
प्रश्नकर्ता १: आचार्य जी, प्रणाम। आज गुरु पूर्णिमा का पावन अवसर है। आपसे आज तक मिला तो नहीं हूंँ, लेकिन आपके वीडियोस व्याख्यान ही मेरे लिए गुरु समान हैं। सबसे पहले धन्यवाद!
श्री गुरुगीता में आया है —
"शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन। लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यग्गुरुमेव समाश्रयेत्।।"
यदि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अनहद में नाचते समय जो ऊर्जा थी वह ऊर्जा हमेशा नाचने में क्यों नहीं होती?

Is peace something we can sit our way into? We try: eyes closed, body motionless, hoping for a glimpse of something higher. But the body is never still, the brain hums on, and the only perfectly still body is a lifeless one. Real stillness, then, may have little to do with posture. It may mean standing firm in what matters most, with no alternative and no substitute. Where in our lives are we truly still, and where do we keep shifting?















प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा नाम परितोष त्रिपाठी है और मैं भी बनारस से ही आया हूँ।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो रुद्राक्ष होता है उसके बारे में जैसे बचपन में मैंने भी सुना था, घर में कहते थे कि रुद्राक्ष को मंदिर में रखते हैं तो उससे जीवन में एक सकारात्मकता आती है।

आचार्य प्रशांत: तुलसीदास उल्लेख करते हैं एक स्थान पर, वहीं से प्रश्नकर्ता ने ये सवाल रखा है: उल्लेख ये है कि ब्रह्मा जी पार्वती जी से शिकायत कर रहे हैं कि शिव आगा-पीछा देखे बिना, विचारे बिना, दान करते रहते हैं। इतना दान दे देते हैं कि उनके पास भी…

We leave a talk moved, and by evening it has faded, so we ask how to stay aware every moment. Yet one glance at a report that says cancer is never forgotten; even in our dreams we remember it, and no one has to remind us. We remember what we truly want to save. The mirror is held up once, and a teacher can do no more than that. Sunlight pours through every window, and we can still crawl under a rock. What are we choosing, each time we forget?
आचार्य प्रशांत: तो ऊर्जा का संबंध फिर किससे हुआ? शांति से। मैं उसको थोड़ा और साफ़ करके बोलूँ तो ऊर्जा का संबंध हुआ आत्मा से। जब कुछ भी आत्मिक होता है तो…
Shiv isn’t a person who existed at some point in time. Shiv isn’t confined to a specific place. Stories are sometimes useful pointers to the truth, but in our ignorance, we take the pointers themselves as history, facts or Truth. Shiv is the joy of pure consciousness. When false identifications and attachments are dropped in the light of self-knowledge, what remains is called the untainted essence of Shiv.
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Rishikesh is the city of Shiva; it is the city of ending. While many cities mark beginnings, Rishikesh is where you come to stop. Haven’t we already had enough beginnings? Things must end somewhere. Having passed through Brahma and Vishnu, it is now time to meet Shiva. Shiva is annihilation—a full stop.
दो आँखें सबके पास होती हैं, और ये सिर्फ़ दुनिया को देखती हैं, स्वयं को नहीं। शिव की तीसरी आँख एक प्रतीक है, जो बताती है कि आपकी ज़िंदगी में दुनिया से परे कुछ होना ज़रूरी है। क्योंकि जो केवल दुनिया को देखेगा, वह उसमें फँसकर दुख पाएगा। इसलिए दुनिया को और स्वयं को एकसाथ देखो। यही शिवत्व और शिव के तीसरे नेत्र का अर्थ है।
धर्म के साथ कई तरह की परंपराएँ जुड़ी हैं, जिनका उद्देश्य होता है — मन को भ्रम और दुख से मुक्ति देना। ‘शिव’ परम सत्य का दूसरा नाम है। यदि तीर्थाटन करने से मन साफ़ हो रहा है, आपके मन में सच्चाई दृढ़ता से स्थापित होती है, तो तीर्थयात्रा बहुत शुभ है — चाहे वह कावड़ यात्रा हो, अमरनाथ यात्रा हो, या केदार यात्रा। लेकिन यदि शिव का अर्थ बस मानसिक तल पर कुछ मान लिया है, उस पवित्रता से प्रेम ही नहीं, तो फिर क्या ही लाभ।
शिव कोई ऐसी इकाई नहीं हैं, जो अपना कोई निजी, पृथक या विशिष्ट व्यक्तित्व रखती हो। हम सब जहाँ पहुँचना चाहते हैं, हमारी एक-एक गतिविधि जिस अवस्था को हासिल करने के लिए है, उसका नाम है—शिव। सब समय, सब स्थान मन का विस्तार हैं और शिव मन का केन्द्र हैं। शिव इसलिए नहीं हैं कि उनके साथ और बहुत सारे किस्से जोड़ दो। शिव इसलिए हैं ताकि हम अपने किस्सों से मुक्ति पा सकें। शिव कोई देवता, भगवान या ईश्वर नहीं हैं, शिव सत्य मात्र हैं।
Shakti represents everything in motion, everything that can be experienced, everything in space-time. We move in search of a final destination. That point is symbolically represented by Shiva. Those who are inclined towards having the right kind of movement worship Shakti. Those who have fallen in love with the destination itself, worship Shiva. The fact is that the two are inseparable.
Now comes the deeper symbolism of Shivlinga. It says—look, if you have taken birth, then you are there in the body. But even while living in the body, you have to live as if you are without a body. So, the shape of the Yoni that you see in the Shivalinga is actually the world or the body, and this Lingam that you see in the middle of it is the Consciousness—the Consciousness which is located in the body.
हम वहाँ से शुरुआत करेंगे जहाँ पर कोई तर्क हो ही नहीं सकता। हम वहाँ से शुरुआत करेंगे जहाँ कोई मान्यता हो नहीं सकती और कौन सी हैं वो जगह ‘मैं’। बिल्कुल हो सकता है कि ये दीवारे न हो, ये मेरी मान्यता हो, आँखों का धोखा हो, सब कुछ झूठ हो सकता है। लेकिन एक चीज तो है न, जो है और उसी की खातिर मैं बात कर रहा हूँ, मैं हूँ और मैं हूँ। मुझे मेरे होने का दुख नहीं पता चलता है। मैं दुखी हूँ। यहाँ से सारा अध्यात्म शुरू होता है। बाकी सब नकली हो सकता है। आपको सामने वाले से एक बात पूछनी है दुखी हो? और ‘हो’। दुखी हो। उसमें अस्तित्व भी आ गया तुम्हारा। अहम। हो, हो माने अस्तित्व है तुम्हारा। अहम और दुख है। हाँ यही है अध्यात्म सारा।
आम जनमानस में तो ये एक ही हैं, पर अध्यात्म की दुनिया में बाकी सारे नाम सिर्फ नाम हैं, और शिव सत्य हैं। शिव कोई चरित्र नहीं हैं; शंकर का चरित्र होता है। शंकर किसी पुराण के केंद्रीय पात्र हो सकते हैं, शिव नहीं। शंकर मन की जितनी अधिकतम ऊँचाई पर उड़ सकता है, वह हैं। और शिव हैं उस मन का आकाश में विलीन हो जाना। तो विचार का उच्चतम बिंदु हुए शंकर, और निर्विचार हुए शिव।
महाशिवरात्रि का उत्सव मनाने का सार भीतर के अंधकार को पहचानना और उसे कम करने का प्रयास करना है, यह मानते हुए कि यह त्योहार केवल एक दिन का नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता की निरंतर यात्रा है। यह रात महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विनाश की एक धारा और नए आरंभ की दूसरी धारा के मिलन का प्रतीक है। किसी भी नए आरंभ के लिए, पहले पुराने, सड़े हुए और झूठे तत्वों को समाप्त करना आवश्यक है।
Shiv is unthinkable—beyond words, thought, and representation. He cannot be captured in pictures or idols. Yet, for most people, imagining truth without form feels impossible. This is where Shankar arrives. Shankar is the highest point a man’s imagination can reach. The maximum flight of the mind is Shankar, and Shiv is the disappearance of the mind into the sky.
So 'know', don’t try to know about Shiva. Shiva is not furniture. Shiva is not a tree. Shiva is not a cloud, not even the sky. How will you know Shiva? Do you know of anything that has no shape, no form, and is eternal? How will you know Shiva? But know, do know. What can you know? This world and yourself. Know that. That knowing is Shiva-ness. Shivatva.
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सपनों में या ध्यान में किसी भी भगवान के दर्शन हो जाने को बड़ा महत्व दिया गया है, लोगों को ध्यान में शिव दिखते हैं और ऐसी बहुत कहानियाँ और भी प्रचलित हैं, ये सब क्या है कृपया स्पष्ट करें?
आचार्य प्रशांत: और शिव का भी वही…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। 'निर्वाण षटकम्' की एक पंक्ति है —
'न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्।'
तो इसमें जो मोक्ष के विषय में कहा गया है कि मैं मोक्ष भी नहीं हूँ, तो क्या शिव को मोक्ष भी नहीं चाहिए?
आचार्य प्रशांत: हाँ,…
आचार्य प्रशांत: महाशिवरात्रि का समय है और आपकी बहुत-सी जिज्ञासाएँ आयी हैं। आपने कहा कि जैसे अभी पूरी बात समझायी आपने कि ईश्वर माने क्या, आत्मा माने क्या, माया माने क्या, चार राम कौन से होते हैं — और श्री कृष्ण की गीता पर तो लंबे और पूरे व्याख्यान होते…
आचार्य प्रशांत: आप मन का कोई विषय नहीं हैं। मन में कभी कोई विषय देखा है जो शाश्वत रहे कि अब आ गई मन में वो बात तो लगातार है, कोई भी ऐसी बात है? ज़िंदगी में आपको जो चीज़ सबसे प्यारी हो, वो भी क्या ऐसा होता है कि…
आचार्य प्रशांत: हम भी बनारस से ही हैं।
(श्रोतागण हँसते हुए)
प्र: महर्षि वेदव्यास जी ने स्कन्द पुराण लिखा है जिसमें सात खंड हैं, जिसमें चौथा खंड काशी खंड है। और उसमें जो…
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं!
देखो, भारत एक विशेष जगह रहा है। यहाँ पर हमने…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं आपको पिछले छः महीने से सुन रही हूँ और मेरा प्रश्न पहले सत्र से जुड़ा हुआ है। तब आपने कहा था और मैं मानती भी हूँ कि जो ब्रह्म है वही सत्य है। और जो निराकार है, जिसे हम ईश्वर भी कहते हैं, सामान्य भाषा…

ध्यान में बैठकर हम कोशिश करते हैं कि मन में एक भी विचार न आए, मानो सोचना कोई गंदगी हो। पर जैसे पेट का काम पचाना है, वैसे ही मस्तिष्क का काम सोचना है। विचार न कोई रोग है, न कोई बड़ी उपलब्धि, वह डकार जितनी ही साधारण क्रिया है। दस सेकंड आँख बंद करके अपनी कोई अधूरी हसरत पूरी होती सोचिए, सब नकली जानते हुए भी मज़ा आ जाता है। सोच के घोड़े को वही दौड़ा रहा है जिसे उससे राहत की आशा है। तो हम विचार से लड़ें, या पूछें कि यह सोच किसके लिए चल रही है?

We have all put down a book that could have helped us, or dozed off halfway through something that mattered. A man who could not keep food down was given medicine, and he threw that away too, since it went in by the same route. Most of us strike a similar deal: we move into a place that stinks and, within a week, call the smell normal. Show our fifteen-year-old self the life we lead now and they would scoff. What would change if we admitted we do not like our condition?

किसी के मुँह से सुनते ही कि उसे सच मिल गया है, हम उसके पीछे चल पड़ते हैं, जेब भी ढीली कर आते हैं। फिर हम जैसे दो-चार लोग मिलकर एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि हमें भी मिल गया। पर जो सबसे ऊँचा है, वह जेब में डालने की चीज़ नहीं। जो उसे छूने निकला है, वह अभी पूरा बचा हुआ है, और छूते ही उसे अपनी कहानी का पात्र, अपना औज़ार बना लेता है। जिसका सच से सचमुच नाता है, उसकी ज़बान तो नाम लेने में भी काँपती है। तो हम सच खोज रहे हैं, या अपने झूठ को देखने से बच रहे हैं?

Questioner: When I do something my parents don’t approve of, they scold me. But sometimes the matter goes too far and I get offended, and then I refrain from talking back to them; I fear that if I say something, I will end up hurting them. But then, if I…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर आज काफ़ी अच्छे सीख थे सत्र में। और मेरा प्रश्न भी इस सत्र से ही सम्बन्धित है। सर, आपने बताया था कि मान्यताओं का सम्बन्ध अनुभव से है। प्रारम्भ में हमने चर्चा की था। यानी कि जो विकार हैं, वो भी एक तरह से मान्यताओं…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं पिछले दो-तीन महीने से अध्यात्म में हूँ। थोड़े समय से बिलकुल सही चल रहा था, जब तक मन और बुद्धि पर काम हो रहा था तो ज़्यादा डर नहीं था, पिछले हफ़्ते कुछ ऐसा हुआ कि बहुत ज़्यादा डर लगने लगा। मैं जिनसे सीख रही…

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य प्रशांत जी! हमारे लिए समय निकालने के लिए। अभी जैसे हम लोग देख रहे हैं कि कोरोना काल चल रहा है और जीवन का भी काफ़ी लॉस (हानि) हुआ है, जीवनी का भी काफ़ी लॉस हुआ है। ये क्या एक कलेक्टिव मॉर्निंग (सामूहिक शोक) जो हो रही…

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आपने कहा था कि ग़लती ‘मैं’ भाव से आती है। तो इसके साथ ही अक्सर हम अपनेआप को ये तर्क देते हैं कि मुझसे ये ग़लती हो गयी, ये मैं नहीं थी। तो ये ‘मैं’ भाव क्या है? और ग़लती किसको कहा जा रहा है तब?…

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल भावनाओं को पहचानने पर है। कुछ चार साल पहले मैंने एक वर्कशॉप अटेंड की थी, जिसका नाम था ‘सेक्रेड फेमिनिन'। उसमें कुछ ऐसी बातें सामने आईं थी जो कि मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी।
उसमें एक स्टेटमेंट थी- ‘इमोशन इस द एज ऑफ़ वैकफुलनेस। उस टीचिंग…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, हाल ही में मैंने अपने आदर्श स्टीव जॉब्स और विराट कोहली द्वारा सुझाई गयी लोकप्रिय किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पढ़ी, तो जीवन का अलग ही आयाम खुल गया।
उस किताब के लेखक और उनके गुरु ने, न केवल अपने पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से…

आचार्य प्रशांत: अगर एक बच्चा पैदा होता है तो वो औसतन अपने जीवनकाल में प्रतिवर्ष अट्ठावन टन कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन करेगा। आज की जो स्थिति है, आज के जो ट्रेंड (प्रचलन) हैं उसके हिसाब से। उसकी तुलना में अगर आप कार्बन डायऑक्साइड कम करने के दूसरे तरीक़े लगाते हैं,…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न विज्ञान से सम्बन्धित है। तो काफ़ी समय से वैज्ञानिक समुदाय और प्रकृति में एक तरीक़े का एक तकरार चल रहा है और काफ़ी हद तक विज्ञान सफल भी हुआ है, कोविड वैक्सीन का उन्होंने निर्माण किया और शायद प्रकृति की जो योजना थी उसको…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम संघर्ष करते हैं तो वह समय हमें बहुत कुछ सिखाता है, लेकिन फिर हम उसे कठिन समय क्यों कहते हैं? और जब समय अनुकूल चल रहा हो तो हम कुछ ऐसे काम कर देते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए था। मुझे यह समझ नहीं…

आचार्य प्रशांत: अगर हमारे बीच वास्तव में कोई रिश्ता है तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा कि आप वैसे ही कोई ज़िन्दगी जी रहे हो जैसे कोई आम आदमी जीता है। मुझे अपनेआप पर और अपनी बात पर घिन आएगी। आप अगर कहते हो आप दो साल से मेरे साथ…

प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। आपका एक वीडियो था, वो अभी हाल ही में आया था और उसको कई सारे साथियों ने देखा। और मैं उस वीडियो के कमेंट्स को पढ़ रहा था तो मैंने वहाँ पर देखा कि कई सारी जिज्ञासाएँ थीं, लोगों के सवाल थे, जो मुझे वहाँ मिले और…

Acharya Prashant: It has been told to us that there exist two centers. I suppose it has been very freshly told to you right? Very recently. He says, “How do I know that I am living out of the right center? How does a young man know whether he’s not…

प्रश्नकर्ता: जो अभी जिज्ञासा है मेरी आचार्य जी, यूट्यूब पर एक शॉर्ट्स देखा था, उसके सम्बन्ध में है। तो एक बहुत सुप्रसिद्ध व्यक्ति जो श्रीमद्भगवद्गीता पर बोलते हैं उनका वह शॉर्ट्स देखा था; काफ़ी चल रहा है, बार-बार मेरे फीड पर आया। तो वो निष्काम कर्म पर बोल रहे थे…

आज्ञाभयसंशयात्मगुणसङ्कल्पो बन्धः ।
ājñābhayasaṁśayātmaguṇasaṅkalpō bandhaḥ
Bondage is to imagine that Ātman has qualities like doubts, fear, etc.
~ Niralamba Upanishad, Verse 25
✥ ✥ ✥
Acharya Prashant (AP): “Bondage is to imagine that Ātman has qualities like doubts or fear etc. Bondage is to imagine that Ātman has doubt or…

आपको लगता है कि अब आपकी चीज आपसे छिन गई, वो छिनी नहीं है, वो कहीं और पहुँची है, बिखर गई है, हजार जगह पहुँच गई है, लेकिन वो जहाँ भी पहुँची है, वहाँ पर, तो आप भी मौजूद हो। तो आपसे भिन्न कहाँ हुआ वो आपसे अलग कहाँ हुआ आपसे बिछड़ा कहाँ, वो? जो आपको दिखाई देता है कि वो जहाँ भी जायेगा वो आपको ही पायेगा। तो फिर आपको दुख थोड़े ही होगा।

आँखें खुलकर के अगर तुम अपना रास्ता बदल रहे हो तुम्हें कुछ नया ही दिखायी पड़ रहा है, तुम्हें कुछ नया ही सुनायी पड़ रहा है, और वो तुम्हें पुकारता है तो उसमें परेशान बिलकुल मत हो। इस बात से मन में क्षोभ मत पालो कि अब मैं पहले जैसा नहीं रहा या कि दूसरे पहले जैसे नहीं रहे। भली बात है पहले जैसे नहीं रहे।

आचार्य प्रशांत: आनंद फ़िल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन की जो आपसी नोंक-झोंक होती थी, बड़ी दिलचस्प थी — कि ज़िंदगी तुमको बड़ी चाहिए कि लंबी चाहिए। ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी चाहिए या लंबी चाहिए?’
लंबी चाहिए तो खूब नकारात्मकता से भरे रहो। जितना तुम शक्की रहोगे, प्रकृति ने संयोग…