेरा एक प्रश्न था वो मैं आपसे पूछना चाह रही थी।
आचार्य जी, मेरा प्रश्न यही था कि मैं बार-बार आकर एक जगह फँस जाती हूँ कि प्रेम बड़ा है या बोध। अगर बोध नहीं है तो क्या करने योग्य है, वो समझ नहीं आता, और अगर प्रेम नहीं है तो हम अपनी भलाई करने जाते हैं और अपने आप को ही नरक में झोंक देते हैं। तो मेरी जिज्ञासा थी।
आचार्य प्रशांत: छोड़िए है न, क्या जिज्ञासा का क्या करना है? कह रही हैं अध्यात्म में भी दो मार्ग होते हैं। कौन से दो मार्ग होते हैं?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग।
आचार्य प्रशांत:




