आत्म-अवलोकन बस ये नहीं है कि बैठे-बैठे कह रहे हैं, 'मैं आत्म-अवलोकन कर रहा हूँ।' सक्रिय रूप से जाकर के पूछो। जैसे, आपने एक फ़िल्म देखी किसी के साथ। तो देखने के बाद आधे घंटे कहीं बैठ जाओ, और कहो, 'अच्छा, मैंने क्या देखा?' 'अच्छा, तुमने क्या देखा?' इससे पता चलता है कि कितने हम पक्षपाती हैं। फ़िल्म हो, समाज हो, घटना हो, जीवन हो, कुछ भी। जिन्हें स्वयं को बढ़ाना है, उनके लिए बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो दूसरों से बात ज़रूर करें। अपने पास सिर्फ़ अपना ही पक्ष नहीं, तीन-चार और पक्ष आने दें।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न आत्म-अवलोकन के बारे में है। पहले तो आत्म-अवलोकन कैसे करें? अगर मैं आत्म-अवलोकन कर रहा हूँ, और मेरी ज़िंदगी के बारे में, मेरे परिस्थिति के बारे में एक दृष्टि रख रहा हूँ, तो वो भी मैं मेरे ही हिसाब से कर रहा हूँ। जो मेरे पर्सपेक्टिव हैं, उसी एंगल मे मैं उसको देख रहा हूँ। तो फिर इंडिपेंडेंटली मैं वो कैसे करूँ? जो मेरे प्रायर एक्सपीरियंसेस हैं, मेरे थॉट्स हैं, मेरी धारणाएँ हैं उनसे वो प्रभावित न हो, आत्म-अवलोकन और वो शुद्ध हो। तो मैं वो कैसे करूँ?
आचार्य प्रशांत: हाँ, ये व्यवहारिक समस्या है। अच्छा करा आपने पूछा। सबको आती होगी ये समस्या, कि “जब मैं ख़ुद को देखता हूँ, तो मैं निष्पक्ष होकर नहीं देख पाता।”
मैं ख़ुद को मैं ही तो बनकर देख रहा हूँ; और आत्म-अवलोकन का मतलब होता है, जितना अपने आप से दूरी बनाकर देखोगे उतना सच्चाई पता चलेगी। और मैं ही बनकर मैं को देखोगे, तो हमेशा मैं के ही पक्ष में कुछ विचार, निर्णय, फ़ैसला आ जाएगा। वो फिर बस सेल्फ इंडिकेशन हो जाता है, कि जो मैं हूँ उसी को सत्यापित कर दिया और कह दिया कि, "ये तो मैंने अभी रिफ्लेक्शन




