इंसान होने का मतलब ही है बहुत कुछ होगा जो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर का होगा। एक चीज़ है तुम्हारे हक़ में। क्या? घटना कुछ भी घट रही हो, उस घटना को उत्तर क्या देना है। तुम्हारा प्रतिसाद, तुम्हारी प्रतिक्रिया, ये तुम्हारे अधिकार में हो सकते हैं। बिल्कुल संभव है कि बाहर बड़ी से बड़ी कठिनाई हो, कष्ट हो; भीतर तुम्हारे एक अस्पर्शित शांति बनी ही रहे। जो ऐसा कर ले गया, वो न सिर्फ़ जी गया, वो जीवन के पार निकल गया। सिर्फ़ उसी का जीवन सार्थक हुआ।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। जीवन की कठिनाइयों का सामना करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका क्या है? आपके द्वारा बताई गई युक्ति से लाभ तो हुआ, परंतु बीच-बीच में माया अपना कार्य कर जाती है और फिर फिसल जाता हूँ। बहुत बेचैनी होती है। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: नहीं तो माया अपना काम न करे? गेंदबाज़ गेंद तुम्हें अंडर आर्म लुड़का के देगा क्या? जानते हो फिर दिक़्क़त क्या आएगी? छक्का नहीं मार पाओगे। सुर्रा गेंद समझते हो? उस पर छक्का पड़ सकता है? मज़ा भी तभी आता है न, जब बिल्कुल नाक-गर्दन की ओर आ रही बाउंसर हो और उसको हुक करो मुँह के सामने से और छह रन।
देने वाले ने माया को भी सामर्थ्य दी है और तुम्हें भी, वो अपना काम करेगी। वो क्या कर रही है, उसकी शिकायत छोड़ो, चर्चा भी मत करो। तुम अपना काम करो न, जीव पैदा हुए हो। पहली माया तो यही है कि तुम जीव पैदा हो गए, यही बड़ी मायावी बात है। और इसके बाद तो मायावी घटनाओं की पूरी श्रृंखला लगी ही रहेगी, तुम देखो कि तुम्हें फँसना है या नहीं। तुम देखो कि तुम्हें दुख कितना सहना है और आनंद की तुम्हारी अभिप्सा कितनी है।




