हम अपने आराध्यों की कथा, चरित्र, मूर्ति, छवि अपने ही हिसाब से बना देते हैं। हम अपनी सहूलियत, मान्यता और स्वार्थ के अनुसार कालातीत को भी बदल डालते हैं। यह समस्या राम के निर्गुण–निराकार रूप के साथ बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो निर्गुण और निराकार है, उसकी कोई मूर्ति ही नहीं, कोई छवि ही नहीं; तुम उसको कैसे ख़राब कर लोगे? इसलिए ज्ञानियों ने कहा कि उनको तो ब्रह्मस्वरूप ही मानना — “राम ब्रह्म परमारथ रूपा, अबिगत अलख अनादि अनूपा।” मात्र वही राम हैं जो कालातीत हैं।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं आपको पिछले कुछ महीनों से सुन रहा हूँ। मेरे मन में श्रीराम को लेकर एक दुविधा है। आप कहते हैं, कि आप दशरथ पुत्र राम को नहीं बल्कि जो सत्य है उसे राम कहते हैं। तो दुविधा ये है कि दशरथ पुत्र राम को कर्म मानने में या राम मानने में क्या समस्या है? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: नहीं, समस्या कोई नहीं है। न उनको कहा जा रहा है कि राम मत मानो। प्रश्न में भाव निहित है, जैसे दशरथ पुत्र राम को राम मानने में कोई बाधा है, वर्जना है, समस्या है। ऐसा कुछ नहीं है। लेकिन मुद्दा हमें श्रीराम से हटाकर स्वयं पर लाना पड़ेगा न। हम कैसे हैं? बात उनकी नहीं है, बात हमारी है। प्रश्न सुनो तो ऐसा लगता है जैसे राम, जो कि ब्रह्मस्वरूप हैं, और राम, जो कि दशरथ पुत्र हैं, इन दो की तुलना की जा रही हो, है न? लेकिन मुद्दा राम नहीं है, मुद्दा हम हैं, हमारा अहंकार, हम कैसे हैं?
हम ऐसे हैं कि मैं आपसे कोई साधारण-सी बात भी बोलूँ या मैं आपके सामने कोई साधारण-सा काम भी करूँ और आपसे कहूँ कि लिखो मैंने क्या कहा, क्या किया, तो आप सब अलग-अलग लिख दोगे। तो आपके कहे में आपके व्यक्तित्व का कुछ अंश आकर मिलावट कर देता है। कई बार थोड़ी मिलावट, कई बार बहुत ज़्यादा। दशरथ पुत्र राम स्वयं अपनी कोई जीवनी लिखकर गए नहीं न। उनके बाद दर्जनों प्रकार की अलग-अलग रामायण लिखी गईं। रामचरित्र अलग-अलग। उत्तर भारत में हम दो से परिचित हैं, वाल्मीकि रामायण और संत तुलसीदास का रामचरितमानस। इन्हीं दोनों में ज़बरदस्त भिन्नताएँ रहती हैं, बहुत भिन्नताएँ हैं, इतनी कि आप गिनने लगें तो बड़ी लंबी सूची बनेगी।







