ईरान विरोध प्रदर्शन: सिस्टम वही, समाधान अलग कैसे?

Acharya Prashant

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ईरान विरोध प्रदर्शन: सिस्टम वही, समाधान अलग कैसे?
दुनिया में जहाँ भी दक्षिणपंथ है, राइट-विंग मूवमेंट्स जहाँ-जहाँ चल रहे हैं, वहाँ-वहाँ लोकतंत्र कमज़ोर पड़ रहा है। ईरान में भी अब यही चल रहा है। यह एक तरह से माया का चक्र है। यह सोचा जा रहा है कि लिबरल-सेकुलर होने से हटकर के हम जब कंज़र्वेटिव, ऑर्थोडॉक्स इस्लामिक हुए, तब समाधान मिल जाएगा; और उससे वापस घूम करके फिर से लिबरल-सेकुलर हो जाएँगे, तब समाधान मिल जाएगा। मनुष्य यह मानने को ही तैयार नहीं है कि व्यवस्था आती रहेगी, जाती रहेगी। उसकी समस्या का मूल कारण उसके भीतर है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं ऋतुपन्ना हूँ, ओड़िसा से। मेरा सवाल ईरान प्रोटेस्ट को लेकर है। मैं हाल ही में पढ़ रही थी उसके बारे में। हाल ही में जो इकोनॉमिक क्राइसिस है ईरान में, उसके वजह से बहुत सारा प्रोटेस्ट चल रहा है। और मैंने यह भी पढ़ा कि 1979 में भी ऐसा ही एक इकोनॉमिक क्राइसिस के वजह से एक प्रोटेस्ट हुआ था और उसके वजह से शाह को गिरा के आयतुल्लाह, जैसे वह धार्मिक मोड़ ली और उनको लाया गया था।

पर अभी यह देखा जा रहा है कि इसकी वजह से उनको विरोध किया जा रहा है। तो इसका क्या कारण हो सकता है कि जो उस समय जो प्रोटेस्ट चल रहा था, जिनको लाया गया था, अभी उन्हीं के विरोध में जा रहा है?

आचार्य प्रशांत: तो तब आयतुल्लाह से पहले ईरान काफ़ी हद तक, समझ लो कि जिसको हम एक सेकुलर और लिबरल जगह कहेंगे, वैसा था। आप महिला हैं, अपर अगर ईरानी महिलाओं की तस्वीरों के बारे में गूगल करेंगी, 60 के दशक में, 70 के दशक में, तो आप पाएँगी कि वो काफ़ी आधुनिक दिखती थीं। यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ा रही थीं, गाड़ियाँ चला रही थीं। आपको यह सब सूचना भी मिल जाएगी, बाक़ायदा इनकी तस्वीरें भी मिल जाएँगी। हँस रही हैं, कोई ऐसे कपड़ों की या आचरण की कोई पाबंदी नहीं है। आपको सड़कों पर दिख जाएँगी, घूम रही हैं, टहल रही हैं, बाज़ारों में ख़रीद रही हैं। अपना, जैसे कोई साधारण आदमी होता है आज़ाद, वैसे वो जी रही थीं।

अब वो सब चल रहा था, लेकिन समस्याएँ तो किसी भी देश के सामने आती ही हैं। तो समस्याएँ सामने आईं। उनका काफ़ी सारा संबंध तो विदेश नीति से ही था और कुछ उसका आर्थिक पहलू था, तेल, मुद्रास्फीति, बेरोज़गारी, और कुछ उसमें मामला मनोवैज्ञानिक भी था कि जनता को यह लग रहा था कि हम तो जो विदेशी ताक़तें हैं, ख़ासकर जो ईसाई ताक़तें हैं, उनके सामने घुटने टेके बैठे हैं।

तो क्रांति हुई, ईरानियन रिवॉल्यूशन या इस्लामिक रिवॉल्यूशन बोलते हैं उसको। तो उसमें शाह को; और यह साहब आ गए। और उसके कितने साल बीत गए हैं? लगभग 50 साल। अब उसके 50 साल बीतने को हो रहे हैं, 46 हो गए, 46 साल।

तो अब समय का जो पहिया है, उसने अपना चक्र पूरा कर लिया है। अब जो वहाँ पर क्रांति चल रही है, उसको बोला जा रहा है “जेन-ज़ी रिवोल्यूशन।” और उसमें सब जवान लोग और लड़कियाँ भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं। अभी पिछले साल वहाँ पर हुआ था कि एक लड़की ने किसी यूनिवर्सिटी कैंपस में अपना हिजाब ही नहीं, अपने सब कपड़े वग़ैरह उतार दिए थे। उसकी तस्वीर काफ़ी वायरल वग़ैरह हुई थी।

उससे पहले क्या नाम था उस लड़की का, जिसकी मौत ही हो गई थी प्रोटेस्ट्स में?

श्रोता: माहसा।

आचार्य प्रशांत: हाँ, और उसको ले जा रहे थे पुलिस वाले, और उसमें उसकी मृत्यु हो गई थी। तो उसको लेकर के खूब चला था। तो यह भी पिछले दो-चार साल से यह चल रहा है।

और अब इसमें एक बहुत बड़ा कारण यह है कि अभी जो इज़राइल और ग़ाज़ा वाला खेल था, उसमें पिछले साल ईरान भी लपेटे में आ गया था। तो उसकी वजह से जो वहाँ की इस्लामी हुकूमत है, वह कमज़ोर हो गई है। लगभग यहाँ तक हालत आ गई थी कि अमेरिका बम-वर्षा करके तुम्हारे प्रमुख को मार ही डालेगा।

तो जब यह देखा जाता है न कि हमारा यह हेड बने बैठे हैं और देखो, इनकी तो इतनी बेइज़्ज़ती हो रही है, ख़ुद ही सुरक्षित नहीं हैं, तो जो भीतर आंतरिक विद्रोही ताक़तें होती हैं, डिसेंटिंग फ़ोर्सेस, उनको बल मिलता है। तो अब वो इनको गिराना चाहती हैं।

तो यह ऐसे पूरा पहिया घूम रहा है। और यह सोचा जा रहा है कि लिबरल-सेकुलर होने से हटकर के अब हम जब कंज़र्वेटिव, ऑर्थोडॉक्स इस्लामिक हुए, तब समाधान मिल जाएगा; और उससे वापस घूम करके अब हम फिर से लिबरल-सेकुलर हो जाएँगे, तब समाधान मिल जाएगा।

यह एक तरह से माया का चक्र है, जहाँ पर हम देखना नहीं चाहते हैं कि फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप कंज़र्वेटिव हो कि लिबरल हो, कि आप रिलीजियस हो, ऑर्थोडॉक्स हो, सेकुलर हो; जब तक मूल अज्ञान बाक़ी है, तब तक आप बस बाहरी सिस्टम्स, बाहरी व्यवस्थाएँ चेंज करते रहोगे।

पहले कितना चला कि जब तक जनतंत्र नहीं आएगा, तब तक दुनिया की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। अब न जाने कितने देशों में, जिसमें भारत भी शामिल है, यह ज़ोर-शोर से कहा जा रहा है कि ये जनतंत्र हमारी समस्याओं का कारण है। दुनिया भर में आप पाओगे कि अभी लोकतंत्र के लिए कोई बहुत अनुकूल हवा नहीं बह रही है। और इसी लोकतंत्र को दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह मान लिया गया था कि यह शांति की गारंटी होगा। वो सब उड़ गया।

दुनिया में जहाँ-जहाँ भी दक्षिणपंथ है, जो राइट-विंग मूवमेंट्स हैं, जहाँ-जहाँ चल रहे हैं, वहाँ-वहाँ लोकतंत्र कमज़ोर पड़ रहा है और जनता की सहमति से कमज़ोर पड़ रहा है। क्योंकि लोगों ने जैसे पहले माना था कि लोकतंत्र आएगा तो हमारी सारी समस्याओं का हल हो जाएगा, वैसे ही अब जनता कह रही है कि हमारी समस्याओं का कारण लोकतंत्र है।

माने कारण जब भी तलाशना है, कहाँ तलाशना है? बाहरी व्यवस्था में तलाशना है।

मनुष्य यह मानने को ही तैयार नहीं है कि व्यवस्था आती रहेगी, जाती रहेगी। उसकी समस्या का मूल कारण उसके भीतर है।

तो बाहरी व्यवस्था बदलने से कुछ समय के लिए कुछ राहत मिल सकती है, पर कोई मौलिक परिवर्तन नहीं आने वाला। बात आ रही है समझ में?

जिन देशों में सबसे ज़्यादा ताक़त सेंट्रलाइज़्ड थी, उन देशों में सबसे पहले क्रांतियाँ हुईं। और क्रांतियाँ होने के बाद अक्सर देखा गया कि ताक़त दोबारा सेंट्रलाइज़ हो गई। आज आप इतिहास पर जाकर देखो तो कहना मुश्किल हो जाएगा कि ज़ार ने ज़्यादा सेंट्रलाइज़ कर रखा था या स्टालिन ने, रूस में। बड़ा मुश्किल हो जाएगा।

और वह कौन-सा टेस्ट है, अभी वह पायनियर वाले आर्टिकल में उसका मैंने नाम भी लिखा हुआ था। 1951 में, वो ब्रिटिश बंदा था, उसने एक टेस्ट करा था। क्या नाम था? तो उसने साइकोलॉजिकल टेस्ट करा था, जो लेफ्ट-विंग के लोग थे और जो राइट-विंग के लोग थे। और उसने यह पाया कि ये लोग आइडियोलॉजिकली जितने-जितने विपरीत हैं, साइकोलॉजिकली उतने ही सिमिलर हैं। दोनों में ही कॉमन टेंडेंसी है।

राइट-विंग और लेफ्ट-विंग साइकोलॉजिकली बिल्कुल सिमिलर हैं। दोनों में कॉमन टेंडेंसी है किसी बाहर वाले को दोष देने की। जब भी कुछ गलत हो, तो दोष दे दो कि बाहर वाला है, लोकेट द एनिमी आउटसाइड समवेयर। दोनों में ही टेंडेंसी है ट्रुथ को बिलॉन्गिंग से डिफ़ाइन करने की। वह जो भी हमारे पक्ष से खड़ा है, वह सच ही बोल रहा है; और जो हमारे पक्ष से नहीं खड़ा है, जो हमें नहीं बिलॉन्ग करता, वह झूठ बोल रहा होगा। और दोनों में ही यह भी टेंडेंसी है कि वो सत्ता के सामने खूब झुकते हैं।

आप देखो तो जहाँ कहा गया, कि आम आदमी को ताक़त मिलनी चाहिए, लेट द कॉमन मैन राइज़, वहाँ सबसे ज़्यादा डिक्टेटर्स पैदा हुए। आप स्टालिन को ले लो, आप माओ को ले लो, आप दक्षिण कोरिया को ले लो। आप पूर्वी यूरोप के बहुत सारे देशों को ले लो, आप अफ्रीका को ले लो। यहाँ देखो किस आधार पर तानाशाह खड़े हुए। कहा गया कि इट्स द कॉमन मैन्स अपराइज़िंग।

बात हुई थी कि देखो ये जितने सेठ होते हैं, पूँजीवादी होते हैं, बड़ी गड़बड़ करते हैं। इन्होंने आम आदमी का पैसा हड़प रखा है। तो अब हम क्रांति करेंगे और सत्ता आम आदमी को सौंप देंगे। और इन सब देशों में सत्ता किसी तानाशाह के हाथ में चली गई।

दुनिया में यही चलता रहेगा। जब तक हम नहीं देखेंगे कि हमारी वृत्ति ही हिंसा की है, अज्ञान की है। अहंकार जहाँ रहेगा, वहाँ सत्ता का खेल ही खेलेगा। वहाँ आप बाहरी व्यवस्थाएँ कितनी भी बदलते रह जाओ, हिंसा का, दमन का चक्र चलता ही रहेगा। बस इतना है कि बाहरी व्यवस्था बदलती रहेगी, तो आपके बाहरी मालिकों के नाम बदलते रहेंगे। और अपनी ख़राब हालत के लिए आप जिनको दोष देना चाहते हो, बहाना बनाना चाहते हो, उन बहानों के नाम बदलते रहेंगे।

कभी बहाना बन जाएगी डेमोक्रेसी और कभी बहाना बन जाएगा डिक्टेटरशिप। पर हमेशा आप ये बोलोगे, “हमारी हालत ख़राब इसलिए है क्योंकि डेमोक्रेसी बहुत ज़्यादा है भारत में।” फिर बोलोगे, “हमारी हालत ख़राब इसलिए है क्योंकि डिक्टेटरशिप है भारत में।” कभी यह नहीं बोलोगे, कि हमारी हालत ख़राब इसलिए है क्योंकि हम ही ख़राब हैं।

तो ईरान में भी अब यही चल रहा है, पूरा एक चक्र चल रहा है। बिल्कुल हो सकता है कि जो वहाँ इस्लामिक व्यवस्था है, गिर जाए, हो सकता है। पर क्या उससे कोई मूलभूत अंतर पड़ेगा ईरानियों की ज़िंदगी में? मुझे संदेह है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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