निर्वाण षट्कम को स्वयं तक पहुँचने का आख़िरी सूत्र भी माना जाता है। निर्वाण षट्कम के सब के सब श्लोक मात्र नकार में हैं। सब बस ये बता रहे हैं कि किसको ज़िंदगी में अहमियत नहीं देनी है। वो सब, जो मैं नहीं हूँ, जो मुझे बाँध कर रखता है, उसका नकार ही शिवत्व है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इनको बहुत महत्त्व नहीं देना है। इन सबका उपयोग कर लेना, उधर बढ़ने को, जिधर शुद्धता हो। हम में उस शुद्धता से प्रेम रहे। जहाँ कहीं भी कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं को चुनौती दे रहा है, शिवत्व वहीं है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे । न च व्योमभूमि- र्न तेजो न वायुः चिदानंदरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।।
~निर्वाण षट्कम
आचार्य प्रशांत: महाशिवरात्रि का पर्व है। सबसे पहले तो आपका आभार। मेरे लिए बहुत मार्मिक बात रहती है, हृदय-स्पर्शी बिल्कुल आप लोग। आप लोग दूर से आते हैं, देश के कई कोनों से, कुछ लोग विदेशों से भी आए हैं। सबसे पहले तो आपका आभार।
मेरे लिए बहुत एक महत्त्वपूर्ण दिन होता है, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि आज महाशिवरात्रि है, बल्कि इसलिए क्योंकि जहाँ कहीं भी व्यक्ति शारीरिक, भौतिक, सांसारिक स्थितियों की बाधाओं की परवाह किए बिना वो करे जो चित्-स्वरूप है, जो चेतना-सम्मत है, उसको ही शिवत्व कहते हैं।



