प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।
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आचार्य प्रशांत: जितेंद्र का प्रश्न है कि जो कहानी है, “अल्लाह में यक़ीन रखो, लेकिन अपने ऊँट को बाँध लो पहले।” क्या कहती है ये कहानी? पहले जरा समझ लें कहानी का वृतांत।
तो एक गुरु, एक शिष्य किसी रेगिस्तान से यात्रा करते थे, रात में किसी सराय में रुकते हैं। शिष्य की ज़िम्मेदारी थी कि वो ऊँट को बाँध दिया करे सोने से पूर्व। शिष्य ने अल्लाह से प्रार्थना की कि ऊँट का ख़याल रखना और बाँधे बिना सोने चला गया। सुबह उठते हैं दोनों, गुरु चेला देखते हैं कि ऊँट गायब है। तो शिष्य घिघियाने लगा, बोला गुरु से, “तुम्हीं ने सिखाया था कि अल्लाह में यक़ीन रखो। मैंने एक नहीं, तीन बार अल्लाह को बोला था कि ऊँट तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। अब देखो, इतने गुस्से से हमारी ओर मत देखो, हमारी गलती नहीं है।”
गुरु ने कहा, कि बिल्कुल सही बात है खुदा में पूरा यक़ीन रखो, लेकिन ऊँट को बाँध लो पहले, क्योंकि खुदा के पास जो हाथ हैं वो तुम्हारे हैं। ये कहानी है।
जितेंद्र पूछ रहे हैं, कि इस कहानी से उन्हें ये समझ में आया है कि नित्य और अनित्य की अपनी-अपनी उपयोगिता है, लेकिन मैं इन दोनों का मिश्रण कर देता हूँ। लापरवाही को बेपरवाही समझकर बहुत दुख उठाता हूँ। आपकी कृपा से आजकल थोड़ा-थोड़ा ख़ुद को पकड़ भी पाता हूँ कि मैं कहाँ इन दोनों को मिश्रित कर रहा हूँ, घपला कर रहा हूँ। कह रहे हैं, कि कृपया इस वृत्ति पर प्रकाश डालने की कृपा करें।




