
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न आत्म-अवलोकन के बारे में है। पहले तो आत्म-अवलोकन कैसे करें? अगर मैं आत्म-अवलोकन कर रहा हूँ, और मेरी ज़िंदगी के बारे में, मेरे परिस्थिति के बारे में एक दृष्टि रख रहा हूँ, तो वो भी मैं मेरे ही हिसाब से कर रहा हूँ। जो मेरे पर्सपेक्टिव हैं, उसी एंगल मे मैं उसको देख रहा हूँ। तो फिर इंडिपेंडेंटली मैं वो कैसे करूँ? जो मेरे प्रायर एक्सपीरियंसेस हैं, मेरे थॉट्स हैं, मेरी धारणाएँ हैं उनसे वो प्रभावित न हो, आत्म-अवलोकन और वो शुद्ध हो। तो मैं वो कैसे करूँ?
आचार्य प्रशांत: हाँ, ये व्यवहारिक समस्या है। अच्छा करा आपने पूछा। सबको आती होगी ये समस्या, कि “जब मैं ख़ुद को देखता हूँ, तो मैं निष्पक्ष होकर नहीं देख पाता।”
मैं ख़ुद को मैं ही तो बनकर देख रहा हूँ; और आत्म-अवलोकन का मतलब होता है, जितना अपने आप से दूरी बनाकर देखोगे उतना सच्चाई पता चलेगी। और मैं ही बनकर मैं को देखोगे, तो हमेशा मैं के ही पक्ष में कुछ विचार, निर्णय, फ़ैसला आ जाएगा। वो फिर बस सेल्फ इंडिकेशन हो जाता है, कि जो मैं हूँ उसी को सत्यापित कर दिया और कह दिया कि, "ये तो मैंने अभी रिफ्लेक्शन करा है, या आत्म-अवलोकन करा है।"
नहीं, वैसे नहीं होता।
तो अगर अपनी मान्यताओं के चश्मे से देख रहे हो, तो ये भी देखना होता है कि मैं चश्मे से देख रहा हूँ। अगर अपनी मान्यताओं के माध्यम से देख रहे हो, तो ये भी देखना होता है कि मान्यताओं के माध्यम से देख रहा हूँ। और ये जो शुद्धता है देखने की ये क्रमशः विकसित होती है, ये एक झटके में नहीं आ जाएगी। जिसकी इंद्रियाँ जीवन भर बस बाहर को ही भटकती रही हों, वो स्वयं को देखना शुरू करेगा तो उसका केंद्र तो काम का ही होगा न। क्योंकि बाहर आप देखते हो तो काम, काम माने डिज़ायर। आप उसी केंद्र से देखते हो, कि बाहर से कुछ मिल जाएगा।
तो अब किसी ने कह दिया, “स्वयं को देखो।" तो आप स्वयं को भी थोड़ा देखोगे किसी तरीके से, तो देखोगे तो अपने पुराने केंद्र से ही। तो वो एक व्यवहारिक समस्या रहती है। तो उसमें फिर अभ्यास करना पड़ता है, कि कैसे मैं और निष्पक्ष होकर स्वयं को देखूँ।
कैसे देखूँ?
इसमें दूसरों का भी सहारा ले लेना चाहिए, क्योंकि हम स्वयं को लेकर जितने पूर्वाग्रहग्रस्त होते हैं, जितने पक्षपाती होते हैं, उतने दूसरे तो नहीं होंगे। तो दूसरों से जाकर बातचीत कर ली, दूसरों से जाकर उनका मत माँग लिया, फीडबैक। उससे अपने बारे में कई बार धारणाएँ टूटती हैं। किसी को भी लग सकता है कि "मुझे तो कभी क्रोध आता नहीं," या "मैं तो बहुत सहयोगी आदमी हूँ, मैं तो देखो तमाम इधर-उधर सबकी मदद करता हूँ।” ऐसा-वैसा।
कभी-कभी दूसरों से पूछना चाहिए कि "हमें हमारे बारे में बताओ कुछ।” हो सकता है वो जो बताएँ, वो बिल्कुल कचरा हो। कचरा हो, तो भी उसको निष्पक्ष होकर सुन लो। उस कचरे से भी ये पता चलेगा कि देखो, जब एक आदमी दूसरे को देखता है, तो कैसा कचरा बताता है। लेकिन कई बार, उस कचरे में कुछ मूल्य की बातें मिल जाती है। एक ही चीज़ को अपने नज़रिए से देखा, उसी चीज़ को किसी और ने देखा, उससे पूछो। ये सब आत्म-अवलोकन की प्रक्रिया का हिस्सा है।
आत्म-अवलोकन बस ये नहीं है कि बैठे-बैठे कह रहे हैं, "मैं आत्म-अवलोकन कर रहा हूँ।" सक्रिय रूप से जाकर के पूछो।
जैसे, आपने एक फ़िल्म देखी किसी के साथ। फ़िल्म आमतौर पर आप किसी के साथ ही देखने जाते हो। आपने फ़िल्म देखी, अब आपने उस फ़िल्म में क्या देख लिया? और साथ में दो-तीन लोग थे, फिर उनसे पूछो कि क्या देख लिया तुमने भी?
यही नहीं कि फ़िल्म देख ली, हो गया, पॉपकॉर्न खा लिया, घर वापस जाओ, सो जाओ। फ़िल्म देखी है तो देखने के बाद आधे घंटे कहीं बैठ जाओ और कहो, "अच्छा, मैंने क्या देखा?" "अच्छा, तुमने क्या देखा?" इससे पता चलता है कि हमारी आँखें कितने चश्मों के माध्यम से देखती हैं। कितने हम पक्षपाती हैं। कितना हम एक व्यक्तिगत केंद्र से देखते हैं। फ़िल्म हो, समाज हो, घटना हो, जीवन हो, कुछ भी। आ रही है बात?
जो एक चीज़ कभी नहीं होने देनी चाहिए, वो है स्वयं को एक ईको-चैम्बर में डाल देना। जहाँ बस अहम् को अहम् की ही अनुगूंज सुनाई देती है। और आप अपने आपको एक कमरे में बंद कर लीजिए, और बोलिए "मैं अच्छा हूँ।" पंद्रह-बीस और लोग बोल रहे होंगे आपके साथ “मैं अच्छा हूँ, मैं अच्छा हूँ।" बड़ा अच्छा लगेगा। आपका नाम संदीप है, "संदीप के साथ बुरा हुआ।” बीस और लोग बोल रहे होंगे, "संदीप के साथ बुरा हुआ।"
ये कभी नहीं होने देना चाहिए।
जिन्हें स्वयं को बढ़ाना है, उनके लिए बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो दूसरों से बात ज़रूर करें। अपने आपको खुला रखें। अपने पास सिर्फ़ अपना ही पक्ष नहीं, तीन-चार और पक्ष आने दें। भले ही उनकी बात बुरी लगे। बात समझ रहे हैं आप?
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी। एक उसी से रिलेटेड थोड़ा-सा सवाल था, बहुत क्विकली मैं पूछ लूँगा। कर्ता-भाव। तो मैंने आपके काफ़ी सारे वीडियोज़ भी देखे थे; कहीं मुझे ये लगता है कि एक वीडियो में आपने बताया था, कि बहुत सारी चीजें जो हैं वो इन्फ्लुएंस करती हैं, और उससे हम बनते हैं, बहुत सारे इन्फ्लुएंसर्स से।
तो हमारा रिएक्शन जो होगा, वो भी बेस्ड ऑन हाउ वी आर फॉर्म्ड, और जो-जो इनफ्लुएंसेस आज तक हुए हैं, उस हिसाब से जो डाटा रहेगा दिमाग में, उस हिसाब से आई वुड बी रिएक्टिंग।
तो इन दैट केस, मैं अगर कर्ता हूँ ही नहीं और मैं सिर्फ़ परिस्थितियों से बना हूँ, तो फिर जब मैं ये डिसाइड करता हूँ कि मुझे संघर्ष करके सत्य को देखना है; तो वहाँ पर मैं कर्ता हूँ या मैं वहाँ पर भी कर्ता नहीं हूँ?
आचार्य प्रशांत: अपनी दृष्टि में तो आप सदैव कर्ता हैं न। जब आप कर्ता हो ही, तो क्यों झूठ बोलना अपने आप से। या तो आपको साफ़ दिख जाए और आप बोल दो, "मैं कर्ता नहीं हूँ;" तब आत्म-अवलोकन की कोई ज़रूरत नहीं है। पर मैं मेरी नज़र में तो कर्ता हूँ।
दुनिया कुछ बोल रही होगी, बोला होगा, गीता ने कुछ बोला होगा, ज्ञानियों ने कुछ। आप क्या गीता की, ज्ञानियों की बात मान रहे हो? आप अपनी नज़र में तो कर्ता ही हो न। आप अपनी ज़िंदगी की गाड़ी, अपनी दृष्टि में ख़ुद चला रहे हो। आपके ऊपर आपकी कामनाओं का बोझ है, कर्तव्यों का बोझ है। तो आप तो कर्ता बने ही बैठे हो। आप कर्म भी इसीलिए कर रहे हो, ताकि कर्मफल को एक दिन भोग सको। तो आप तो कर्ता बने ही बैठे हो, तो आप तो कर्ता हो ही। तो ये प्रश्न यहीं समाप्त हो गया।
तो अगर मैं कर्ता हूँ ही, तो मैं क्यों न देखूँ कि मैं क्या कर रहा हूँ। मैं उस दिन तक अपने आपको देखूँगा, जिस दिन तक मुझे ये साफ़-साफ़, ईमानदारी से नहीं दिख जाता कि "मैं कर्ता हूँ ही नहीं।" पर वो दिन पता नहीं कब आएगा। हम अग्रिम में ही क्यों बोल दें कि वो ऐसा एक दिन आने वाला है। पता नहीं आए, न आए। उस दिन का पता नहीं, पर आज का पता है। आज तो मेरे भीतर कर्तृत्व कूट-कूट कर भरा हुआ है। भरा हुआ है न?
हाँ तो जब भरा हुआ है, तो मैं कहूँगा “हाँ, मैं कर्ता हूँ।” और चूँकि मैं कर्ता हूँ, तो अपने उद्धार की ज़िम्मेदारी भी मैं लेता हूँ। पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लो।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।