
प्रश्नकर्ता: सर, आज के जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के टाइम में, जो चिकित्सा-विज्ञान है और स्पिरिचुअलिटी है, वो कैसे एक साथ चल सकते हैं? क्योंकि इनह्यूमन होने का आपने बताया भी था अभी डॉक्टर-वायलेंस पर टॉपिक पर, और बस यही क्वेश्चन है।
आचार्य प्रशांत: ये ऊपर लाइटें लटक रही हैं, ये और इस भवन की बुनियाद एक साथ कैसे चल सकते हैं? ये ऊपर से लटक रही हैं और बुनियाद तो ज़मीन की सतह के भी नीचे है। ये एक साथ कैसे चल सकते हैं? कैसे चल सकते हैं? यह एक साथ ही चलेंगे। और वह न हो तो यह लटकेगा नहीं, ये गिर जाएगा। और गिरेगा, तो बड़ा नाश करेगा, पता नहीं किसके सर पर गिर जाएगा।
अध्यात्म कोई क्षेत्र नहीं है, कोई काम नहीं है, कोई विषय या ऑब्जेक्ट नहीं है कि आप कहो कि एक ऑब्जेक्ट दूसरे ऑब्जेक्ट के साथ कैसे चलेगा। स्पिरिचुअलिटी माने विज़डम, माने आत्मज्ञान, वो आधार है जिसके बिना इंसान पगला है। उसके बाद वो वहाँ से ये लाइट्स नहीं लटकाएगा, वो वहाँ से गन्स लटकाएगा कि “मार देते हैं सबको।”
जो प्रश्न है, उसके पीछे की मान्यता समझिए। इस प्रश्न में एक अज़म्प्शन है। अज़म्प्शन यह है कि विज्ञान की एआई, या जो भी कटिंग-एज टेक है, वो भी एक फ़ील्ड है और वो मॉडर्न फ़ील्ड है; और स्पिरिचुअलिटी भी तो एक फ़ील्ड ही है न, फ़ील्ड ऑफ़ नॉलेज और वो एक एंशिएंट फ़ील्ड है। तो इनका सवाल है कि ये दोनों फ़ील्ड्स आपस में कम्पैटिबल कैसे हैं? इन दोनों क्षेत्रों का आपस में समायोजन कैसे हो? यह इनका सवाल है।
सवाल के पीछे की मान्यता ही गड़बड़ है। अरे भाई, अध्यात्म कोई क्षेत्र नहीं होता, क्षेत्र सारे बाहर होते हैं। यह एक क्षेत्र है, ये दूसरा क्षेत्र है, ये तीसरा क्षेत्र है। अध्यात्म मेरे बारे में होता है, मैं इन सब क्षेत्रों का ज्ञाता हूँ; गीता में आता है, “क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग।”
सब क्षेत्र होते हैं, हाँ, यह एक क्षेत्र है, मेरा मेरे परिवार वालों के साथ क्या व्यवहार है, वो एक क्षेत्र है। अपने व्यवसाय में कितना पैसा कमा रहा हूँ, वो एक क्षेत्र है। मुझे राजनैतिक मुद्दों की कितनी जानकारी है, वो एक क्षेत्र है। मैं कुछ खेलता हूँ, मैं कितना अच्छा खिलाड़ी हूँ वो एक क्षेत्र है। एआई एक क्षेत्र हो गया, मेडिसिन एक क्षेत्र हो गया, ये सब क्षेत्र हैं। पर इन सब क्षेत्रों के बीच में तो मैं खड़ा हूँ न। घर में अपने माँ-बाप से बात करने वाला कौन हूँ? मैं। क्लीनिक में अपने पेशेंट से बात करने वाला कौन हूँ? मैं। एक पॉलिटिकल डिस्कोर्स में बातचीत करने वाला कौन हूँ? मैं। कटिंग टेक्नोलॉजी का ज्ञान लेने वाला कौन हूँ? मैं। बैडमिंटन कोर्ट पर प्रतिस्पर्धा करने वाला कौन हूँ? मैं।
अध्यात्म इस “मैं” के बारे में है, वह किसी क्षेत्र के बारे में नहीं है। सारे क्षेत्र मेरे चारों ओर हैं। उन सब क्षेत्रों के केंद्र में जो खड़ा है, उसको जानने को अध्यात्म कहते हैं। सब क्षेत्रों को जानने को शास्त्रीय तौर पर कहा जाता है, अविद्या। क्या कहा जाता है? अविद्या। अविद्या या अपराविद्या। और इन सारे क्षेत्रों के मध्य जो खड़ा हुआ है वह स्वयं को जाने, इसको कहा जाता है अध्यात्म, या विद्या, या पराविद्या।
और अगर यह जो मध्य में खड़ा हुआ है, यह स्वयं को ही नहीं जानता, और यह एआई भी जानता है, ये पॉलिटिक्स भी जानता है, ये हिस्ट्री भी जानता है, ये साइकोलॉजी जानता है, ये मेडिसिन जानता है, ये फलाना-ढिमाका सौ चीज़ें जानता है ख़ुद को नहीं जानता, तो ये पगलू है। हाँ, ये बन के बहुत बड़ा बैठा होगा, “हम बड़े अनुभवी हैं, हम साठ साल के हो गए। हमारे पास अब एक ऊँची गद्दी है, हम यह कहलाते हैं, वो कहलाते हैं। सबसे बड़े ऑफ़िस में बैठते हैं।” पर तुम पगलू हो।
जैसे कहते हैं न कि बंदर के हाथ में तलवार आ गई है। वो बहुत कुछ जानता है पर जानने वाले को नहीं जानता है, तो उसको पता ही नहीं चलेगा कि उसके निर्णय कहाँ से आ रहे हैं।
जाकर पूछो अमेरिका वालों से कि तुम क्यों लड़ रहे हो ईरान में? वो अच्छे से जानते हैं कि बम कहाँ गिराना है। वो अच्छे से जानते हैं कौन-से बमवर्षक का इस्तेमाल करना है। वो अच्छे से जानते हैं किसके साथ अलायंस करनी है। वो अच्छे से जानते हैं कि टैक्टिकल लेवल पर जीत कैसे हासिल करनी है। वो सब जानते हैं। पर उनसे केंद्रीय बात पूछो, “पर ये तो बताओ, लड़ क्यों रहे हो?” ये उनको नहीं पता, उनको बिल्कुल नहीं पता।
और बड़ा भारी अहंकार खड़ा हो जाता है, ‘मैं तो सब जानता हूँ, मैं यह हूँ, मैं वो हूँ।’ और उम्र बढ़ती जाती है, पदवी बढ़ती जाती है। वो अहंकार और सघन होता जाता है, ‘मैं यह जानता हूँ, मैं वो जानता हूँ।’ तू अपने बारे में कितना जानता है?
तुम्हें पता है कि अगर अभी तुम्हारे भीतर ऊब उठ रही है, तो क्यों उठ रही है? तुम्हें पता है, तुम्हारे भीतर वितृष्णा उठ रही है, घृणा उठ रही है या पसंद उठ रही है, तो क्यों उठ रही है? तुम्हें कुछ नहीं पता। तुम कह देते हो, “इंस्टिंक्ट्स हैं।” इंस्टिंक्ट्स नहीं हैं, ईगो है। और वह कैसे काम कर रही है उसकी व्यवस्था और संरचना के बारे में तुम्हें कुछ नहीं पता, क्योंकि वह बात किसी किताब में लिखी नहीं जा सकती। लिख भी दी जाए, तो काम नहीं आ सकती, क्योंकि उसको सिर्फ़ डायनामिकली जाना जा सकता है, रियल टाइम में जाना जा सकता है। जब हो रहा हो, सिर्फ़ उसको तब देखा जा सकता है। वो घटना अभी घट रही है, अभी बाद में नहीं घट रही है। वो घटना क्योंकि अभी घट रही है, तो आपको उसको अभी जानना पड़ेगा। अभी जानना पड़ेगा।
यह अध्यात्म है। वो किताबों की बात नहीं है, वो स्वयं को बिल्कुल ठीक-ठीक अभी जानने की बात है।
समझ रहे हो बात को?
बहुत लोग ये सवाल करते हैं। कहते हैं कि “अब मैं मैनेजर हो गया हूँ, किसी एमएनसी में ब्रांडिंग का ज़िम्मेदार हूँ, तो हाउ कैन दिस गो अलॉन्ग विद स्पिरिचुअलिटी?” ये क्या पूछ रहे हो? ये क्या पूछ रहे हो? ये लगभग वैसी-सी बात है कि “अब मेरे पास बहुत बड़ी गाड़ी आ गई है, तो हाउ कैन दिस गो अलॉन्ग विद जीपीएस?” जीपीएस के बिना वो गाड़ी ले जाकर के तुम कूड़ेदान में ही डालोगे?
अध्यात्म जीपीएस है, और जीपीएस तो फिर भी तुम्हें बाहर के रास्ते और नक्शे बताता है। अध्यात्म भीतर का जीपीएस है, जो तुम्हें तुम्हारे बारे में बताता है। नहीं तो तुम्हारे पास गाड़ी है भी, तो वो ग़लत दिशा को ही दौड़ेगी। तुम्हारे पास जो कुछ है, तुम उसका इस्तेमाल अपने और दुनिया के नाश के लिए ही करोगे।
इसीलिए, जो व्यक्ति आत्मज्ञान नहीं रखता, उसके हाथ में कम-से-कम ताक़त और अधिकार दिए जाएँ, यही बेहतर है। आत्मज्ञान जितना कम होगा, आत्मविश्वास उतना ज़्यादा होता है। घातक आत्मविश्वास, विषैला आत्मविश्वास, “मैं तो कुछ हूँ, मैं कुछ जानता हूँ।” और जब मैं सब जानता हूँ, तो मुझे सुनने की ज़रूरत क्या है? मुझे झुकने की ज़रूरत क्या है? “आई एम समबडी। आई कैन नो मोर बी अ स्टूडेंट। आई एम अ प्रोफेसर।”
बात आ रही है समझ में?
अध्यात्म कोई पुराने ज़माने की चीज़ नहीं है। जैसे कई लोग बोलते हैं, “द एंशिएंट साइंसेस” वग़ैरह। मूर्खता की बात है ये। “एंशिएंट साइंसेस” क्या होता है? तुम आज ज़िंदा हो। तो तुम्हें अपने बारे में आज ही तो जानना पड़ेगा न। तुम आज के हो, तो तुम्हारा अपने बारे में जानना भी तो आज ही होगा न। वह एंशिएंट कहाँ से हो गया? अध्यात्म की तुलना में सब पिछले ज़माने का है, एआई भी थोड़ा पीछे का होगा। अध्यात्म तो सदा अति-आधुनिक होता है। अधुना माने होता है अभी। एआई भी हो सकता है, उसमें जो लेटेस्ट डिस्कवरी है, वह कल-परसों हुई हो। अध्यात्म तो अभी है।
पर आपके मन में बात आई हुई है कि एक चीज़ मॉडर्न है और एक चीज़ प्रिमिटिव है। ‘पर मैं, देखिए, मैं अच्छी संस्कृति का कल्चर्ड बालक हूँ, तो मैं दोनों को एक साथ लेकर चलना चाहता हूँ। मैं आधुनिक बनना चाहता हूँ, पर अपनी संस्कृति को त्यागे बिना। तो इसलिए आप मुझे बताएँ कि मैं एआई के साथ स्पिरिचुअलिटी को लेकर कैसे चल सकता हूँ?’
जैसे कि होता है, हिंदुस्तानी लोग जब बीच वग़ैरह पर भी जाते हैं, मालदीव्स वग़ैरह, तो वहाँ से उनके चुटकुले आते हैं कि ‘सांस्कृतिक थे, तो बीच तक भी आए थे, तो उन्होंने कुर्ता-पजामा और उन्होंने साड़ी पहन रखी थी। और फिर इधर-उधर देखा, जब कोई देख नहीं रहा है, तो फिर वह बीच-वियर में और वो बिकिनी में आ गईं। हमारी संस्कृति, आधुनिकता और परंपरा का अनूठा संगम।’
वैसे यह सवाल है कि ‘मैं एआई और स्पिरिचुअलिटी को एक साथ लेकर कैसे चलूँ?’
आप अभी सुन रहे हो न ध्यान से? यह अध्यात्म है। सुनना अभी हो रहा है न, तो इससे मॉडर्न क्या हो सकता है? सुनना यदि ध्यान से सुन पा रहे हो, तो यही अध्यात्म है।