
We leave a talk moved, and by evening it has faded, so we ask how to stay aware every moment. Yet one glance at a report that says cancer is never forgotten; even in our dreams we remember it, and no one has to remind us. We remember what we truly want to save. The mirror is held up once, and a teacher can do no more than that. Sunlight pours through every window, and we can still crawl under a rock. What are we choosing, each time we forget?

ध्यान में बैठकर हम कोशिश करते हैं कि मन में एक भी विचार न आए, मानो सोचना कोई गंदगी हो। पर जैसे पेट का काम पचाना है, वैसे ही मस्तिष्क का काम सोचना है। विचार न कोई रोग है, न कोई बड़ी उपलब्धि, वह डकार जितनी ही साधारण क्रिया है। दस सेकंड आँख बंद करके अपनी कोई अधूरी हसरत पूरी होती सोचिए, सब नकली जानते हुए भी मज़ा आ जाता है। सोच के घोड़े को वही दौड़ा रहा है जिसे उससे राहत की आशा है। तो हम विचार से लड़ें, या पूछें कि यह सोच किसके लिए चल रही है?


किसी के मुँह से सुनते ही कि उसे सच मिल गया है, हम उसके पीछे चल पड़ते हैं, जेब भी ढीली कर आते हैं। फिर हम जैसे दो-चार लोग मिलकर एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि हमें भी मिल गया। पर जो सबसे ऊँचा है, वह जेब में डालने की चीज़ नहीं। जो उसे छूने निकला है, वह अभी पूरा बचा हुआ है, और छूते ही उसे अपनी कहानी का पात्र, अपना औज़ार बना लेता है। जिसका सच से सचमुच नाता है, उसकी ज़बान तो नाम लेने में भी काँपती है। तो हम सच खोज रहे हैं, या अपने झूठ को देखने से बच रहे हैं?

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आपने कहा था कि ग़लती ‘मैं’ भाव से आती है। तो इसके साथ ही अक्सर हम अपनेआप को ये तर्क देते हैं कि मुझसे ये ग़लती हो गयी, ये मैं नहीं थी। तो ये ‘मैं’ भाव क्या है? और ग़लती किसको कहा जा रहा है तब?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम संघर्ष करते हैं तो वह समय हमें बहुत कुछ सिखाता है, लेकिन फिर हम उसे कठिन समय क्यों कहते हैं? और जब समय अनुकूल चल रहा हो तो हम कुछ ऐसे काम कर देते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए था। मुझे यह समझ नहीं

आचार्य प्रशांत: अगर हमारे बीच वास्तव में कोई रिश्ता है तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा कि आप वैसे ही कोई ज़िन्दगी जी रहे हो जैसे कोई आम आदमी जीता है। मुझे अपनेआप पर और अपनी बात पर घिन आएगी। आप अगर कहते हो आप दो साल से मेरे साथ


Acharya Prashant: It has been told to us that there exist two centers. I suppose it has been very freshly told to you right? Very recently. He says, “How do I know that I am living out of the right center? How does a young man know whether he’s not


आचार्य प्रशांत: आनंद फ़िल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन की जो आपसी नोंक-झोंक होती थी, बड़ी दिलचस्प थी — कि ज़िंदगी तुमको बड़ी चाहिए कि लंबी चाहिए। ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी चाहिए या लंबी चाहिए?’


आचार्य प्रशांत: आप जो चाहो, जिसको चाहो, दिखा सकते हो, कैमरे का मतलब ही होता है झूठ। कैमरे का तो मतलब ही झूठ है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। सवाल ये है कि मन हर चीज़ को अंकित क्यों करता है, कि किसी ने किस नज़र से देखा, क्यों हँसा, क्यों आवाज़ हुई। कहीं तो मन में भी कुछ हो जाता है।



n some sense, spirituality is all about unleashing yourself, which is freedom from bondage. The leash is the bondage. Read more....


प्रश्नकर्ता मेरे को पता है कि मैं नशा करता हूँ और वो एक सर्टेन टाइम (निश्चित समय) पर आता है। शाम हो जाती है तब मन उधर को पूरा खिंचा चला आता है। वो जो मज़ा देता है मैं उसको छोड़ भी नहीं पाता और मैं कहीं भी कोई भी…

प्रश्नकर्ता: पानीपत से व्यवसायी हैं, उनका प्रश्न है। आचार्य जी, हमारे सारे कर्मों के पीछे मोक्ष की गहरी इच्छा होती है। परन्तु जैसे हम वैसे ही हमारे तरीके इसीलिए हम यूँही भटकते रहते हैं। लेकिन कर्म तो हम करते ही हैं, अब कर्म की गुणवत्ता का पैमाना स्वयं को तो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो अनुभव आपको नहीं हैं, वो किसी और को कैसे हो सकते हैं, ये कहीं ऐसा तो नहीं, आपका कोई पूर्वाग्रह है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, क्या है? खोलकर बताओ बात, क्या कह रहे हैं? किसका अनुभव? एनलाइटनमेंट का?

The ego does not need an entire purpose of life. It's so much in pain and so full of immediate distress that it's enough for it to pay attention to its immediate surroundings. And the most immediate to the ego is itself. So words like ultimate mean nothing to the ego. The ego is like a patient on a ventilator. That fellow is looking forward to the next hour. Will I see the next day? Will I survive the next hour? That's the ego so much in distress that even the next one hour is difficult to to predict or see through or navigate.

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज़ाद मन को पुन: कैसे प्राप्त करूँ? यदि मेरा आनन्द खो गया है, तो पुनः उस आनन्द को कैसे प्राप्त करूँ?

आचार्य प्रशांत: तुम्हारे सामने, तुम्हारे साक्षात् नहीं खड़ा होगा ब्रह्म। ब्रह्म अनन्त है। और ये अहंकार का बचपना है, छोटे बच्चे की ज़िद जैसा है कि ब्रह्म सामने खड़ा हो और हम उसका साक्षात् कर रहे हैं। और पड़ोस की पिंकी को बता भी रहे हैं कि अहा-हा! देखो कितना

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। सबसे पहले आपका बहुत-बहुत धन्यवाद काफ़ी कुछ बदलाव आया है। मैं पाठ कर रहा था, तो उसमें भगवान दत्तात्रेय का जिक्र था। तो उनसे कुछ ऋषि पूछने आएँ, उनमें से कुछ ऋषि गृहस्थ हैं। अपना पूरा वृतांत बताया। कहते हैं, "ऐसा है, वैसा है।" दत्तात्रेय सब…

Acharya Prashant (AP): When you come upon something beautiful, try to understand it. That’s what is meant by watching. The worldly bird, the engaged bird would have surely glanced at her neighbour many times, that’s not really called looking. To look is to understand; do you really understand, or do

प्रश्नकर्ता: आपकी वीडियो देखती हूँ मैं हमेशा। और आपने बहुत लोगों को इस राह पर लगाया है, सत्य की राह पर। मैं भी बहुत महीनों से आपको सुन रही हूँ। और ऐसे जीवन को देखने लगी हूँ अभी। विवेक थोड़ा-थोड़ा जाग्रत होने लगा है, क्या सत्य है, क्या असत्य है।

We have all put down a book that could have helped us, or dozed off halfway through something that mattered. A man who could not keep food down was given medicine, and he threw that away too, since it went in by the same route. Most of us strike a similar deal: we move into a place that stinks and, within a week, call the smell normal. Show our fifteen-year-old self the life we lead now and they would scoff. What would change if we admitted we do not like our condition?
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर आज काफ़ी अच्छे सीख थे सत्र में। और मेरा प्रश्न भी इस सत्र से ही सम्बन्धित है। सर, आपने बताया था कि मान्यताओं का सम्बन्ध अनुभव से है। प्रारम्भ में हमने चर्चा की था। यानी कि जो विकार हैं, वो भी एक तरह से मान्यताओं…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, हाल ही में मैंने अपने आदर्श स्टीव जॉब्स और विराट कोहली द्वारा सुझाई गयी लोकप्रिय किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पढ़ी, तो जीवन का अलग ही आयाम खुल गया।
उस किताब के लेखक और उनके गुरु ने, न केवल अपने पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न विज्ञान से सम्बन्धित है। तो काफ़ी समय से वैज्ञानिक समुदाय और प्रकृति में एक तरीक़े का एक तकरार चल रहा है और काफ़ी हद तक विज्ञान सफल भी हुआ है, कोविड वैक्सीन का उन्होंने निर्माण किया और शायद प्रकृति की जो योजना थी उसको…
प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…
ājñābhayasaṁśayātmaguṇasaṅkalpō bandhaḥ
Bondage is to imagine that Ātman has qualities like doubts, fear, etc.
~ Niralamba Upanishad, Verse 25
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Acharya Prashant (AP): “Bondage is to imagine that Ātman has qualities like doubts or fear etc. Bondage is to imagine that Ātman has doubt or…
लंबी चाहिए तो खूब नकारात्मकता से भरे रहो। जितना तुम शक्की रहोगे, प्रकृति ने संयोग…
प्रश्नकर्ता: तलब एक हैप्पिनेस (खुशी) है सर, हैप्पिनेस को किस तरह कन्सिडर (मान) कर सकते हैं?...कि मतलब हमारी जो इच्छाएँ हैं वो पूरी हो जाएँ? या उसमें कोई दुख वगैरह उसको कन्सिडर करते हैं? सर एक लाइन (पंक्ति) है कि हर लाइफ़ (जीवन) की एक हैप्पी एंडिंग (सुखान्त) होती है,…
अहंकार है, कुछ नहीं भी करो तो भी तुम लगे ही हुए हो, रत हो, उद्यमी हो। और नहीं है अगर अहंकार तो जो करना है करो, तुमने तब भी कुछ नहीं किया।अहंकार रहित कर्तृत्व को ही कहते हैं अकर्तृत्व। अकर्ता और कोई नहीं है; अकर्ता और कर्ता में यही अंतर है कि करते दोनों हैं, एक इसलिए करता है कि कुछ मिल जाएगा और एक बस यूँही करता है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, पिछले एक साल से आपको सुन रहा हूँ और आपकी अनुकम्पा से ग्रन्थ भी पढ़ने शुरू किये हैं तो अभी प्रतिदिन कुछ नया सीखने को मिलता है, मन बिलकुल लगा रहता है और जैसा पहले चला करता था, उससे बिलकुल बदल गया है जीवन।…
प्रश्नकर्ता: और ये सब कंटेंट (सामग्री) बनाया भी जा रहा है, फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच (अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता)। वो बोल रहे हैं कि ये फ़िल्म बनाना हमारी …
आचार्य प्रशांत: हर चीज़ को नहीं अंकित करता मन। इतनी सामर्थ्य ही नहीं…
कभी स्कूल गए हो वहाँ कभी किसी तीसरी क्लास के लड़के को पहली क्लास के लड़के को धुनते देखा है? देखा है? तो वही है ये। तीसरी क्लास वाले ने पहली क्लास वाले को पकड़ के पटापट- पटापट- धुन दिया, और यही है। इसका कुछ नहीं है।
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिक अनुभव जैसा कुछ नहीं होता। आप अगर आध्यात्मिक हैं तो आपके सब अनुभवों में एक सच्चाई…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम अंकिता रावत है। सर, जैसे कि मन हमेशा चीज़ों की ओर आकर्षित होता है तो आकर्षित का मतलब होता है कि हमें वहाँ खुशी मिलेगी, हम उसके पीछे भागते हैं और वो और अन्त में हमें दुख ही होता है, मतलब खुशी और दुख का…
आचार्य प्रशांत: कंडिशनिंग से अहम् का निर्माण नहीं है, कंडिशनिंग से…
Questioner (Q): I had been part of the last Delhi Camp, IIT Delhi Camp. During those three days, I have seen that you have spoken to the participants continuously for 6 hours, then later in the evenings, with hostel students, for another two, to three hours till 2 a.m. in…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ ख़ास दिन जैसे नवदुर्गा के नौ दिनों में सब द सेक्रेड फेमिनिन (पवित्र स्त्रीत्व) वगैरह की बहुत बातें करते हैं। हर जगह स्त्री शक्ति का ही ज़ोर रहता है। पंडालों में भी देवी और अखबारों में भी नारी का, स्त्री का महिमामंडन रहता है और तब…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न डर से सम्बन्धित है। मैं जब किसी इंसान को देखता हूँ कि वो ख़ुद से कमज़ोर इंसान को डाँट रहा है या मार रहा है तो मैं बहुत घबरा जाता हूँ, कभी-कभी बहुत गुस्सा हो जाता हूँ। मैंने सोचा, तो इसके पीछे मुझे कुछ…
Questioner: How can we control the ego?
Acharya Prashant: We have this electric fan here, right? And let's say we want to control its functioning. We have so many other machines around, so many other phenomena around. Can you do anything about this fan if you do not understand this…
तोहि मोहि लगन लगाय रे फ़कीरवा तोहि मोहि लगन लगाय रे फ़कीरवा सोबत ही मैं अपने मंदिर में सबद बान मार जगाये रे फ़कीरवा डूबत ही मैं भव के सागर में बहियाँ पकर समुझाये रे फ़कीरवा एकै बचन बचन नहीं दूजा तुम मोसे बंध छुड़ाये रे फ़कीरवा कहै कबीर सुनो…
आचार्य प्रशांत: एक स्कूल था बच्चों का, छोटे बच्चे आते थे वहाँ एकदम। छोटे बच्चे आये वहाँ, खड़े हो और बड़े अपनेपन से और बड़े नाज़ से बोले, 'ये हमारा स्कूल है।' एक दिन वहाँ कुछ जंगली जानवर आ गये। उनको खबर मिल गयी थी कि यहाँ छोटे-छोटे बच्चे रहते…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जिस व्यवसाय में हूँ, मैं जानता हूँ कि इस व्यवसाय में छलकपट, झूठ बड़ी आम बात है। परंतु ये जानने के बावज़ूद भी जो बेहतर से बेहतर मैं कर पा रहा हूँ वो ये है कि मैं इस काम को पूरी ईमानदारी से कर रहा हूँ।…
आचार्य जी: खोता नहीं है। अगर होता है, नहीं खोता है। अगर खोया है तो खोने लायक़ ही था, असली नहीं था। आने-जाने वाली चीज़ थोड़े…
आचार्य प्रशांत: ‘नय’ शब्द का अर्थ होता है, साधारण भाषा में, जिस चीज़ को जहाँ होना चाहिए उसका वहीं होना। जहाँ से 'न्याय' निकला था न। जो चीज़ जहाँ हो अगर वहीं है तो न्याय है। ठीक? तो अध्यात्म की दृष्टि से अन्याय सिर्फ़ एक होता है — मन का…
प्रश्नकर्ता: हमारे जीवन में परिवर्तन कैसे सम्भव है?
आचार्य प्रशांत: हर समय हो तो रहा है परिवर्तन। अभी बैठे थे, अब खड़े हो गये। हो गया परिवर्तन। और कैसा परिवर्तन चाहते हो? टीशर्ट पहने हो, थोड़ी देर में उतार दोगे, तो हो गया परिवर्तन। परिवर्तन क्या है? दायें को अटके…
Questioner (Q): Acharya Ji, pranam. Is there any difference between being immersed and being alert? What we see in nature is that the animals are very much alert of their surroundings from moment to moment. What does J Krishnamurti mean when he says that great alertness is needed to remain…
Questioner: So, do you teach any Sādhanā through which your disciples and followers can access this inner Witness through which they can constantly de-attach themselves from the world which they are experiencing.
Acharya Prashant: Know what you are doing currently, first of all, that’s what is needed. Anything begins when…
Questioner (Q): Put in some difficult situations and old locations, I am surprised to see my old tendencies of hurt and dependence are back; they never did leave. I am selfish, difficult and stubborn. Help me Acharya Ji. Help me move ahead of this pettiness. Please!
Acharya Prashant (AP): You…
Questioner (Q): I watched your recent video - “Loving your fake lifestyle.” In that video you talked about two things. One is abuse of consciousness and another was that corporates are dehumanizing the employees.
In that context I wanted to ask you, this dehumanization actually is not only happening in…