
A modern woman calls herself liberated, yet lives anxious — anxious about age, desirability, marriage, motherhood. Acharya Prashant exposes this anxiety as proof that feminism never touched the real wound: centuries of conditioning that reduced women to bodies for pleasure and reproduction. External equality isn't enough. True freedom demands she reject the entire inheritance of tradition and simply become human — not woman, not wife, not mother by decree, but free.

Migration can arise from genuine needs such as safety, education, livelihood, or environmental conditions, as well as from the ego's pursuit of greater consumption and fulfilment. The challenge is to distinguish between these motives with wisdom rather than ideology. Fair, impartial screening, mutual respect between migrants and host societies, and practical integration create a balanced approach that is both humane and responsible.

आत्मसम्मान उपलब्धियों से नहीं, अपनी पहचान से जन्म लेता है। जब तक हम स्वयं को केवल शरीर मानते हैं, तब तक प्रकृति और समाज की अपेक्षाएँ हमें अधूरा महसूस कराती रहती हैं। सच्ची मुक्ति तब है जब हम जैविक और सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर चेतना के अनुसार जीवन जिएँ। शरीर साधन है, साध्य नहीं। जीवन का उद्देश्य प्रकृति के आदेशों का पालन नहीं, बल्कि अपने बंधनों को पहचानकर उन्हें तोड़ते हुए स्वतंत्रता और आत्मबोध की ओर बढ़ना है।

True revolution begins with inner transformation, not merely with protest. Lasting social change is possible only when individuals cultivate self-knowledge, integrity, and personal responsibility. Replacing governments or demanding reforms without examining the mind that sustains the same patterns only repeats history. Awaken yourself first, educate others with clarity and compassion, and let conscious citizens, not unconscious crowds, become the foundation of a better society.

भारत की असली चुनौती तकनीक या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक ढाँचा है जहाँ उत्कृष्टता कुछ द्वीपों तक सीमित रह जाती है। जब समाज सत्य, स्वतंत्र सोच और मानवीय विकास के बजाय लोकधर्म, भय और सामाजिक स्वीकृति से संचालित होता है, तब स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होता। एक बेहतर समाज केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि साहसी, ईमानदार और जागरूक समुदायों के निर्माण से जन्म लेता है।

The crisis exposed by the NEET paper leak goes far beyond examination malpractice. When society teaches young people that a single rank determines their worth, corruption, desperation, and broken trust become inevitable. Lasting reform requires more than stricter systems—it demands a transformation in how education, success, and self-worth are understood by students, parents, teachers, and society.

गरीबी केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि गलत सोच, अंधविश्वास, भाग्यवाद और अविवेकपूर्ण आदतों से भी बढ़ती है। शिक्षा, जिम्मेदारी और सही मूल्यों की कमी इंसान को पीढ़ियों तक गरीब बनाए रखती है। कर्मकांड, दिखावा और बिना समझ के खर्च आर्थिक संकट को गहरा करते हैं। बदलाव तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी बुद्धि, विवेक और जिम्मेदारी के साथ सही निर्णय लेना शुरू करे।

Will another revolution really change anything, or are we just changing faces while keeping the same consciousness intact? The article argues that societies often rush toward rebellion because it feels easier than responsibility. We blame systems, governments, and institutions, but the deeper crisis lies in the collective ego that creates them. Without inner education and self-understanding, every revolution risks becoming another cycle of the same story.

क्या सचमुच FOMO और YOLO सिर्फ़ Gen Z की समस्या हैं, या ये मनुष्य के पुराने डर के नए नाम हैं? जब भीतर खालीपन हो, तो बाहर की हर चीज़ छूटती हुई लगती है। फिर जीवन एक दौड़ बन जाता है, जहाँ “और चाहिए” कभी ख़त्म नहीं होता। समस्या वस्तुओं की कमी नहीं, उस अहंकार की है जो हमेशा अधूरा महसूस करता है। जब तक स्वयं को नहीं जानोगे, तब तक हर चाह एक नई बेचैनी बनती रहेगी।

TCS जैसे मामलों पर पूरा देश कुछ दिनों तक हैरान होता है, लेकिन क्या सच में ये घटनाएँ नई हैं! कार्यस्थलों पर शोषण, करियर के नाम पर चुप्पी, धर्म को पहचान और सत्ता का हथियार बना देना, और भीतर से डरा हुआ इंसान... ये सब उसी समाज से निकलता है जिसे हमने सामान्य मान लिया है। सवाल सिर्फ़ कानून या सिस्टम का नहीं, इंसान की चेतना और परवरिश का है।

Do you still feel the need to know someone’s caste? That urge itself is the problem. Caste exists neither in the body nor in consciousness; it is a construct of the mind. Society keeps it alive because the ego thrives on division. Until you see a person simply as a person, caste will persist. The real solution lies in understanding and dropping inner ignorance.

सामंजस्य, एडजस्टमेंट नहीं कर लेना चाहिए। जहाँ किसी तरीके से झुकना भी पड़े, दबना भी पड़े, डरना भी पड़े, वहाँ कम से कम अपने लिए नापसंद तो उठे। इतना तो हो कम से कम। मेरे भी थे ऑफिस में लोग, जिनको न चाहते हुए भी ‘सर’ बोलना पड़ता था। बहुत लंबे समय तक नहीं बोला, पर जितने समय तक बोला, उतने समय तक बोलना भी ऐसा था कि सिर भनना जाए।

किसी महिला को पढ़ाई, नौकरी, खेल से वंचित कर दिया गया, यह अत्याचार नहीं है क्या? पर इन अत्याचारों को तो हम अत्याचार मानते ही नहीं। चूँकि हमने महिला की पूरी आइडेंटिटी को उसकी सेक्सुअलिटी से ही बाँध दिया है। उसी का नतीजा यह होता है कि कहीं पर भी दंगा-फसाद हो, उसमें महिलाओं का बलात्कार अक्सर देखने को मिलता है। लेकिन महिला सिर्फ अपने जेंडर या सेक्स से तो आइडेंटिफाइड नहीं होती न! हमें उसके व्यक्तित्व के बाकी आयामों को भी सम्मान देना सीखना होगा।

अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।

एक कागज़ पर समानता शब्द लिख भर देने से समानता नहीं आ जाएगी। जो समानता के आदर्श को पसंद करते हों, उनकी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वो समझें, सर्वप्रथम, कि असमानता, भेद कहाँ से आते हैं। वो आते हैं, अहम् से। अहम् विभाजन पर पलता है। उसको जीने के लिए सीमाएँ चाहिए, वर्ग चाहिए, कुछ ऊँचा, कुछ नीचा चाहिए। सिर्फ़ आत्मा वो बिंदु है, जहाँ सब एक और एक समान हैं। इसीलिए, अगर भारत को या दुनिया के किसी भी राष्ट्र को समानता चाहिए, तो उसे आत्मिक होना पड़ेगा।

दुनिया के बारे में तो तुम्हें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ही खूब पढ़ा देती है। तुम कौन हो, कैसे हो, मन क्या चीज़ है, इसके बारे में कुछ नहीं बताती। तो इसीलिए अपूर्ण है ये व्यवस्था। देखो कि बच्चे को उसका सारा मानसिक भोजन कहाँ से मिल रहा है। तुम्हें बच्चे को कुछ नया सिखाने की ज़रूरत तो है, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा बड़ी ज़रूरत है उन सब रास्तों को रोकने की, जिनसे ज़हर बच्चे में प्रवेश करता है। जो-जो कर सकते हो, सब कुछ करिए। यही वास्तविक अध्यात्म है, यही वास्तव में पुण्य का काम है।

आप आज के कैपिटलिस्ट को रोल मॉडल क्यों बोलते हो? अगर यह रोल मॉडल है, तो अंग्रेज़ भी रोल मॉडल हैं। द ब्रिटिश एंपायर वाज़ द बिगेस्ट कैपिटलिस्ट ऑफ़ इट्स टाइम। कैपिटल अपने आप में बुरी नहीं है। पर तुम्हारे भीतर एक बेहूदा अंधकार है, जिसमें तुम पैसा ठुँसे जा रहे हो। तुम दुनिया की आधी प्रजातियाँ ख़त्म करके खा चुके हो। तुम अब पूरी पृथ्वी को खा जाओगे, फिर भी तुम्हारा पेट नहीं भरेगा। आप एक्सप्लॉइटेड हो क्योंकि आप ख़ुद वैसा ही बनना चाहते हो जैसा आपका एक्सप्लॉइटर है। आपका एक्सप्लॉइटर ही आपका रोल मॉडल है।

If you leave yourself weak and vulnerable, you are submitting to the ecosystem of rape. What’s worse? It won’t even be reported. The first thing is: empower yourself through education, through exposure, through wisdom. When it comes to sexual urges, no lessons of morality really succeed. You’ll just be left complaining to the benevolent power up there, “You know, I’m such a pious woman. Why was I violated?” Because that’s how it happens in the jungle. That’s the answer. That’s all.

तुम ये माने बैठे हो कि समाज बहुत अच्छा है, क़ानून में बस कमी है। क्यों अपने आपको कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट दे रहे हो? क्यों कह रहे हो कि इस समाज का चरित्र बहुत अच्छा है? क्यों समाज को एक चरित्र प्रमाणपत्र दे रहे हो? मत दो भाई। इस समाज को अच्छा कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट देने की कोई ज़रूरत नहीं है। जो मामले होते हैं न, वो प्रतिनिधि मामले हैं — वे रेप्रेजेंटेटिव मामले हैं। वो ऐसा नहीं कि यूँही कोई आसमान से गिरा एलियन है जो आकर रेप कर गया। वो इसी समाज, इसी मिट्टी से उठा हुआ अपराधी है।

हम अपनी देह के साथ डर लेकर पैदा होते हैं। चूँकि हम में डरने की वृत्ति है, इसलिए समाज भी हमें डरा लेता है। डर से मान्यता आती है, और वही मान्यता आतंकवादी भी बनाती है। चेतना का धर्म आनंद की ओर जाना है। यदि किसी के भीतर यह मान्यता बैठ गई है कि कुछ लोग दुश्मन हैं और उन्हें मारकर आनंद या जन्नत मिलेगी, तो वह मारेगा। आतंकवादी भी अपनी सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक मान्यताओं का गुलाम है। अज्ञान ही हर हिंसा का कारण है, और अज्ञान का अर्थ ही मान्यता है।

जबकि ये जानी-समझी बात है कि स्मृति में जो कुछ लिखा है, उसे श्रुति-सम्मत होना चाहिए, और स्मृति अगर श्रुति का उल्लंघन कर रही है तो स्मृति को हटा दो, श्रुति की बात मानी जाएगी, क्योंकि श्रुति वो देती है जो कालातीत सत्य है। और स्मृति वो बातें कहती है जो उस समय के समाज में प्रचलित हैं। उस समय समाज में जो प्रचलित है, उन चीज़ों को माध्यम बनाकर, सहारा बनाकर, उन चीज़ों को भी सम्मान देकर किसी तरह से धर्म को अशिक्षित लोगों तक भी पहुँचा सको, इसके लिए स्मृति थी।

You know, if your husband is gone, your finances are gone. Therefore, you will guard your husband very, very strongly, very possessively. It’s not love, it’s dependence. In love, you often allow the other to fly free. But if you are acting as that possessive wife or girlfriend or whatever, that is also because you are dependent, and that is violence, is it not?

इससे बड़ी विडम्बना नहीं हो सकती कि जिस ज़मीन पर ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ उच्चारित हुआ, उस ज़मीन पर जाति और लिंग आधारित इतनी क्रूरता चली। कोई दलित महिला अतीत से बंध कर रहे, इससे ज़्यादा ताज्जुब की बात नहीं हो सकती। आपके लिए अतीत में रूढ़ियों और बंधनों के अलावा है क्या? उनसे आपको कुछ नहीं मिलने वाला। जितना उनका मुँह देखोगे, उतना आपका दिल टूटेगा। अपने आपको सही ज़मीन और सही आसमान दीजिए। अतीत को तोड़कर उड़ जाओ, इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।

The biggest problem is when we succeed in these little acts of charity, goodness, kindness. Had you succeeded in somehow persuading the kids away, you wouldn’t even have raised this question, and a self-awarded sense of morality and righteousness would have held you high. That’s the whole problem. When you said the kids wouldn’t go away because it is a festival and it is crackers, then do we really understand why the kids wouldn’t go away?

ये जो पूरा मुद्दा ही है, ये कोई बहुत ऊँचे तल का नहीं है। रिश्ता कैसा भी हो, समाज को स्वीकार हो, नैतिक हो, अनैतिक हो, पता नहीं कैसा है। सवाल ये है कि आप जिसकी ओर जा रहे हो, वो इंसान आपको क्या देने वाला है? ऊँचाई देने वाला है?

मेंस्ट्रुएशन को लेकर जो बड़ा हौवा है, उसको जो एक टैबू की तरह हम देखते हैं, उसका कारण ये नहीं है कि हम मेंस्ट्रुएशन को लेकर अनकंफ़र्टेबल रहते हैं। उसका कारण ये नहीं है कि हमें अजीब लगता है, असंगत लगता है कि ये मेंस्ट्रुएशन क्या चीज़ होती है। उसका कारण थोड़ा उससे आगे का है एक कदम, हम सेक्स को लेकर ही अभी तक सहज नहीं हो पाए हैं। हमारी असहजता मेंस्ट्रुएशन, मासिक-चक्र से उतनी नहीं है, हमारी असहजता सीधे-सीधे सेक्स से है। और उसके पीछे बड़ा गहरा कारण है, जो अगर हम समझेंगे तो जीवन को ही समग्रता से समझने में मदद मिलेगी।

देखो, जितनी भी व्यवस्थाएँ होती हैं, वो ट्रैफिक जाम हो, चाहे सरकारी दफ्तरों का भ्रष्टाचार हो, अव्यवस्था हो, चाहे प्राइवेट सेक्टर की मनमर्जी हो, चाहे रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन पर जो हो रहा होता है, वो हो — वो सब कुछ उन लोगों का प्रतिबिंब होता है जो लोग उस व्यवस्था को बना और चला रहे हैं। ख़राब व्यवस्था है, माने लोग ख़राब हैं। सीधी-सी बात, कोई बहुत गहरा कारण नहीं है। सड़क ख़राब है, माने बंदा ख़राब है। जिस क्षेत्र की सड़कें बहुत ख़राब पाई जाएँ, जान लो कि वो लोग भी बहुत अच्छे नहीं हो सकते।

अध्यात्म वहाँ भी बहुत ज़रूरी है, ताकि तुम्हें पता चले कि अगर तुमने विक्टिम होने को अपनी पहचान बना लिया, तो तुम अपनी ज़िंदगी ख़राब कर रहे हो। तो इसलिए अध्यात्म सबके लिए ज़रूरी है। उनके लिए भी, जिनको हम प्रिविलेज्ड क्लास कहते हैं। उनके लिए भी, जो ऑप्रेस्ड रहे हैं और जिनमें अब हीन भावना, इन्फ़िरिऑरिटी आ गई है। और उनके लिए भी, जो अब रेडिकलाइज़ हो रहे हैं, अपने आप को विक्टिम बोलते हैं और अब अग्रेसिव होना चाहते हैं। अध्यात्म उनके लिए भी बहुत ज़रूरी है। अध्यात्म सबके लिए बहुत ज़रूरी है।

ये तर्क गलत है कि बच्चों की ख़ातिर महिला घर में मारपीट बर्दाश्त करे। घरेलू हिंसा हो रही है तो स्त्री को समझना होगा कि उस घर में बच्चों का भी कोई हित नहीं है, वे सुरक्षित नहीं हैं। जितना झेलोगे, उतना पछताओगे। भूल हुई, ग़लत शादी की, लेकिन अब बाहर निकलो, कमाओ। तुम्हारी बाहों की ताक़त सीमित हो सकती है, पर हृदय की नहीं।

ये जो पैसे की अंधाधुंध दौड़ है, प्लेसमेंट, प्लेसमेंट — ये नशा कैसे नहीं है? बताओ न!

श्रुति ने कहा है — आप जन्म से ब्राह्मण नहीं हो जाते। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में ब्राह्मण की तो बड़ी ऊँची परिभाषा बताई है — कहते हैं कि जो असली ज्ञानी होता है, वो तो ब्राह्मण, चांडाल, कुत्ते, गाय — सबको एक दृष्टि से देखता है। जाति का रिश्ता देह से ही बताया जाता है, और अध्यात्म इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वो सीधे-सीधे देह-भाव पर ही सवाल उठाता है। जब तुम देह नहीं, तो तुम्हारी जात कैसे हो सकती है?

You have inflated the reproductive process much beyond its worth. Psychologically, a girl carries it throughout her life as something big, whereas it's nothing — just another process in the human body. And because of the stigma you have attached to this purely biological thing, countless women suffer silently because they can't openly talk about gynaecological problems. Indian philosophical systems have zero space for any belief, assumption, or tradition. So, obviously, this culture has to be outrightly rejected.

महिला मासिक धर्म के पहले दिन चाण्डालिनी होती है, या महिला घूंघट कितना लंबा निकाले — ये सब बातें अध्यात्म में नहीं आती हैं। प्रेसिडेंट से लेकर सीईओ तक महिलाएँ हैं, वो पीरियड्स के दिनों में ऑफिस नहीं जातीं? कितना कमज़ोर हो जाती हैं, बताओ? श्रुति सारे धार्मिक मसलों का सर्वोच्च न्यायालय होती है। जब सर्वोच्च न्यायालय ने बोल दिया कि, “महिला और पुरुष देह से अलग होंगे, चेतना से एक हैं और देह का महत्त्व नहीं — महत्त्व चेतना का है,” तो अब नीचे वाले कुछ बोलते रहें, उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?

रिज़र्वेशन इसलिए है, ताकि एम्पावरमेंट हो पाए। और जब वास्तविक सशक्तिकरण होने लगता है, तो उसका एक लक्षण यह सामने आता है कि लोग फिर आरक्षण, अनुदान लेने से स्वैच्छिक रूप से मना करने लगते हैं। इंसान कहता है — ‘मैं आज़ाद आदमी हूँ। अब और किसी से नहीं लूँगा, मैं तो अब दूँगा।’ ऐसे जीने में अपनी एक शान होती है। और यह तब होगा, जब स्पिरिचुअल एम्पावरमेंट होगा।

बाहर की बात तो ये बिल्कुल ठीक है कि बाहर निकलो तो वर्कप्लेस पर हरासमेंट हो जाता है। कोई चिकोटी काट लेता है, कोई आँख मार देता है, कोई कुछ आपको अश्लील संदेश भेज देता है, ये सब हो जाता है बाहर ठीक है, बिल्कुल होता है। और बाहर बहुत बुरी दुनिया है, ये सब चल रहा है। ऑटो वाला आपको, आप बैठ गए ऑटो में तो वो रियर व्यू से आपको देख रहा है, ये सब हो सकता है। लेकिन बाहर माने किसकी तुलना में बाहर? भीतर की तुलना में बाहर ना। तो भीतर की बात कौन करेगा?

ध्यान और प्रेम, इनके सामने ये जाति जैसा कचरा टिकेगा क्या? तो अगर जाति हटानी है तो इनको ही लाना पड़ेगा — एक ध्यान और एक प्रेम।

ज़्यादातर लोग हँस रहे हैं, क्यों हँस रहे हैं? क्योंकि जिन चीज़ों को तुम भाव से या संवेदना से जोड़ रहे हो, या पवित्र मान रहे हो, वो वास्तव में किसी के लिए पवित्र, वग़ैरह है ही नहीं, ऊपर-ऊपर से लोग पाखंड कर देते थे। तो जब कोई आकर के उस पाखंड का नक़ाब उतार देता है तो लोग कहते हैं, “चलो, अच्छा हुआ, हँस ही लो इस पर।”

Just because we don't hear gunshots doesn't mean that things are peaceful between partners or between parents and kids — especially daughters. Not at all. There are clear boundaries and those boundaries have been mined. As long as you remain within the boundaries, you will entertain the illusion that you are free and loved. Try to step out, and you'll be blown to pieces. So, the violence was always cooking but you didn't see it because you were blinded by your emotions, need for security, and conditioning.

Vedanta says that the body of the woman is her cage, just as the body of the man is the man's cage. Vedantic feminism would say, ‘Disown your physical self — you are much beyond that, girl.’ As long as you identify with the body, enjoy being called a girl or woman, there’s no freedom for you, and the same goes for the man. Saying, ‘I am the woman, I am the man’ is the real problem. Equality is a high ideal, but liberation is the purpose of life.

प्रेम तो होश की बात होती है, हम तुम्हें छुएँगे भी सिर्फ़ तब जब तुम अपने पूरे होशो-हवास में हो और प्रेम का क्षण है। नहीं तो इंसान कैसा है, जो किसी बेहोश इंसान को छू भी सकता है।

The building is raised on a weak foundation, and now you want to penalize everybody who comes and shakes it up even a little? You don't do this. Why did you allow this building to stand on such a weak foundation, and now you are trying to protect it through legislation? What kind of stupidity is this?

We don't really look at a woman as a human being, but rather as her physical identity. Even in murder, we fail to see the human being. The sexual lenses are always on. Sri Ramakrishna Paramhans, the great saint, used to say that the ordinary person is driven by two objectives — kanchan (money) and kamini (lucrative girl). Sex is not so much a need of the body, it's a need of the mind. Unless this thinking changes, we'll have to live through the pain of seeing more such incidents.

भारत में हर 15 मिनट में एक रेप हो रहा है। ये बस रजिस्टर्ड आँकड़े हैं, अनरजिस्टर्ड आँकड़ों का तो कोई हिसाब ही नहीं है। ये चीज़ तब तक नहीं हो सकती, जब तक इसको एक वाइडर सोशल सैंक्शन न मिला हो। हमारा कल्चर कहीं न कहीं रेप की तरफ़ परमिसिव है। इसकी जड़ बॉडी आइडेंटिफिकेशन में है। जब तक हमारा कल्चर कॉन्शियसनेस-सेंट्रिक नहीं होगा, तब तक बलात्कार होते रहेंगे। बात रेप की नहीं है, बात इस पूरी संस्कृति को ही बदलने की है।

दो चीज़ें होती हैं, जिसमें इंसान फँसता है। एक — बहुत बड़ा मकान, और दूसरा — लाखों-करोड़ों की शादी, जिसमें विलासिता का प्रदर्शन करना अनिवार्य है। इन दोनों के लिए बहुत पैसा चाहिए, जिसकी ख़ातिर आप ज़िंदगी भर ग़ुलामी करते हो। अध्यात्म इन मोटे खर्चों से बचने का नाम है। अगर ये मोटे खर्चे न हों, तो आप जितना कमाते हो, ज़िंदगी उससे आधे में भी चल जाए, क्योंकि वे खर्चे जो ज़िंदगी को बिल्कुल मस्त और आनंदमय बनाते हैं, वो बहुत बड़े नहीं होते।

एक बार में किसी को मार दो, तो दिखाई पड़ता है — ‘हत्या हो गई,’ पर धीरे-धीरे करके किसी को कुपोषण से मार दो, तो थोड़ी पता चलेगा। भारत में आधे से ज़्यादा महिलाएँ एनीमिया, आयरन डेफिशिएंसी से पीड़ित हैं। उनको ठीक से खाने को ही नहीं दे रहे। हिंसा लगातार हो रही है, लेकिन हम चौंकते सिर्फ़ तब हैं, जब बलात्कार या हत्या हो जाती है। ये सब प्रेम की कमी है और कुछ नहीं। हमें बुनियाद से ही कुछ चीज़ें बदलनी पड़ेंगी।

जाति मानसिक कल्पनाओं और अंधविश्वासों में होती है। आप जैसे ही समझने लग जाते हो कि जाति सिर्फ़ मन का खेल है, फिर जाति पीछे छूटती है। जाति को दो ही चीज़ें तोड़ सकती हैं — पशुता या चेतना। जो ऊँचा उठ गया, वो भी जाति का ख़्याल नहीं करता और जो एकदम गिर गया, वो भी जाति का ख़्याल नहीं करता। अध्यात्म कहता है, सबको इतना उठा दो कि सब एक बराबर हो जाएँ। अध्यात्म ही जाति-प्रथा को मिटा सकता है, और कुछ नहीं।

तीर्थ यात्रा के लिए हेलीकॉप्टर हैं और पूरे रोपवे बना दिए गए हैं, खच्चर-घोड़े पर अत्याचार करके वहाँ तक जाते हैं — ये पशुपति के प्रेम का प्रतीक है? तीर्थ वहाँ स्थापित किया गया था कि जा सकते हो अगर, तो पैरों पर चलकर जाओ। यह रेगुलेट होना चाहिए, चार-चार महीने की वेटिंग लगनी चाहिए ताकि जो सचमुच गंभीर हो, वही लोग जाएँ। पहाड़ के लोगों को सब्सिडीज़ दो, उनकी ज़िंदगी आर्थिक रूप से भी बेहतर हो जाएगी लेकिन पहाड़ क्यों बर्बाद कर रहे हो?

जीवन में कोई श्रीकृष्ण जैसा ही आ जाए, तो बिल्कुल करो शादी, पर ये कोई वजह नहीं है कि 'मैं निकला करती थी, मुझे लड़के छेड़ते थे, तो मैंने शादी कर ली।' यदि कोई छेड़छाड़ करे, तो विरोध करो, मार्शल आर्ट्स सीखो, इतनी मज़बूत बनो कि एक लगाओ अच्छे से। लेकिन इसके बावजूद भी कोई छेड़ के चला गया, तो उसे बहुत भाव मत देना, क्योंकि यह इतनी बड़ी बात नहीं कि इसकी वजह से ज़िन्दगी के निर्णय बदल दिए जाएँ।

It is our animal tendency to be territorial and to really want to control the other gender — so that we can maximize our own pleasure. When you own something, then there is a sense of security and that's why men want to control women's sexuality. You can dispel that by understanding that you can have no lasting pleasure by owning anything — including a person of the other gender.

हम सोचते हैं, आदमी कितना भी बुरा हो, अपने घर वालों के लिए तो अच्छा ही होता है — ऐसा नहीं होता। जो दुनिया के लिए बुरा है, वही घर पर फिर चाइल्ड मॉलेस्टेशन भी करता है। इसीलिए बच्चों का सबसे ज़्यादा शोषण परिवार के भीतर ही होता है। आज ऑनलाइन अब्यूज़, ऑनलाइन कचरा आपके घर की दीवारें बिल्कुल लाँघ करके आपके घर आ रहा है। सब के विरुद्ध एक ही सुरक्षा है — अध्यात्म। बच्चे ने अगर उपनिषदों सरीखे कुछ मूलभूत सवाल पूछने सीख लिए, तो फिर कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।