
प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी, प्रणाम! गीता का पाठ संभव कर देने के लिए धन्यवाद। अध्याय ७, १३ और १५ में श्रीकृष्ण प्रकृति, दो प्रकार के पुरुष, और पुरुषोत्तम के बारे में बताते हैं और कबीर साहब ने चार रामों की बात कही है-
चार राम हैं जगत में, तीन राम…

साल भर जो निरंजन में जिया है, उसके लिए कल राम निरंजन; और साल भर जिसने मनोरंजन ही पाला है, उसके लिए फिर पर्व भी मनोरंजन। अंजन माने क्या होता है? कालिमा। तो राम निरंजन न्यारा रे, अंजन सकल पसारा रे। समझ रहे हो? अब आपको तय करना है कि सकल पसारा माने चहुदिश जो ये व्याप्त है, आपको इसका होना है या इससे न्यारा होना है। न्यारा माने अलग, अस्पर्शित।





Rama’s festival has become the festival of shopping, shoppers and shopkeepers—Rama, who never had anything to do with shops; Rama, who was never a buyer or a seller or a consumer; Shri Rama, who stands for that which can neither be bought nor be sold. This festival has turned into

When you stand in front of a client and make a presentation, what is it that makes you go weak in the knees? Expectation. Greed. And there is only one solution to greed: Rama.

I say, if you have lived up to Rama for 364 days, only then must you celebrate the festival of Rama-ness. How is it that for 364 days your life had nothing to do with Shri Rama, and on the 365th day you jump up and join the bandwagon, the…

Diwali, for most people, must be a festival of austerity, of repentance. We must, on this day, offer our prayers to Shri Rama and say, “We are very sorry, O Holy One! We are extremely sorry. We couldn’t live by your life, your message, your teachings. We are very sorry.

I say, if for 364 days you have really lived up to Rama, only then must you honestly celebrate the festival of ‘Rama-ness’. How is it that for 364 days your life really had nothing to do with Shri Rama, and on the 365th day you jump up and join…

Just think if Rama was there in his bodily shape, in his mortal life, and were to see you celebrating his festival. What would he say? He would call you, “Hey you! Yes, you! Come here. You just did something taking my name? All this tamasha (commotion) is in my…

प्रश्नकर्ता: पिछले बीस-चालीस साल से ऐसा क्यों हो रहा है कि लोगों को राम पसंद आने बहुत कम हो गए हैं? तो आम जनमानस को ख़ासतौर पर जो नई पीढ़ी है उसे तो नहीं ही पसंद आते राम, इधर पिछले बीस-चालीस साल के कुछ प्रसिद्ध गुरुओं ने भी राम का

आचार्य प्रशांत: (मुस्कुराते हुए) चुन्ना भाई की कहानी सुनेंगे? ये बड़ा गूढ़ रहस्य था, जो कभी कोई जान नहीं पाया कि चुन्ना भाई आठवीं कक्षा तक पहुँचे कैसे? मैं आठवीं की बात बता रहा हूँ। ब्रह्मांड के सब रहस्यों पर से पर्दा उठ सकता है, चुन्ना भाई आठवीं तक आ


प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर! मेरा क्वेश्चन (प्रश्न) है मेरे सामाजिक जीवन से। सर! हमारे समाज में जैसे मैं ट्राइबल कम्यूनिटी (आदिवासी समुदाय) से आता हूँ, तो उसमें एक धारणा, एक मिथ (कल्पित कथा) है जो यह प्रचलित है सर! ये कि जो हमारे धार्मिक ग्रन्थों में जो हिंसा है जैसे— भगवान…


आचार्य प्रशांत: राम आज ज़्यादातर लोगों को क्यों पसंद आएँगे? देखो हर युग, उस युग के मूल्यों के हिसाब से अपने आदर्शों को, नायकों को चुनता है। चुनता भी है, गढ़ता भी है। तो जिस युग के जो मूल्य होते हैं, जो

आचार्य प्रशांत: मुकेश पूछ रहे हैं कि क्या ध्यान करते समय किसी पर केंद्रित होना है? गिरेन्द्र कह रहे हैं कि मन एक बार में एक ही काम क्यों करना चाहता है? कहते हैं कि जब ईश्वर को याद करता हूँ तो संसार को भूलता हूँ। जब संसार याद आता

सागर पार करके लंका पहुँचने हेतु पुल बन रहा था। उसमें यह सब वानर, भालू सब लगे हुए थे, हनुमान तो थे ही,

प्रश्नकर्ता: गर्भवती पत्नी को वन में छोड़ने पर भी राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। जुऐ में द्रौपदी को हारकर भी युधिष्ठिर धर्मराज कहलाए। अरे! अगर ये धर्म है तो, फिर अधर्म क्या है?

आचार्य प्रशांत: जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना…
Shri Ram is the source of all excellence—Kabir Sahab’s excellence, the excellence of an astronaut, the excellence of a deep-sea diver, the excellence of a professional, etc. If you don’t have excellence in what you do, it is because you have been disloyal to Ram. Without Ram, you can’t do anything nicely.
राम कोई खिलौना थोड़ी ही हैं, जो कहीं से "मिल जाएँगे"। राम की प्राप्ति जैसा कुछ नहीं होता, अहंकार को मिटाना होता है, और इसी को ‘रामत्व’ कहते हैं। अपनी रोज़मर्रा की हरकतों को देखिए—सुबह से शाम तक क्या किया, क्या सोचा, क्या अनुभव किया; तो पता चलेगा कि बड़ा अंधकार है। और वह स्वयं को जानने से ही मिटेगा। उसके बाद जो शेष बचेगा, उसी को 'राम' बोलते हैं।
हम अपने आराध्यों की कथा, चरित्र, मूर्ति, छवि अपने ही हिसाब से बना देते हैं। हम अपनी सहूलियत, मान्यता और स्वार्थ के अनुसार कालातीत को भी बदल डालते हैं। यह समस्या राम के निर्गुण–निराकार रूप के साथ बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो निर्गुण और निराकार है, उसकी कोई मूर्ति ही नहीं, कोई छवि ही नहीं; तुम उसको कैसे ख़राब कर लोगे? इसलिए ज्ञानियों ने कहा कि उनको तो ब्रह्मस्वरूप ही मानना — “राम ब्रह्म परमारथ रूपा, अबिगत अलख अनादि अनूपा।” मात्र वही राम हैं जो कालातीत हैं।
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कह रहे हैं कि आप कहते हैं कि महिलाओं का कमाना उनकी आन्तरिक और भौतिक प्रगति के लिए ज़रूरी है, पर हमारी प्राचीन देवियाँ जैसे माँ सीता, देवी अनुसुइया, यहाँ तक कि साध्वियाँ जैसे मीराबाई भी कभी कमाती तो नहीं थीं, तो क्या वो सब…
What is it that Shri Rama stands for? He stands for detachment. He stands for fearlessness. He stands for compassion. He stands for Dharma.
Is there Dharma really in your life? And by Dharma I do not mean a creed or a cult, or observation of certain rituals, or the…
You try to feel like a champion, but in front of your boss you have feet…
आचार्य प्रशांत: ऐसों से बचना जो मिलते ही ये कहते हैं कि चल यार, वीकेंड (सप्ताहान्त) पर पीते हैं। ऐसों से बचना जो जब तुमसे मिलने आते हैं तो तुम्हारे लिए साथ में गलौटी कबाब लेकर आते हैं, बचना। ये तो आया ही है देह का सुख साथ लेकर के।…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कई भ्रांतियाँ मैंने देखी है कि फैली हुई हैं। जैसे कि उत्तरकांड को बहुत से लोग रामायण का हिस्सा नहीं मानते। कहते हैं, रामायण युद्धकांड पर समाप्त हो जाती है, वाल्मीकि जी ने उससे आगे उसको नहीं कहा था।
ऐसे ही कुछ सनातन धर्म पर आक्षेप…
प्रश्नकर्ताः तुलसीदास जी ने कहा है : 'नहिं कलि करम न भगति बिबेकू, राम नाम अवलंबन एकू।' आपका भी वीडियो सुना जहाँ कहीं भी राम नाम का शीर्षक मिला कि राम नाम एक ऐसी चीज़ है जो निराकार और साकार दोनों के बीच का है। तो मैं बच्चों को ये…
प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये है कि बहुत सारी कहानियों में, जैसे राम और कृष्ण की कहानी हम पढ़ते हैं या कोई और भी। इन अवतारों को बचपन से ही बहुत ऐसे दिखाया जाता है कि इनमें बचपन से ही सारे गुण थे, या ये बचपन से ही अच्छे थे, निपुण…
जिस प्रकार अनेक नदियों का जल समुद्र में निरन्तर प्रविष्ट होता रहता है, किन्तु समुद्र उससे विक्षुब्ध नहीं होता अर्थात् बढ़ नहीं जाता, इस प्रकार आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित जिस योगी के मन में विषय की चिन्ताएँ प्रविष्ट होकर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब सीता और हनुमान दोनों ही राम तक पहुँचने के मार्ग हैं, तो इनमें मूलभूत रूप से क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: एक है अपने को मिटा देना, और दूसरा है अपने को मिला देना।
मिटा देना ऐसा है कि जैसे कोई सपने से उठ गया हो,…
आचार्य प्रशांत: ताली बजादूँ डायलॉग पर या जवाब दूँ? चलो जवाब दिए देता हूँ।
क्रिकेट विश्व कप के…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, श्रीराम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा जाता है, जबकि उन्होंने सीता जी की अग्नि परीक्षा ली थी, और जब वो गर्भवती थीं तो उन्हें घर से निकाल दिया था। मैं श्रीराम के इस व्यवहार को ग़लत मानती हूँ। कृपया मेरी इस शंका को दूर कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मर्यादा…
We have all put down a book that could have helped us, or dozed off halfway through something that mattered. A man who could not keep food down was given medicine, and he threw that away too, since it went in by the same route. Most of us strike a similar deal: we move into a place that stinks and, within a week, call the smell normal. Show our fifteen-year-old self the life we lead now and they would scoff. What would change if we admitted we do not like our condition?

किसी के मुँह से सुनते ही कि उसे सच मिल गया है, हम उसके पीछे चल पड़ते हैं, जेब भी ढीली कर आते हैं। फिर हम जैसे दो-चार लोग मिलकर एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि हमें भी मिल गया। पर जो सबसे ऊँचा है, वह जेब में डालने की चीज़ नहीं। जो उसे छूने निकला है, वह अभी पूरा बचा हुआ है, और छूते ही उसे अपनी कहानी का पात्र, अपना औज़ार बना लेता है। जिसका सच से सचमुच नाता है, उसकी ज़बान तो नाम लेने में भी काँपती है। तो हम सच खोज रहे हैं, या अपने झूठ को देखने से बच रहे हैं?

![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)
आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग है।
आचार्य प्रशांत के यूं तो सोशल मीडिया इत्यादि पर तीन करोड़ से अधिक फॉलोवर और तीस करोड़ से अधिक श्रोता हैं, परंतु गीता कम्यूनिटी कुछ अलग ही बात है। इसमें मात्र वे गंभीर साधक सम्मिलित हैं जो…

आज महर्षि वाल्मीकि जयंती का सुअवसर है। इससे बेहतर शायद ही कोई मौका मिले भारत के आदिकवि को जानने के लिए। इसलिए आज हम उनके विषय में कुछ महत्वपूर्ण बातें आपके साथ साझा करना चाहते हैं:
महर्षि वाल्मीकि का योगदान
~ भारत व सनातन धर्म में महर्षि वाल्मीकि का योगदान…

Research has shown that loneliness is found throughout the society, including among people in marriages along with other strong relationships, and those with successful careers. As a subjective emotion, people experience loneliness even when surrounded by other people.

Love is great. Love is necessary. Love is beautiful.
But what is love?
For most of us, love is the greatest excitement and comfort—and also the greatest suffering. Whether love has become a problem or something you cherish the most in your life, please go deeper into the matter. Know…

Man has always been attracted to the new. But attraction alone is not enough, especially when one is resistant to leaving the old ways. 'New' comes with an opportunity to change, and equally with a responsibility to act upon that change. Bridging this gap between attraction and action, Acharya Prashant guides us with practical resolves that possess the potential to bring real development—if followed honestly!

नवरात्रि में हम देवी की पूजा करते हैं और महिषासुर को बाहर का कोई दैत्य मान लेते हैं। पर दुर्गा सप्तशती का दूसरा चरित्र हमारी अपनी वृत्ति की कथा है। जो मन प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मानता है, जंगल काटता है, नदियाँ दूषित करता है, पशुओं को खाता है और कहता रहता है कि मुझे और चाहिए, वही महिषासुर है। त्यौहार उसी के वध के लिए है, उसे भोग लगाने के लिए नहीं। क्या इस नवरात्रि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानेंगे?

किसी के क्रोध पर चोट करो तो क्रोध पाँच गुना हो जाता है। दो गुटों की लड़ाई में एक मारा जाता है तो बीस और खड़े हो जाते हैं। दुर्गा सप्तशती का रक्तबीज यही है: हर बूँद से एक नया असुर। रक्तबीज कोई ख़ास असुर नहीं, हमारे अहंकार की प्रतिक्रियात्मकता है। उस पर चोट करने से वो और बड़ा होता है, क्योंकि किसी को ‘तुम बुरे हो’ कहना भी उसे ‘तुम हो’ कहना है। काली उसे खा लेती हैं, यानी अहंकार प्रकृति से अलग नहीं रह जाता। तो क्या हम देख सकते हैं कि जिसे हम ‘मैंने किया’ कहते हैं, वो कौन कर रहा है?

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

संसार में तुम जिस भी चीज़ को शांति का,तृप्ति का साधन बनाओगे वो चीज़ बेचारी असफल हो जाएगी। तुम उसे भोगकर के कुछ और कर देते हो। तो फिर कौन है जो तुम्हें सन्तुष्टि दे सकता है? सिर्फ़ वो जो तुम्हारे स्पर्श से कहीं आगे का हो। तुम्हारा स्पर्श उस पर कोई दाग ही न लगा पाये, जो अस्पर्श्य हो। ऐसे किसी को ही सत्य कहा गया है, परमात्मा कहा गया है। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उस पर हावी नहीं हो सकते। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उसे बदल नहीं सकते।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर आज काफ़ी अच्छे सीख थे सत्र में। और मेरा प्रश्न भी इस सत्र से ही सम्बन्धित है। सर, आपने बताया था कि मान्यताओं का सम्बन्ध अनुभव से है। प्रारम्भ में हमने चर्चा की था। यानी कि जो विकार हैं, वो भी एक तरह से मान्यताओं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न युग के बारे में है। जैसे हम पढ़ते हैं, चार युग होते हैं– सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। और जो एक युग होता है उसको लगभग लाखों वर्षों का मानते हैं। जबकि एस्ट्रोफिजिक्स (खगोल भौतिकी) के अनुसार जो स्टार्स (तारों) की पोजीशन (स्थिति) है,…

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

प्रश्नकर्ता: एक चीज़ होती है मेंटल एजिलिटी (मानसिक चपलता), जैसे कि मैं कहीं बाइक से जा रहा हूँ और अचानक कोई मोड़ आ गया या एक कुत्ता बीच सड़क पर आ गया, तो मुझे एकदम से ब्रेक लगाने की आवश्यकता पड़ी। तो ये जो स्किल (कौशल) होती है एकदम से …

प्रश्नकर्ता: मेरे विचार से एक व्यक्तिगत संसार होता है और एक सामाजिक संसार होता है। और मेरी आयु वर्ग में — 21 से 30 वर्ष की आयु के बीच जहाँ पर आदमी के के सामाजिक संसार को दो हिस्सों में बाँट दिया जाता है — रिश्ता (पर्सनल लाइफ़) और कैरियर…

आचार्य प्रशांत: रिलेशनशिप (सम्बन्ध) में और रिलेट (सम्बन्धित) करने में क्या अन्तर है? सवाल आप नहीं भी समझे हों तो जो बात है उस पर ग़ौर करिएगा, कुछ खुलेगा।
उन्होंने कहा, एक आईना है, आप उसमें अपनी शक्ल देखने गये और पहले से ही मन बना कर गये कि फ़लाने…

जीवन में जो भी तुम्हें ऊँचे-से-ऊँचे अनुभव हों, उनको एक सीमा से ज़्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। और जो लोग सच्चाई के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं उनको थोड़े अलग तरह के अनुभव होने शुरू हो जाते हैं, इससे मैं सहमत हूँ। और वो अनुभव आपको तभी नहीं होते…