
आचार्य प्रशांत: जितेंद्र का प्रश्न है कि जो कहानी है, “अल्लाह में यक़ीन रखो, लेकिन अपने ऊँट को बाँध लो पहले।” क्या कहती है ये कहानी? पहले जरा समझ लें कहानी का वृतांत।
तो एक गुरु, एक शिष्य किसी रेगिस्तान से यात्रा करते थे, रात में किसी सराय में रुकते हैं। शिष्य की ज़िम्मेदारी थी कि वो ऊँट को बाँध दिया करे सोने से पूर्व। शिष्य ने अल्लाह से प्रार्थना की कि ऊँट का ख़याल रखना और बाँधे बिना सोने चला गया। सुबह उठते हैं दोनों, गुरु चेला देखते हैं कि ऊँट गायब है। तो शिष्य घिघियाने लगा, बोला गुरु से, “तुम्हीं ने सिखाया था कि अल्लाह में यक़ीन रखो। मैंने एक नहीं, तीन बार अल्लाह को बोला था कि ऊँट तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। अब देखो, इतने गुस्से से हमारी ओर मत देखो, हमारी गलती नहीं है।”
गुरु ने कहा, कि बिल्कुल सही बात है खुदा में पूरा यक़ीन रखो, लेकिन ऊँट को बाँध लो पहले, क्योंकि खुदा के पास जो हाथ हैं वो तुम्हारे हैं। ये कहानी है।
जितेंद्र पूछ रहे हैं, कि इस कहानी से उन्हें ये समझ में आया है कि नित्य और अनित्य की अपनी-अपनी उपयोगिता है, लेकिन मैं इन दोनों का मिश्रण कर देता हूँ। लापरवाही को बेपरवाही समझकर बहुत दुख उठाता हूँ। आपकी कृपा से आजकल थोड़ा-थोड़ा ख़ुद को पकड़ भी पाता हूँ कि मैं कहाँ इन दोनों को मिश्रित कर रहा हूँ, घपला कर रहा हूँ। कह रहे हैं, कि कृपया इस वृत्ति पर प्रकाश डालने की कृपा करें।
जितेंद्र, घपला फिर हो गया। आपने जो घपला पकड़ा, वो पकड़ना और बड़ा घपला है। घपला वहाँ है ही नहीं, जहाँ आप उसे पकड़ रहे हैं। माया दो प्रकार की होती है, एक ये कि जहाँ घपला था, वहाँ उसे देखा नहीं; और दूसरी ये कि जहाँ घपला नहीं था, वहाँ घपला देख आए।
जानने वालों ने कहा है कि ये दो शक्तियाँ होती हैं मेयर की, आवरण और विक्षेप। नित्य और अनित्य की अपनी-अपनी उपयोगिता और स्थान नहीं है। आपको नित्य में ही स्थापित रहना है। गुरु ने चेले को क्या सीख दी, ज़रा उस पर ग़ौर करिए। गुरु ने चेले से कहा, प्रार्थना करो, लेकिन सच्ची प्रार्थना करो। सच्ची प्रार्थना अगर तुमने की होती, तो फिर तुम ‘तुम’ रहकर के काम नहीं करते। क्योंकि सच्ची प्रार्थना में तो प्रार्थी ईश्वर में विलुप्त हो जाता है, विलय हो जाता है, घुल जाता है, फ़ना हो जाता है। फिर तो प्रार्थी के कर्म उसके अपने नहीं रह जाते। अल्लाह मात्र कर्ता हो जाता है, सत्य मात्र कर्ता हो जाता है।
गुरु ने कहा, कि अल्लाह को जो कुछ करना है, तुम्हारे हाथों से करेगा। कैसे? तब, जब तुम्हारे भीतर का कर्तृत्व समाप्त हो जाए और तुम्हारे हाथ किसके इशारों पर चलें? अपने इशारों पर नहीं, अल्लाह के इशारों पर। तब तुम्हारे हाथ तुम्हारे व्यक्तिगत हाथ नहीं रहते, तुम्हारे हाथ तब अल्लाह के हाथ हो जाते हैं। और अगर तुम्हारे हाथ अल्लाह के हाथ हो गए होते, तो उन्होंने वही काम किया होता जो सही, सम्यक, उचित होता; पर देखो, तुम तो कैसी मूर्खता कर बैठे। इसका मतलब तुम्हारा कर्म तो गलत था ही, उस कर्म से पहले तुमने जो प्रार्थना करी, वो भी झूठी, नकली, अधूरी थी।
असली प्रार्थना के बाद तो प्रार्थी शेष ही नहीं रहता। असली प्रार्थना के बाद तो प्रार्थी करता रह ही नहीं जाता। असली प्रार्थना के बाद प्रार्थी के जो भी कर्म होते हैं, वो वास्तव में किसके होते हैं? वो, जिससे प्रार्थना करी थी। अब वही-वही रह जाता है। उसके अलावा तुम प्रार्थना में माँगते भी क्या हो? प्रार्थना में अपने विलोप के अलावा कोई माँग रखी जाती है क्या?
“मैं न रहूँ, तू ही तू बचे। मैं मिटूँ, तू रह जाए। मैं और तू, दो से एक हो जाएँ।” यही तो प्रार्थना है न? इसके अलावा क्या माँग करोगे? और अगर मैं मिटा, तू बचा, तो फिर अब मैं व्यक्तिगत निर्णय कैसे ले रहा हूँ? प्रार्थना करने के बाद भी, समर्पित होने के बाद भी, अगर अभी मैं अपना ही भेजा चला रहा हूँ, अपनी ही बुद्धि से व्यक्तिगत निर्णय ले रहा हूँ, तो इससे क्या साबित हुआ? कि मैंने प्रार्थना कभी करी ही नहीं थी; प्रार्थना का स्वाँग किया था, प्रार्थना-सा आचरण किया था। वहाँ प्रार्थना नहीं थी; वहाँ बस कुछ रस्मों की अदायगी थी, कुछ पंक्तियों का दोहराव था। कुछ वास्तविक हुआ नहीं वहाँ पर।
इस बात को समझना, खुदा जब तुम्हारी मदद करना चाहता है, तो कहीं बाहर से आकर नहीं करता; तुम्हारे भीतर बैठ जाता है। जब वो तुम्हारे भीतर बैठ जाता है, तो तुम्हारे कर्म ऐसे हो जाते हैं कि तुम अपनी मदद करने लगते हो।
दो तरह के लोग होते हैं। एक, वो जो कहते हैं कि “हम हम रहे, खुदा बाहर से आकर हमारी मदद कर दे।” उन्हें कभी मदद मिलती नहीं। क्योंकि जब तक तुम हो, कौन तुम्हारी मदद कर सकता है? जब तक तुम हो, कौन तुम्हारी मदद करेगा?
और दूसरे होते हैं जो कहते हैं, “हम न रहे।” उनकी वास्तविक मदद होती है, वो मिटे, अब उनके भीतर जो बोध है, उसी का नाम तो अल्लाह है, उसी का नाम खुदाई है, उसी का नाम आत्मा है, उसी का नाम तो सत्य है। अब वो कर्ता हो गई है, अब वो काम कर रही है। अब आप जो कुछ भी करोगे, उसमें आपकी भी मदद होगी और पूरे संसार की भी। अब आपका एक-एक कर्म सही दिशा में होगा, आपकी मदद की दिशा में होगा।
समझ में आ रही है बात?
आपने जो माँगा था, वो आपको अपने ही हाथों मिल जाएगा। आप जो बाहर तलाशते थे, वो आपको अपनी ही हस्ती में मिल जाएगा। बस आपकी हस्ती अब वो नहीं रहेगी जो प्रार्थना से पूर्व थी। क्योंकि प्रार्थना से पूर्व की जो हस्ती थी, उसमें आप संतुष्ट थे ही नहीं। उसी को अगर बचाए रह गए, तो संतुष्टि भी कभी मिलने की नहीं।
ये गलती अक्सर प्रार्थी-भक्त कर ही जाता है। वो कहता है, “मुझे कुछ ऐसा दे दो जो मुझे अच्छा लगता हो।” तुम तुम हो, तब न वो है जो तुम्हें अच्छा लगता है। जो असली भक्त है, जो वास्तव में प्रार्थना कर रहा है, वो कहता है, मैं क्या जानूँ, मेरे लिए क्या अच्छा है। तुम आ जाओ, फिर जो होगा सब अच्छा होगा। तुम्हारे होने से रौनक है, तुम्हारे होने से सच्चाई है, तुम्हारे होने से खुशबू है, तुम्हारे होने से बहार है। तुम नहीं, तो और क्या। तुम्हारे अतिरिक्त कुछ और माँगूँ, तो अँधेरा ही माँग रहा हूँ, अपनी मूर्खता ही दर्शा रहा हूँ। बात समझ में आ रही है? तुम आओ और ऐसे छाओ कि किसी और के लिए जगह न रहे, यहाँ तक कि स्वयं मेरे लिए भी जगह न रहे।
तुम कुछ ऐसा भर दो मुझको कि मैं भी अपने वजूद से बाहर हो जाऊँ, बेदख़ल हो जाऊँ। यही प्रार्थना होती है।
प्रार्थना ये थोड़ी होती है कि तुम वहाँ दूर बैठे हो और हम माँग रहे हैं कि देखो, तुम वहाँ दूर बैठे-बैठे कुछ ऐसा प्रबंध कर दो कि हमें लड्डू मिल जाए। अब तीन हैं, वो वहाँ बैठा है, तुम यहाँ बैठे हो, लड्डू यहाँ है। और तुम उससे माँग क्या रहे हो? कि हमारा और लड्डू का योग हो जाए। तो प्रेम तुम्हें किससे है? लड्डू से।
प्रेम लड्डू से है तो प्रार्थना उससे काहे कर रहे हो? लड्डू ऐसे कर लो। और यही प्रार्थना नहीं करते क्या तुम? प्रार्थना कर रहे हो कि कल बस दो लाख हों। वो है, तुम हो, और दो लाख हैं। प्रेम किसके बीच है? तुम्हारे और दो लाख के बीच है, तो उसके पास काहे गए हो प्रार्थना करने, उसको क्यों बेगाने झंझट में घसीटते हो? उसके पास तब जाओ, जब और कुछ न चाहिए हो, सिर्फ़ वही चाहिए हो। अभी और कुछ चाहिए, तो जो चाहिए सीधे उसके पास जाओ न।
अल्लाह भी पूछता है, बोलता है, तुम और लड्डू, मैं बीच में कहाँ से आ गया? तुम्हें लड्डू चाहिए, जाओ लड्डू से बात करो। तुम्हें लड़की चाहिए, जाओ लड़की से बात करो। तुम्हें अगर मैं चाहिए हूँ, तो मुझसे बात करो न। ये तो बड़ी कड़ी शर्त हो गई। तुम भगवान के पास भगवान को माँगने कब जाते हो, तुम तो भगवान के पास वरदान माँगने जाते हो। इसीलिए कुछ नहीं मिलता, न भगवान, न वरदान।
याद रखना, भगवान और वरदान अलग-अलग नहीं हो सकते। भगवान एक ही वरदान दे सकता है, उस वरदान का नाम भगवान है। और यही वरदान माँगन हमेशा, क्या? और कुछ नहीं चाहिए, तुम ही आ जाओ। तुमसे कुछ नहीं चाहिए, मुझे तो तुम ही चाहिए। और अगर अभी यही माँग रहे हो कि तुमसे कुछ चाहिए, तुमसे कुछ चाहिए। तो बजाओ झुनझुना, वही मिलेगा। झुनझुना भी नहीं मिलेगा।
तुम आ जाओ, फिर तुम ही बाँध देना ऊँट को, अगर बाँधना ज़रूरी है। नहीं बाँधना ज़रूरी, तो तुम ही मत बाँधना। बस ये हाथ मेरे न रहें, ये हाथ किसके हो जाएँ? तुम्हारे ही हो जाएँ। मैं तो इन हाथों को जब भी चलाऊँगा, तो इन हाथों से कुछ ऊटपटाँग ही हो जाएगा, कुछ गलत ही हो जाएगा। तुम आओ और इन हाथों को, इस शरीर को, इस बुद्धि को संचालित करो। तुम बनो सर्वेसर्वा, तुम बनो मेरे कर्ता। मुझे क्यों झंझट में डालते हो? मैं तो अधना-सा हूँ, नौकर हूँ, मति-भ्रष्ट, बुद्धिहीन हूँ, कामी हूँ, लोलुप हूँ। मुझसे काम कराओगे तो फिर वैसा ही होगा जैसा अभी हो रहा है।
कैसा हो रहा है? जैसा अभी हो रहा है।
मेरा जीवन सुधारने-संवारने का तो एक ही तरीका है, मेरी जगह तुम आ जाओ, मेरे भीतर तुम आ जाओ, तुम्हारे भीतर मैं आ जाऊँ।
आ रही है बात समझ में?
तो नित्य और अनित्य की थी ही नहीं, जितेंद्र, कि दोनों की अपनी-अपनी उपयोगिता है। कहानी ये नहीं समझा रही है, भटक मत जाइएगा। कहानी कह रही है कि अनित्य की उपयोगिता है ही नहीं। तुम नित्य को बुलाओ और कहो, तू पूरा ही भर दे मुझे और फिर नित्य देखेगा कि अनित्य का क्या करना है। नित्य प्रथम, नित्य सर्वोच्च।
अनित्य से तुम्हारा आशय था दुनियावी कामों को याद रखना, हाथ चलाना, ऊँट की परवाह करना, इत्यादि, इत्यादि, ये सब कुछ। उस सब की परवाह तुम्हें करनी ही नहीं है, किसको करनी है?
इस शिष्य ने गलती ये नहीं करी थी कि उसने प्रार्थना भर करी और ऊँट बाँधा नहीं। भटक मत जाना, समझो, कहानी को ऊपरी तौर पर पढ़ोगे तो तुम्हें लगेगा कि इस चेले की गलती ये थी कि उसने प्रार्थना तो करी और ऊँट बाँधना भूल गया। न! उसकी गलती ये थी कि उसने प्रार्थना भी पूरी नहीं करी। प्रार्थना उसने अगर पूरी करी होती, तो वो हट गया होता। अल्लाह ने ख़ुद उतरकर ऊँट को बाँध दिया होता।
कहानी ये नहीं सिखा रही है कि प्रार्थना भी करो और ऊँट भी बाँधो। कहानी सिखा रही है कि इतने जज़्बे से, इतनी तल्लीनता और इतनी पूर्णता से प्रार्थना करो कि तुम प्रार्थना से भर जाओ पूरी तरह से और तुम्हारी सारी बेवकूफ़ियाँ बाहर हो जाएँ, ख़त्म हो जाएँ। भीतर बचे क्या? बस प्रार्थना ही प्रार्थना गूँज रही है।
और इस तरह की बेवकूफ़ीयाँ, कि ऊँट नहीं बाँधा, और ये नहीं किया, वो सब मिट गया। तुम्हारे भीतर शेष क्या रहा? मात्र बोध। उसी बोध को सत्यता कहते हैं। उसी बोध को कहते हैं कि अब मुझमें परमात्मा उतरा, अब मैं जो भी करता हूँ, बोध से संचालित होकर करता हूँ।
तुम नित्य को समर्पित रहो,अनित्य की परवाह नित्य ख़ुद कर लेगा, बस तुम्हारा समर्पण पूरा होना चाहिए। समर्पण पूरा नहीं है, तो दोनों तरफ़ से मारे जाओगे। खुदा तो मिला ही नहीं, ऊँट भी गया। दुविधा में दोनों गए, माया मिली, न राम। ये मत कर देना, कि आधी-अधूरी ऐसी प्रार्थना करी कि प्रार्थना तो सुनी ही नहीं गई, ऊँट से भी हाथ धो बैठे। ये नहीं।