
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आचार्य जी आजकल त्योहारों का माहौल है, तो जानना था, भारत में त्योहारों का मतलब क्या है?
आचार्य प्रशांत: माने क्या? समझा के बोलो।
प्रश्नकर्ता: त्योहारों का माहौल है आजकल, तो इस विषय में जानना था कि भारत में त्योहारों का मतलब क्या है?
आचार्य प्रशांत: भारत में, माने, आम जनता के लिए, किसके लिए?
प्रश्नकर्ता: जी, आम जनता के लिए।
आचार्य प्रशांत: तो आप छोटे होते थे, तब त्योहार का क्या मतलब होता था? स्कूल में, कॉलेज में आज तक पढ़ते आए हो न, तो मतलब तो पता ही होगा। क्या मतलब रहा है?
प्रश्नकर्ता: मस्ती।
आचार्य प्रशांत: तो खुल के बोलो न, मस्ती। यही मतलब है, यही मतलब और क्या? ये मतलब भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में है। पर भारत, क्योंकि त्योहारों का देश कहलाया ही जाता है, हमारे यहाँ जितने त्योहार कहीं होते नहीं। कैलेंडर देखा होगा? पंचांग देखा है? पंचांग जानते हो क्या होता है? नहीं जानते, तुम्हारी पीढ़ी के साथ समस्या ही यही है कि कुछ “देसी माल” पता ही नहीं होता है।
पंचांग कभी देखना, उसमें महीने का लगभग हर दिन कोई-न-कोई त्योहार होता है, मुश्किल से कोई दिन मिलेगा जिसमें त्योहार न हो। इतना पुराना देश है भारत, और साल में 365 ही तो दिन होते हैं। इतना पुराना इतिहास है कि हर दिन ही हमें कोई-न-कोई कारण मिलता आया है उत्सव मनाने का। तो पूरा हमारा जो साल भर का कैलेंडर है, वही भर गया है त्योहारों से। और त्योहारों का अर्थ वही है जो अभी तुमने बोला, झिझक के बिल्कुल “मस्ती।” बोल झिझक के रहे हो, मस्ती, करते खुल के हो। यही है।
पुराने दिन थे “अद्वैत लाइफ़ एजुकेशन” जो कॉलेजेस में सब स्टूडेंट्स को विज़डम कोर्सेस कराती थी, ठीक है? विज़डम कोर्सेस, बोध कोर्सेस, समझाने वाला काम। तो उसमें बड़ी समस्या आया करे, क्योंकि जिन कॉलेजेस में जाकर हम वो काम कराते थे, ठीक है? हमारी पुरानी संस्था, इतना तो जानते ही होंगे न?
जहाँ हम जाकर वो कराते थे, वहाँ पर जैसे-जैसे किसी सेमेस्टर में कोर्स आगे बढ़े और गहराई पकड़े, वैसे ही त्योहार आ जाए। और ये सब इधर उत्तर भारत के, ख़ासकर उत्तर प्रदेश के, और मध्य प्रदेश के, और हरियाणा, पंजाब, इधर के सब कॉलेज थे, कुछ दिल्ली के, जहाँ पर हमारा ये कोर्सेस चलते थे।
अब ये जो ऑड सेमेस्टर होता है, यहाँ पर शुरू होता है कोर्स जुलाई के अंत में। अगस्त, सितंबर, आपने जान लगाकर स्टूडेंट्स को पढ़ाया और एक निरंतरता चाहिए होती है न पढ़ाई में, कॉन्टिन्यूटी, ताकि बात गहराई पकड़ सके। और फिर आ गया कि अब महीने भर के लिए कॉलेज में स्टूडेंट छोड़ दो, फैकल्टी भी नहीं रहेंगे।
वो छुट्टी एक दिन की नहीं होती, एक हफ़्ते की नहीं होती, वो पूरे महीने की होती है, दशहरे से लेकर पूरा दिवाली तक। और दिवाली पर आप अगर घर गए हो, तो दिवाली के अगले दिन तो आ नहीं जाओगे। आने में भी तीन-चार दिन लगते हैं, और दशहरे पर घर जाना है तो ऐन दशहरे के दिन तो जाओगे नहीं, जाने में भी तीन-चार दिन लगते हैं। दशहरे-दिवाली के बीच में बीस दिन। तो कुल मिलाकर महीना भर, और महीने भर बाद जब ये स्टूडेंट्स लौट के आएँ, तो बोलें, अब एग्ज़ाम आ गया है। तो पूरा कोर्स ख़त्म!
भारत में त्योहार का ये मतलब होता है, कि जो कुछ भी आप सार्थक कर रहे होते हो उसमें बीच में अब बाधा आ जानी है। ये अर्थ होना नहीं चाहिए, त्योहार का बहुत ऊँचा अर्थ होना चाहिए। त्योहार बड़े गहरे आनंद और अर्थ के दिन होने चाहिए, पर भारत में ऐसा है नहीं।
और साल भर हम त्योहार-त्योहार मनाते हैं, तो फिर साल भर ही ऐसा नहीं है? यही काम ऑड सेमेस्टर्स में हुआ करे, वहाँ होली आ जाती थी। और होली के लिए भागें तो बीस दिन बाद लौटे, और जब लौट के आएँ तो बोलें, अब हमारे एग्ज़ाम आ गए हैं। तो वहाँ पर भी जो फिर पूरी लर्निंग है, वो थम जाया करे।
भारत में इतने त्योहारों का मतलब ही यही होता है कि अब हम काम नहीं करेंगे, चाहे वो पढ़ाई का काम हो, नौकरी का, उद्योग का, व्यापार का कोई काम हो, हम काम नहीं करेंगे। हमें अब काम नहीं करना।
अब आप देख लो कि फिर त्योहारों का व्यक्ति की और राष्ट्र की प्रगति पर क्या असर पड़ता है। त्योहार तो होने चाहिए, सार्थक कर्म का उत्सव न, कि अगर त्योहार आया है तो हम खुशी मनाएँगे, खुशी मनाने की कोई वजह होनी चाहिए। खुशी मनाने की कोई पात्रता होनी चाहिए।
त्योहार को तो मैं ऐसा कहा करता हूँ कि जैसे साल के अंत में जब साल भर की पढ़ाई का परिणाम घोषित हो रहा हो, वो दिन, द डे ऑफ़ डिक्लेरेशन ऑफ़ रिज़ल्ट्स। उस दिन खुशी मनाने का हक़दार कौन होता है? सिर्फ़ वही, जिसने साल भर मेहनत करी हो। ये बाक़ी लोग किस बात पर नाच-कूद रहे हैं? श्रीराम का त्योहार है, इस पर खुशी मनाने का अधिकार तो उन्हीं का है न, जिन्होंने साल भर थोड़ा तो श्रीराम जैसा जीवन जिया हो।
आपका जीवन पूरा-पूरा रावण जैसा रहा है पूरे साल, और आप दिवाली पर खुश हो रहे हो! ये बात तो बड़ी असंगत हो गई, बेमेल हो गई। आप ख़ुद रावण हो, और आप दशहरे पर नाच-गाना कर रहे हो, और बड़े खुश हो रहे हो कि “मैंने रावण जला दिया।” ख़ुद को ही जला लेते। ये बात तो किसी तुक की नहीं रही। समझ में आ रही है बात?
त्योहार का मतलब होता है, कि पहले मैं सही जीवन जिऊँगा, और उसके बाद एक दिन आएगा जब मैं अपने आप को बधाई दूँगा कि हाँ, साल भर सही जीवन जिया, और आज मैं खुलकर घोषित कर रहा हूँ — साल भर सही जीवन जिया। हम सही जीवन जी कहाँ रहे हैं? चाहे श्रीराम हों, चाहे श्रीकृष्ण हों, हम उनकी सीख पर, उनके आदर्शों पर, उनके जीवन पर चल कहाँ रहे हैं? बस, उनसे संबंधित जो त्योहार आते हैं, उनमें हुड़दंग मचाने को हम सबसे आगे रहते हैं।
इसी तरह भारत में जो हाथ के काम होते हैं ज़्यादा, उनमें मुस्लिम समुदाय आगे रहता है। ठीक है? चाहे लकड़ी का काम हो, चाहे मेसनरी हो, और इस तरह के प्लम्बिंग हो, ये सारे काम। बड़ा मुश्किल हो जाता है, कोई भी काम करना। एक महीना अब रमज़ान चल रहा है, वहाँ आपको कारीगर नहीं मिलेगा। एक महीना आपका जो भी काम है, अब ठप पड़ा रहेगा। आपको थोड़ा फ़र्नीचर का काम कराना है, आप नहीं करा सकते। आपको पुताई का काम कराना है, आप नहीं करा सकते। क्यों? कारीगर उपलब्ध नहीं हैं, वो सब अपने गाँव गए हैं ईद मनाने के लिए। कारीगर नहीं हैं, गाँव गए ईद मना रहे हैं। होना तो ये चाहिए कि त्योहार आया है, तो मैं दूनी तेजी से काम करूँगा, क्योंकि काम ही तो ज़िंदगी है न मेरी। कर्म ही धर्म है।
हमारे यहाँ ये होता है कि जब त्योहार आता है, तो हम अपना कर्म बिल्कुल रोक देते हैं। और अगर आपका कर्म ऐसा है कि उसको रोकना पड़ता है, तो फिर वो कर्म करने लायक ही नहीं रहा होगा। जिस कर्म को त्योहार पर रोकना पड़े, इसका मतलब वो कर्म त्योहार से मेल नहीं खा रहा न।
त्योहार का मतलब होता है कोई ऐसी चीज़ जो पूजने लायक है, त्योहार का संबंध दैवियता से होता है, होता है न? त्योहार का संबंध किसी ऐसे से जो पवित्र है। पवित्र दिन पर अगर कुछ रोकना पड़ रहा है, तो वो चीज़ कैसी होगी? अपवित्र होगी। अगर पवित्र दिन पर काम रोकना पड़ रहा है, तो निश्चित ही आपका काम क्या था? बड़ा अपवित्र था। तो अपवित्र काम आप साल भर करते रहे, उसके बाद फिर आप पवित्र उत्सव मना ही क्यों रहे हो?
अगर वास्तव में आपका जीवन पवित्र हो, आपका कर्म पवित्र हो, तो त्योहार तो आप मनाओगे और ज़्यादा काम करके न। लेकिन हमारा जो जीवन होता है, उसमें कहीं दैवियता होती नहीं, उसमें कहीं कृष्णत्व या रामत्व होता नहीं, तो फिर हमें वो सारा काम रोकना पड़ता है त्योहारों पर। और थोड़ा बहुत नहीं रोकते हम, आप बंगाल जाइए, वहाँ दुर्गा-पूजा के समय, पूरा प्रांत रुक जाता है। और नौ दिन को नहीं रुकता है, वो भी महीने भर को ही रुकता है पूरा। न तो पढ़ाई होगी, न कुछ होगा। हाँ, ख़रीदारी होती है।
लोगों ने जो जमा-पूँजी इकट्ठा कर रखी होती है, उसको भोग की चीज़ों में वो खर्च कर डालते हैं। उत्पादन नहीं होता है, विक्रय होता है। प्रोडक्शन नहीं होता, बस सेलिंग होती है। उसमें कोई वैल्यू ऐडिशन नहीं है।
आप अगर ये कहें कि त्योहारों पर देखो इकोनॉमिक एक्टिविटी तो बहुत ज़्यादा होती है न। वो इकोनॉमिक एक्टिविटी डिसेप्टिव है, झूठ है। क्योंकि असली बात तो प्रोडक्शन है। प्रोडक्शन थोड़ी हो रहा है, प्रोडक्शन वाले लोग तो जाकर के धूम मचा रहे हैं, इधर-उधर घूम रहे हैं। क्या हो रहा है बस? विक्रय, सेलिंग, हो रही है, और कोई ख़रीद रहा है, परचेज़ हो रहा है। और जो ख़रीद रहा है, वो क्या कर रहा है? उसने जो ख़ून-पसीने से कमाया है, उससे वो ऐसी चीज़ें ख़रीद रहा है, जिससे उसके जीवन में वास्तव में न कोई शुद्धि आनी है, न क्रांति आनी है, न कांति आनी है, न धार्मिकता आनी है।
बस उसने चीज़ें वो ख़रीद ली हैं, और चीज़ें भी सब भोग की हैं। त्योहारों पर आप देखो तो ऐसी-ऐसी चीज़ों पर डिस्काउंट और सेल लगा होता है जिनका धर्म से क्या लेना-देना! वॉशिंग मशीन में 15% डिस्काउंट, इसका दिवाली से क्या लेना-देना, कपड़े धोने वाली चीज़ का? पर वो सब कार्यक्रम चल रहा है।
वास्तव में हम अपने त्योहार वैसे ही मना रहे हैं जैसी हमारी धार्मिकता है, उथली। तो हमारे त्योहार भी उथले होते हैं।
और हमारा काम ऐसा होता है कि हम उस काम से भागने का कोई-न-कोई बहाना ढूँढ़ते हैं। तो हमें त्योहारों में वो बहाना मिल जाता है, काम से भागने का।
एक सच्चा आदमी जो सचमुच धार्मिक जीवन जी रहा होगा, वो अपने जीवन में कर्म ही ऐसा चुनेगा कि उस कर्म से कभी भागना न पड़े। उसको जब उत्सव मनाना होगा, सेलिब्रेशन करना होगा, तो उस दिन कहेगा, “आज मैं दूना काम करूँगा।” वो कहेगा, “आज मेरा धार्मिक त्योहार है, आज हम डबल काम करेंगे।” ये होगा उसका उत्सव मनाने का तरीका। लेकिन जो आदमी नकली ज़िंदगी जी रहा होगा, फ़रेब की ज़िंदगी जी रहा होगा, वो मौका तलाशेगा कि किस तरीके से अपना काम मैं बंद कर दूँ।
उदाहरण देता हूँ, अभी मैंने उदाहरण दिया, जैसे हमारे साधारण इंजीनियरिंग कॉलेज होते हैं, यूपी, एमपी में, कि वहाँ पर महीने-महीने भर के लिए सब, पूरा छात्र क्या, स्टाफ भी भाग जाता था। अब इसी की तुलना मैं अपने आईआईटी के अनुभव से करता हूँ। तो मैं वहाँ पहुँचता हूँ और पहले सेमेस्टर में मुझे बड़ा विचित्र लगा कि दिवाली पर कुल एक दिन की छुट्टी है, कोई गया ही नहीं कहीं घर। जो वहीं दिल्ली वाले थे, स्थानीय लड़के, वो फिर भी अपने घर हो आए, और कोई नहीं गया। कोई बिहार से है, कोई कहीं से, लखनऊ से, वो कैसे अपने घर जाएँगे? एक दिन की छुट्टी बस, जिस दिन दिवाली है, उस दिन की।
अजीब भी लगा। ऐसा लगा, ये तो बड़ा निर्दय, बड़ा निर्मम काम है कि कुल एक दिन की छुट्टी दे रहे हो। नहीं, उसके पीछे एक तर्क है, उसके पीछे एक विचार है, एक दर्शन है। वो कह रहे हैं, असली प्रकाश तो ज्ञान का होता है। दिवाली अगर प्रकाशोत्सव है, तो कैंपस में रुको न। ये ज्ञान की जगह है, ये ज्ञान का मंदिर है, यहाँ ज्ञान का दीपक जलाओ। बॉम्ब, पटाखे, रॉकेट क्या फोड़ रहे हो?
असली प्रकाश तो वेदांत कहता है, उपनिषद् कहते हैं, कि ज्ञान का होता है। तुम ज्ञान का मंदिर छोड़कर कहाँ भाग रहे हो, जाने कि “यहाँ जाकर मैं वो चीनी झालर जलाऊँगा।” चीनी झालर से थोड़े ही प्रकाश होता है, प्रकाश तो ज्ञान से होता है। तो एक दिन की छुट्टी की, यहीं रुको। कोई नहीं कहीं जाता था।
यही बात आईआईएम कैंपस में। वहाँ भी नहीं छुट्टी, तो वहाँ भी एक दिन की होली की छुट्टी, एक दिन की दिवाली की छुट्टी, बस इतना ही। आगे-पीछे कुछ नहीं कि धनतेरस, छोटी दिवाली और ये-और-वो, कोई मतलब नहीं, कुछ नहीं। एक दिन! और वो जो एक दिन मिल रहा है, उस दिन सब क्या कर रहे हैं? उस दिन सब जो अपने पुराने काम हैं, वो पूरा कर रहे हैं, पेंडिंग असाइनमेंट्स कर रहे हैं, पढ़ाई कर रहे हैं।
ये हुई असली दिवाली न? समझ में आ रही है बात ये?
ये बात बहुत लोगों को अजीब लगेगी। वो कहेंगे, “ऐसे तो फिर क्या हम श्रीराम की घर-वापसी का, अयोध्या-वापसी का कोई उत्सव ही नहीं मनाएँगे?”
साहब, उत्सव मनाइए, श्रीराम जैसा होकर। भीतर अपने थोड़ा रामत्व तो लाइए, वो उत्सव होगा। भीतर अगर दानवीयता भरी हुई है, भीतर से पशु ही हैं तो बाहर अच्छे-अच्छे कपड़े पहनकर और मिठाई बाँटने से क्या होगा? भीतर बहुत अँधेरा है, तो बाहर प्रकाश जलाकर क्या होगा? उपनिषद् कहते हैं, “तमसो मा ज्योतिर्गमय।” वो किस ज्योति की बात कर रहे हैं और किस तमस की बात कर रहे हैं? भीतर का ही अँधेरा और भीतर का ही प्रकाश। भीतर इतना अँधेरा है, और बाहर झालर और दीया, उससे क्या मिलेगा?
धर्म का संबंध आपके आंतरिक जगत से होता है। भीतर रोशनी लाइए, ये असली धार्मिकता है। और जब भीतर रोशनी ले आइए, तब आप अधिकारी हो जाते हैं बाहर भी दीयों की कतार सजाने के। नहीं तो बाहर दीयों की कतार सजाना और भीतर अँधेरे को सहेज के रखना, पाखण्ड ही तो हुआ न!
और जैसा ज़्यादातर लोगों का काम-धंधा होता है, एकदम निकृष्ट कोटि का, उससे किसी तरह बच-भागने का बहाना। जिसको तुम्हारी भाषा में बोलते हैं क्या? मस्ती! इस “मस्ती” की परिभाषा क्या है? यही तो, काम न करना पड़े, ये मस्ती है। मैं कह रहा हूँ, काम ऐसा चुन ही क्यों रहे हो, जो ना करना मस्ती कहलाए? काम ऐसा चुनो न, कि काम करना ही मस्ती हो जाए। फिर ये नहीं कहोगे बात-बात में कि “छुट्टी कब मिलेगी, कितने दिनों की दिवाली की छुट्टी है? कितने दिनों पर वीकेंड की छुट्टी है? अरे, लॉन्ग वीकेंड कब आ रहा है, भागना है!”
असली आदमी के लिए तो छुट्टी जैसी कोई चीज़ होनी ही नहीं चाहिए। दिल की धड़कने से छुट्टी लेते हो कभी? साँसों के आवागमन को छुट्टी देते हो कभी? तो काम से छुट्टी कभी चाहिए ही क्यों? ये “छुट्टी” का सिद्धांत ही बहुत बुरा है। छुट्टी काहे के लिए चाहिए?
छुट्टी का अर्थ ही यही है कि काम कुछ घटिया-सा चुन लिया है। छुट्टी का अर्थ ही यही है कि तुम्हारी हस्ती और तुम्हारे कर्म के बीच बहुत बड़ी खाई है। तुम्हारा कर्म, तुम्हारी हस्ती की अभिव्यक्ति नहीं है, तुम्हारा कर्म तुम्हारी कामना की अभिव्यक्ति है, सौ तरह की झूठी मजबूरियों की अभिव्यक्ति है। तो इसीलिए वो कर्म तुम्हें दिन-रात दुख देता है। जब दिन-रात दुख देता है, तो वेकेशन माँगते हो। और उस वेकेशन का बहाना किसको बना लेते हो? धार्मिक उत्सवों को।
ये धर्म का भी अपमान है। धर्म को छुट्टी की तरह इस्तेमाल करना या धर्म को मस्ती की तरह इस्तेमाल करना, तो धर्म का भी अपमान ही है न। है या नहीं है?
है पूरी दुनिया में मामला ऐसे ही, पर पश्चिम में भारत से फिर भी थोड़ा बेहतर है। वो साल में एक बार लेते हैं छुट्टी, साल के अन्त में, दस–पन्द्रह दिनों की वो छुट्टी लेते हैं। उसी में उनका क्रिसमस और न्यू ईयर, दोनों एक साथ निकल जाता है। वही उनका प्रमुख मामला रहता है, बीच में ईस्टर वग़ैरह आते हैं, पर वो बहुत बड़ा नहीं रहता। वो साल के अन्त में ही लेते हैं अपना एक बार में।
भारत में, बार-बार, बार-बार, बार-बार। और कोई भी चीज़ जो सार्थक गति से आगे बढ़ रही है, त्योहार उसको रोकने का बहाना बन जाते हैं, चाहे वो राष्ट्र-निर्माण की गतिविधियाँ हों, चाहे वो छात्र-निर्माण की गतिविधियाँ हों, चाहे कुछ और हो रहा हो।
आप सरकारी कार्यालयों में जाओ वो बोलेंगे, “दिवाली बाद आइएगा, दिवाली बाद आइएगा।” दिवाली बाद आइएगा माने क्या? आप बंद हो क्या? अगर बंद हो, तो दफ़्तर पर ताला डाल दो। नहीं, बंद नहीं है पर अभी फेस्टिव माहौल है। ये “फेस्टिव माहौल” क्या होता है? फेस्टिव माहौल का एक ही मतलब है, काम नहीं करेंगे! माने काम से चोरी करना, यही फेस्टिविटी है तुम्हारी। ये क्या है “दिवाली बाद?” बहुत आम मुहावरा है न, पूरे उत्तर भारत में कुछ भी हो इन दिनों में दिवाली से एक महीने पहले से, सीधे यही जवाब आएगा, “अब दिवाली के बाद होगा, अब दिवाली बाद होगा।” माने क्या “दिवाली बाद होगा?” ये दिवाली का अपमान है।
दिवाली भूलिए नहीं उनका त्योहार है जिन्होंने जीवन में एक दिन आराम नहीं किया। आप श्रीराम का चरित्र देखते हो, आप बताओ, उन्होंने कब आराम किया? वो तो जीवन भर आतप, अंधड़ और संघर्षों में जूझते रहे। और हम उनके नाम पर मस्ती कर रहे हैं, और आराम कर रहे हैं, मिठाई खा रहे हैं।
उन्होंने तो सोने की लंका ठुकरा दी, और हम उनके नाम पर सोने की ख़रीददारी करने निकल जा रहे हैं! इससे बड़ी विद्रूपता, विकृति कोई हो सकती है क्या?
जिन्होंने सब प्रकार के सुख-सुविधाएँ त्याग दिए, हम उनके नाम पर, उनके त्योहार के दिन जाकर तरह-तरह की सुख-सुविधा की चीज़ ख़रीद के ले आते हैं। दिवाली का दिन तो होना चाहिए कि हम पूछें अपने आप से, कि श्रीराम होने का मर्म क्या है? और श्रीराम होने की शर्त क्या है? और अगर पूरा नहीं हो सकते उनके जैसा, तो कम से कम थोड़ा-बहुत तो हो जाए उनके जैसा।
और जब जन्माष्टमी आए, और श्रीकृष्ण से संबंधित बाक़ी पर्व आएँ, तो वहाँ भी हमें पूछना पड़ेगा, क्योंकि श्रीकृष्ण के प्राण तो गीता है। श्रीकृष्ण का पूरा बोध तो गीता है। जो वे बात कहना चाहते हैं, जो स्वयं भी हैं, वो तो गीता है। मौज-मस्ती क्या? वो दिन तो गीता-पाठ का होना चाहिए न, कि “आज बैठ कर गीता पढ़ेंगे।”
अहंकार धर्म को भी अपनी खुराक बना लेता है। ऋषियों को बोलना पड़ा था, कि तमस से ज्योति की ओर जाना है, असत् से सत् की ओर जाना है, और मृत्यु से अमृत की ओर जाना है। क्यों बोलना पड़ा था? क्योंकि आमतौर पर हम प्रकाश को दबाकर अँधेरे में ही बैठे होते हैं। तभी तो उन्हें हमें प्रेरणा देनी पड़ी कि “भैया, तमसो मा ज्योतिर्गमय।” तमस को छोड़ो, प्रकाश की ओर जाओ। अगर हम स्वयं ही प्रकाशोन्मुखी होते, तो हमें कोई क्यों सीख देने आता कि प्रकाश की ओर बढ़ो।
पर हम प्रकाश के उन्मुख नहीं रहते, हम तो अंधकार के ही उन्मुख रहते हैं, और उस अंधकार ने धर्म को भी अपना निवाला बना लिया है। ये सदा से रहा है, आज नहीं, सदा की बात है, और भारत ही नहीं पूरे विश्व की बात है।
त्योहार के नाम पर हुड़दंग, त्योहार के नाम पर मस्ती! क्या है ये? “आनंद” बिल्कुल दूसरी चीज़ होता है, भाई! मस्ती को आनंद नहीं बोलते, आनंद बिल्कुल दूसरी चीज़ होता है। आनंद आता है ज़िंदगी में गहराई से, आनंद आता है गहरे संघर्षों के बाद, आनंद आता है मुक्ति की पूरी कीमत चुकाने के बाद। और मस्ती बड़ी सस्ती चीज़ होती है, मस्ती दो कौड़ी की चीज़ होती है। मस्ती तो कुत्ते भी कर लेते हैं, मौसम ज़रा अच्छा हो तो देखो ज़रा, वो पीठ के बल लेटकर चार टाँगें आकाश की ओर करके सोचते हैं, “आकाश मिल गया।”
मस्ती तो कुत्ते भी कर लेते हैं। आनंद — बड़ी गहरी बात होती है। वो विचारकों, चिंतकों, ऋषियों के लिए होती है। उसके लिए पहले साल-भर गहरा जीवन जीना पड़ता है। साल-भर गहरा जीवन जिएँ, यही वास्तविक धार्मिकता है, उत्सव इसी में है। उसके बाद आपकी दिवाली में प्राण आएँगे। उसके बाद आप अधिकार के साथ, गौरव के साथ, आनंद के साथ, सब उत्सव मना पाएँगे। और फिर उन उत्सवों में कर्म पर न निषेध लगेगा, न विराम लगेगा। उन उत्सवों में कर्म का ही आपके पूजन होगा, क्योंकि वो कर्म ही फिर धर्म होगा आपका।
तो धार्मिक उत्सव के दिन जो धार्मिक कर्म है, उसी को तो आगे बढ़ाएँगे न? धार्मिक उत्सव के दिन कोई कर्म रोकना पड़ा, तो वो कर्म फिर अधर्म ही रहा होगा जो रोकना पड़ा। कुछ आ रही है बात समझ में?
जिस दिन हमारा समाज थोड़ा जाग्रत होगा, उस दिन देखिएगा, वो यही करेगा। वो सब उत्सवों को, काम को दूनी निष्ठा, दूने श्रम और दूने प्रेम से करने का दिन बनाएगा।
वो कहेगा, “आज उत्सव है! अगर रोज़ इतना काम करते थे, तो आज उससे ज़्यादा करेंगे। आज कुछ नए तरीके से करेंगे, आज पूरा प्रेम उड़ेलकर करेंगे।” फिर ये नहीं होगा कि बस किसी भी तरीके से मौका तलाश हो कि “बारिश हो गई, आज काम नहीं करना है, आज धूप ज़्यादा है, आज काम नहीं करना है, आज थोड़ा छींक आ गई, आज काम नहीं करना है।” कुछ हो जाए, आज काम नहीं करना है।
आम आदमी की आधी ज़िंदगी तो बस किसी तरीके से काम न करने का बहाना ढूँढने में जाती है, ख़ासतौर पर अगर वो कहीं नियुक्त है, एम्प्लॉयी है। अभी उस दिन ही बोल रहा था न आपसे कि “प्रेम-मग्न जब मन भया, कौन गिने तिथि-वार?” कौन गिने तिथि-वार! आप प्रेम-मग्न हो जाइए हर दिन होली है, हर रात दिवाली है। फिर न तिथि गिनने की ज़रूरत पड़ती है, न वार। माने, न दिन, न दिनांक। फिर कुछ नहीं गिनना पड़ता। पर हृदय में पहले सत्य के प्रति, धर्म के प्रति प्रेम तो हो।
सकारात्मक पर्व होने चाहिए न हमारे। और दूसरे धर्मों और दूसरे देशों के लोग कैसे मनाते हैं, इससे हमें क्या मतलब? तुलना करने से क्या फ़ायदा? हमें तो ख़ुद को देखना है, हमें आगे बढ़ना है न? हमें अपनी ज़िंदगी बेहतर बनानी है। दूसरे धर्मों के, पंथों के, मज़हबों के लोग अगर अपने धर्मों को, अपने उत्सवों को ठीक से नहीं मना रहे, तो हम उस बात का बहाना लेकर ख़ुद भी थोड़े ही ठहरे हुए या गिरे हुए रह सकते हैं। हमें तो आगे बढ़ना है।
दस लोग बीमार हों, तो हम ये थोड़े कहेंगे कि “सब बीमार हैं, तो मुझे भी बीमार रहना है।” उत्सव का मतलब यही होना चाहिए, कुछ नया करेंगे, कुछ बेहतर करेंगे, कुछ ऐसा करेंगे जिसमें सफ़ाई हो, शुद्धि हो, जिसमें जीवन एक क़दम और आगे बढ़ता हो। ये थोड़ी कि पूरी दुनिया और दूषित करेंगे, जानवर काट देंगे बहुत सारे, जैसे बक़रीद में होता है। या चिड़ियाँ काट देंगे बहुत सारी, जैसा ईस्टर पर होता है। या नदियाँ गन्दी कर देंगे सारी, या हवा ज़हरीली कर देंगे, जैसा भारत में खूब होता है। या सड़कें जाम कर देंगे।
पर्व का तो मतलब होता है, कि हम जैसे थे, हमें उससे बेहतर होना सीखें। यही यज्ञ है, यही देवता को हमारा प्रणाम है, है कि नहीं? और ये बात सिर्फ़ धार्मिक उत्सवों पर ही नहीं लागू होती, ये बात व्यक्तिगत उत्सवों पर भी लागू होती है। चाहे वो जन्मोत्सव हो, चाहे आपका विवाह उत्सव हो, या जैसे राष्ट्रीय उत्सव होते हैं, गणतंत्र दिवस, स्वाधीनता दिवस, उन पर भी ये बात लागू होती है।
पर हर जगह बस क्या? छुट्टी, छुट्टी, छुट्टी मिल जाए उसमें मस्ती करनी है। कितना दुखी जीवन बीत रहा है, कि छुट्टी की तलाश रहती है हर समय। काम में कितना दुख है भारी, कि तारीख़ें तलाशता रहता है बस कैलेंडर में कि छुट्टी कब पाऊँगा! कितना भारी दुख मिल रहा है काम से। और अगर काम से इतना भारी दुख मिल रहा है, तो भाई जी कैसे रह रहे हो? घोर दुख में जी रहे हो।
योद्धा चाहता है, युद्ध में प्राण जाएँ। योद्धा कहता है, मेरे लिए बड़े अपमान की बात होगी अगर बिस्तर पर मरा तो। सच्चा कलाकार चाहता है, कि मंच पर ही उसके प्राण जाएँ, अपनी कला के आगोश में। और ध्यानी चाहता है, ध्यान में ही प्राण चले जाएँ। ये होता है सच्चा जीवन जीने का नतीजा, आप उसको एक पल के लिए रोकना नहीं चाहते जो आपका प्यारा कर्म है, और वही आपका उत्सव होता है, तीन-सौ-पैंसठ दिन उत्सव। फिर वो चाहे होली मनाए, चाहे दिवाली मनाए, चाहे कुछ मनाए। उस उत्सव में भी फिर एक सच्चाई होती है, प्रेम होते हैं, प्राण होते हैं।
नहीं? ठीक नहीं लग रहा? ज़्यादा आदर्श लग रही है बात? मस्ती सूख रही है, या बस गला सूख रहा है?
मैं जब कहा करता हूँ, कि “भाई, श्रीराम का पर्व है कुछ तो श्रीराम जैसा होने का प्रयास करो,” तो कहते हैं, “वो तो भगवान थे, हम तो इंसान हैं!” अरे भाई! वो अगर भगवान थे तो उनसे कुछ सीखोगे नहीं, वो कब उस तरह की मस्ती करते थे जैसे तुम करते हो? वो तो मर्यादा-पुरुषोत्तम थे, और तुम्हारे जीवन में मर्यादा लेशमात्र भी नहीं! कुछ तो उनसे सीखो, या उन्हीं के पर्व के दिन तुम उल्टी-पुल्टी मस्तियाँ करोगे?
लोग जुआ खेलते हैं, कहते हैं “आज दिवाली है, जुआ खेलना है।” तुमने उनका संबंध जुए से कहाँ से लगा दिया? तुमने उनका संबंध ख़रीददारी से कहाँ लगा दिया? जिन्होंने सत्य के लिए और मर्यादा के लिए अपना सिंहासन छोड़ दिया पहले, और फिर चौदह बरस बाद सोने की लंका भी छोड़ दी, तुम उनका संबंध भोग-विलास से कैसे जोड़ रहे हो?
दिवाली वो दिन है, जब हम अपने जीवन को बहुत ध्यान से देखें, अवलोकन करें, विश्लेषण करें, और पूछें, “डर क्यों है हममें इतना?” क्योंकि जो एक बात श्रीराम के साथ बिल्कुल सामने आती है, वो है निडरता। उनके पास क्या था? कुछ भी नहीं। निहत्थे, बिना किसी सामग्री के, बिना किसी सम्पदा के, नंगे पाँव दो राजकुमार जंगल में और भिड़ किससे गए? दशानन से! जिसको कहते हैं, अब प्रतीकात्मक बात है, पर मतलब समझिए कि उसने सारे देवताओं को भी क़ैद कर रखा था, और दुनिया भर की सारी सम्पदा का वो मालिक था, और दुनिया भर के सारे ज्ञान का भी मालिक था। तो ज्ञान भी उसके पास, सम्पदा भी उसके पास, शस्त्रागार भी सबसे बड़ा उसी का। और जाकर के उससे, निडर होकर, निर्भीक होकर श्रीराम भिड़ गए!
दिवाली पर्व है, जब हम अपने आप से पूछें कि “आज के रावण कौन हैं? और उनके सामने हम इतने दबे हुए क्यों रहते हैं? हम भिड़ क्यों नहीं पाते?”
और रावण आवश्यक नहीं है हमेशा कोई व्यक्ति ही हो, रावण एक सोच भी हो सकती है, रावण अज्ञान का भी नाम हो सकता है, रावण एक प्रकार का ट्रेंड भी हो सकता है, एक कल्चर भी हो सकता है, जिसने हमको दबा रखा हो, जिसका हम अंधानुकरण कर रहे हों।
सब त्योहार बस बहाना हैं, मस्ती काटना है, नाचना है, नचाना है, बस!