ज़िंदगी में मुश्किलें रहेंगी, कोई बात नहीं

Acharya Prashant

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ज़िंदगी में मुश्किलें रहेंगी, कोई बात नहीं
इंसान होने का मतलब ही है बहुत कुछ होगा जो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर का होगा। एक चीज़ है तुम्हारे हक़ में। क्या? घटना कुछ भी घट रही हो, उस घटना को उत्तर क्या देना है। तुम्हारा प्रतिसाद, तुम्हारी प्रतिक्रिया, ये तुम्हारे अधिकार में हो सकते हैं। बिल्कुल संभव है कि बाहर बड़ी से बड़ी कठिनाई हो, कष्ट हो; भीतर तुम्हारे एक अस्पर्शित शांति बनी ही रहे। जो ऐसा कर ले गया, वो न सिर्फ़ जी गया, वो जीवन के पार निकल गया। सिर्फ़ उसी का जीवन सार्थक हुआ। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। जीवन की कठिनाइयों का सामना करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका क्या है? आपके द्वारा बताई गई युक्ति से लाभ तो हुआ, परंतु बीच-बीच में माया अपना कार्य कर जाती है और फिर फिसल जाता हूँ। बहुत बेचैनी होती है। क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: नहीं तो माया अपना काम न करे? गेंदबाज़ गेंद तुम्हें अंडर आर्म लुड़का के देगा क्या? जानते हो फिर दिक़्क़त क्या आएगी? छक्का नहीं मार पाओगे। सुर्रा गेंद समझते हो? उस पर छक्का पड़ सकता है? मज़ा भी तभी आता है न, जब बिल्कुल नाक-गर्दन की ओर आ रही बाउंसर हो और उसको हुक करो मुँह के सामने से और छह रन।

देने वाले ने माया को भी सामर्थ्य दी है और तुम्हें भी, वो अपना काम करेगी। वो क्या कर रही है, उसकी शिकायत छोड़ो, चर्चा भी मत करो। तुम अपना काम करो न, जीव पैदा हुए हो। पहली माया तो यही है कि तुम जीव पैदा हो गए, यही बड़ी मायावी बात है। और इसके बाद तो मायावी घटनाओं की पूरी श्रृंखला लगी ही रहेगी, तुम देखो कि तुम्हें फँसना है या नहीं। तुम देखो कि तुम्हें दुख कितना सहना है और आनंद की तुम्हारी अभिप्सा कितनी है।

माया पर तुम्हारा बस नहीं है, अपने सामर्थ्य पर तुम्हारा बस हो सकता है।

प्रकृति तुमसे बाहर का तंत्र है, वो तुमसे पूछकर नहीं चलेगी। जीवन के संयोग तुम्हारे अधिकार के नहीं हैं, तुम्हें नहीं पता कब, क्या, कहाँ, कैसे हो जाएगा; कोई नहीं जानता। अवतार और पैगंबर भी जब ज़मीन पर उतरते हैं तो उनके साथ भी संयोगवश अनहोनी घटनाएँ हो जाती हैं, उनको भी झटके लग जाते हैं। हम कौन हैं।

इंसान होने का मतलब ही है, बहुत कुछ होगा जो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर का होगा। एक चीज़ है तुम्हारे हक़ में। क्या? घटना कुछ भी घट रही हो, उस घटना को उत्तर क्या देना है। तुम्हारा प्रतिसाद, तुम्हारी प्रतिक्रिया, ये तुम्हारे अधिकार में हो सकते हैं। हो सकते हैं, ज़रूरी नहीं है कि हों। अधिकांश लोगों के हाथ में नहीं होते।

अधिकांश लोग तो संयोगों के ग़ुलाम बनकर ही जीते हैं। बाहर किसी ने रुष्ट किया तो भीतर का मौसम बिल्कुल गर्म हो गया। बाहर से कोई आया और प्रशंसा कर गया तो भीतर फूल खिल गए। निंदा हो गई तो भीतर मरुता हो गई।

कोई तारीफ़ करेगा, कोई आलोचना, किसका बस है; जीवन-मरण पर भी किसका बस है। लेकिन एक चीज़ है जिस पर माया का ज़रा भी अधिकार नहीं, वो है तुम्हारी आंतरिकता, तुम्हारे भीतर क्या है। और ये बिल्कुल संभव है कि बाहर बड़ी से बड़ी कठिनाई हो, कष्ट हो, दुश्वारी हो, भीतर तुम्हारे एक अस्पर्शित शांति बनी ही रहे। जो ऐसा कर ले गया, वो न सिर्फ़ जी गया, वो जीवन के पार निकल गया। सिर्फ़ उसी का जीवन सार्थक हुआ। अन्यथा तो जीवन कुछ नहीं है, क्रिया-प्रतिक्रिया की एक सीमित श्रृंखला मात्र है।

कुछ बाहर हुआ, कुछ तुमने किया। जो तुमने किया उसके फलस्वरूप फिर बाहर कुछ हुआ, फिर तुमने कुछ किया। ऐसे ही अपनी कड़ी आगे बढ़ती रहती है, एक दिन मर-मुरा जाता है आदमी। कई बार तो मरना भी एक प्रतिक्रिया ही होती है; बाहर कुछ हुआ, साहब ने अपनी जान ही ले ली। जैसे पैदा हुए थे ठीक वैसे ही मरे, प्रतिक्रिया वश। समझ में आ रही है बात?

क्रिया-प्रतिक्रिया की कठपुतली ही बनकर न जियो। इसके लिए ज़रूरी है कि भीतर वो हो, जिसको ऋषियों ने कहा आत्मा।

आत्मन् माने वो जो पूरी तरह से तुम्हारा है, जो दूसरों की ग़ुलामी में नहीं चलता, जो दूसरों के बहकावे और प्रभाव में नहीं आ जाता, उसको कहते हैं आत्मा।

अधिकांश लोग आत्मा से बड़े हीन होते हैं, आत्मा से बड़ी दूरी होती है उनकी। अपने आप को ऐसी जगह ले आए होते हैं जहाँ आत्मा से उन्होंने सब संबंध ही छोड़ दिया होता है। फिर वो क्या हैं? वो फिर हाड़-मांस हैं बस। आध्यात्मिक अर्थों में उनको जीवित कहना भी ठीक नहीं होगा। वो चलते हैं, फिरते हैं, खाते हैं, पीते हैं, उठते-बैठते हैं, सोते-जागते हैं। तो वैज्ञानिक दृष्टि से, भौतिक दृष्टि से ऐसा लगता है कि वो ज़िंदा हैं, पर वो ज़िंदा हैं नहीं। ज़िंदा सिर्फ़ उसको मान सकते हो, जिसका कोई अपना वजूद हो।

जिसका वजूद संसार को एक प्रतिक्रिया मात्र है, उसकी अपनी कोई हस्ती हुई क्या? अपनी कोई हस्ती हुई उसकी? तो हम में से अधिकांश लोग हैं ही नहीं। इसी को बुद्ध बता गए थे अनत्ता, हम नहीं हैं। हमें बड़ा अच्छा लगता है कहना कि हम हैं; "मैं, मैं" हम खूब करते रहते हैं पर हम हैं नहीं।

हम कठपुतली भर हैं। और कठपुतली सोचो, बोले बार-बार "मैं," तो हँसोगे न। जितना ज़्यादा वो बोलेगी "मैं," उतना हँसोगे। तुम कहोगे, तू है कहाँ? तेरी डोर तो पता नहीं कितने दूसरे लोगों के हाथ में है, तुझे रचा भी दूसरों ने और तुझे चला भी दूसरे ही रहे हैं। तू क्यों बोलती है "मैं?” यही माया है, न होना पर कहना "मैं हूँ।" यः माः सः, माया जो है नहीं पर कहती खूब है कि "मैं हूँ," उसको कहते हैं माया।

तो हम में से अधिकांश लोग माया का सामना नहीं कर रहे, हम में से अधिकांश लोग माया ही हैं। क्योंकि हम हैं ही नहीं, पर हमें एहसास ऐसा होता है जैसे कि हम हैं। हम हैं ही नहीं। हम ठीक उतने ही हैं जितना एक कठपुतली होती है या जितना ये पंखा है, कि किसी ने चला दिया तो चल रहा है, कोई बंद करेगा तो बंद भी हो जाएगा। हमसे बेहतर है, क्योंकि वहाँ बैठकर "मैं-मैं" तो नहीं चिल्ला रहा। क्योंकि "मैं-मैं" नहीं चिल्ला रहा, इसीलिए कष्ट में भी नहीं है। हम पहली बात तो मशीन हैं और हम बड़ी मैमियाती हुई मशीन हैं। एक ऐसी मशीन जिसको इस बात के लिए भी संस्कारित कर दिया गया है कि हर वाक्य के साथ बोलो, "मैं।"

अध्यात्म फिर क्या है? अध्यात्म है मशीन को याद दिलाना कि तू मशीन नहीं है। तू मशीन ही होती तो तुझे कोई कष्ट नहीं होता। कोई मशीन है जो तड़प के रोती हो? पर हम रोते हैं न। कोई मशीन है जो कहती हो कि मुझे मुक्ति दे दो, कहती है कभी? झड़ सकती है, जंग लग सकता है, गिर सकती है, बेकार हो सकती है, पर कष्ट में नहीं जीती न।

हम कष्ट का अनुभव करते हैं, इसी से साबित होता है कि हमने गलती कर दी मशीन बनके। हम कुछ और हैं, बन कुछ और गए हैं, इसको कहते हैं माया से बाहर आना। जब तुम्हें दिख जाए, कुछ और हो और कुछ और ही बनकर जी रहे हो, इसीलिए परेशान हो। उस दिन तुम कुछ ऐसा करते हो जो धारणाओं, संस्कारों, कंडीशनिंग से बाहर का होता है। कुछ नया करते हो बिल्कुल, कुछ अलग, अप्रत्याशित। अब कुछ नया हुआ।

श्रोता: जो डेली हमारी लाइफ़ में प्रॉब्लम्स आती हैं, उनको कैसे फेस करना है?

आचार्य प्रशांत: उन्हें एक समस्या क्यों कहते हैं आप? जब आप कह रहे हैं कि जीवन की रोज़मर्रा की समस्याओं का सामना कैसे करें? मैं थोड़ा समझना चाहूँगा, आप समस्या किसको कहते हैं?

श्रोता: अनएक्सपेक्टेड इवेंट्स।

आचार्य प्रशांत: आप एक्सपेक्ट क्या कर रहे होते हैं? और अनएक्सपेक्टेड इवेंट ये हो कि सुबह-सुबह कोई आकर बताए, लॉटरी लग गई। क्या तो भी वो समस्या है? वो भी तो अप्रत्याशित ही है न। उसको भी समस्या कहते हैं क्या? उसको तो समस्या नहीं कहते। समस्या की हमारी परिभाषा क्या है?

श्रोता: जो हमारे अनुरूप न हो। जो हमारी आदतों के हिसाब से न हो।

आचार्य प्रशांत: हमारी कुछ इच्छाएँ होती हैं। उन इच्छाओं से हमारी अपेक्षाएँ, उम्मीदें निकलती हैं। जब उनके ख़िलाफ़ कुछ हो जाता है तो हम कहते हैं समस्या। तो समस्या वास्तव में आपकी इच्छाओं के विरुद्ध है। है न?

अब ये बताइएगा कि आपकी जो इच्छाएँ समस्याओं से रुकी नहीं, पूरी भी हो गईं, वो क्या वाक़ई आपको संतुष्टि दे पाई हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है, ग़ौर करके देखिएगा कि आज आप जिन समस्याओं में अपने आप को घिरा पाते हैं, उनमें से अधिकांशतः आपकी पूरी हुई इच्छाओं से जनित हैं। कहिए? आज आप जिसको समस्या कह रहे हैं, उस समस्या के मूल में कहीं आपकी कोई पुरानी इच्छा ही तो नहीं है। अपूर्ण इच्छा नहीं, पूर्ण इच्छा। इच्छा जो कल पूरी हो गई थी वो आज की समस्या है। कहीं ऐसा तो नहीं है।

कल की पूर्ण इच्छा आज की समस्या है और हम कहते हैं कि जो मेरी इच्छा पूरी नहीं हो रही हैं, मैं उनको पूरा करना चाहता हूँ। जो पूरी हो रही हैं इच्छाएँ, वही बन जा रही हैं समस्याएँ। आपने इस दृष्टि से शायद देखा नहीं होगा, ग़ौर करेंगे तो बात कुछ खुलेगी। दोहराता हूँ, जो पूरी हो जा रही हैं इच्छाएँ, आप पा रहे हैं कि वही बन जा रही हैं समस्याएँ। और फिर भी आपका आग्रह ये है कि आज जो इच्छाएँ हैं, उन्हें मुझे पूरा करना ही करना है। अब ये तो बड़ी दिक़्क़त है, पूरी नहीं हुई इच्छा तो आप कहते हैं समस्या। और ये नहीं देखते हैं कि आज जो सामने खड़ी है समस्या, वो आ रही है पूरी हुई इच्छा से ही।

हम आमतौर पर सोचते हैं कि इच्छा का पूरा न होना बड़ी बुरी बात है। बड़ा दुख मनाते हैं न इच्छा नहीं पूरी हुई। जो पूरी हो गई थीं इच्छाएँ, उन्होंने फल क्या दिए ये हम नहीं देखते; विचारणीय है। ज़्यादा बुरा क्या है, अपूर्ण इच्छाएँ या पूर्ण इच्छाएँ? ज़्यादा बुरा कब होता है? जब जो चाहा वो मिला नहीं, या जब जो चाहा वो मिल ही गया।

याद रखिएगा, हर इच्छा को पूरी करने की एक कीमत होती है। जो इच्छा पूरी हुई है, आवश्यक नहीं है कि वो आपको बड़ा नुकसान पहुँचाए। तभी आप कहें कि ये तो भारी पड़ी, ये तो समस्या बन गई। ये भी देखिएगा कि जो पूरी हुई इच्छा, उसको पूरी करने में आपने जितना समय लगाया, जीवन लगाया, संसाधन लगाए, ऊर्जा लगाई, वो अगर किसी और दिशा में, सही दिशा में लगाए होते तो क्या मिलता?

बात समझ रहे हो?

क्योंकि समय सीमित है, संसाधन सीमित हैं। चार साल लगा दिए किसी इच्छा को पूरी करने में। वो पूरी हो भी गई मान लो, तो ये बताओ कि जीवन के वो जो चार वर्ष हैं, क्या उनका सर्वश्रेष्ठ उपयोग यही था कि इसी में लगाया जाए? इच्छाओं को लेकर के बहुत सतर्क रहिए। दिक़्क़त ये नहीं है कि आप जो माँगते हैं उसको पाना बड़ा मुश्किल है। मैंने देखा है कि आदमी का दुर्भाग्य ये है कि वो जो माँगता है, अक्सर उसको वो मिल जाता है। तो बहुत सावधान रहिए माँगने में। कहीं ऐसा न हो, जो चाह रहे हैं वो हो ही जाए। फिर क्या करोगे? किसको दोष दोगे? तुम ही ने चाहा था।

जब इच्छा उठे तो ग़ौर से पूछिए, क्या है जो माँगने लायक है वाक़ई? जो ऊँचे से ऊँचा है, उसको ही माँगो। ऊँचे से ऊँचा माँगोगे तो बड़ी समस्या पैदा हो जाएगी, क्योंकि हमारी तो छोटी ही माँगे मुश्किल से पूरी होती हैं और यही बड़ी राहत की बात है। जिसने कोई बहुत ऊँची चीज़ माँग ली, उसके सामने एक ऊँची समस्या खड़ी हो जाती है कि वो ऊँची चीज़ चाहिए।

राहत क्या मिलती है? राहत ये मिलती है कि समस्या खड़ी हो जाती है, समस्याएँ गायब हो जाती हैं। हमारे पास तो समस्याओं की लंबी सूची होती है न, दिनभर की इच्छाएँ और हर इच्छा की पूर्ति में कुछ बाधा। ये समस्या, ये समस्या, ये समस्या, ये समस्या, जैसे किसी आदमी को दस जगह से मच्छर काट रहे हों। तो मैं कहा करता हूँ, इससे अच्छा जाकर तुम शेर का सामना कर लो। और जो मच्छरों से आतंकित हों, वो पुष्टि करेंगे मेरी बात। वो कहेंगे, शेर से भिड़ लेना ज़्यादा ठीक है; एक बार में आर-पार कर देते हैं।

कल्पना ही कर लो न, जीवन अगर ऐसा हो कि लगातार आठों पहर दस-बीस-चालीस मच्छर तुम्हें चुग ही रहे हैं, तो जियोगे कैसे? बोलो, जी पाओगे? उससे अच्छा क्या ये नहीं है कि एक बड़ी चुनौती स्वीकार कर लो ताकि ये सब छोटी-मोटी समस्याएँ तिरोहित हो जाएँ।

ज़िंदगी का नरक है रोज़मर्रा की समस्याएँ, और ज़िंदगी का अमृत है एक ऊँची चुनौती।

रोज़मर्रा की समस्या समझते हो न? दूध नहीं। चुन्नू के जूते में मकड़ा घुस गया, अब दिनभर अफ़रा-तफ़री मची हुई है। मकड़े का पूरा खानदान खौफ़ में है, ढूँढाई चल रही है। आज साँझ को सीरियल में क्या होगा और जो सीरियल में होगा, उससे घर में कितना बवाल मचेगा।

क्रेडिट कार्ड वाले ने ₹150 ज़्यादा लगा दिए बिल में, अब दो दिन से फोन लेके उसको पछिया रहे हैं और हेल्पलाइन में कॉल कर रहे हैं। वहाँ वो बोलते हैं, आप कतार में हैं। ठीक है, कतार में रहूँगा, छोड़ूँगा नहीं ₹150। रात में जग-जग के, दो बजे, चार बजे फोन किया जा रहा है कि ₹150। वो काहे को सुने। एक ने सुन भी लिया, बता भी दिया, तो भी कुछ हुआ नहीं। अब उसको ढूँढ रहे हैं। कह रहे हैं, वो तुम्हारे कॉल सेंटर में कहाँ है पिंकी शर्मा? काहे को मिले पिंकी शर्मा; और बड़ी भारी समस्या है, और फोन पर लगे हुए थे बिल्कुल झल्लाए हुए हैं। तभी पीछे से आकर चुन्नू ने पैंट खींच दी, तो पटाक से एक चुन्नू को झापड़। वहाँ चुन्नू को झापड़ पड़ा ही नहीं कि चुन्नू की मम्मी ने आकर के लगाया, कौन पिंकी शर्मा? दो दिन से काहे इसके पीछे पड़े हो? नीयत ही साफ़ नहीं है तुम्हारी।

और किसको बोलते हो रोज़मर्रा की समस्या; भाई, तुम हल्दीघाटी की लड़ाई लड़ने जाते हो क्या? ज़िंदगी में कुछ बड़ा है? रोज़मर्रा की समस्या और क्या होती है? और ये हीरा-जन्म अमोल था, कौड़ी बदले जाए। इसलिए पैदा हुए थे पिंकी शर्मा को पछियाने ख़ातिर? ये दो दिनों की कीमत ₹150 से भी कम थी? कुछ बड़ा है जीवन में? पूछ रहा हूँ। आप भौचक्के रह जाएँगे, 99.9% लोगों का दुनिया में किसी विस्तृत, वृहद काम से कोई सरोकार ही नहीं होता।

हम कीड़े-मकोड़ों को देखते हैं तो उन्हें धिक्कारते हैं। हम कहते हैं, ये देखो मक्खी, इसे कोई लेना-देना ही नहीं किसी और चीज़ से। यहाँ गुड़ मिल जाए, वहाँ गंदगी मिल जाए, बस इसी में लगी रहती है। यही कहते हैं न? बोलो। और छोटे-मोटे कीड़े, कोई बल्ब पर जाकर बैठ रहा है, कोई कहीं घुसा हुआ है। एक छिपकली है जो उनके पीछे लगी हुई है, इनको देखते हैं तो हम लानत भेजते हैं। कहते हैं, ये कोई जीवन है; और हमारा जीवन?

धनिया, मेथी, लहसुन, हींग, चेतना पर इन्होंने कब्ज़ा करा हुआ है। हींग इतनी बड़ी चीज़ हो गई, दिन में तीन-चार घंटे ज़ेहन पर क्या छाई हुई है? हींग। और लानत भेज रहे हो मक्खी-मच्छर पर। हींग के लिए पैदा हुए थे? कोई पूछेगा, जीवन में क्या किया? तो क्या बोलोगे? हिंगा लाला!

कोई बड़ी समस्या उठाइए तो दिनभर के इस नरक से अपने-आप मुक्ति मिल जाएगी। उसके बाद आप जिसको समस्या कहते हैं, वो प्रतीत होनी भी बंद हो जाएगी। और अगर बड़ी समस्या नहीं स्वयं आमंत्रित करोगे, छोटी ही छोटी चीज़ों में उलझे रहोगे, तो मैं कह रहा हूँ, छोटी इच्छा का पूर्ण होना भी एक नई समस्या बनेगा ही बनेगा। अंतर स्पष्ट हो रहा है?

छोटी इच्छा रखोगे तो उसकी अपूर्णता भी खलेगी और पूर्णता उसकी एक नई समस्या बनकर सामने आएगी। और बड़ी चुनौती जीवन में उठा लोगे, बड़े सरोकार रखोगे, तो पहली बात तो ये कि छोटी समस्याएँ तिरोहित हो जाएँगी और दूसरी बात, एक लड़ाई बचेगी। वो लड़ाई अगर जीत ली, तो तर गए। और नहीं जीती, जीतने की कोशिश में मर गए, तो मर गए। कम से कम ज़रा शान के साथ मरोगे, किसी बड़े अभियान में मरोगे।

एक होता है जो रणभूमि में मरता है तो कहलाता है, शहीद। और मौत कई दूसरे तरह की भी होती है, मरते तो सभी हैं। कोई ऐसा युद्ध चुनो न कि जीवन की रणभूमि में शहीद कहलाओ, या फिर विजेता। दोनों ही बातें ज़रा सम्मान की हैं। नहीं तो लौंग, लहसुन।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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