आपको क्या लगता है, यह जो अलग-अलग तरह के स्पोर्ट्स हैं, यह क्यों इतने प्रचलित हो गए? क्योंकि स्पोर्ट्स होगा तभी तो ऐड होगा। वह विज्ञापन बेचने का ज़रिया है और विज्ञापनदाता ऐसे नए-नए ज़रिए खोजते रहेंगे। चाहे वह विज्ञापन हो, चाहे बाबा जी की PR हो, चाहे आपको धार्मिक आधार पर भड़काने वाला कोई WhatsApp फ़ॉरवर्ड हो, वह सब बहुत केयरफुली क्राफ्टेड होते हैं। बहुत सतर्क रहा करिए, बहुत सतर्क; सब कुछ सिर्फ़ इसलिए है ताकि कोई आपसे अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम रूपाली ताई है। मैं लगभग एक साल से आपसे जुड़ी हुई हूँ। तो मैं एक मेडिकल कॉस्मेटोलॉजिस्ट हूँ। जब से आपको सुनना चालू किया है, मुझे इस फ़ील्ड में कोई रुचि नहीं है। इस वजह से मैंने एम.ए. साइकोलॉजी में ख़ुद को एनरोल कर लिया है। अभी जब मेरा सेकंड सेम चल रहा है, मैं आपसे सीख रही हूँ कि ईगो का डिसॉल्यूशन होता है इन स्पिरिचुअलिटी। और साइकोलॉजी में सिखाते हैं कि ईगो को मेंटेन करके रखना है, जिसकी अलग-अलग विधियाँ रहती हैं, जैसे मेडिटेशन हो गया, एंड माइंडफुलनेस, और वो सब चीज़ें।
तो इस वजह से क्या हो रहा है कि आई एम नॉट एबल टू गिव माय हंड्रेड परसेंट टुवर्ड्स व्हाट आई एम लर्निंग राइट नाउ। तो वो चीज़ मुझे एवरी टाइम, एवरी डे।
आचार्य प्रशांत: देखिए, अध्यात्म और मनोविज्ञान में केंद्रीय अंतर ये होता है कि मनोविज्ञान का पूरा क्षेत्र विकसित ही हुआ था एक औद्योगिक साम्राज्य की ज़रूरतें पूरी करने के लिए, और अध्यात्म किसी की ज़रूरत पूरी करने के लिए नहीं होता।




