
नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

Spirituality is neither a tradition nor a culture. Spirituality is not at all about following something or somebody. When it is said that you must follow the Guru, the Guru is the Truth, not a person not a man. Spirituality would never say, “Follow the words of a man.” Spirituality says, “Let the mind follow the Center, the Truth or you may call it the Heart or God.”

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब मैंने शिविर में आने की बात अपने जानने वालों को बतायी तो सबकी ओर से एक सी ही प्रतिक्रिया आयी कि ये तो जोगी बनने जा रहा है या संन्यास लेने की सोच रहा है। तो मेरा प्रश्न ये है कि समाज में अध्यात्म की

जीवन में जो भी तुम्हें ऊँचे-से-ऊँचे अनुभव हों, उनको एक सीमा से ज़्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। और जो लोग सच्चाई के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं उनको थोड़े अलग तरह के अनुभव होने शुरू हो जाते हैं, इससे मैं सहमत हूँ। और वो अनुभव आपको तभी नहीं होते…

आचार्य प्रशांत: इस तरह की व्यर्थ बातें प्रचलन में इसीलिए रह जाती हैं क्योंकि हिन्दू धर्म और भारतीय गौरव के नाम पर हम इनको कभी ख़ारिज नहीं करते।

Acharya Prashant: Hell is a place where you get a lot of sympathy, consolation, condolence, and commiseration. You're told that we agree that you are in a miserable state. Your neighbor comes to you, puts his hand on your shoulder, and with a grave face tells you that you are…

प्रश्नकर्ता: साक्षी भाव के लिए ध्यान की आवश्यकता है?
आचार्य प्रशांत: साक्षी भाव और ध्यान एक ही बात है। ध्यान साक्षित्व का माध्यम नहीं है। थोड़ा समझेंगे, ध्याता हम सब सदा हैं, ऐसा नहीं कि जब आप कुछ विशिष्ट पलों में ध्यान लगाने बैठते हो तभी आप ध्यानी होते हो।…

एक बार को ज़िंदगी में चोर आ रहा हो, लुटेरा आ रहा हो, भ्रष्टाचारी आ रहा हो तो मजबूरी में उसको स्वीकार कर लेना, हालत ऐसी बने तो। पर ज़िंदगी में अगर अंधविश्वासी आ रहा हो, पलटकर भागना। आपने कभी सोचा ये डर क्या है? ये अहंकार है, ये अज्ञान है जो मानता ही नहीं कि तुम पूरे तरीके से कंडीशन्ड (संस्कारित) हो।

जो आम आदमी की फिलॉसफी है, वह यही है कि दुनिया की सबसे बड़ी जो ताकत है, जिस पर पूरा भरोसा किया जा सकता है, जो सब कुछ ठीक कर सकती है, जो सब कुछ चलाती है, वह ऊपर कहीं आसमानों में बैठी है। माने, वह इस दुनिया की नहीं है। माने, जो कुछ इस दुनिया का है, उसका भरोसा मत करो, वह ना कुछ जानता, ना समझता, वह तो गड़बड़ी है। माने, अगर आपकी कोई शारीरिक समस्या भी है, तो उसका समाधान वही करेगा, जो आसमानों में बैठा है। यही तो द्वैतवाद दर्शन है ना? हम गीता का दर्शन थोड़ी समझ पाए हैं।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी। मैं आइआइटी कानपुर से हूँ, और जीवन के प्रति एक तर्कवादी रवैया रखता हूँ, चीज़ों को समझने की कोशिश करता हूँ। आपको सुनता हूँ और आपका बहुत सम्मान करता हूँ। मेरे कुछ मित्र भी हैं जो आपको सुनते हैं, और और भी आपको सुनने वाले हैं जो

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो अनुभव आपको नहीं हैं, वो किसी और को कैसे हो सकते हैं, ये कहीं ऐसा तो नहीं, आपका कोई पूर्वाग्रह है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, क्या है? खोलकर बताओ बात, क्या कह रहे हैं? किसका अनुभव? एनलाइटनमेंट का?

ग़रीब आदमी को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है वास्तविक धर्म की। और सबसे ज़्यादा ग़रीब ही होता है, जिसको लोक धर्म का चूर्ण चटा दिया जाता है।

प्रश्नकर्ता: कहीं-न-कहीं आज के समय में आम आदमी के मन में ये बात बहुत गहरे बैठ गयी है कि शायद बिना आसन जमाए, बिना कुछ ऐसा करे कि कुछ मन्त्र का जाप करे, कुछ भी करे बात नहीं बनेगी तो बहुत बार होता है कि लोग बोलते है कि आचार्य


प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी! पहले मैं सोशल मीडिया पर ज़्यादा सक्रिय नहीं था। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय आने के बाद, मैं थोड़ा ज़्यादा सक्रिय हो गया हूँ। तो मैं देखता हूँ, सोशल मीडिया पर आजकल बहुत सारे बाबा लोग हैं, जो अपना आधिकारिक ऐप बना लिये हैं। और ऐड के माध्यम…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! जब डेढ़ साल पहले किताबें पढ़नी शुरू की थी तो पढ़ने में बहुत मज़ा आता था, लगता था रोज़ कुछ नया जानने को मिल रहा है। लेकिन अब न पढ़ने का मन करता है, न ही यूट्यूब पर सुनने का। मन को लगता है कि शब्द के


Acharya Prashant: If you will observe, you will find that people who are living most contented lives do not find it necessary to intrude in the lives of their kids, their sons and daughters. Because they are complete and satisfied in themselves. If they have to do something, or get

प्रश्नकर्ता: यूनिवर्स (संसार) का सत्य क्या है? मेरी आत्मा का उद्देश्य क्या है?
आचार्य प्रशांत: ये सवाल मत पूछो, ये पता लगाओ कि ये सवाल तुम्हारे मन में अरे आए नहीं हैं घुसेड़े गए हैं। तुम पूछ रहे हो सोल पर्पज़ क्या है, आत्मा का उद्देश्य क्या है? उद्देश्य बाद

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्कार! मेरा नाम माणिक पांडे है, मैं हंसराज कॉलेज का विद्यार्थी हूँ और इतिहास में बीए ऑनर्स कर रहा हूँ। मेरा आपसे ये प्रश्न था कि क्या आध्यात्मिकता के लिए हमें किसी धर्म या आस्था से जुड़ना ज़रूरी है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जितनी भी बात आपने बतायीं उसके मूल में यही था कि अध्यात्म का उद्देश्य तो मन को शान्त करना है, सरल करना है। आज का जो अध्यात्म है उसका उद्देश्य मन की शान्ति और सरलता नहीं, बल्कि कुछ और ही है। और क्योंकि उद्देश्य बदल चुका है

Questioner: Good evening sir. I’m…. and I’m a PhD student here at IIT, Kanpur. Sir, I have a very personal question. Being a girl child, especially in India, comes with very different sets of consequences. Despite being given equal opportunities like education and skills, at the end where we’re supposed




We read books, watch talks and follow advice, and somewhere along the way we begin to wonder how much of what we think is really ours. The subject we chose, the way we dress, even our spiritual beliefs seem borrowed from someone. Yet perhaps nothing was ever ours to begin with. Every word comes from somewhere, and what we examine closely enough stops being borrowed. What changes when wisdom moves from the palm of our hand into the heart?

Desires and beliefs may keep changing, but the deeper tendency to believe, think, choose, and seek fulfilment often remains unchanged. Real transformation begins by examining this constant inner pattern rather than changing superficial preferences. Instead of seeking conclusions about greed or desire, honestly observe recurring behavior and support the truth you already recognize. Expressing that truth can dissolve false identities, relationships, and habits, creating space for genuine change.

Questioning pseudo-science and superstition is the first step toward genuine freedom. Beliefs such as *Vastu, Kundli,* and *Muhurat* should not be accepted merely because they have been followed traditionally. Fear and attachment to privileges often prevent people from questioning authority. A truth-seeker must be willing to challenge age, status, and authority. Human progress has come through curiosity, inquiry, experimentation, and reason—not through blind obedience.

What is the relationship between quantum physics, consciousness, and the ego? This dialogue explores where scientific inquiry ends and self-enquiry begins. Through Vedanta, Acharya Prashant explains why the ego clings to its own existence, how beliefs and superstition shape our lives, and why lasting freedom lies beyond conditioned thinking.





प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर आज काफ़ी अच्छे सीख थे सत्र में। और मेरा प्रश्न भी इस सत्र से ही सम्बन्धित है। सर, आपने बताया था कि मान्यताओं का सम्बन्ध अनुभव से है। प्रारम्भ में हमने चर्चा की था। यानी कि जो विकार हैं, वो भी एक तरह से मान्यताओं…
Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, हाल ही में मैंने अपने आदर्श स्टीव जॉब्स और विराट कोहली द्वारा सुझाई गयी लोकप्रिय किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पढ़ी, तो जीवन का अलग ही आयाम खुल गया।
उस किताब के लेखक और उनके गुरु ने, न केवल अपने पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से…
हम कहते हैं कि देखो, हमारा धर्म इतना ऊँचा है और हमारा देश इतना ऊँचा है कि बड़े ज़बरदस्त योगी होते हैं…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न मेरे वैवाहिक जीवन से है। किसी भी अन्य रिश्ते में मुझे अभिव्यक्ति करना सरल लगता है पर अपनी बातें अपनी पत्नी तक पहुँचाना बहुत ही कठिन लगता है। यह रिश्ता इतना गहरा है फिर इतनी मुश्किल क्यों?
आचार्य प्रशांत: अब तुम्हें यहाँ पर एक…
प्रश्नकर्ता: जो अभी जिज्ञासा है मेरी आचार्य जी, यूट्यूब पर एक शॉर्ट्स देखा था, उसके सम्बन्ध में है। तो एक बहुत सुप्रसिद्ध व्यक्ति जो श्रीमद्भगवद्गीता पर बोलते हैं उनका वह शॉर्ट्स देखा था; काफ़ी चल रहा है, बार-बार मेरे फीड पर आया। तो वो निष्काम कर्म पर बोल रहे थे…
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिक अनुभव जैसा कुछ नहीं होता। आप अगर आध्यात्मिक हैं तो आपके सब अनुभवों में एक सच्चाई…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। कोटि-कोटि नमन। मेरा प्रश्न ‘घर-घर उपनिषद्’ से सम्बन्धित है। ये जो अभियान है, यह मुझे बहुत उत्साह दे रहा है। और मैंने पाया है कि उपनिषदों से आम लोगों का परिचय नहीं है। मेरा ख़ुद परिचय इक्कीस-बाइस की उम्र में हुआ था। और जब कि मुझे…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। पहले मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ कि मैं आपको लगभग छह महीने से मैं सुन रहा हूँ और मुझे बहुत फ़ायदा हुआ है।
मैं आगे बढ़ते हुए पूछना चाहता हूँ कि हमें हमेशा कुछ-न-कुछ चुनाव करना होता है कि ये करें या तो ये करें।…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, महामृत्युंजय मंत्र का जाप क्या मदद कर सकता है कुछ वृत्तियों को काबू करने के लिए? क्योंकि वृत्तियों से मुक्ति ही सत्य की ओर ले जा सकती है और यह जाप भी बंधनों से मुक्ति के लिए जाना जाता है।
आचार्य प्रशांत: 'जाना जाता है,' किसके द्वारा? …
Questioner(Q): Hello Sir, I am Saurav, PhD student at IIT-Patna. Sir, a couple of years ago I met with a bike accident. At that moment, I felt like time was moving very slowly. I don’t know if it was just my feelings, but I searched on the internet and I…
The universe does not care for any human being. The universe is a very, very neutral place and a very random place. We are all products of randomness. Do you get this? The universe is not going to have any specific intention towards a specific individual. All that we are experiencing is episodes and events of random distribution. That’s all. Please understand the philosophy.
आचार्य: ये जो बाहर वाले तुम्हारे भगवान हैं, उनका क्या काम है? तुम्हारी कामनाओं की पूर्ति करना। तो उसको तुम बोलते हो पॉज़िटिव एनर्जी। (सकारात्मक ऊर्जा) ठीक है? जो तुम्हारी कामना पूर्ति करे उसको तुम…
प्रश्नकर्ता: जो श्रीमद्भगवद्गीता की दो मूलभूत बातें हैं, उनको जोड़कर सवाल है। श्रीमद्भगवद्गीता में ये कहा गया है कि आत्मा एक शरीर बदलकर दूसरा शरीर धारण करती है। पिछले दो-सौ वर्ष में जो मानव जनसंख्या है, वो क़रीब एक बिलियन से बढ़कर अब क़रीब आठ बिलियन होने को है। तो…
असली धर्म की पहचान ही यही है कि ये आदमी फालतू की प्रथा, परंपरा, झाड़फूंक, टोना-टोटका, रस्मों, रिवाज़, अंधविश्वास, इस पर हँसेगा। वो ठुकराएगा भी नहीं वो हँसेगा, बोलेगा "और दिखाओ, और दिखाओ, अच्छा चुटकुला है मनोरंजन हो रहा है और करो, और करो कैसे होता है।"
प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर, मैं करीब पन्द्रह साल की थी, जब मेरे मम्मी-पापा ने एस्ट्रोलॉजर (ज्योतिषी) से मेरी कुंडली बनवायी थी। जिसमें मुझे पता चला था कि मुझे कालसर्प दोष है। तो उसको लेकर फिर काफ़ी रुद्राभिषेक भी हुए, मासिक शिवरात्रि को भी मन्दिर गये थे, मेरे मम्मी-पापा। उस वक्त तो…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी! मैंने ट्विटर पर नासा के ऑफिसियल (आधिकारिक) चैनल पर एक पोस्ट देखा था जिसने वो ये कह रहे हैं कि गैलेक्सी (आकाशगंगा) के जो क्लाउड्स (बादल) हैं उसमें उन्होंने साउंड (ध्वनि) डिटेक्ट (पता) कर ली है और उसका जो ऑडियो (श्रव्य) है वो ऑनलाइन रिलीज़ भी…
इतिहास में जो बड़े-से-बड़े नरसंहार हुए हैं, उनमें से न जाने कितने बस इसी बात पर हुए हैं कि तू अपना धर्म परिवर्तन कर, और मान कि मेरा धर्म सच्चा है। नहीं तो मैं तेरे गाँव में आग लगा दूँगा, तुझे मार दूँगा, महिलाओं का बलात्कार कर दूँगा, सारी संपत्ति लूट लूँगा। ये सब करूँगा। ये सब क्यों? क्योंकि तू मेरी बात नहीं मानता, तू काफ़िर है। क्या है ये? मान्यता का मतलब ही है हिंसा। जहाँ मान्यता होगी, वहाँ हिंसा होगी ही होगी। मान्यता है तो हिंसा है।
Remember, it is not as if Krishna did not try with Duryodhana. Krishna goes to Duryodhana and what does Duryodhana do? He tries to arrest him. Krishna goes as the messenger of peace and Duryodhana says no, no, no! The action of Love is still taking place. He is not saying that I will leave Duryodhana to his fate. He says it is my responsibility to teach even Duryodhana. But when Duryodhana proves it beyond doubt, that he is incorrigible, then Krishna says, “Fine, now that the battle is destined, let the blows rain.”
किसी से मिलते ही हम पूछ लेते हैं: आपके गुरु कौन हैं, आप किस परंपरा से हैं? नाम बड़ा हो तो सिर अपने-आप झुक जाता है। कोई एक मठ से जुड़कर उसका वारिस बन जाता है, कोई सब परंपराओं की दुकान सजा लेता है, और कोई सबको ठुकराकर कहता है, मैं ख़ुद काफ़ी हूँ। तीनों रास्ते आसान हैं, और तीनों में समझ कहीं नहीं है। दस किताबों पर उथली बात एक किताब पर उथली बात से बड़ी कैसे हो गई? क्या हम सिर्फ़ फैल रहे हैं, या कहीं ऊपर भी उठ रहे हैं?
It has been extremely conclusively proven, demonstrated that astrology is not a science at all. It's a conjecture. It's a belief system. Belief system with no material basis at all.
जानते-बूझते कुछ नहीं, बस किए जा रहे हैं — यही अंधविश्वास है। कोई भी चीज़ इसलिए ठीक नहीं हो जाती, क्योंकि वो पीछे परंपरा से आ रही है। हमेशा पूछा करो — क्यों? जो सवाल नहीं पूछ सकता, वो इंसान ही नहीं है। आपकी जिज्ञासा ही आपको इंसान बनाती है। पीछे से सिर्फ़ वो लेना है जो कभी पीछे नहीं छूट सकता। पीछे से आप वेदांत दर्शन ले सकते हो, क्योंकि वो उस विषय की बात करते हैं, जो समय के साथ बदलता ही नहीं है।
बच्चे को स्मॉल पॉक्स हुई है। और आपसे कोई कहेगा ये चेचक नहीं है, माता आई है इसको, और पाँच दिन तक इसको फलाने तालाब की मिट्टी का पानी छानकर पिलाओ। ये बात कौन मान सकता है? सिर्फ ऐसा आदमी जो अपनी ज़िंदगी के किसी भी पहलू में तथ्यों के लिए इज़्ज़त नहीं रखता। आप अगर ऐसे आदमी हो जो एक सच्ची ज़िंदगी जीते हो, तो आप सवाल पूछोगे ना? जो लोग तथ्य से जितना घबराते होंगे, वो उतने ज़्यादा अंधविश्वासी होंगे।
To the one who believes in ghosts (Bhūta-Piśāca) — for him, they exist. When you are asleep and are engaged in some nightmare, you feel it actually exists. Bhūta-Piśāca Nikata Nahiṁ Āve, Mahāvīra Jab Nāma Sunāve: Mahavira Hanuman, devoted to Shri Ram, is to be taken as the representative of Truth. If you can be close to the representative of the Truth, you will get rid of all nonsensical and horrifying imaginations.
Don’t think of heaven and hell as the afterlife; both are here, right now. As the Niralamba Upanishad says: Right company is heaven; wrong company is hell. If you are someone who loves to be with people who will take you towards truth, joy, and simplicity, you are already in heaven. And if you surround yourself with people who pull down your consciousness, then verily, you are—right now—in hell.