बच्चे की परवरिश कैसे हो?

Acharya Prashant

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बच्चे की परवरिश कैसे हो?
आप चालीस के हो जाओ, आप सत्तर के हो जाओ, अगर आपने बचपन नहीं जिया है, तो आपके भीतर इतना बड़ा छेद रह जाता है और वो भरता नहीं है। एक स्वस्थ बच्चा बहुत दुर्लभ है। स्कूल अपने तरीक़े चला देता है और माँ-बाप उसमें सहभागी बन जाते हैं। इस पीढ़ी को मिकी माउस बनाए दे रहे हैं, रोबोटिक, असंवेदनशील और बहुत-बहुत भयभीत। बच्चे पर रोज़ सौ तीर लग रहे हैं; इस वक़्त उसको सुरक्षा चाहिए, और अध्यात्म के अलावा कोई दूसरा कवच नहीं है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, बच्चों की परवरिश कैसे करनी चाहिए? कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: पिछले दस साल से जब से बोलना शुरू किया है, एकदम छोटे बच्चों से मेरा वास्ता कभी पड़ता नहीं था, दस की उम्र के आस-पास के, दस-बारह-आठ। अभी तीन महीने से ये बच्चों वाले कैम्प शुरू हुए हैं, तीन-चार महीने से। तो ये मेरे लिए भी एक ऐसी चीज़ थी जिसकी ओर मैंने अभी तक ध्यान ही नहीं दिया था। आबादी का जो ये तबक़ा होता है, बच्चे, इन पर ध्यान नहीं दिया था अभी तक। अब 2017 में पहली बार इन पर ध्यान दे रहा हूँ।

और जब से इन पर ध्यान देना शुरू किया है बाक़ी सारी सब चीज़ें जो हैं वो पीछे होती जा रही हैं। क्योंकि जितनी बीमारियाँ बड़ों को होती हैं, जो तीस-चालीस या साठ-सत्तर की उम्र में जाकर के फूटती हैं, उनकी जड़ें सब होती हैं बचपने में ही। सात-आठ साल की उम्र तक, दस साल की उम्र तक, अधिक-से-अधिक पंद्रह-सोलह की उम्र तक बच्चे का जो होना होता है मानसिक रूप से, साइकोलॉजिकल रूप से, वो हो चुका होता है।

ये कैम्प में आते हैं बच्चे, उनको देखता हूँ तो थर्राने वाली हालत होती है। मुझे लगता है कि तीन दिन बहुत कम हैं कुछ कर पाने के लिए। अब तीन-चार कैम्प हो चुके हैं तो तीस-चालीस-पचास बच्चों से, उनके माँ-बाप से मिल चुका हूँ मैं। ए हेल्दी चाइल्ड इज़ सो रेयर। जबकि ये पूरा स्पेक्ट्रम है, सात साल से लेकर सत्रह साल तक का जिनसे कैम्प में मिलते हैं। और इन सबका सत्यानाश किया है स्कूल ने और घर के माहौल ने।

ये जो स्कूल नाम की संस्था थी, आपने ही मुझे बोलते सुना होगा, मैंने स्कूलों पर बहुत कम बोला है। स्कूल जो शब्द है, वही मेरे रडार से ग़ायब रहता था। अब पिछले कुछ महीनों से स्कूल शब्द बहुत आ गया है, मैं कुछ बोलता हूँ तो उसमें स्कूल अक्सर आ जाता है। बड़े गुनहगार हैं ये स्कूल वाले और ये ख़त्म किए दे रहे हैं, बिल्कुल मिकी-माउस बनाए दे रहे हैं जेनरेशन को: *रोबोटिक, इंसेंसिटिव (असंवेदनशील), डीपली कंडिशन्ड,* और बहुत-बहुत भयभीत।

जैसे बच्चे, वैसे ही उनके माँ-बाप। मतलब स्कूल-धर्म बन चुका है; स्कूल धर्म का स्थान ले चुका है। स्कूल जो बताएगा, ज़िंदगी वैसी चलानी है। ज़िंदगी तो वैसे चलनी होती है न जो उचित है, जिसको हम कहते हैं धर्म; दैट विच इज़ राइट। ज़िंदगी यहाँ ऐसी चल रही होती है बच्चों की और माँ-बाप की कि जैसा स्कूल ने बताया है।

जैसे खाना बनता है न, एक बार आपने कोई व्यंजन बनाया, अगर वो ख़राब हो गया है तो अक्सर जो कुक होता है वो कोशिश करता है उसे किसी तरह से ठीक करने की; नमक तेज़ हो गया है तो आप उसमें नींबू मिलाते हो। आप समझ रहे हो? कोई चीज़ ज़रा जल गई है या कुछ हो गया है तो आप कहते हो, इसमें से ज़रा सा पानी जोड़ करके या कुछ करके इसको ज़रा फिर से आँच दिखा दो। आप कुछ कोशिश करते हो; या आप माइक्रोवेव के साथ कोई तरकीब लगाते हो, कुछ करते हो। लेकिन ये जो रिपेयर्ड खाना होता है, इसमें कभी और स्वाद भी, पहले वाली बात नहीं रहती है। ये रिपेयर्ड है, ये पता चल जाता है कि इसके साथ अब ठोक-पीटकर किसी तरीके से।

तुम्हारी जितनी भी कोशिशें हैं, जो पूरा मिशन है, मुझे ये दिखाई पड़ा है कि वो रिपेयरिंग का मिशन है। क्योंकि आज जब हम डील ही कर रहे हैं सेवेनटीन-प्लस एज ग्रुप के साथ, तो ये तो वो लोग हैं जिनकी डैमेज पहले हो चुकी है, बाद में रिपेयर चलती है अलग-अलग तरीकों से; कहीं कैम्प जा रहे हैं, कहीं कुछ कर रहे हैं; तमाम तरीके की किताबें भी हैं। भाई, किताबें भी कौन पढ़ रहे हैं? किताबें भी तो जो एक प्रौढ़ वर्ग है वही पढ़ रहा है न? जो रीडर है, वो कोई पच्चीस का है, कोई पचास का है, वही तो पढ़ रहा है।

द डैमेज इज़ ऑल्रेडी बीइंग डन एंड इट इज़ वेरी इम्पॉर्टेंट टू अरेस्ट द डैमेज बिफोर इट हैपन्स; अदरवाइज़ इट इज़ जस्ट अ पैच-अप जॉब। कि भाई जैसे कपड़ा फट जाता है तो उस पर आपने पैच लगा दिया; पैच कभी भी पूरा काम थोड़े ही करेगा।

डैमेज मत होने दीजिए; और इस एज में जो डैमेज होती है वो नहीं कवर होती।

आप जिस कुर्सी पर बैठे हो न, यहाँ पर अब तक लगभग सौ लोग बैठ चुके होंगे और उनमें से आधों के साथ मुझे बस ये करना पड़ता है कि जो स्पॉइल्ट चाइल्डहुड रहती है, उसको रिकवर कराता हूँ। पीपल हैव सैट हियर एंड एक्टेड लाइक कॉमेडियन्स। पीपल हैव सैट हियर एंड रेग्रेटेड द लॉस्ट चाइल्डहुड। दे हैव रिग्रेटेड कि मैंने कभी खेला नहीं, बच्चों की तरह चिल्लाया नहीं। किसी ने कहा है कि मेरे ऊपर कम उम्र में ही कमाने का दबाव आ गया था; किसी का कुछ, किसी का कुछ।

आप चालीस के हो जाओ, आप सत्तर के हो जाओ, अगर आपने बचपन नहीं जिया है तो आपके भीतर इतना बड़ा छेद रह जाता है और वो भरता नहीं है। वो नहीं भरता। आप कितनी किताबें पढ़ लो, आप कुछ कर लो। आप मैदान पर दौड़ना चाहते थे, आप घास पर लोटना चाहते थे। समझ रहे हो?

आप खुले में नंगा होकर नहा लेना चाहते थे। ये सारी चीज़ें वही हैं जो आमतौर पर बच्चे या छोटे जानवर वग़ैरह करते हैं। आपको वो सब करने को नहीं मिला है और आप जब पाँच साल या दस साल के थे तभी आपके ऊपर वो दबाव आ गया है जो एक पच्चीस साल वाले के ऊपर ठीक रहता। द डैमेज इज़ सो डीप, सो डीप दैट मैन स्पेंड्स एन्टायर लाइफ़ जस्ट ट्राइंग टू रेक्टिफ़ाइ, ऐंड द रेक्टिफ़िकेशन डज़न्ट हैपन।

असल में सारी स्पिरिचुएलिटी और कुछ है ही नहीं, ख़राब बचपन की वो हीलिंग है। कि मेरे लिए तो ये 2017 हैज़ बीन द ईयर ऑफ़ द चाइल्ड। आइ ऐम बिकमिंग अ चाइल्ड-स्पेशलिस्ट। मतलब कहाँ तो ये कि अध्यात्म की गहराइयाँ और उपनिषद्।

अब समझ में आ रहा है कि उपनिषद् की भी ज़रूरत इसलिए है क्योंकि बचपन तबाह रहता है। बचपन तबाह न हो तो उपनिषद् की बहुत ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

स्कूलों के बाद नंबर दो कल्प्रिट हैं पेरेंट्स। स्कूल तो ख़ैर जान-बूझकर बर्बाद करते हैं, स्वार्थवश। स्कूल बर्बाद करते हैं स्वार्थवश और माँ-बाप बर्बाद करते हैं अज्ञानवश। स्कूल का तो सीधा-सीधा प्रकट स्वार्थ है, उनको तो शोषण करना है, किसी भी तरीके से उगाहना है। तो वो तो ऐसे बर्बाद करते रहे हैं। माँ-बाप इसलिए बर्बाद करते हैं क्योंकि उन्हें पता ही नहीं है। जैसा आप कह रहे हैं कि ख़ुद ही विक्टिम हैं, तो उनके माध्यम से बच्चा भी विक्टिम बन जाता है। और वो फिर माँ-बाप रेज़िस्टेंस भी नहीं कर पाते स्कूल जो कुछ कर रहा होता है उसको।

स्कूल अपने तरीके चला देता है, ज़ोर-आज़माइश कर लेता है। माँ-बाप उसका विरोध करना तो छोड़िए, उसमें सहभागी बन जाते हैं। ये जो पैरेंट-टीचर मीटिंग होती हैं, ये बच्चे के ख़िलाफ़ समझ लीजिए साज़िश का आयोजन होती हैं, कि स्कूल वाले और घरवाले अब मिल गए हैं और योजना बनाई जा रही है कि बच्चे को कैसे अब बिल्कुल दबा दिया जाए।

आइ विल गो टू द एक्सटेंट ऑफ़ सेइंग दैट इफ़ देयर इज़ वन ईविल इंस्टीट्यूशन टुडे, वन; बहुत सारे हों उसमें एक चुनने को कहा जाए, कि इस एक को ठीक करो, दैट वुड बी द स्कूल, नॉट द कॉर्पोरेट, नॉट द फ़ैमिली, नॉट द यूनिवर्सिटीज़ ऑर द कॉलेज; नॉट इवन द गवर्नमेंट ऑर एनी इकोनॉमिकल ऑर पॉलिटिकल सिस्टम। आइ वुड लाइक टू फ़र्स्टली करेक्ट द स्कूल। बाक़ी सारी चीज़ें हटाओ स्कूल ठीक करो। ये मतलब पाप के अड्डे हैं, ये बर्बाद कर रहे हैं, सब ख़त्म कर रहे हैं।

मेरे लिए दुख के हो जाते हैं, बच्चों के कैम्प के जो तीन दिन होते हैं। हर महीने जाना होता है, दुख के हो जाते हैं उनकी हालत जो देखता हूँ। द वर्ल्ड इज़ डेस्परेटली इन नीड ऑफ़ सम वाइज़ पेरेंटिंग, डेस्परेटली। नथिंग एल्स कैन सेव द वर्ल्ड। वर्ल्ड सीरियसली नीड्स सम मदर्स एंड फ़ादर्स हू आर बुद्धा-लाइक। वरना कुछ नहीं है, बहुत ख़त्म मामला है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपने और अपरिपक्वता में क्या अंतर है?

आचार्य प्रशांत: देखिए, बचपना और इम्मैच्योरिटी अलग-अलग बात होती हैं। इनोसेंस एंड इम्मैच्योरिटी आर नॉट द सेम थिंग। होता क्या है, ये जब हम कहते हैं न कि अरे! बच्चे जैसी हरकत करो, तो हमारा इशारा ये नहीं होता कि इनोसेंट रहो। हमारा इशारा ये होता है कि यू शुड ऐक्ट इम्मैच्योर।

फैक्ट ये है कि इनोसेंस बहुत कुछ मैच्योरिटी जैसी होती है। तो जो वास्तव में इनोसेंट होगा, उसमें तो मैच्योरिटी होगी ही होगी। लेकिन हमारी नज़र कुछ ऐसी हो गई है न। और ये बात भी हमें कैपिटलिज़्म, कॉर्पोरेट कल्चर ने सिखाई है, जितने प्रोडक्शन के एजेंट्स हैं न उन्होंने सिखाई है।

आप कोई बच्चों के ज़एडवर्टिज़मेंट्स* देखिएगा टीवी पर, वो टारगेट ही उस बच्चे को कर रहे हैं जो इम्मैच्योर है। और चूँकि उनका उत्पाद तभी बिकेगा जब उसे ख़रीदने वाला इम्मैच्योर है, तो वे चाहेंगे ही क्या? कि ये इम्मैच्योर ही रहे। तो उन्होंने ये परिभाषा सेट कर दी है कि बच्चा होने का मतलब है बेवकूफ़ होना।

बच्चा होने का मतलब बेवकूफ़ होना नहीं होता। एक उम्र के बाद, छह-सात साल के बाद बच्चा क़रीब-क़रीब एक लिटल एडल्ट हो जाता है। या पीछे भी जाएँ तो हमारे अष्टावक्र गीता है, कहते हैं जब वो बोली गई तो अष्टावक्र ग्यारह साल के थे। ग्यारह साल का बच्चा ही तो है न जो इतना कुछ बता गया। और आज का कोई ग्यारह साल का हो तो आप उससे उम्मीद करोगे कि वो बैठकर पॉपकॉर्न खा रहा है और कार्टून देख रहा है।

जानती हैं, एक संभावना और भी होती है; दोस्तों का, समाज का, स्कूल का, परिवार का दबाव इतना बढ़ जाए कि बच्चा जानते-बूझते उल्लू बनने लगे। आप समझ रहे हो? अब पेशेंट आईसीयू चला गया है। एक तो ये है कि मुझे पता नहीं था कि इस चिप्स के पैकेट में क्या है तो मैंने अज्ञानतावश ख़रीद लिया। दूसरा ये है कि मुझे मालूम है, कि जो वादा किया जा रहा है वो पूरा नहीं होगा, लेकिन आइ नो दैट आइ ऐम बीइंग चीटेड, येट आइ ऐम लेटिंग माइसेल्फ़ बी वल्नरेबल टू चीटिंग बिकॉज़ आइ डोन्ट हैव द गट्स टू नॉट टू बी अ पार्ट ऑफ़ इट।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बच्चों को इन सब प्रभावों से कैसे बचाया जाए?

आचार्य प्रशांत: कभी भी ग्रुप बिहेवियर के ऊपर या ट्रेंड को फॉलो करने के ऊपर घर में भी इंसेंटिव मत रखिएगा। और ये देखिए मेसेजेज़ न बड़े सटल होते हैं। ये मेसेजेज़ आप कभी ऑब्वियस्ली खुले में तो दोगे नहीं, कि “फॉलो द हर्ड,” ऐसे तो आप बोलोगे नहीं कि “भीड़ के साथ ही चलना, रिमेन अ फ़ॉलोअर।” ऐसे तो आप बोलोगे नहीं। ये मेसेजेज़ इंडायरेक्टली आते हैं, नीचे-नीचे आते हैं, कोडेड भाषा में आते हैं। और वो तभी नहीं जाएँगे जब जो लोग ये मेसेजेज़ दे रहे हैं, मैं आपको फ़ाइनल बात बता रहा हूँ, जब वो काफ़ी सेंटर्ड हों, नहीं तो जाने पक्के हैं। आप कोशिश करते रह जाओगे, आपको पता भी नहीं चलेगा कि आपने गलत संदेश दे दिया।

उसके लिए तो घर का माहौल ही आपको बहुत सही रखना पड़ेगा। और जैसा मैंने कहा कि इनिशियल एज में ही उसको आप उसकी एज के अनुरूप जो आध्यात्मिक साहित्य है, उससे आपको उसको इंट्रोड्यूज़ कराना पड़ेगा।

इफ़ ही इज़ एट ऑर टेन नाउ, देन इट्स हाई टाइम दैट ही गेट्स इंट्रोड्यूस्ड टू द बेसिक्स। जैसे कबीर के हल्के दोहे हो गए या ईसोप की कहानियाँ हो गईं। इनसे उसका जो आरंभिक परिचय है, अब हो जाना चाहिए। नहीं हो रहा है तो नुक़सान हो जाएगा। क्योंकि यही डिफ़ेन्स है, हर तरफ़ से उस पर तीर आ रहे हैं, रोज़ सौ लग रहे हैं।

जानते हैं सौ में से एक-दो आपके भी हैं जो आपने अनजाने में चला दिए हैं। भई ठीक है, आप चाहते नहीं हैं, अनइंटेंशनली हो जाता है न कई बार। बहुत कुछ आप बचाते होंगे लेकिन एक-दो जगह तो चूक होती ही होती है।

बच्चे पर सौ तीर लग रहे हैं रोज़, इस वक़्त उसको कवच चाहिए, डिफ़ेन्स चाहिए। और स्पिरिचुएलिटी के अलावा मन का कोई डिफ़ेन्स होता नहीं है।

ए माइंड दैट इज़ नॉट स्पिरिचुअल विल रिमेन वेरी-वेरी ससेप्टिबल टु कंडिशनिंग। कुछ भी आकर उसे कंडीशन कर जाएगा। और पता नहीं लगता न, ये चीज़ें तो ऐसी हैं कि जब फल निकलता है, ज़हर बन जाती हैं चीज़ें, तो ही पता चलती हैं। यू हैव टु कीप इट रियली सेंटर्ड इन द हाउसहोल्ड।

एक चीज़ और बोलता हूँ, ये मेरी बात आपको थोड़ी सी रूढ़िवादी लग सकती है; जिन बातों को हम कहते हैं न कि पुरातन पंथी हैं, ये तो रिवाज़ों की बातें हैं, ऑर्थोडॉक्सी है, उन सब बातों को एक झटके में फेंक मत दीजिए, उनमें भी दम होता है। टोटल रिजेक्शन मत करिए। बच्चा आपके पाँव छूता है? ये आदत डाली है? सुबह उठता है पाँव छूता है? ये डलवाइए।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, लेकिन वो हमसे प्यार बहुत करता है।

आचार्य प्रशांत: ठीक है प्यार रहता है लेकिन प्यार का मतलब यही नहीं होता कि गले मिल रहे हैं, hugging हो रही है और चूम रहे हैं बच्चे को। इसमें भी प्रेम है कि बच्चा चरणस्पर्श कर रहा है। बच्चे को प्रेम का ये रूप भी बताइए।

देखिए, अगर आप किसी से प्रेम करते हैं और उस प्रेम का आपने ये मतलब निकाला है कि मैं इसके पाँव नहीं छूऊँगा तो फिर ये आपका प्रेम बड़ा हिंसक प्रेम है। ये जो पाँव छूना है ये बहुत ज़रूरी चीज़ है। आप जानें तो सही न कि कोई इज़्ज़त के क़ाबिल है और उसको इज़्ज़त दें। इज़्ज़त देने का मतलब होता है अपने अहंकार का झुकना। तो पाँव न छूना बड़ी गलती की बात होती है, बहुत गलती की बात है वो।

इसी तरीके से, अब मालूम नहीं आप कितना कर पाएँगे, अगर घर में भजन का, आरती का माहौल रख सकें। इन चीज़ों को बहुत ऊँची प्राथमिकता देकर के, याद करके और पूरे डिसिप्लिन के साथ करिए। जैसे आदमी और चीज़ों में कहता है न कि आज ये करना ही है, टु-डु लिस्ट में आप लिख लेते हो, वैसे ही इसको भी आप अपनी टु-डु लिस्ट का हिस्सा बना लीजिए। जैसे इतनी चीज़ों के लिए समय निकल जाता है, तो पंद्रह मिनट एक कीर्तन के लिए भी समय, और देखिएगा इसका बच्चे पर भी क्या असर पड़ता है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वो भजन सुन लेता है लेकिन गाता नहीं है।

आचार्य प्रशांत: मुँह से निकलता है न, वो बात दूसरी होती है। उसमें जानती हैं क्या भाव रहता है? ऑनरशिप, बिलोंगिंग; मेरे मुँह से निकला है न, मेरा है। आप किसी को सुन रहे हो तो ये तो ऐसा है कि जैसे मैच चल रहा है और आपने देख लिया। और जब आप ख़ुद बोल रहे हो तो ऐसा है कि आप मैच में उतर गए। बहुत अंतर है। सुनने भर से नहीं होता, ख़ुद गाना होता है।

और आपको मैं नहीं कह रहा हूँ कि आप दुनियाभर के इधर-उधर के जो संस्कृत में सूत्र हैं आप उनका पाठ करिए, आप उपनिषदों के सूत्रों का पाठ करिए न। वो तो आप जानती हैं कि उनमें कहाँ पर गहराई है और क्या बात है, तो आप अपने हिसाब से उनको चुन लीजिए और उनका पाठ करिए। पर ये करिए ज़रूर।

इसको ऐसे ही मत देखिए कि बच्चे की ज़िंदगी का सवाल है, सबकी ज़िंदगी का सवाल है। एक ही बंदा नहीं घर में सही निकलेगा, फिर सबकी ज़िंदगी और बेहतर हो जाएगी। बच्चे के साथ-साथ सबका कल्याण हो जाएगा, और अकेले तो किसी का होता भी नहीं है।

और मैं छोटी बातें बता रहा हूँ, जैसे खाने बैठता है बच्चा, आजकल के बच्चों में बहुत बड़ी समस्या है ग्रेटिट्यूड की कमी, क्योंकि सब चीज़ें आसानी से मिली हैं न। तो कम-से-कम ये सीखे वो कि खाने के सामने बैठा है तो पाँच सेकंड के लिए आँख बंद कर ले। चुपचाप बैठकर पाँच सेकंड के लिए ऐसे आँख बंद कर ले। भाई, होना तो ये चाहिए कि खाने को भी ऐसे सिर झुकाओ। या तो वही कर लो, वो भी नहीं कर सकते तो चुपचाप बैठ जाओ और पाँच सेकंड के लिए आँख बंद कर लो। याद तो आ जाएगा न कि कुछ महत्त्वपूर्ण होने जा रहा है। नहीं तो आप तो यूँ उठाते हो और टीवी देख रहे हो, ऐसा नहीं होना चाहिए।

इससे तरह से छोटी बात है, अब खाया है तो जूठा रखा है, तो आपका काम है उसको किचन तक लेकर जाओ। और आपको ये पता होना चाहिए कि आप छोड़ नहीं सकते हो ज़्यादा। आपने अगर लिया है इतना बड़ा पोरशन तो आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप उसे ख़त्म करोगे; या लो मत। ये सब बहुत छोटी बातें हैं लेकिन मैं कह रहा हूँ चरित्र आदमी का इन्हीं से बनता है।

थोड़ा सा ट्रेडिशनल ही रह लीजिए, बहुत कूल करने की ज़रूरत नहीं है। मेरा तो काम ही यही है, मैंने बहुत कूल लोगों का बड़ा अनकूल अंजाम देखा है। ये सब कूल-कूल रहते हैं और फिर बहुत ख़राब हालत होती है, फिर इधर-उधर भागे-भागे फिरते हैं। थोड़ा सा ट्रेडिशनल रहिए। सेंटर्ड बट अ बेंट टुवर्ड्स द ट्रेडिशनल साइड, दैट विल हेल्प। दैट विल रियली हेल्प। सहारा तो अंत में उसी का है न, तो थोड़ा सा उसकी ओर अगर झुके हुए हैं तो अपने पर ही एहसान कर रहे हैं।

प्रश्नकर्ता: क्या पुराने रीति-रिवाज़ों को भी वापस अपनाना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: मैं रिलिजन फॉलो करने को नहीं बोल रहा हूँ। हम हार्डकोर स्पिरिचुएलिटी की बात कर रहे हैं, हम सरेंडर की बात कर रहे हैं, हम अंडरस्टैंडिंग की बात कर रहे हैं। हम रीति-रिवाज़, कर्मकाण्ड, इनकी नहीं बात कर रहे हैं। मैं नहीं कह रहा हूँ कि स्वास्तिक का निशान बनाइए और ये सब करिए। उस सब से क्या लेना-देना!

पर पता चला कि रीती-रिवाज़ हटाने के नाम पर गीता हटा दी, श्रीकृष्ण हटा दिए, अष्टावक्र हटा दिए, तो बहुत बड़ा नुक़सान हो गया। वो ऐसा ही है कि जैसे कचरे के ढेर में हीरा पड़ा था तो कचरे के साथ-साथ हीरा भी फेंक दिया। ये नहीं कर सकते न हम।

मैं किसी को दोष देता ही नहीं अगर कोई ये कहता है न कि मुझे स्पिरिचुएलिटी पसंद नहीं है। मैं कहता हूँ कि यू आर नॉर्मल। होता भी यही है, देखिए। आप मंदिरों वग़ैरह में जाइए या ये जो बड़े-बड़े सतसंग होते हैं जिनमें हज़ारों की भीड़ बैठती है, आप वहाँ पर न एक आइक्यू टेस्ट दे दीजिए, और उस पूरी भीड़ का जो आइक्यू आएगा वो एवरेज से बीस परसेंट नीचे होगा। जितने बेवकूफ़ होते हैं वही तो इन जगहों पर जाते हैं। तो ज़ाहिर सी बात है कि जिस आदमी में ज़रा भी अक्ल होगी वो दूर हो जाएगा इससे। और ठीक ही है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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