
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम रूपाली ताई है। मैं लगभग एक साल से आपसे जुड़ी हुई हूँ। तो मैं एक मेडिकल कॉस्मेटोलॉजिस्ट हूँ। जब से आपको सुनना चालू किया है, मुझे इस फ़ील्ड में कोई रुचि नहीं है। इस वजह से मैंने एम.ए. साइकोलॉजी में ख़ुद को एनरोल कर लिया है। अभी जब मेरा सेकंड सेम चल रहा है, मैं आपसे सीख रही हूँ कि ईगो का डिसॉल्यूशन होता है इन स्पिरिचुअलिटी। और साइकोलॉजी में सिखाते हैं कि ईगो को मेंटेन करके रखना है, जिसकी अलग-अलग विधियाँ रहती हैं, जैसे मेडिटेशन हो गया, एंड माइंडफुलनेस, और वो सब चीज़ें।
तो इस वजह से क्या हो रहा है कि आई एम नॉट एबल टू गिव माय हंड्रेड परसेंट टुवर्ड्स व्हाट आई एम लर्निंग राइट नाउ। तो वो चीज़ मुझे एवरी टाइम, एवरी डे।
आचार्य प्रशांत: देखिए, अध्यात्म और मनोविज्ञान में केंद्रीय अंतर ये होता है कि मनोविज्ञान का पूरा क्षेत्र विकसित ही हुआ था एक औद्योगिक साम्राज्य की ज़रूरतें पूरी करने के लिए, और अध्यात्म किसी की ज़रूरत पूरी करने के लिए नहीं होता।
मनोविज्ञान में कामना न हो, ये हो नहीं सकता। और अध्यात्म निष्काम न हो तो अध्यात्म नहीं है।
सारे कॉर्पोरेट्स साइकोलॉजिस्ट्स को एम्प्लॉय करते हैं। किसलिए करते हैं?
श्रोता: कामना के लिए।
आचार्य प्रशांत: अपने एम्प्लॉयज़ की वो प्रोफ़ाइलिंग कराएँगे, माइंड मैपिंग कराएँगे, उनकी पर्सनैलिटी ट्रेट्स असर्टेन करेंगे। किस लिए करते हैं?
प्रश्नकर्ता: उनके डिज़ायर्स जानने के लिए।
आचार्य प्रशांत: आप जाते हो, जब जो आपके पास आते होंगे, आपके सब जो क्लाइंट्स, पेशेंट्स, आप लोग जो भी बोलते हो उनको, तो वहाँ भी जो ऑब्जेक्टिव रहता है वो लिबरेशन ऑफ़ ईगो नहीं होता, रेगुलेशन ऑफ़ बिहेवियर होता है। साइकोलॉजी लिबरेशन ऑफ़ ईगो नहीं माँगती। वो कहती है, इसका बिहेवियर रेगुलेट कर दो ताकि ये समाज में सुव्यवस्थित होकर चल सके।
तो आप वहाँ जाएँ, तो आपकी शुरुआत होती है; वो सबसे पहले पूछते हैं, “अच्छा, आपको अपने बिहेवियर के कौन से हिस्सों से प्रॉब्लम है?” तो आप कहोगे फिर, कि “एंग्री जल्दी हो जाता हूँ, ऐंग्ज़स जल्दी हो जाता हूँ, रिएक्ट जल्दी कर लेता हूँ, ईर्ष्या है इस तरह की बातें होती हैं।
तो साइकोलॉजिस्ट कुछ ऐसा प्रबंध कर देगा कि ये जितनी आप बातें बता रहे हो, ये आपके व्यवहार में दिखाई देनी बंद हो जाएँ। भले ही इनकी जड़ यथावत रहे चलेगा, व्यवहार में प्रदर्शित नहीं होनी चाहिए ये सारी बातें। वहाँ पर सदा एक उद्देश्य हैं, एक कामना है। मनोविज्ञान में हमेशा एक कामना है, कि या तो जो आपका नियोक्ता है, एम्प्लॉयर है, या जो आपका ग्राहक है, उससे कुछ लाभ निकाल ले, या उससे कुछ कामना पूरी कर ले। या फिर समाज जैसी इच्छा रखता है कि व्यक्ति जैसा व्यवहार करे, आप उसी के अनुसार व्यवहार कर पाओ।
वहाँ सदा जो स्टैंडर्ड है, मानक है, वो कुछ और है मुक्ति के अलावा। साइकोलॉजी में लिबरेशन जैसा कुछ नहीं होता। अध्यात्म भी मनोविज्ञान का इस्तेमाल करता है, बिल्कुल करता है। लेकिन मनोविज्ञान अध्यात्म के लिए अधिक से अधिक एक उपाय है, एक मेथड है, एक टूल है। एंड क्या है?
प्रश्नकर्ता: लिबरेशन।
आचार्य प्रशांत: लिबरेशन। साइकोलॉजी में लिबरेशन जैसी कोई चीज़ नहीं होती। वहाँ ईगो ही होती है, और ईगो का लिबरेशन नहीं होता। और ईगो से हमें क्या चाहिए? प्रोडक्टिविटी चाहिए। ईगो से हमें क्या चाहिए? सोशली एक्सेप्टेबल बिहेवियर चाहिए। तो वो काम साइकोलॉजी करती है। साइकोलॉजी अध्यात्म के हाथ लग जाए, तो बहुत उपयोगी हो जाएगी।
मनोविज्ञान का इस्तेमाल तो श्रीकृष्ण भी कर रहे हैं भगवद्गीता में। और कई-कई जगहों पर मैंने आपसे बात करी है। मैं पढ़ता हूँ, मैं मुस्कुरा देता हूँ कि मास्टर साइकोलॉजिस्ट हैं। ऐसे ही नहीं जो श्लोक की धारा होती है, वो बदल जाती है। आप बीच-बीच में देखते हैं कि बात चल रही थी, चल रही थी, अचानक श्रीकृष्ण कुछ और बोल देते हैं। वो यूँ ही नहीं बोल दिया है। वो वही कर सकता है जो अर्जुन के मनोविज्ञान को पूरा समझ रहा हो, कि अब ये जो तरीका है, अर्जुन पर काम नहीं कर रहा, तो ऐसे।
तो मनोविज्ञान का उपयोग अध्यात्म में भी है। पर वहाँ अंत, वहाँ जो अभीष्ट है, वो होता है। आपके पास अगर टूल्स हैं साइकोलॉजी के, अच्छी बात है। पर उनका सही इस्तेमाल करिए।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू, आचार्य जी।
प्रश्नकर्ता: इसमें एक और जो मैडम ने क्वेश्चन पूछा था, और मनोविज्ञान के बारे में बताया था; ये भी दिमाग में चलता है कि मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस दोनों का जो उपयोग है, वो बेहोश रखने के लिए किया जा रहा है अभी और वो बाज़ारवाद द्वारा किया जा रहा है।
आचार्य प्रशांत: बहुत आपने अच्छी बात कही और मैं आप सब से निवेदन कर रहा हूँ, बहुत-बहुत सावधान रहें। देखिए, जो लोग आपकी ज़िंदगी पर कब्ज़ा करना चाहते हैं, बहुत शातिर लोग हैं। बहुत-बहुत शातिर लोग हैं। उनकी तुलना में आप सीधे हैं। आप नहीं जानते।
एक विज्ञापन आपको अगर दिखाया जाता है न, मान लीजिए 8 सेकंड, 10 सेकंड का है कमर्शियल; करोड़ों लगते हैं पहले तो उसको बनाने में और फिर उसको एयर करने में भी दसियों करोड़ ख़र्च किए जाते हैं। तो सोचो, उसके एक-एक सेकंड में, एक-एक फ़्रेम में कितनी चालाकी डाली गई होगी, कि वो जो करोड़ों लगाए गए हैं वो वापस मिल जाएँ, उस पर आर.ओ.आई. मिल जाए। और आप उसको ऐसे देख लेते हो कि “अच्छा-अच्छा, कि ये तो मुझे मुफ़्त में एक ऐड दिखाया जा रहा है, ऐड ही तो है। ऐड देखने के पैसे थोड़ी लगते हैं।”
जिसने वो बनाया है, वो बहुत शातिर आदमी है। ये अटेंशन इकॉनमी है। आपकी जेब तक पहुँचा जाता है आपकी इंद्रियों के द्वारा, आपके मन के द्वारा। जिसने आपकी आँखें पकड़ लीं उसने आपकी जेब भी पकड़ ली।
बहुत सावधान रहा करिए, जिसकी ओर भी आपकी आँखें मुड़ रही हों। आपको क्या लगता है, ये जो अलग-अलग तरह के स्पोर्ट्स हैं ये क्यों इतने पॉपुलर हो गए, प्रचलित हो गए? मुझे बताइए तो। क्यों हो गए? क्योंकि स्पोर्ट्स होगा तभी तो ऐड होगा न। आप सोचते हो कि मैच के बीच में ऐड आ रहा है; नहीं, ऐड के बीच में मैच आ रहा है। मैच चाहिए ताकि आपको ऐड दिखाया जा सके।
आप सोचते हो अख़बार आपके पास आता है ताकि आप ख़बरें पढ़ सको। नहीं, आप जो ₹15 अख़बार का देते हो, उससे थोड़ी ही चल रही है मीडिया इंडस्ट्री। अख़बार चलता है विज्ञापन से, अख़बार छपता है विज्ञापनदाता के लिए, पाठक के लिए थोड़े ही। पर आप सोचते हो कि हमें ख़बरें पढ़ाई जा रही हैं। नहीं, ख़बरें नहीं पढ़ाई जा रही हैं, आपको विज्ञापन दिए जा रहे हैं। और चूँकि विज्ञापन प्रमुख है इसीलिए ख़बरें भी आपको वही दी जाएँगी जो विज्ञापन से अलाइन्ड हों।
आप लोग कहते हो न कि आचार्य जी, मीडिया आपको कवर क्यों नहीं करता? आपकी उपेक्षा क्यों करता है? क्योंकि जो बात मैं बोल रहा हूँ, वो किसी विज्ञापन से मेल नहीं खाने वाली। अगर अख़बार या मीडिया मुझे कवर करने लगे, तो उनके एडवरटाइज़र्स भाग जाएँगे। अगर सोशल मीडिया का एल्गोरद्म मुझे सपोर्ट करने लगे, तो उनके भी एडवरटाइज़र्स भाग जाएँगे।
आप बहुत जल्दी बोल देते हो कि अरे, फलाना क्रिकेटर मेरा; वो कुछ नहीं है, वो विज्ञापन बेचने का ज़रिया है। और विज्ञापनदाता ऐसे नए-नए ज़रिए खोजते रहेंगे। अब टीम का कोई नया कप्तान बनेगा; आप देखेंगे, विज्ञापनों में वही छा गया है। बात आ रही है समझ में?
क्योंकि हो तो आप बेचैन अहंकार ही न। एक विषय से आप संतुष्ट तो हो नहीं सकते। तो एक विषय से आप जैसे ही ऊबने लगो, ये जो पूरी इंडस्ट्री है, ये तुरंत आपके हाथ में एक दूसरा विषय दे देती है। “देखो, अब ये एक नया ग्लैमरस विषय आया है, नाउ यू कैन ऑब्सेस विद दिस वन फ़ॉर अ वाइल बिफ़ोर यू गेट बोर्ड।”
बहुत सतर्क रहा करिए, बहुत सतर्क। सब कुछ सिर्फ़ इसलिए है ताकि कोई आपसे अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके।
आप तक एक व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड आ रहा है, तो इसलिए नहीं आ रहा क्योंकि कोई निष्कामी बैठा हुआ है जो आप तक सूचना पहुँचाना चाहता है। किसी बहुत शातिर आदमी ने बैठकर के वो व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड पहले कंपोज़ किया है, लिखा है, और फिर उसको वायरल कराया है। आप उसके शिकार हैं, उसके कंज़्यूमर नहीं हैं। आपको ये नहीं समझ में आती बात?
वेदान्त आपको यही बोलता है न, कर्म को नहीं, कर्ता को देखो। एक एडिटोरियल है या कुछ है, वो क्या है? वो कर्म है कि कर्ता है? वो किसी का कर्म है। आप क्या उसके पीछे के कर्ता को सावधानी से देखते हो या बेहोश रहते हो बस? बस बेहोश रहते हो, आपको जो दे दिया गया आप उसको ऐसे देखने लग जाते हो बस। आप ये नहीं सोचते कि ये किसी ने किया है और क्यों किया है उसने, वो बहुत-बहुत शातिर है।
जो लोग जनता की नब्ज़ पकड़ना चाहते हैं, उनसे ज़्यादा पैसा किसी को नहीं मिलता। कोई भी क्षेत्र हो, एंटरटेनमेंट का क्षेत्र हो, पॉलिटिक्स का क्षेत्र हो और चाहे रिलीजन का क्षेत्र हो। क्योंकि जिसने आपकी नस पकड़ ली, उसने आपकी जेब भी पकड़ ली। और कोई नहीं आ रहा आपकी नस इसलिए पकड़ने कि वो आपका इलाज करना चाहता है, तो पल्स नाप रहा है। आपकी नस पकड़ी इसीलिए जाती है कि अब आपकी कलाई मरोड़ी जा सके।
तो उसके पहले वो पूरी पाँच साल से अगर वीडियो बना रहा है, देखो वो क्या बोल रहा है। वो जन-कल्याण के लिए निकला है? वो तुम्हारे भले के लिए निकला है? उसके लिए तुम सिर्फ़ कंटेंट कंज़्यूमर हो। तुम क्या कर रहे हो? तुम्हें कोई बात आ जाती है, उसको इधर-उधर फैलाने लगते हो। “फलानी चीज़ आ गई है, वीडियो आ गया, हमने देख लिया।” ख़ासकर ये जो व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड्स चलते हैं, बाप रे बाप! कितना नहीं मज़ा आता इसको इधर-उधर शेयर करने में। और एक पल को भी नहीं सोचते कि कितना-कितना काइयाँ आदमी होगा जिसने ये कंपोज़ किया है, और तुम उसके शिकार बन रहे हो।
उनकी प्रतिभा बहुत ज़बरदस्त है। उनका शिल्प देखो, एक-एक शब्द चुन-चुन कर डाला गया होता है। ऐसे ही नहीं है वो मामला वहाँ; चाहे वो विज्ञापन हो, चाहे बाबाजी की पी.आर. हो, चाहे नए मोबाइल का होर्डिंग हो, चाहे पॉलिटिकल स्पीच हो, चाहे आपको धार्मिक आधार पर भड़काने वाला कोई व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड हो, वो सब बहुत केयरफुली, मैटिक्युलसली क्राफ्टेड होते हैं। और आप कहते हो, “हाँ, हाँ, देखो ये चल रहा है, ये चल रहा है।” ये चल रहा है या चलाया जा रहा है?
एक बार उस आदमी की शक्ल पर ध्यान देने की तो कोशिश करो, जिसने ये सब बनाया होगा। आपके सामने ज्वेलरी का विज्ञापन आ जाता है, आप कहते हो, “हाँ, अच्छा लग रहा है। कपड़े भी अच्छे लग रहे हैं उसके, उसके गहने भी अच्छे लग रहे हैं, उसकी शक्ल भी अच्छी लग रही है, उसकी क्लीवेज भी अच्छी लग रही है।” वहाँ जितना नाप-तौल करके सोना रखा गया है, उतना ही नाप-तौल करके क्लीवेज भी रखी गई है। आपको लग रहा है इंसिडेंटली उसका पल्लू गिर गया। सब कुछ फाइनली कैलकुलेटेड है, आपका अटेंशन, आपका माइंड-स्पेस हथियाने के लिए। आप उसके कंज़्यूमर नहीं हो, यू आर द कन्ज़्यूम्ड वन। ख़ासकर अगर कुछ फ़्री है, तब तो पक्का है कि यू आर द कन्ज़्यूम्ड वन।
विज्ञापन फ़्री होते हैं न, विज्ञापन देखने के पैसे लगते हैं कभी? जो कुछ भी मुफ़्त दिया जा रहा है, ये पक्का जान लो कि वो तुम्हें खाने के लिए है। तुम नहीं खाओगे उसको; वो जो तुम देख रहे हो, वो तुम्हें खाएगा।
राजा भर्तृहरि ने कहा था न, कि “मैं भोगता नहीं हूँ; मैं जिसको भोग रहा हूँ, वो मुझे भोग रहा है।” वही आपके साथ हो रहा है।
फिर हम अपने बच्चों को भी यही अभ्यास करा देते हैं कि बर्थडे है तो बर्थडे पार्टी होगी, बेटा। आप नहीं बताते हो तो उसे कोई पता भी न चलता कि बर्थडे का मतलब होता है कि उतने ही छोटे-छोटे को इकट्ठा करके, उनको इकट्ठे नचा दो। उसको तो पता भी न चले। अभी वो चार साल का है, आपने वैसे ही छोटे-छोटे इकट्ठा करके नचा दिए। फिर वो चौदह साल का होगा, वो अपनी पार्टी में जाकर अलग नाचेगा। तब आप कहोगे, “हाय राम! हाथ से निकल गया। नाउ ही इज़ इंटू दोज़ थिंग्स।” उसकी शुरुआत किसने कराई थी? शुरुआत किसने कराई थी?
अब एक आख़िरी बात इस पर बोल रहा हूँ, सबसे बड़ा नशा होता है उत्तेजना। एक्साइटमेंट को स्वभाव मत बना लो, क्योंकि वो बन गया तो लत लगेगी उसकी। बात-बात में कहोगे, उत्तेजना चाहिए। और नहीं मिलेगी तो छटपटाओगे, जैसे ड्रग एडिक्ट छटपटाते हैं कि जो चाहते हैं वो मिल क्यों नहीं रहा। ऐसे लोगों को देखा है? उन्हें दो-चार दिन भी कुछ एक्साइटिंग न मिले तो वो पागल हो जाते हैं। व्हाट्स द नेक्स्ट एक्साइटिंग थिंग? वो आपसे ऑफ़िस वग़ैरह मिलेंगे तो बस यही पूछेंगे, सो, व्हाट्स नेक्स्ट? नेक्स्ट व्हाट? नेक्स्ट व्हाट? लाइफ इज़ ऑन। द नेक्स्ट मोमेंट इज़ हियर। नेक्स्ट व्हाट? व्हाट एक्सैक्टली?
व्हाट्स नेक्स्ट? से उनका मतलब ही यही होता है, व्हाट्स द नेक्स्ट ऑब्सेशन? व्हाट्स द नेक्स्ट इंटॉक्सिकेशन? व्हेयर इज़ द नेक्स्ट एक्साइटमेंट? व्हेयर इज़ द नेक्स्ट स्पाइक?