आप चालीस के हो जाओ, आप सत्तर के हो जाओ, अगर आपने बचपन नहीं जिया है, तो आपके भीतर इतना बड़ा छेद रह जाता है और वो भरता नहीं है। एक स्वस्थ बच्चा बहुत दुर्लभ है। स्कूल अपने तरीक़े चला देता है और माँ-बाप उसमें सहभागी बन जाते हैं। इस पीढ़ी को मिकी माउस बनाए दे रहे हैं, रोबोटिक, असंवेदनशील और बहुत-बहुत भयभीत। बच्चे पर रोज़ सौ तीर लग रहे हैं; इस वक़्त उसको सुरक्षा चाहिए, और अध्यात्म के अलावा कोई दूसरा कवच नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, बच्चों की परवरिश कैसे करनी चाहिए? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: पिछले दस साल से जब से बोलना शुरू किया है, एकदम छोटे बच्चों से मेरा वास्ता कभी पड़ता नहीं था, दस की उम्र के आस-पास के, दस-बारह-आठ। अभी तीन महीने से ये बच्चों वाले कैम्प शुरू हुए हैं, तीन-चार महीने से। तो ये मेरे लिए भी एक ऐसी चीज़ थी जिसकी ओर मैंने अभी तक ध्यान ही नहीं दिया था। आबादी का जो ये तबक़ा होता है, बच्चे, इन पर ध्यान नहीं दिया था अभी तक। अब 2017 में पहली बार इन पर ध्यान दे रहा हूँ।
और जब से इन पर ध्यान देना शुरू किया है बाक़ी सारी सब चीज़ें जो हैं वो पीछे होती जा रही हैं। क्योंकि जितनी बीमारियाँ बड़ों को होती हैं, जो तीस-चालीस या साठ-सत्तर की उम्र में जाकर के फूटती हैं, उनकी जड़ें सब होती हैं बचपने में ही। सात-आठ साल की उम्र तक, दस साल की उम्र तक, अधिक-से-अधिक पंद्रह-सोलह की उम्र तक बच्चे का जो होना होता है मानसिक रूप से, साइकोलॉजिकल रूप से, वो हो चुका होता है।
ये कैम्प में आते हैं बच्चे, उनको देखता हूँ तो थर्राने वाली हालत होती है। मुझे लगता है कि तीन दिन बहुत कम हैं कुछ कर पाने के लिए। अब तीन-चार




