
प्रश्नकर्ता: नए साल कैसे मनाएँ? क्या रखना चाहिए? क्या नया धारण करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: आँखे बाहर-बाहर देख ही रही हैं कि क्या चल रहा है। दुनिया है दुनिया उत्सव मना रही है, ये तथ्य है और ये आपको साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है। आप उपेक्षा तो नहीं कर सकते इस बात की, आप ये कह ही नहीं सकते कि बाहर कुछ हो ही नहीं रहा है। आप ये तो नहीं कह सकते, कि जैसे बाक़ी दिन होते हैं वैसे ही आज का दिन है।
तो सबसे पहले तो इमानदारी से स्वीकार करना पड़ेगा कि आज का दिन अलग है, क्यों अलग है? क्योंकि आज सब कुछ अलग है। आप सड़क पर जाइए तो सड़क अलग है, लोग अलग हैं, लोगों के मन अलग हैं, उनकी उम्मीदें अलग हैं, टीवी, रेडियो खोलिए तो उसमें कार्यक्रम अलग हैं, सब कुछ अलग है, और तो और कैलेंडर भी अलग है। ठीक?
ये नहीं कहा जा रहा है, कि, अरे! नहीं सब कुछ वैसा ही है। अगर सब कुछ वैसा ही है तो कल से 2025, 2026 कैसे हो जाएगा? तो सब कुछ तो वैसा नहीं है, कुछ तो बदला है। दूसरी ओर उससे कहीं गहरी बात ये भी है, कि कुछ नहीं बदला है; जो नहीं बदला है वो दो तलों पर है, दोनों को समझिएगा।
आदमी के मन कि चाल, कि वो असली मुद्दों को दबा के छोटे-छोटे मुद्दों में किसी तरीके से मुक्ति खोज ले, वो नहीं बदली है। सुख ढूँढने की आदमी की अभीप्सा नहीं बदली है। आलसी मन की परंपरा पर चलने कि वृत्ति नहीं बदली है। धारणाएँ नहीं बदली हैं, ये नहीं बदला है। और इनसे भी गहरी बात जो न बदली है, न बदल सकती है, वो ये है कि ‘सत्य’ नहीं बदला है, ‘आत्मा’ नहीं बदली है।
जो जगा हुआ व्यक्ति होता है वो इन सभी बातों को एक साथ ध्यान में रखता है, एक-एक करके नहीं, अलग-अलग बिंदुओं, अलग-अलग जगहों, अलग-अलग समयों पर नहीं, एक साथ ध्यान में रखता है। वो ये भी जानता है कि दुनिया के लिए आज का दिन ख़ास है। वो ये भी जानता है कि दुनिया के लिए ख़ास इसलिए है क्योंकि दुनिया का मन बदल नहीं रहा। और वो ये भी जानता है कि जो मन बदल नहीं रहा वो बदला जा सकता है क्योंकि वास्तव में जो अपरिवर्तनीय है वो ‘सत्य’ है। तीनों बातें समझ में आ रही हैं?
एक बात मैंने उसकी करी जो बदलता दिख रहा है, दो बातें मैंने उनकी करी जहाँ बदलाव नहीं है। क्या बदलता दिख रहा है? आज के दिन दुनिया का रंग-ढंग बदलता दिख रहा है। क्या है जो नहीं बदल रहा है? दुनिया का गहरा ढर्रा है, वृत्ति है, वो नहीं बदल रही है। और क्या है जो कभी बदलेगा ही नहीं ? वो ‘सत्य’ है।
आप यहाँ आए, बैठे, मैनें आपसे कहा चलिए ठीक है, आज सवाल ज़रा लिख लीजिए दूसरे क़िस्म के। दोहा, श्लोक ज़रा पीछे छोड़िए कुछ और कर लीजिए। इस बात का संबंध निश्चित रूप से इससे था, कि आज तारीख क्या है। तो मैंने उस बात को उपेक्षित नहीं कर दिया, मैंने उस बात का संज्ञान लिया, महत्त्व दिया कि आज तारीख अलग है और हम सब तारीखों में रहने वाले जीव हैं। तो तारीख अलग है तो थोड़ा कुछ अलग करूँगा। ये पहली बात हुई, कि बदला है इसका स्वीकार, इसका संज्ञान लेना।
दूसरी बात, मुझे ये भी दिख रहा है कि ये जो हमारे भीतर मनोरंजन की और उत्सव मनाने की ख़्वाहिश रहती है, वो रहती इसीलिए है कि हम सब भीतर से बड़े सूने और उदास हैं।
मनोरंजन से उदासी ख़त्म नहीं होती, सिर्फ़ कुछ समय के लिए छुपती है, और जो चीज़ कुछ समय के लिए छुपती है वो कुछ समय बाद और ज़्यादा बल लेकर के प्रकट होती है।
तो इस बात को जानते हुए आपके बदले हुए सवालों पर भी मैंने चर्चा आपके मन की ही करी, जो हमेशा करता हूँ। उससे अलग कोई चर्चा नहीं करी। ठीक है कभी दोहे पर बोलता था, आज दोहे पर नहीं बोल रहा पर बात वही कह रहा हूँ। कहने के लिए मेरे पास दूसरी बात होती ही नहीं है।
और तीसरी बात जो अपरिवर्तनीय है, वो क्या? वो तो बस है। उसी से आप हैं, उसी से मैं हूँ, उसी से ये शब्द हैं, उसी से आपका ये सुनना है; यही संसार में जीने की कला है। फालतू स्वांग नहीं करना है, कि दुनिया में जो हो रहा है उससे हमें अंतर नहीं पड़ता। अंतर तो पड़ता ही है।
आज रात में अगर निकलोगे 11-11:30 बजे तो जाम में फंस जाओगे, अंतर नहीं पड़ेगा? तुम्हें इस बात को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि आज का दिन दुनिया के लिए विशेष है। आज जाओ किसी रेस्तराँ में खाना खाने के लिए तो बिना बुकिंग के घुसने को नहीं पाओगे। तो ये झूठ क्यों बोलें, कि आज का दिन किसी भी और दिन कि तरह है, ये झूठ बोलने से कोई फ़ायदा? तो मानना पड़ेगा कि आज का दिन कुछ है, दुनिया का है, ख़ास दिन है। पर वो दिन क्यों ख़ास है ये हमें समझना पड़ेगा, वो बात तो समझ की है, वो मानसिक तल की है, उसी को मैंने कहा, कि
दुनिया ख़ास दिन इसलिए मनाती है, ताकी उसकी बीमारियाँ क़ायम रह सकें।
आपको ये दिलासा बनीं रहती है, कि एक ख़ास दिन आ रहा है, आप उसकी उम्मीद में जिए जाते हो, आप उसकी उम्मीद में बाक़ी सब बर्दाश्त किए जाते हो। आप कहे जाते हो, “आने वाला है ख़ास दिन।” एक दूसरा उदाहरण लीजिए, आप सब के पास वो सब हमारी ओर से संदेश आ रहे होंगे, कि हमनें पोस्टर बनाए हैं, वो पिनटरेस्ट में हम लोगों ने जाकर रख दिए हैं, और आप लोगों से कहा जा रहा होगा कि आप भी इनको बाँटे। आ रहे हैं?
हम बिल्कुल इस बात को तवज्जो दे रहे हैं कि दुनिया आज एक दूसरे को बधाइयाँ देना चाहती है, और वो बधाइयाँ देने के लिए कुछ रंगीन, उजले, आकर्षक क़िस्म के पोस्टर खोज रही है। तो हमने तीन-चार रोज़ पहले से, योजनाबद्ध तरीके से ही, प्लानिंग के साथ; भूलिएगा नहीं वहाँ योजना है, हमनें तीन-चार दिन पहले से उनको इकठ्ठा करना शुरू किया। और अब मेरे ख़्याल से सौ, दो सौ, डेढ़ सौ हो गए हैं। और फिर आप तक संदेश पहुँचाया कि भाई, और इधर-उधर के फालतू संदेशों की जगह वहाँ से आकर के उठाओ और उसको।
इसमें देखिए कि तीनों बातें हो रही हैं कि नहीं: पहला, हम जानते हैं कि ये दिन आपके लिए ख़ास है, तो आपके लिए हमनें कुछ सामग्री तैयार कर दी। रोज़ तो नहीं तैयार करते, आज के लिए ही तैयार करी है। दूसरी बात, वो सामग्री ऐसी है, कि जिसके पास जाएगी उसके मन की शुद्धि करेगी। भेज हम उसको किस बहाने से रहे हैं? कि नया साल है; पर वो काम क्या करेगी? कि मन से समय का जो पूरा आतंक है वही हटा देगी, अगर कोई इसमें गहरे प्रवेश करे तो, वो तो बात है ही।
और तीसरी बात, ये सब करने की प्रेरणा और बल हमें कौन दे रहा है, वो जो समय के साथ कभी बदलता नहीं। तो हम इस बात का संज्ञान ले रहे हैं कि समय बदल रहा है। बदलते समय में हम वो कर रहे हैं जो हमें करना चाहिए, और वो उचित कर्म कर पाने की समझ और बल हमको वो दे रहा है जो समय के साथ कभी बदलता नहीं। बस यही है तरीका जीने का, ऐसे जियो।
फिर बात सिर्फ़ नव वर्ष के पर्व कि नहीं रहेगी, फिर जीवन में जो भी परिस्थिति आएगी उसमें तुम जानोगे, कि अब उचित कर्म क्या है? इस वक़्त मुझे क्या करना चाहिए? तुम अंधे नहीं होगे उस पल के प्रति, कि मैं तो संन्यासी हूँ, मुझे नहीं पता कि क्या हो रहा है। अरे! हमारे सामने हो रहा है, हमारा दायित्व है। हमें पता होना चाहिए कि अभी हमारे क्या कर्तव्य हैं, हम वो करेंगे।
जब कर्तव्य आपकी अपनी समझ से निकलता है, तो उसका नाम ‘धर्म’ हो जाता है। समझिएगा बात को। और जब कर्तव्य सिर्फ़ नैतिकता के उद्देश्यों से आता है, तो वो कोरा-कर्तव्य कहलाता है। कर्तव्य जब आत्मा से प्रस्फुटित होता है, तो उसी का नाम ‘धर्म’ होता है।
पता होना चाहिए कि आपका कर्तव्य क्या है; फिर चाहे वो नए साल का जश्न हो, चाहे कोई भी और मौका।