बंधन नहीं छूट रहे?

Acharya Prashant

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बंधन नहीं छूट रहे?
मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो। आप मान लीजिए, शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक… नहीं, नहीं, नहीं। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो। कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, आपने आज जो हमने पकड़ लिया है, उसको साथ ढोते हुए समझाया था कि हम थोड़ा-सा उसको ब्रेक दें, फिर ढोए। आपने पहले भी कहा था कि अगर कुछ पकड़ लिया है, कोई बॉन्डेजेस हैं, बंधन हैं, तो तुम उसके साथ ही भागो। उसको अगर छोड़ नहीं सकते, तो उसके साथ भागो।

तो मैं उसके साथ भागने की कोशिश करती हूँ, बोझ के साथ, बंधन के साथ, मुक्ति की तरफ़। उसमें बहुत ज़्यादा संघर्ष करना पड़ता है, पीड़ा होती है, थकान होती है। वो सब तो ठीक है, लेकिन गति नहीं बढ़ रही है। उसके लिए बेचैनी होती है। क्योंकि जब ज्ञान आता है, आप ही ने कहा था कि आपको आकाश दिखेगा, तो आकाश दिखेगा। तो आपके साथ अपने आप ही न यह माइक या कप आपने एक उदाहरण दिया था, छूट जाएगा।

लेकिन वो छूट नहीं रहा है, और आकाश दिख रहा है। तो वो एक बेचैनी अंदर रह रही है। वो अपनी परिस्थिति, अपनी स्थिति समझ नहीं रही हूँ।

आचार्य प्रशांत: आपने जिस तरीके से उस पूरी बात का ढाँचा बनाया है, कुछ छूटेगा भी नहीं। मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो।

मैंने कहा, तुम अपनी ओर से छोड़ना चाहते हो, पर भीतर की वृत्तियाँ हैं, समय लग रहा है। तो यह मत कह देना कि जब पूरी तरह से सब छूट जाएगा, और बिल्कुल निर्मल हो जाएँगे और निर्भार हो जाएँगे, तब भागेंगे। सही दिशा में तुम भागो। सही दिशा में भागो, इंतज़ार मत करते रहो। इस अर्थ में मैंने कहा है।

यह थोड़ी कहा है कि सही दिशा में भागो, लेकिन अपने बंधनों को सिक्योर करके भागो। और अच्छे से करके भागो।

भागने से आशय क्या है? आप मान लीजिए शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैंने लाइसेंस नहीं दे दिया है कि जिन विषयों से आसक्ति है, उस आसक्ति को कायम बिल्कुल रख के भागना है, यह थोड़ी बोल दिया है। देख कितना ख़तरा है।

इसलिए मैं पूरी बात बोलना चाहता हूँ, पर जमाना रील्स का है। तो उसमें इतनी-सी ही बात जाती है, और इतनी-सी बात तो कभी पूरी नहीं होगी। उसमें कुछ आगे है, कुछ पीछे है।

वो बात कही गई थी। देखिए, कभी भी कोई बात कही जाती है न, तो वो बात अपने आप में सत्य नहीं होती। वो किसी मान्यता को काटने के लिए कही जाती है। तो उदाहरण के लिए, अगर मैंने कहा, कि जैसे हो कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर, तो वो मैंने बात किसी मान्यता को काटने के लिए बोली है। किस मान्यता को काटने के लिए बोली है? कि आइ विल वेट टिल आइ एम परफेक्ट। व्हेन आइ विल बी एब्सोल्यूटली फिट, देन आइ विल स्टार्ट रनिंग।

इस मान्यता को काटने के लिए मैंने कहा, “नहीं, यू स्टार्ट रनिंग जस्ट ऐज़ यू आर।” तो जब भी मेरा कोई वक्तव्य पढ़ो, तो यह मत सोचो कि मैंने कोई कांसेप्ट दिया है, कोई सिद्धांत दिया है। अपने आप से यह पूछा करो इसको अच्छे से समझिए, अपने आप से ये पूछा करो कि उन्होंने यह बात किस मान्यता को काटने के लिए बोली होगी? क्योंकि मान्यताओं को काटने के अलावा बोलने का कोई उद्देश्य होता ही नहीं है। होता ही नहीं है।

तो जो मैंने बात बोली है, वो सिर्फ़ नेगेटिवा में एप्लीकेबल है। उस मान्यता के कॉन्टेक्स्ट में, संदर्भ में एप्लीकेबल है। वरना जो भी मैंने बोला, वो अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखता। ठीक वैसे जैसे कोई भी दवाई अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखती। कोई भी दवाई अर्थवान सिर्फ़ बीमारी के संदर्भ में होती है। नहीं तो दवाई क्या पोषण होती है? दवाई कोई क्यों खाए?

आप किसी के सामने ले जाओ, कि “ये दवाई,” दवाई माने केमिकल। “ये केमिकल अच्छा है कि बुरा है?” न अच्छा है, न बुरा है। हाँ, दवाई को अगर बीमारी के संदर्भ में बता पाओ, तो वो अच्छी हो जाएगी कि इन कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ दिस डिज़ीज़, व्हाट डू यू थिंक ऑफ़ दिस केमिकल? (इस बीमारी के संदर्भ में, आप इस केमिकल के बारे में क्या सोचते हैं?) तब कहा जाएगा, दिस केमिकल इज वेरी बेनिफिशियल इफ यू हैव दिस डिज़ीज़। (यह केमिकल बहुत लाभकारी है यदि आपको यह बीमारी है।)

तो आप एक मान्यता लेकर आते हो, उसको काटने के लिए मैं कोई स्टेटमेंट देता हूँ। उस स्टेटमेंट को हमेशा उस मान्यता के साथ रखकर पढ़ा जाना चाहिए। कौन सी मान्यता थी मेरे वक्तव्य के पीछे? कि मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक नहीं, वही कि रिटायरमेंट हो जाएगा उसके बाद कुछ करेंगे। तब मैंने कहा था, कि “नहीं, नहीं, नहीं, अभी शुरू करो। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो।” ठीक है? पकड़े-पकड़े ही बढ़ना है, यह नहीं कहा है।

प्रश्नकर्ता: दूसरे तरीके से पूछती हूँ, आचार्य जी, कि मैंने तो विषयों से आसक्ति छोड़ दी, या अपने जो कर्तव्य-बंधन बना रखे हैं, जो डिसीजन आप बोलते हैं न अप्रवर्तनीय है।

आचार्य प्रशांत: मैं कहूँ कि मुझे अभी से पता है, आपका अगला वाक्य क्या होगा। मैंने तो छोड़ दिया पर उधर से नहीं छोड़ा गया।

प्रश्नकर्ता: दोनों जगह बीच में।

आचार्य प्रशांत: है न?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: और उधर से नहीं छोड़ा गया, इसका असर किस पर पड़ रहा है? माइक किसके हाथ में है?

प्रश्नकर्ता: मुझ पर ही पड़ रहा है।

आचार्य प्रशांत: तो बस यही बात है न, ये स्वीकार नहीं करते। न ये कर रही थी न आप। हमेशा यही कि नहीं-नहीं मुझे कोई समस्या नहीं है, पर दूसरे दुखी हैं। अरे, दूसरे दुखी हैं। हाँ, अमेज़न में अभी एक एनाकोंडा बैठा है, वो बहुत दुखी है उसकी एनाकोंडी भाग गई। तो उसकी वजह से आप दुखी हो क्या?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दुखी तो मैं ही हूँ।

आचार्य प्रशांत: तो बस यह बोलो न, सीधे ही मुझ पर असर पड़ रहा है। ईमानदारी से स्वीकार क्यों नहीं करते?

प्रश्नकर्ता: लेकिन उस दुख को मैं, वही मैं बोलना चाह रही हूँ कि करुणा समझ में नहीं आ रहा कि करुणा की वजह से छोड़ नहीं पा रही हूँ, कि बच्चा है।

आचार्य प्रशांत: करुणा सार्वजनिक होती है।

प्रश्नकर्ता: हाँ, सार्वजनिक।

आचार्य प्रशांत: हाँ, तो करुणा बस उसी पर क्यों होगी जिससे आसक्ति है? उसे फिर करुणा नहीं बोलते।

प्रश्नकर्ता: आपने बताया, मोह होता है, ममता।

आचार्य प्रशांत: हाँ, तो बस वही है; मोह है, ममता है।

प्रश्नकर्ता: लेकिन अगर सबसे है, तो उससे भी तो है, वो नहीं छूट रही है।

आचार्य प्रशांत: तो उसका तो तरीका ज्ञान होता है। देख लीजिए, क्या बात है। उसको ममता भी मत बोलिए, स्वार्थ है। सबसे पहले तो सही शब्दों का इस्तेमाल शुरू करिए।

प्रश्नकर्ता: मुझे अपनी तरफ़ से कोई स्वार्थ नहीं है, लेकिन उसको मेरी ज़रूरत है। ऐसा लगता है, शारीरिक संयोग से है बीमार, अगर दुखी है वो तो कैसे छोड़ दें? यह समझ में नहीं आता। यहीं पर अटक जाते हैं, कि अगर सामने वाले को आपकी ज़रूरत है…।

आचार्य प्रशांत: आप यहाँ सब बैठे हो। ठीक इस पल आप में से किस-किस के रिश्तेदार या दोस्त बीमार हैं? हाथ उठाना। (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)। दुखी क्यों नहीं हैं आप? आप दुखी क्यों नहीं हैं?

उन सबको आपकी सेवा की ज़रूरत है। क्योंकि आप उनकी सेवा कर भी दोगे न, तो उनसे आपको कुछ नहीं मिलने वाला। जिससे मिलने की उम्मीद है, वहाँ निवेश कर रहे हो। सेवा वग़ैरह मत बोलो। नहीं तो बीमार तो पूरी दुनिया ही है, बीमार तो वह मुर्गा भी है जिसका चिकन सूप अपने बच्चे को पिलाते हो।

बात यह नहीं है कि वो बीमार है, उसे मेरी ज़रूरत है। बात यह है कि वहाँ निवेश करेंगे, तो आगे कुछ मिलेगा।

यह बात मानने में बुरी लगती है। आप नहीं मानोगे, अब मैं क्या कर सकता हूँ, मत मानो। मैं क्या करूँ इसमें? नहीं मानोगे आप, मत मानो।

85% भारत ही अब मज़े में मुर्गा खाता है, और बच्चों को तो खासतौर पर खिलाया जाता है। लो कार्ब, हाई प्रोटीन; डॉक्टर साहब का नुस्ख़ा। और माँ कह रही है, नहीं, नहीं, नहीं, मैं स्वार्थ के नाते तो कर ही नहीं रही, मुझे तो बस किसी का दुख नहीं देखा जाता।

जो आपका तर्क है वह न हो, तो क्या कोई भी ममता में बंधेगा?

कोई भी यह बोलकर ममता में बंधेगा कि मैं स्वार्थी हूँ। सबका यही होता है, “मैं क्या करूँ? उसको मेरी ज़रूरत है।” सबसे पहले तो स्वीकार करो कि तुम्हें उसकी जरूरत है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वो ऑटिस्टिक है। तो मुझे पता है स्वार्थ नहीं है कि उससे मुझे उससे कुछ मिलेगा।

आचार्य प्रशांत: कितने यहाँ पर होंगे जो ऑटिस्टिक भी होंगे और न जाने कितनी बीमारियों से ग्रस्त होंगे, और जो मिलना होता है न, बस रुपया नहीं होता, और भी चीज़ें होती हैं जो मिलती हैं।

ऑटिस्टिक बच्चे की देखभाल करने से कोई क्यों रोके आपको? लेकिन वो देखभाल कैसे, आप कह रहे हो कि इतना-इतना बड़ा बंधन हो गया है कि आप जीवन में कोई सार्थक काम नहीं कर सकते, कैसे हो सकता है ये?

आप तो बच्चा कह रहे हो। मेरे पास तो मेरे जानवर रहे हैं, जो बीच-बीच में बहुत बीमार पड़ते हैं। उनकी बेचारों की ज़िंदगी कितनी होती है, पाँच साल, दस साल, बारह साल। और वो बीमार भी खूब पड़ते हैं, और उनकी खूब सेवा करी है। यह अभी डॉग्स वाला कैंपेन चला था, दो स्ट्रीट डॉग्स थे मेरे पास। उनको मैं ख़ुद टट्टी उनकी साफ़ कर रहा हूँ, झाड़ू लगा रहा हूँ, पानी डाल रहा हूँ। लेकिन उससे मैंने अपना काम थोड़ी रुकने दिया।

यह क्या तर्क होता है कि मैं किसी की सेवा कर रही हूँ, तो इस कारण मेरा काम रुक रहा है? यह कैसे हो सकता है? अब या तो मैं आपकी ज़िंदगी में बिल्कुल ग्रेनुलर तरीके से घुसूँ, और मिनट-मिनट का हिसाब लिखकर बताऊँ कि देखिए आप यहाँ पर बेईमानी कर रही हैं। आप वास्तव में समय यहाँ ख़राब कर रही हैं, लेकिन दोष अपने बच्चे पर डाल रही हैं। और समय आपका जा कहीं और रहा है। अब या तो मैं वहाँ घुसूँ, या फिर आप ही अपनी ईमानदारी से आत्मवलोकन कर लीजिए और अपने समय को देख लीजिए कि सचमुच कहाँ जाता है।

वी फाइंड होली रीज़न्स टू एन…। है न?

आई मस्ट सफ़र नाउ फ़ॉर होली रीज़न्स। क्योंकि सफ़रिंग चीज़ ही इतनी गंदी है, दैट नथिंग लेस दैन होली विल सफाइस। सो, वी हैव टू फाइंड होली रीज़न्स टू रिमेन सफ़रिंग।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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