दुनिया अगर आपको शरीर के आधार पर तौलती है, तो वो आपके बारे में नहीं, अपनी सीमित समझ के बारे में बता रही है। मनुष्य की पहली पहचान देह नहीं, चेतना है। जो लोग आपको दया, कमजोरी या “अलग” नज़रों से देखते हैं, उन्होंने खुद को सिर्फ़ शरीर तक सीमित कर रखा है। इसलिए खुद को कभी दूसरों की नज़रों से मत मापिए। आपकी असली कीमत चेतना तय करती है, शरीर नहीं।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मेरा नाम सत्यम है। मैं ओड़िसा से हूँ। मैं फिजिकली डिसेबल्ड लोगों के बारे में कुछ पूछना चाहता हूँ। जैसे कि हम दुनिया में बाहर निकलते हैं तो जो लोग हमें मिलते हैं, वो या तो हमें दया की दृष्टि से देखते हैं, या फिर हमें अति-प्रतिभावान समझकर हमारी तारीफ़ करते रहते हैं। पर हमें सामान्य मनुष्य की तरह ज़्यादा समझा नहीं जाता। तो ये जो रवैया है समाज का, उससे मैं थोड़ा-सा एफेक्ट भी होता हूँ। तो इसके रिगार्डिंग मैं अपने अंदर क्या changes ला सकता हूँ?
आचार्य प्रशांत: जो तुम्हें साधारण मनुष्य नहीं समझते, कभी तुमको दिव्य पुरुष बोलते हैं और कभी दया दिखाते हैं। कभी दया के पात्र हो, कभी दिव्यांग हो, इस तरह की बातें करते हैं। वो तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कह रहे, वो बस अपने भीतर का अँधेरा दर्शा रहे हैं। उनके देखे इंसान बस देह होता है, उनके लिए इंसान एक और जानवर है बस। वो इंसान को अपूर्ण मानते हैं, अगर उसकी देह में कोई अंग या कोई इंद्रिय कम हो तो। इंसान बराबर देह; तो देह में कमी है तो? इंसान में कमी है। ये उनका समीकरण है।
वो तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कह रहे हैं, वो अपनी हैसियत दिखा रहे हैं। उन्हें इंसान के नाम पर बस हड्डी और मांस नज़र आता है। वो व्यक्ति को देखते हैं तो कहेंगे, अच्छा गोरा है, काला है, आदमी है, औरत है, अच्छा जवान है क्या। उनको शरीर ही दिखता है, शरीर के अलावा कुछ नहीं। ये बात कुछ हद तक भिंडी, तोरी, टमाटर पर लागू हो सकती है। उसके बाद शरीर ही होता है, वज़न से नाप लो उसको। ये बात कुछ हद तक मवेशियों पर भी लागू हो सकती है। आप देखते हो कि बढ़िया है, इसके अंग-वंग सब ठीक हैं, वज़न कितना है। पर ये बात मनुष्य पर लागू नहीं होती।




