भारतीय चित्त बहुत हद तक ऐसा हो गया कि हमें कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं करना। नींद आ रही? नहीं आ रही। खाओगे? नहीं खाएँगे। कपड़ा चाहिए? नहीं चाहिए। पैसा चाहिए? नहीं चाहिए। तू जी ही क्यों रहा है फिर, जब तुझे कुछ नहीं चाहिए तो? भीतर कामना भरी हुई है और बाहर से संस्कारी दिखना है। जो खुल के नहीं बता सकता कि उसकी कामना क्या है, उसके पास छुपी हुई बहुत बड़ी कामना है। सरल हो जाओ। प्रकृति ने पैदा किया है। प्रकृति को ही हम महा-माँ बोलते हैं। जैसे भी हो, वैसे हो, पैदा ही ऐसे हुए हो, शर्माने-लजाने की क्या बात है इसमें?
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा सवाल हमारे भारत देश को लेकर है। आचार्य जी, इस विषय में हमारे भारत पर काफ़ी इल्ज़ाम लगाए जाते हैं कि जो सामाजिक कुरीतियाँ रही हैं या फिर विज्ञान में बहुत तरक्क़ी नहीं मिल पाई है, तो इसका कारण बहुत ज़्यादा धर्म को बताया जाता है। लेकिन इसी देश में उपनिषद् हैं, जो सिखाते हैं कि विद्या और अविद्या दोनों का ही महत्त्व है। तो कई मामलों में जो भारत पिछड़ा रहा है, तो क्या इसका कारण सही में धर्म हो सकता है?
आचार्य प्रशांत: देखो, बाहर बदलो, बाहर पूजा-पाठ करो, बाहर मत बदलो, बाहर मत पूजा-पाठ करो, ये सब क्या हो गए? कर्म हैं न ये तो, ये करो, ये न करो। और गीता बार-बार खींचकर कहाँ ले जाती है आपको?
प्रश्नकर्ता: कर्ता पर।
आचार्य प्रशांत: कर्ता पर ले जाती है न। अगर कर्ता भाव विलुप्त हो चुका है, अहंकार एकदम तृप्त हो चुका है और उसके बाद अजगर बनना चाहते हो, कुछ नहीं करना, तो स्वागत है, पड़े रहो, अगर ऐसे हो जाओ तो। ऐसा आमतौर पर देखा नहीं गया है, ज़्यादा संभावना यही है कि जब अहम् मुक्त हो जाओगे तो कर्म तुम्हारा और घोर हो जाएगा, क्योंकि अब बचाने को कुछ बचा नहीं न।




