आस्था और ज़िम्मेदारी अलग नहीं हैं; सच्ची आस्था खुद ज़िम्मेदारी बन जाती है। धर्म के नाम पर प्रकृति का नुकसान और अंधविश्वास, धर्म नहीं बल्कि अज्ञान है। वास्तविक धर्म समझ और सत्य पर आधारित है, न कि परंपराओं की अंधी नकल पर। अंधविश्वास पर प्रश्न उठाना धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे बचाने का काम है।
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प्रश्नकर्ता: सर, नर्मदा नदी में आज भी 11,000 लीटर दूध चढ़ाया गया है। आधुनिक समय में, जब पर्यावरण संरक्षण एक बड़ी चिंता है, तो आस्था और ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
आचार्य प्रशांत: नहीं, संतुलन नहीं बनाना होता। यही तो सारी समस्या है कि हमें लगता है कि वो अलग-अलग हैं। देखिए, दो चीज़ें अलग-अलग होती हैं तभी उनमें संतुलन बनाना पड़ता है। दो चीज़ें अगर एक ही हों, तो संतुलन तो नहीं बनाना पड़ेगा।
आस्था और ज़िम्मेदारी एक ही बात है। अगर आस्था वास्तविक हो और ज़िम्मेदारी समझी गई हो, दोनों का संबंध वास्तविक धर्म से है, जिसे मैं श्रुति-धर्म बोलता हूँ, या गीता के अनुसार स्वधर्म। वही आपको बता देता है कि आपका वास्तविक कर्तव्य क्या है। और श्रीकृष्ण कहते हैं, वो जो वास्तविक है, जो सचमुच तुम्हारा स्वधर्म है, उसके लिए अगर मरना पड़े तो भी स्वीकार कर लो। लेकिन जो तुमने कर्तव्य-धर्म समझकर ओढ़ लिए हैं, बिना जाने कि वो आ कहाँ से रहे हैं, और अब वो तुम्हारा पाखंड बन बैठे हैं, तुम मान्यताओं का पालन कर रहे हो, बिना ये जाने कि उनका सत्य क्या है, बिना ये जाने कि उनका उद्गम क्या है। तो वो फिर सब परधर्म कहलाता है। मैं नहीं, गीता कह रही है।
वो चीज़ है जो तुमने समाज से, संयोग से, परंपरा से उठा ली है, और तुम्हें कुछ पता नहीं कि उसका तुम्हारी हस्ती से, तुम्हारे सत्य से क्या लेना-देना है। तो वो भयावह होता है, गीता कहती है। तो वही भयावहता है परधर्म की, जो हमें चारों तरफ़ देखने को मिल रही है।




