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बच्चे की परवरिश कैसे हो? || आचार्य प्रशांत (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, बच्चों की परवरिश कैसे करनी चाहिए? कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: पिछले दस साल से जब से बोलना शुरू किया, एकदम छोटे बच्चों से मेरा वास्ता कभी पड़ता नहीं था, यही दस-बारह-आठ के। अभी तीन-चार महीने से ये बच्चों वाले कैम्प (शिविर) शुरू हुए हैं। तो ये मेरे लिए भी एक ऐसी चीज़ थी जिसकी ओर मैंने अभी तक ध्यान ही नहीं दिया था। आबादी का जो ये तबक़ा होता है, बच्चे, इन पर ध्यान नहीं दिया था अभी तक। अब २०१७ में पहली बार इन पर ध्यान दे रहा हूँ।

और जब से इनपर ध्यान देना शुरू किया है तब से बाक़ी सब चीज़ें पीछे होती जा रही हैं। क्योंकि जितनी बीमारियाँ बड़ों को होती हैं जो तीस-चालीस या साठ-सत्तर की उम्र में जाकर के फूटती हैं उनकी जड़ें सब होती हैं बचपने में ही। सात-आठ साल की उम्र तक, दस की उम्र तक अधिक-से-अधिक पंद्रह-सोलह की उम्र तक बच्चे का जो होना होता है मानसिक रूप से, साइकोलॉजिकल रूप से, वो हो चुका होता है।

ये कैम्प में आते हैं बच्चे, उनको देखता हूँ तो थर्राने वाली हालत होती है। मुझे लगता है कि तीन दिन बहुत कम हैं कुछ कर पाने के लिए। अब तीन-चार कैम्प हो चुके हैं तो तीस-चालीस-पचास बच्चों से और उनके माँ-बाप से मिल चुका हूँ। अ हेल्थी चाइल्ड इज़ सो रेयर। (एक स्वस्थ बच्चा बहुत दुर्लभ है।) जबकि ये पूरा स्पेक्ट्रम है सात साल से लेकर सत्रह साल तक के जिनसे कैम्प में मिलते हैं। और इन सबका सत्यानाश करा है स्कूल ने और घर के माहौल ने।

ये जो स्कूल नाम की संस्था थी, आपने मुझे बोलते हुए सुना होगा, मैंने स्कूलों पर बहुत कम बोला है। ये जो स्कूल शब्द है वही मेरे रडार (प्रभाव क्षेत्र) से ग़ायब रहता था। अब पिछले कुछ महीनों से स्कूल शब्द बहुत आ गया है, मैं कुछ बोलता हूँ तो उसमें स्कूल शब्द अक्सर आ जाता है। बड़े गुनहगार हैं ये स्कूल वाले और ये ख़त्म किये दे रहे हैं, बिलकुल मिकी माउस बनाये दे रहे हैं इस जेनरेशन (पीढ़ी) को — रोबोटिक (यंत्रवत), इंसेंसिटीव (असंवेदनशील), डीपली कंडिशन्ड (गहराई से संस्कारित) और बहुत-बहुत भयभीत।

जैसे बच्चे, वैसे ही उनके माँ-बाप। मतलब स्कूल धर्म बन चुका है, स्कूल धर्म का स्थान ले चुका है। स्कूल जैसे बताएगा वैसे ही इनकी ज़िन्दगी चल रही है। ज़िन्दगी तो वैसे चलनी होती है न जो उचित है, जिसको हम कहते हैं धर्म, दैट व्हिच इज़ राइट (वह जो सही है)। ज़िन्दगी यहाँ ऐसी चल रही होती है बच्चों की और माँ-बाप की कि जैसे स्कूल ने बताया है।

जैसे खाना बनता है न, एक बार जब आपने कोई व्यंजन बनाया अगर वो ख़राब हो गया है तो अक्सर जो कुक (बावर्ची) होता है वो कोशिश करता है उसे किसी तरह से ठीक करने की — नमक तेज़ हो गया है तो आप उसमें नींबू मिलाते हो नमक कम करने के लिए।

आप समझ रहे हो?

कोई चीज़ जल गयी है या कुछ हो गया है तो आप उसमें पानी जोड़ करके फिर उसे ज़रा आँच दिखाकर कोशिश करते हो उसे ठीक करने की, या आप माइक्रोवेव के साथ कोई तरक़ीब लगाते हो, कुछ करते हो। लेकिन ये जो रिपेयर्ड खाना होता है इसमें कभी स्वाद में भी पहले वाली बात नहीं रह जाती, पता चल जाता है कि ये रिपेयर्ड खाना है और इसे ठोक-पीटकर किसी तरीक़े से बनाया गया है।

तुम्हारी जितनी भी कोशिशें हैं, ये जो पूरा मिशन है, मुझे ये दिखायी पड़ा है कि वो रिपेयरिंग (सुधारना) का मिशन है। क्योंकि आज जब हम डील (प्रयत्न) ही कर रहे है सेवेनटीन प्लस एज ग्रुप (सत्रह से अधिक आयु वर्ग) के साथ, तो ये तो वो लोग हैं जिनकी डैमेज (दुर्गति) पहले हो चुकी है, बाद में रिपेयर चलती है अलग-अलग तरीक़ों से — कहीं कैम्प जा रहे हैं, कहीं कुछ कर रहे हैं, तमाम तरीक़े की किताबें भी हैं। भाई, किताबें भी कौन पढ़ रहे हैं? किताबें भी तो जो एक प्रौढ़ वर्ग है वही पढ़ रहा है न? जो रीडर (पाठक) है वो कोई पच्चीस का है, कोई पचास का है, वही तो पढ़ रहा है।

द डैमेज इज़ आलरेडी बींग डन एंड इट इज़ वेरी इम्पोर्टेन्ट टु अरेस्ट द डैमेज बिफ़ोर इट हैपेन्स अदरवाइज़ इट इज़ जस्ट अ पैचअप जॉब। (नुक़सान पहले से ही किया जा रहा है और नुक़सान होने से पहले उसे रोकना बहुत महत्वपूर्ण है अन्यथा यह सिर्फ़ एक पैचअप कार्य है।) वही जैसे कपड़ा फट जाता है तो उसपर आपने पैच (कपड़े का टुकड़ा) लगा दिया। पैच कभी भी पूरा काम थोड़े ही करेगा।

डैमेज मत होने दीजिए; और इस एज में जो डैमेज होती है वो नहीं कवर (भरपाई) होती।

आप जिस कुर्सी पर बैठे हो न, यहाँ पर अब तक लगभग सौ लोग बैठ चुके होंगे और उनमें से आधों के साथ मुझे बस ये करना पड़ता है कि जो स्पॉइलट चाइल्डहुड (बर्बाद बचपन) रहती है, उसको रिकवर (सुधार) कराता हूँ। पीपल हैव सैट हियर एंड एक्टेड लाइक कॉमेडियंस। पीपल हैव सैट हियर एंड रेग्रेटेड द लॉस्ट चाइल्डहुड। (लोगों ने यहाँ बैठकर एक कॉमेडियन की तरह बर्ताव किया है, लोगों ने यहाँ बैठकर खोये हुए बचपन का अफ़सोस मनाया है।)

उन्हें पछतावा हुआ है कि मैं कभी खेला नहीं, कभी बच्चों की तरह चिल्लाया नहीं। किसी ने कहा कि मेरे ऊपर कम उम्र में ही ज़िम्मेदारी आ गयी, कमाने का दबाव आ गया था; किसी का कुछ, किसी का कुछ।

आप चालीस के हो जाओ, आप सत्तर के हो जाओ, अगर आपने बचपन नहीं जिया है तो आपके भीतर इतना बड़ा छेद रह जाता है और वो भरता नहीं है। वो नहीं भरता। आप कितनी किताबें पढ़ लो, आप कुछ कर लो। आप मैदान पर दौड़ना चाहते थे, आप घास पर लोटना चाहते थे। समझ रहे हो?

आप खुल्ले में नंगा होकर नहा लेना चाहते थे। ये सारी चीज़ें वही हैं जो आमतौर पर बच्चे या छोटे जानवर वगैरह करते हैं। आपको वो सब करने को नहीं मिला है और आप जब पाँच साल या दस साल के थे तभी आपके ऊपर वो दबाव आ गया है जो एक पच्चीस साल वाले के ऊपर ठीक रहता। क्षति इतनी गहरी है कि मनुष्य अपना पूरा जीवन लगा देता है सुधार करने में, पर सुधार होता ही नहीं, बिलकुल नहीं होता।

असल में सारी स्पिरिचुएलिटी (अध्यात्म) और कुछ है ही नहीं, ख़राब बचपन की वो हीलिंग (इलाज) है। मेरे लिए तो ये २०१७ का साल पूरा बच्चों के नाम हो गया। आइ एम बिकमिंग अ चाइल्ड-स्पेशलिस्ट। (मैं बच्चों का विशेषज्ञ बन गया हूँ।) मतलब कहाँ तो ये कि अध्यात्म की गहराइयाँ और उपनिषद्। अब समझ में आ रहा है कि उपनिषद् की भी ज़रूरत इसलिए है क्योंकि बचपन तबाह रहता है। बचपन तबाह न हो तो उपनिषद् की बहुत ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

स्कूलों के बाद नंबर दो कल्प्रिट (दोषी) हैं पेरेंट्स (अभिभावक)। स्कूल तो खैर जान-बूझकर बर्बाद करते हैं, स्वार्थवश। स्कूल बर्बाद करते हैं स्वार्थवश और माँ-बाप बर्बाद करते है अज्ञानवश। स्कूल का तो सीधा-सीधा प्रकट स्वार्थ है, उनको तो शोषण करना है, किसी भी तरीक़े से उगाहना है। वो तो ऐसे बर्बाद करते रहे हैं।

माँ-बाप इसलिए बर्बाद करते हैं क्योंकि उन्हें पता ही नहीं है। जैसा आप कहे रहे हैं कि वो ख़ुद ही विक्टिम (पीड़ित) हैं, तो उनके माध्यम से बच्चा भी विक्टिम बन जाता है। और फिर वो माँ-बाप रेज़िस्टेंस (विरोध) भी नहीं कर पाते स्कूल जो कुछ कर रहा है उसको।

स्कूल अपने तरीक़े चला देता है, ज़ोर आज़माइश कर लेता है। माँ-बाप उसका विरोध करना तो छोड़िए, उसमें सहभागी बन जाते हैं। ये जो पैरेंट-टीचर मीटिंग होती है, ये बच्चे के ख़िलाफ़ समझ लीजिए साज़िश का आयोजन हो जाती है, कि स्कूल वाले और घरवाले अब मिल गये हैं और योजना बनायी जा रही है कि अब कैसे बच्चे को दबा दिया जाए।

आइ विल गो टु द एक्सटेंट ऑफ़ सेइंग दैट इफ़ देयर इज़ वन ईविल इंस्टीट्यूशन, वन (मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि यदि कोई एक दुष्ट संस्था है, एक) — भाई, बहुत सारे हैं लेकिन उनमें से एक को चुनने के लिए कहा गया हो, कि उसमें से एक को ठीक करो तो दैट वुड बी द स्कूल, नॉट द कॉर्पोरेट, नॉट द फ़ैमिली, नॉट द यूनिवर्सिटीज़ ऑर द कॉलेज; नॉट इवन द गवर्नमेन्ट ऑर एनी इकोनॉमिकल ऑर पोलिटिकल सिस्टम। आइ वुड लाइक टु फ़र्स्टली करेक्ट द स्कूल। (वो स्कूल होगा, कॉर्पोरेट नहीं, परिवार नहीं, विश्वविद्यालय या कॉलेज नहीं; यहाँ तक ​​कि सरकारी या कोई आर्थिक या राजनीतिक व्यवस्था भी नहीं। मैं सबसे पहले स्कूल को ठीक करना चाहूँगा।) बाक़ी सारी चीज़ें हटाओ और स्कूल ठीक करो। ये पाप के अड्डे हैं, ये बर्बाद कर रहे हैं, सब ख़त्म कर रहे हैं। सब ख़त्म कर रहे हैं।

मेरे लिए दुख के दिन हो जाते हैं बच्चों के कैम्प के जो तीन दिन होते हैं। हर महीने जाना होता है, दुख के हो जाते हैं उनकी हालत जो देखता हूँ। द वर्ल्ड इज़ डेस्पेरेटेली इन नीड ऑफ़ सम वाइज़ पेरेंटिंग, डेस्पेरेटेली। नथिंग एल्स कैन सेव द वर्ल्ड। वर्ल्ड सीरियस्ली नीड्स सम मदर्स एंड फ़ादर्स हु आर बुद्धा-लाइक। (दुनिया को कुछ विवेकी अभिभावकों की सख़्त ज़रूरत है, इसके अलावा कोई भी दुनिया को नहीं बचा सकता। दुनिया को कुछ ऐसे माताओं और पिताओं की सख़्त ज़रूरत है जो बुद्ध जैसे हों।) और मैं कुछ नहीं हूँ। बहुत ख़त्म मामला है।

प्र: आचार्य जी, बचपना और अपरिपक्वता में क्या अंतर है?

आचार्य: देखिए, बचपना और इम्मेच्योरिटी (अपरिपक्वता) अलग-अलग बात होती हैं। इनोसेंस (निर्दोषता) और इम्मेच्योरिटी एक ही चीज़ नहीं हैं। होता क्या है, ये जब हम कहते हैं न कि अरे! बच्चे जैसी हरकत करो, तो हमारा इशारा ये नहीं होता कि इनोसेंट रहो। हमारा इशारा ये होता है कि यू शुड एक्ट इम्मेच्योर (तुम्हें अपरिपक्व व्यवहार करना चाहिए)।

तथ्य ये है कि इनोसेंस बहुत कुछ मेच्योरिटी जैसी होती है। तो जो वास्तव में इनोसेंट होगा, उसमें तो मेच्योरिटी होगी ही होगी। लेकिन हमारी नज़र कुछ ऐसी हो गयी है न। और ये बात भी हमें कैपिटलिज्म (पूँजीवाद) ने, कॉर्पोरेट कल्चर ने सिखायी है, ये जितने प्रोडक्शन (उत्पादन) के एजेंट्स (प्रतिनिधि) हैं न उन्होंने सिखायी है।

आप कोई बच्चों के एडवर्टीज़मेन्ट्स (विज्ञापन) देखिएगा टीवी पर, वो टारगेट (निशाना) ही उस बच्चे को कर रहे हैं जो इम्मेच्योर है। और चूँकि उनका उत्पाद तभी बिकेगा जब उसे खरीदने वाला इम्मेच्योर है, तो वे चाहेंगे ही क्या? कि ये इम्मेच्योर ही रहे। तो उन्होंने ये परिभाषा सेट कर दी है कि बच्चा होने का मतलब है बेवकूफ़ होना।

बच्चा होने का मतलब बेवकूफ़ होना नहीं होता। एक उम्र के बाद, छः-सात साल के बाद बच्चा क़रीब-क़रीब लिटिल एडल्ट (छोटा वयस्क) बन जाता है। या आप पीछे भी जाएँ तो हमारी अष्टावक्र गीता है, कहते हैं कि जब वो बोली गयी तो अष्टावक्र ग्यारह साल के थे। ग्यारह साल का बच्चा ही तो है न जो इतना कुछ बता गया। और आज का कोई ग्यारह साल का हो तो आप उससे उम्मीद करोगे कि वो बैठकर पॉपकॉर्न खा रहा है और कार्टून देख रहा है।

जानती हैं एक संभावना और भी होती है — दोस्तों का, समाज का, स्कूल का, परिवार का दबाव इतना बढ़ जाए कि बच्चा जानते-बूझते उल्लू बनने लगे। आप समझ रहे हो? अब पेशेंट आइसीयू चला गया है। एक तो ये है कि मुझे पता नहीं था कि इस चिप्स के पैकेट में क्या है तो मैंने अज्ञानतावश खरीद लिया। दूसरा ये है कि मुझे मालूम है कि जो वादा किया जा रहा है वो पूरा नहीं होगा। मैं जानता हूँ कि मुझे धोखा दिया जा रहा है, पर फिर भी मैं ख़ुद को धोखा मिलने दूँगा क्योंकि मेरे पास हिम्मत नहीं है इसका हिस्सा न बनने की।

प्र: आचार्य जी, बच्चों को इन सब प्रभावों से कैसे बचाया जाए?

आचार्य: कभी भी ग्रुप बिहेवियर (सामूहिक व्यवहार) के ऊपर या ट्रेंड को फॉलो (अनुसरण) करने के ऊपर घर में भी इंसेंटिव (प्रोत्साहन) मत रखिएगा। और ये संदेश बड़े सूक्ष्म होते हैं। ये सन्देश आप कभी स्पष्ट रूप से खुले में तो दोगे नहीं कि फॉलो द हार्ट (जो दिल चाहे वो करो)। ऐसे तो आप बोलोगे नहीं कि भीड़ के साथ ही चलना, रिमेन अ फोलोअर (अनुयायी बनकर रहना)। ऐसे तो आप बोलोगे नहीं।

ये सन्देश इन्डायरेक्टली आते हैं, नीचे-नीचे आते हैं, कोडेड (कूट) भाषा में आते हैं। और वो तभी नहीं जाएँगे जब जो लोग ये सन्देश दे रहे हैं — मैं आपको आख़िरी बात बता रहा हूँ — जब वो काफ़ी जाग्रत हों, नहीं तो जाने पक्के हैं। आप कोशिश करते रह जाओगे, आपको पता भी नहीं चलेगा आपने गलत सन्देश दे दिया।

उसके लिए तो आपको घर का माहौल ही बहुत सही रखना पड़ेगा। और जैसा मैंने कहा कि इनिशियल एज (आरंभिक आयु) में ही आपको उसकी आयु के अनुरूप जो आध्यात्मिक साहित्य है उससे उसका परिचय कराना पड़ेगा।

इफ़ ही इज़ एट ऑर टेन नाओ, देन इट्स हाइ टाइम दैट ही गेट्स इंट्रोड्यूस्ड टु द बेसिक्स (अगर वो आठ या दस साल का है तो ये उचित समय है कि उसका आधारभूत शिक्षाओं से परिचय कराया जाए), जैसे कबीर के हल्के दोहे हो गये या ईसोप की कहानियाँ हो गयीं। इनसे उसका जो आरंभिक परिचय है अब हो जाना चाहिए। नहीं हो रहा है तो नुक़सान हो जाएगा। क्योंकि यही डिफ़ेन्स (सुरक्षा) है। हर तरफ़ से उस पर तीर आ रहे हैं, रोज़ सौ लग रहे हैं।

और जानते हैं उन सौ में से एक-दो आपके भी हैं जो आपने अनजाने में चला दिये हैं। भई ठीक है, आप चाहते नहीं हैं, अनइनटेंशनली (अनजाने) हो जाता है न कई बार। बहुत कुछ आप बचाते होंगे लेकिन एक-दो जगह तो चूक होती ही होती है। बच्चे पर सौ तीर लग रहे हैं रोज़, इस वक़्त उसको कवच चाहिए, डिफ़ेन्स चाहिए। और स्पिरिचुएलिटी के अलावा कोई दूसरा डिफ़ेन्स होता नहीं।

ए माइंड दैट इज़ नॉट स्पिरिचुअल विल रिमेन वेरी-वेरी ससेप्टिबल टु कंडिशनिंग (एक मन जो आध्यात्मिक नहीं है वो संस्कारित भी आसानी से हो जाएगा)। कुछ भी आकर उसे कंडीशन कर जाएगा। और पता नहीं लगता न, ये तो चीज़ें ऐसी हैं कि जब फल निकलता है, जब ज़हर बन जाती हैं चीज़ें, तभी पता चलता है। यू हैव टु कीप इट रियली सेंटर्ड इन द हाउसहोल्ड (आपको घर का माहौल आतंरिक प्रगति के अनुकूल रखना होगा)।

एक चीज़ और बोलता हूँ — ये मेरी बात आपको थोड़ी सी रूढ़िवादी लग सकती है — जिन बातों को हम कहते हैं न कि पुरातन पंथी है, ये तो रिवाज़ों की बातें हैं, ऑर्थोडॉक्सी है, उन सब बातों को एक झटके में फेंक मत दीजिए, उनमें भी दम होता है। टोटल रिजेक्शन मत करिए। बच्चा आपके पाँव छूता है? ये आदत डाली है? सुबह उठकर पाँव छूता है? ये आदत डलवाइए।

प्र: आचार्य जी, लेकिन वो हमसे प्यार बहुत करता है।

आचार्य: ये प्यार रहता है लेकिन प्यार का मतलब यही नहीं होता कि गले मिल रहे हैं, चूम रहे हैं बच्चे को। इसमें भी प्रेम है कि बच्चा चरणस्पर्श कर रहा है। बच्चे को प्रेम का ये रूप भी बताइए।

देखिए, अगर आप किसी से प्रेम करते हैं और उस प्रेम का आपने ये मतलब निकाला है कि मैं इसके पाँव नहीं छूउँगा तो फिर ये आपका प्रेम बड़ा हिंसक प्रेम है। ये जो पाँव छूना है ये बहुत ज़रूरी चीज़ है। आप जानें तो सही न कि कोई इज़्ज़त के क़ाबिल है और उसको इज़्ज़त दें। इज़्ज़त देने का मतलब है अपने अहंकार का झुकना। तो पाँव न छूना बड़ी गलती की बात होती है।

इसी तरीक़े से, अब मालूम नहीं आप कितना कर पाएँगे, अगर घर में भजन का, आरती का माहौल रख सकें। इन चीज़ों को बहुत ऊँची प्राथमिकता देकर के, याद करके और पूरे अनुशासन के साथ करिए। जैसे आदमी और चीज़ों में कहता है न कि आज ये करना ही है, टु-डु लिस्ट में आप लिख लेते हो, वैसे ही इसको भी आप अपनी टु-डु लिस्ट का हिस्सा बना लीजिए। जैसे इतनी चीज़ों के लिए समय निकल जाता है, तो पंद्रह मिनट आप कीर्तन के लिए भी दीजिए और देखिएगा इसका बच्चे पर भी क्या असर पड़ता है।

प्र: आचार्य जी, वो भजन सुन लेता है लेकिन गाता नहीं है।

आचार्य: मुँह से निकलता है न, वो बात दूसरी होती है। जानती हैं उसमें क्या भाव रहता है? ऑनरशिप, बिलोंगिंग (मालकियत, सम्बन्धता); मेरे मुँह से निकला है न, मेरा है। आप किसी को सुन रहे हो तो ये तो ऐसा है कि जैसे मैच चल रहा है और आपने देख लिया। जब आप ख़ुद बोल रहे हो तो ऐसा है कि आप मैच में उतर गये। बहुत अंतर है। सुनने भर से नहीं होता, ख़ुद गाना होता है।

और मैं आपको ये नहीं कह रहा हूँ कि आप दुनियाभर के जो इधर-उधर के सूत्र हैं आप उनका पाठ करिए, आप उपनिषदों का पाठ करिए न। वो तो आप जानती हैं कि उनमें कहाँ पर गहराई है और क्या बात है, तो आप अपने हिसाब से उनको चुन लीजिए और पाठ करिए। लेकिन आप ये करिए ज़रूर।

इसको ऐसे मत देखिए कि बच्चे की ज़िन्दगी का सवाल है, सबकी ज़िन्दगी का सवाल है। एक ही बंदा नहीं घर में सही निकलेगा, फिर सबकी ज़िन्दगी और बेहतर हो जाएगी। बच्चे के साथ-साथ सबका कल्याण हो जाएगा। और अकेले तो किसी का होता भी नहीं है।

और मैं छोटी बातें बता रहा हूँ, जैसे खाने बैठता है बच्चा, आजकल के बच्चों में बहुत बड़ी समस्या है ग्रेटिट्यूड (अनुग्रह) की कमी क्योंकि सब चीज़ें आसानी से मिली हैं न। तो कम-से-कम ये सीखे वो कि खाने के सामने बैठा है तो पाँच सेकंड के लिए आँख बंद कर ले। चुपचाप बैठकर पाँच सेकंड के लिए ऐसे आँख बंद कर ले।

भाई, होना तो ये चाहिए कि खाने को भी ऐसे सिर झुकाओ। या तो वो कर लो, या वो भी नहीं कर सकते तो चुपचाप बैठ जाओ और पाँच सेकंड के लिए आँख बंद कर लो। याद तो आ जाएगा न कि कुछ महत्वपूर्ण होने जा रहा है। नहीं तो आप तो खाना खा रहे हो और टीवी देख रहे हो, ऐसा नहीं होना चाहिए।

इससे भी छोटी बात है जब आपने खाया है, जूठा रखा है, तो आपका काम है उसे किचन तक लेकर जाओ। और आपको पता होना चाहिए कि आप छोड़ नहीं सकते हो ज़्यादा। आपने अगर लिया है इतना बड़ा पोरशन (हिस्सा) तो आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप उसे ख़त्म करोगे; या लो मत। ये सब बहुत छोटी बातें हैं लेकिन चरित्र आदमी का इन्हीं से बनता है।

थोड़ा सा ट्रेडिशनल (पारम्परिक) ही रह लीजिए, बहुत कूल करने की ज़रूरत नहीं है। मेरा तो काम ही यही है, मैंने बहुत कूल लोगों का बड़ा अनकूल अंजाम देखा है। ये सब बहुत कूल-कूल रहते हैं और फिर बहुत ख़राब हालत होती है, फिर इधर-उधर भागे-भागे फिरते हैं। थोड़ा सा ट्रेडिशनल ही रहिए। सेंटर्ड बट अ बेंट टुवर्ड्स द ट्रेडिशनल साइड, दैट विल हेल्प। दैट विल रियली हेल्प (केंद्रित भी, पर थोड़ा सा परम्परा की तरफ़ झुका हुआ; उससे मदद होगी, काफ़ी मदद होगी)। सहारा तो अंत में उसी का है न, तो थोड़ा सा उसकी ओर अगर झुके हुए हैं तो अपने पर ही एहसान कर रहे हैं।

प्र: क्या पुराने रीति-रिवाज़ों को भी अपनाना चाहिए?

आचार्य: मैं रिलिजन फॉलो करने को नहीं बोल रहा हूँ। हम हार्डकोर स्पिरिचुएलिटी (कट्टर अध्यात्म) की बात कर रहे हैं, हम सरेंडर (समर्पण) की बात कर रहे हैं, हम अंडरस्टैंडिंग (समझ) की बात कर रहे हैं। हम रीति-रिवाज़, कर्मकाण्ड, इनकी नहीं बात कर रहे हैं। मैं नहीं कह रहा हूँ कि स्वास्तिक का निशान बनाइए और ये सब करिए। इस सब से क्या लेना-देना!

पर पता चला कि रीती-रिवाज़ हटाने के नाम पर गीता हटा दी, कृष्ण हटा दिये, अष्टावक्र हटा दिये तो बहुत बड़ा नुक़सान हो गया। वो ऐसा ही है कि जैसे कचरे के ढेर में हीरा पड़ा था तो कचरे के साथ-साथ हीरा भी फेंक दिया। ये नहीं कर सकते न हम।

मैं किसी को दोष देता ही नहीं अगर कोई ये कहता है न कि मुझे स्पिरिचुएलिटी पसंद नहीं है। मैं कहता हूँ कि यू आर नॉर्मल (तुम सामान्य हो)। होता भी यही है, देखिए।

आप मंदिरों वगैरह में जाइए या ये जो बड़े-बड़े सतसंग होते हैं जिनमें हज़ारों की भीड़ होती है, आप वहाँ पर एक आइक्यू टेस्ट दे दीजिए, और उस पूरी भीड़ का जो आइक्यू आएगा वो एवरेज (औसत) से बीस प्रतिशत कम होगा। जितने बेवकूफ़ होते हैं वही तो इन जगहों पर जाते हैं। तो ज़ाहिर सी बात है कि जिस आदमी में ज़रा भी अक्ल होगी वो दूर हो जाएगा इससे। और ठीक ही है।

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