
प्रश्नकर्ता: मेरा जो प्रश्न है, वो अभी के चल रहे ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच जो युद्ध चल रहा है, उससे संबंधित है। एक तरफ तो हम देख रहे हैं कि इस युद्ध का इस्तेमाल जो न्यूज़ टीवी चैनल्स हैं वो अपने टीआरपी मुनाफे के लिए कर रहे हैं। दूसरी तरफ लोग हैं जो इसी तबाही का इस्तेमाल कर रहे हैं पैसा कमाने के लिए, जिसका एक उदाहरण हम देख रहे हैं, एलपीजी सिलिंडरस्, उनकी कालाबाज़ारी जो चल रही है।
तो आचार्य जी, हमारे अंदर ऐसा क्या है जो ऐसी त्रासद और दुखद स्थिति में भी केवल अपना ही मुनाफा देख रहा है?
आचार्य प्रशांत: हमारे अंदर ऐसा क्या है, इसमें कोई गोपनीय बात तो है नहीं। हमारे अंदर वही है जो है नहीं, पर उसका दावा पूरा रहता है कि मैं ही मैं हूँ, मैं ही मैं हूँ, दूसरा कोई नहीं। और उसका नाम भी कोई राज़ नहीं है, उसका नाम रटते-रटते तो…
क्या नाम है उसका?
प्रश्नकर्ता: अहंकार।
आचार्य प्रशांत: तो मैं इसमें नया क्या बताऊँ? उसने अपने आप को परिभाषित ही ऐसे करा है, मैं कौन हूँ? जिसका कोई नहीं। मैं कौन हूँ? जिसका कोई नहीं। शरीर भी उसके लिए बस एक घर है, और घर भी ऐसी चीज़ नहीं होती जिसका शोषण नहीं किया जा सके। घर भी ऐसी चीज़ नहीं होती जिसको बेचा न जा सके। घर भी ऐसी चीज़ नहीं होती जिस पर हथौड़ा न चलाया जा सके। अहंकार किसी पर भी हथौड़ा चला सकता है। अहंकार कुछ भी बेचकर खा सकता है। देखा है न, वो शरीर का ही कैसे शोषण करता है।
अहंकार को अकेलापन लग रहा है। अकेलापन लग रहा है, तो शराब पिए जा रहा है या गंदा खाना खाए जा रहा है, तेल, मिर्च, घी। अकेलापन किसको लग रहा था? शरीर को? पर जो ये तुम खा-पी रहे हो, इससे बर्बाद कौन हुआ? शरीर। अकेलापन किसको लग रहा था? अहंकार को। शरीर को लग रहा होता तो शरीर तब भी अकेला अनुभव करता जब सोता है। पर जब आप सो जाते हो अहंकार की दशा बदल जाती है, तब तो अकेलापन कहीं नहीं रहता। अकेलापन था अहंकार को, बर्बाद उसने किसको कर दिया? शरीर को। आज बहुत अकेलापन है, तो आज चॉकलेट ज़्यादा खा लेते हैं। आज कुछ डिप्रेशन-सा लग रहा है, चलो, चाट-पकौड़ी खाकर आते हैं। वीकेंड है, चार दोस्त आ गए, चलो महफ़िल जमाते हैं, बोतल खोलो।
अहंकार का मतलब ही है, वो जो अपने आप को सदा अपूर्ण मानता है। सदा अपूर्ण ही मानता है वो अपने आप को। वो किसी का सगा नहीं। जब वो अपना ही सगा नहीं तो वो किसी और का क्या सगा होगा। वो तो अपना भी भला नहीं कर सकता, वो किसी और का क्या भला करेगा।
तो आपको ताज्जुब क्यों होता है, जब आप देखते हो कि एक देश दूसरे पर चढ़ बैठा, फिर मीडिया उससे मज़े ले रहा है, फिर कोई कालाबाज़ारी करके उसमें से पैसे कमा रहा है। वो आज ही नहीं हुआ है। जब और भी लड़ाइयाँ हुई थीं, तब भी यही होता था। जब भी इतिहास में युद्ध हुए हैं, समाज का एक वर्ग रहा है जो अचानक अमीर हो गया है। अहंकार किसी का सगा नहीं है, बोल तो रहा हूँ। दूसरों की लाशें गिर रही हों, उनसे मुनाफ़ा बनाना उसके लिए बहुत आसान है। वो तो ऐसा है कि अपनी भी लाश गिरा दे, अपनी, माने इस शरीर की, जिसके भीतर वो स्वयं को स्थापित मानता है। वो तो ऐसा है कि इस शरीर की भी, अपने ही शरीर की भी लाश गिरा दे अपने फ़ायदे के लिए। आत्महत्या, उदाहरण के लिए, और क्या होती है।
लुट गया, बर्बाद हो गया, ये क्या शरीर को लग रहा था? ये क्या शरीर को लग रहा था? हालत खराब किसकी थी? क्या शरीर की? पच्चीस साल का जवान लड़का है, शरीर तो उसका हट्टा-कट्टा था। शरीर को तो कुछ ख़राबी नहीं थी। सारी ख़राबी किसको दी? अहंकार को। मार किसको दिया? लटक गया पंखे से। किसको मारा? अहंकार को मारा क्या? शरीर को मारा है। अहंकार ऐसा है कि दूसरों की लाशें क्या, अपनी भी लाश गिरा दे।
चले गए किसी आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्र में, वहाँ अहंकार को बिल्कुल प्रशिक्षित कर दिया गया कि जाओ और बम बाँधकर जाओ और कहीं पर उड़ा दो बिल्कुल, फ़िदाईन दस्ता बना दिया। जवान लड़का था फिर से पच्चीस साल का, क्या करा जाकर के? यहाँ पेट में बम बाँधा, शरीर उड़ा दिया। पर उस क्षण में भी प्रफुल्लित और गर्वित कौन अनुभव कर रहा था? अहंकार।
अहंकार अपने स्वार्थ की ख़ातिर दूसरों का शरीर तो छोड़ो अपना शरीर भी उड़ा दे। अहंकार अपने स्वार्थ की ख़ातिर कुछ भी उड़ा सकता है।
आदमी अच्छा होता है, मूलभूत रूप से तो हम सभी अच्छे हैं। अरे, इंसानियत भी कोई चीज़ होती है, हम किसी धर्म को नहीं मानते, हम तो मानवता को मानते हैं, इससे बड़ी मूर्खता की बात नहीं होती कोई। मानवता माने क्या होता है? मानव भी एक जानवर है बस और कुछ नहीं है, मानवता माने पशुता। “न हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा।” बेवकूफ़ी भरी और अर्थहीन बात है ये।
धर्म होता ही इसलिए है कि ये जो माँ के गर्भ से जानवर निकला है, इसको इंसान बनाया जा सके। तुम उसको छोड़ दो जंगल में, देखो क्या होता है उसका। तुम उसे कोई शिक्षा-दीक्षा मत दो, छोड़ दो जंगल में। फिर देखो कि वो इंसान की औलाद है, कौन सा इंसान बनता है।
आपको ताज्जुब इस बात का है कि अहंकार इतना हिंसक कैसे हो जाता है? और मुझे ताज्जुब इस बात का है कि आपको ताज्जुब क्यों हो रहा है? इसमें ताज्जुब की क्या बात है? मैं बताता हूँ ताज्जुब की क्या बात है। यहाँ से असली मुद्दा शुरू होता है। यहाँ से ताज्जुब की ये बात है कि हमने अपने आप को पट्टी पढ़ा रखी है कि हम भी अच्छे लोग हैं, हमारे आसपास भी अच्छे लोग हैं। नहीं, ऐसा नहीं है, मुझे माफ़ करिएगा दो दिन के लिए आपके शहर आया और कड़वी बात बोल रहा हूँ, हम बहुत बुरे लोग हैं, हम बहुत बुरे लोग हैं। हर एक व्यक्ति। हम बुरे न होते तो धर्म की, अध्यात्म की, शिक्षा की हमें कोई ज़रूरत ना होती। और हमारी बुराई और ज़्यादा बढ़ जाती है जब हम बुराई के ऊपर अच्छाई का नक़ाब ओढ़ लेते हैं।
आप कहते हो न कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं, अच्छे आदमी, बुरे आदमी; चलती है ऐसी मान्यता। नहीं, दो तरह के लोग होते हैं, बुरे-बुरे आदमी और बुरे-अच्छे आदमी। कुछ होते हैं जो बुरे होते हैं और उनकी बुराई दिख जाती है, और कुछ होते हैं जो अपनी बुराई के ऊपर अच्छाई का नक़ाब पहन लेते हैं। इनको कहना चाहिए “बुरे-अच्छे आदमी” हैं तो बुरे ही पर ऊपर से अच्छे दिख रहे हैं। अच्छा होने के लिए तो बहुत-बहुत यत्न करना पड़ता है।
अभी हमारे गीता सत्रों में उस दिन श्रीकृष्ण कह रहे थे कि हज़ारों में कोई एक होता है, जो यत्न की शुरुआत भी करता है मेरी ओर आने की। हज़ारों में कोई एक होता है जो अच्छा बनना चाहता भी है, बाक़ी तो चाहते भी नहीं। बाक़ी बस इतना चाहते हैं कि अच्छे कहलाए जाएँ। अच्छे हो जाएँ, ये कोई नहीं चाहता। हज़ारों में कोई एक होता है, कह रही है गीता, जो अच्छा बनने की शुरुआत भी करता है। और ये सब जो शुरुआत करते हैं, इन हज़ारों में फिर कोई एक होता है जो, पार्थ, मुझ तक पहुँचता है, माने जो अच्छा हो पाता है।
तो अच्छा है क्या यहाँ कौन? जब कोई अच्छा नहीं है। बात आ रही है समझ में? उसकी मूल वृत्ति ख़ुद को बचाने की है। उसे जो भी चाहिए कि नहीं चाहिए, बाक़ी सब चीज़ें एक तरफ़। पहली चीज़ ये है कि मैं कायम रहूँ, आत्मरक्षा, सेल्फ-प्रिज़र्वेशन। उसको यदि मुक्ति भी पानी है, तो ख़ुद को बचाए-बचाए। उसको यदि मुक्ति भी पानी है, तो ख़ुद को बचाए-बचाए। और ख़ुद को बचाना माने किसको बचाना? अपनी बुराई को बचाना। तो बुराई मिट कैसे जाएगी इंसान की? क्योंकि इंसान बुरा ही पैदा होता है और उसकी पहली टेंडेंसी, सबसे फ़ंडामेंटल टेंडेंसी होती है अपनी बुराई को बचाकर रखने की।
बुराई मिट कैसे जाएगी, हज़ारों में कोई एक होता है जिसको ये ख़याल भी आता है कि मैं बुरा हूँ, मुझे ये बुराई हटानी है। और जिन-जिन हज़ारों में से किसी एक को ये ख़याल आता है, ऐसे जब हज़ार मिल जाते हैं उनमें कोई एक होता है जो बुराई हटाने में सफल हो पाता है। हम जिसको सभ्यता और संस्कृति कहते हैं, वो इतिहास में किसी भी प्रजाति द्वारा स्वयं को दिया गया सबसे लंबा-चौड़ा धोखा है। हमने ख़ुद को जता लिया है कि हम अच्छे लोग हैं। आपने कभी परखा, हम सचमुच कितने अच्छे लोग हैं? आपने कभी परखा है? कभी परखा है? और जो प्रमाण सामने आते हैं, जो साफ दर्शाते हैं कि हम बड़े बुरे लोग हैं, आपने देखा है हम उन प्रमाणों को दबा कैसे देते हैं, उपेक्षा कैसे करते हैं।
आपके ही शहर में मार्च के महीने में औसत तापमान इस साल कितना है और ऐतिहासिक रूप से कितना रहा है। आपको पता है? आपको नहीं पता होगा क्योंकि वो आपको दिखा देगा कि हम कितने बुरे लोग हैं। पृथ्वी कोई छोटा सा गोला नहीं है और न पृथ्वी का वायुमंडल छोटा सा है पर इस एक प्रजाति ने पूरी पृथ्वी खाली, पूरे वायुमंडल को बदल कर रख दिया। तापमान वृद्धि ऐसे ही नहीं हो जाती। और छोटी-मोटी तापमान वृद्धि नहीं हुई है, 2 डिग्री, 3 डिग्री। अभी तो गर्मियाँ शुरू हो रही हैं। हम इतने बुरे लोग हैं, हमने…
कोई जानवर भी होता है, कोई चिड़िया भी होती है, कोई चींटी भी होती है, जो अपना ही घर खा जाए? हम इतने बुरे लोग हैं, हम अपना ही घर खा गए। और वो भी तब, जबकि वो घर हमारा निजी घर नहीं था। वो हमारा साझा घर था, न सिर्फ़ पूरी मानवता के साथ, बल्कि करोड़ों अन्य प्रजातियों के साथ वो घर हमें साझा करने के लिए दिया गया था, पर हम उस घर को खा गए। हम इतने बुरे लोग हैं।
पर ये बात आपके सामने मीडिया नहीं लाएगी, राजनेता नहीं लाएँगे, धर्मगुरु भी नहीं लाएँगे। सब आपको इसी बुलावे में रखना चाहते हैं कि इंसान तो अच्छा है। इंसान तो अच्छा है। गलती तो उससे कभी-कभार हो जाती है, वरना तो डिफ़ॉल्ट यही है कि वो अच्छा है। और गीता आपसे कह रही है कि डिफ़ॉल्ट ये है कि तुम बहुत बुरे हो। लाखों-करोड़ों में कोई एक होता है जो सचमुच अच्छा होता है, बाक़ी तो हर आदमी, कहते हैं न कि ऐसे पत्थर फेंको तो किसी बुरे को ही लगेगा। हम इतने बुरे हैं।
अब बताओ, अब ताज्जुब की बात लग रही है कि वो दो जने चढ़ के आ गए हैं ईरान को मार रहे हैं। और उन दोनों ही देशों के जो धर्मावलंबी हैं, वो कह रहे हैं हाँ, एक ईसाई ताक़त, एक यहूदी ताक़त मिलकर एक मुसलमान ताक़त को मार रही है। और वहाँ जितने मुसलमान हैं, वो कुछ दिन पहले तक वो अपनी हुकूमत गिराने को तैयार बैठे थे। वहाँ तीन साल से विद्रोह चल रहा है, युवाओं द्वारा, महिलाओं द्वारा खूब वहाँ पर विद्रोह का झंडा बुलंद है। लेकिन अब अमेरिका का आक्रमण हो गया है, तो वो कह रहे हैं, नहीं, अब हम राष्ट्रवादी हो गए। अब हम आपस में एक हैं, और हमारे जो साझे दुश्मन हैं, वो ये हैं, ईसाई और यहूदी। और बताया जा रहा है कि ये सब कुछ किया जा रहा है अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर, जिओपॉलिटिकल स्टेबिलिटी भी तो लानी है।
कोई एक इंसान बता दो, इस पूरे वाक्य में, पूरे प्रपंच में, जो सच्चा हो, एक दिखा दो। हर आदमी अपने-अपने तल पर, अपनी सामर्थ्य, अपनी औकात मुताबिक जितना ज़्यादा से ज़्यादा झूठ बोल सकता है, बोल रहा है; छल कर सकता है, कर रहा है। और किसी के साथ सहानुभूति रखना भी बड़ा मुश्किल है, क्योंकि ये सब अवाम में सब नंगे हैं। अभी पिट रहा है ईरान, लेकिन इसी ईरान ने सीरिया, लेबनान, ओमान, न जाने कितनी जगहों पर आतंकवादी गुट खड़े कर रखे थे, अपने ही देश के लोगों को दबा रखा था। तो लगता तो है कि ग़लत हो रहा है ईरान के साथ, पर ईरान का साथ देना भी मुश्किल है, क्योंकि तुम कौन से दूध के धुले हो।
उधर इज़राइल को देखो तो वहाँ दिखाई पड़ता है, बात तो सही है, हमास उनके ऊपर चढ़ आया था। वो कुछ नहीं कर रहे थे, आकर के उनके हज़ारों लोगों को मार दिया। पर फिर देखो कि इज़राइल ने क्या करा है, तो फिर कहते हो कि इज़राइल से ज़्यादा बुरा तो फ़िलिस्तीन के साथ हुआ है। यहाँ सच्चा कौन है? ये तो बताओ। और उसके बाद आप कहते हो, “अरे, अरे, अरे, दुनिया कितनी बुरी है, कितना अजीब हो गया।” अजीब ये हो गया कि आप दुनिया को अच्छा मान रहे थे और आपकी मजबूरी है दुनिया को अच्छा मानना, क्योंकि दुनिया को अच्छा नहीं मानोगे तो आपको विद्रोह करना पड़ेगा।
आप भली-भाँति जानते हो कि हर रिश्ते में व्यापार है और समझौता है। आप भली-भाँति जानते हो कि जिनके साथ आप मुस्कुरा कर मिल रहे हो, कुछ सीमाएँ, कुछ रेखाएँ आप लाँघ दो, वही आपका गला पकड़ लेंगे, हाँ या ना? हाँ या ना?
श्रोता: हाँ।
आचार्य प्रशांत: जिनके साथ सबसे आत्मीय और अंतरंग रिश्ते हैं, कुछ बातें, कुछ चर्चाएँ आप भी उनके साथ नहीं कर सकते। कि कर सकते हो? आप बहुत अच्छे से जानते हो कि घर पर भी कौन से मुद्दे अगर आपने छेड़ दिए तो घर बिखर जाएगा। हम ऐसे लोग हैं, और फिर हम अपने आप को अच्छा आदमी बोलते हैं।
हमारे तो रिश्ते भी लेन-देन पर बने होते हैं। कोई रिश्ता नहीं है जिसमें लेन-देन ना चल रहा हो। और लेना थोड़ा ज़्यादा कर दो देने से रिश्ता अभी गिर जाएगा। और दोनों ही पक्ष ये सोच रहे होते हैं कि हम तो ज़्यादा ही ले रहे हैं दूसरे से, इसीलिए रिश्ता चल भी रहा है।
दोनों इतने मूर्ख हैं कि सोच रहे हैं कि हम सामने वाले को मूर्ख बना रहे हैं। माया हँस रही है, कह रही है, “न, तू उसको मूर्ख बना रहा है; वो तुझे बना रहा है; मैं दोनों को बना रही हूँ।”
हम कौन से कोण से आपको अच्छे आदमी लगते हैं, बताइए न। क्या मीडिया आपको बता रहा है कि ये जो युद्ध चल रहा है, इसमें कितने मेट्रिक टन कार्बन उत्सर्जित हो रहा है? कोई बता रहा है? न वो बता रहे हैं, न आप जानना चाहते हैं। क्योंकि इस वक़्त आपके लिए रोमांच की बात बस यही है कि कौन-सी वाली मिलिट्री जीती। और इस रोमांच के सामने ये कौन सोचे कि क्लाइमेट का क्या हो रहा है, कि एक-एक बम कितना कार्बन छोड़ रहा है? कौन सोचे अभी यह?
कभी ये ख़्याल में बात आई कि एक साधारण कार तो चलती है, तो आप कहते हो, अरे, अरे, कार का धुआँ गड़बड़ है, CO₂ निकल रही है, चलो EV चलाते हैं। तो टैंक चलता होगा तो क्या निकलता होगा? कभी ये बात ख़्याल में आई? और टैंक सिर्फ़ लड़ाइयों में नहीं चल रहे, जब लड़ाई नहीं भी हो रही तो अभ्यास के लिए भी चल रहे हैं। अभी कल ही मैं बात कर रहा था, और आज के ही अख़बार में छपी है वो बातचीत, कि हम ये जो वायु-यात्रा होती है, उड्डयन क्षेत्र, सिविल एविएशन, कमर्शियल, हम इसको कहते हैं कि ये बहुत ज़्यादा कार्बन एमिटिंग होता है। उससे तीन गुना ज़्यादा कार्बन एमिट करती हैं दुनिया की वॉर मशीन्स्। दुनिया के जो मिलिट्रीज़ हैं, वे दुनिया भर के सारे कमर्शियल प्लेन्स से तीन गुना ज़्यादा कार्बन एमिट करती हैं।
पर वो बात हमें अच्छी लगती है। अच्छी लगती है न? अभी चल रहा है ईरान युद्ध तो अच्छा लग रहा है। वीडियो गेम की तरह लगता है। हम अच्छे लोग हैं?
और ये तो मैं सिर्फ़ प्लेन ने कितनी कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ी, उसकी बात कर रहा हूँ। वो जो बम गिरेगा, वो अलग है। उसके बाद जो इमारत ध्वस्त होगी, वो इमारत जब जलेगी, तो उसमें से जो कार्बन डाइऑक्साइड निकलेगी, वो अलग है। और उसके बाद जब नई इमारत बनाई जाएगी, तो उसमें जो स्टील, सीमेंट लगेगा, और उसमें जो कार्बन डाइऑक्साइड लगेगी, वो अलग है।
हम अच्छे लोग हैं। हम वो बुरे लोग हैं, जिनमें एक अद्भुत क्षमता है ख़ुद को धोखा देकर, ख़ुद को अच्छा घोषित करते रहने की। ये इंसान की मौलिक पहचान है, आत्म-प्रवंचना की, सेल्फ-डिसेप्शन की, जो क्षमता हमारी प्रजाति में होती है, वो किसी में नहीं है। हम में से बुरे से बुरा आदमी अपने आप को सफलतापूर्वक ये जता लेता है कि “मैं तो अच्छा आदमी हूँ, मैं तो अच्छा आदमी हूँ।”
और एक अब आख़िरी मज़ेदार बात सुनिएगा, जब हज़ारों, लाखों, करोड़ों लोग मिलकर के एक-दूसरे को अच्छाई का प्रमाण-पत्र दे लेते हैं, तो अगर धोखे से कोई सचमुच अच्छा आदमी वहाँ आ गया, तो वो बुरा हो जाता है। क्योंकि अगर तुमने उसको अच्छा मान लिया, तो तुम्हें ये भी मानना पड़ेगा कि तुम्हारा सारा समाज बुरा है। ये कैसे मानोगे; सारी इमारतें ध्वस्त हो जाएँगी, सारी व्यवस्थाएँ गिर जाएँगी, सारे स्वार्थ टूट जाएँगे, सारी इच्छाएँ हिलने लगेंगी, सारी धारणाएँ, मान्यता, परंपरा, सब काँप जाएगा। तो इससे अच्छा ये है कि जो सचमुच अच्छा आदमी आया है, सस्ता सौदा, उसको ही घोषित कर दो कि वही बुरा है, ताकि जितने ये करोड़ों बुरे हैं इनकी बुराई सुरक्षित रह जाए।
आउटरेज इसीलिए मुझे कभी-कभी समझ में नहीं आती है। कोई घटना घट जाती है लोग छाती पीटना शुरू कर देते हैं, कपड़े फाड़ना शुरू कर देते हैं। युद्ध हो गया, “अरे, ये कैसे हो सकता है! हमारी स्वर्ग-तुल्य शांत धरा के ऊपर दो लोग जाकर एक-दूसरे से लड़ रहे हैं, ये कैसे हो सकता है! हम इतने अच्छे लोग हैं, लड़ाई कैसे कर सकते हैं।” आउटरेज!
बलात्कार करके हत्या कर दी जाती है, कईयों को झटका लग जाता है। कहते हैं, “अरे, हम तो इतने अच्छे लोग थे, ये कैसे हो गया!” कहीं कोई घपला सामने आ जाता है कि लाखों लोगों के पैसे लूट लिए गए, लोगों को, “अरे, अरे, ये कैसे हो गया, अद्भुत! ये कैसे हो सकता है!” ये आश्चर्य भी व्यक्त करके हम अपने आप को बस ग़लतफ़हमी में रखना चाहते हैं, इतनी सी बात है। आश्चर्य तब करो, जब कोई सचमुच अच्छा आदमी मिल जाए। बुरा आदमी मिल जाए, बुरी घटना मिल जाए, उसमें अचरज की कोई बात नहीं, वो तो नियम है। क्योंकि आदमी पैदा ही बुरा हुआ है, और हमारी सारी व्यवस्थाएँ उस बुराई को बचाने के लिए ही हैं।
अचंभा तो तब मानो, जब लाखों-करोड़ों में कभी कोई अच्छा आदमी मिल जाए, तब कहना कि आज कुछ अलग हुआ। आप उल्टा चलते हो, बुराई देखकर आश्चर्य करते हो।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा प्रश्न है कि सही अध्यात्म क्या है और अध्यात्म का उद्देश्य क्या है?
आचार्य प्रशांत: क्यूट, आप गीता सत्रों में हैं?
प्रश्नकर्ता: जी, सर। छह महीने से।
आचार्य प्रशांत: काहे को पूछ रही हैं आप ये फिर? वहाँ ऑफ़र नहीं मिला उत्तर? छोड़िए, यहाँ और लोगों को पूछने दीजिए।
प्रश्नकर्ता: और विस्तार से जानना चाहती हूँ।
आचार्य प्रशांत: ये ऐसी-सी बात है कि आप शेक्सपियर की क्लास में हैं और आचार्य जी से आकर पूछ रही हैं, “आचार्य जी, A फ़ॉर ऐपल या बनाना?” अध्यात्म क्या है, ये गीता सत्रों में तो हम रोज़ ही हर तरीके से उघाड़-उघाड़ कर सामने ला रहे हैं न।
भीतर जो अहंकार बैठा हुआ है, वो खुद को जाने, यही अध्यात्म होता है।
स्वयं को ही और जानना अध्यात्म होता है। और “स्वयं” माने “मैं”, “मैं” कहने वाला अहंकार ही होता है। अहंकार ही ख़ुद को और जाने, इसको अध्यात्म कहते हैं।
और कैसे ख़ुद को जानोगे, अहंकार भीतर कहीं बैठा तो हुआ नहीं है डिबिया की तरह। अहंकार को जाना जाता है उसके कर्मों को ईमानदारी से देखकर के, यही अध्यात्म है। और इसके अलावा बाक़ी जो है अध्यात्म के नाम पर या धर्म के नाम पर, वो सब बस प्रपंच है, नौटंकी है।
अध्यात्म माने इतनी-सी बात, उसका तो नाम ही है “अधि + आत्म”। “अधि” माने, और, अधिक; “आत्म,” आत्म माने आत्मा नहीं, आत्मा कहीं भीतर नहीं बैठी है शरीर के। “आत्म” माने “मैं”, और “मैं” माने अहंकार। इसी को आत्मज्ञान कहते हैं और उसकी एकमात्र विधि है, आत्मावलोकन। क्योंकि आप जो हो, वो और किसी भी तरीके से देखा जा ही नहीं सकता। उसको देखने का एक ही तरीका है। क्या? देखो, कि हरकतें क्या कर रहे हो; देखो कि कामनाएँ किस दिशा जा रही हैं; देखो कि डरते किससे हो, यही अध्यात्म है। देख तो लेते ही हैं, देखने के बाद मुश्किल क्या पड़ता है? स्वीकारना।
पता तो है ही कि किससे डरते हैं, पर ख़ुद से भी ये मानना, आईने के सामने भी खड़े होकर स्वीकारना कि मैं डरपोक हूँ, ये मुश्किल पड़ता है और यही सचमुच अध्यात्म है। जो अपनी भीतरी सच्चाई है। और भीतरी सच्चाई माने, भीतर कोई जीवात्मा वगैरह उबल रही है, उसको देखने को नहीं कहा जा रहा है। भीतरी सच्चाई माने, भीतर डर से भरे हुए हो; भीतरी सच्चाई माने, लालच है, नफ़रत है, ईर्ष्या है। यही है भीतरी सच्चाई। जो अपनी भीतरी सच्चाई है, उसको ईमानदारी से जानना, बेईमानी करके इंकार न करना, यही अध्यात्म है।
और सब जो आप करते रहते हो, ये जो पूरा तमाशा धर्म के नाम पर, उसका अध्यात्म से कोई ताल्लुक नहीं है। वो मनोरंजन है। आपको मनोरंजन करना है, आप करिए, आपकी मर्ज़ी।
प्रश्नकर्ता: आचार्य, एक और सवाल था, जिस तरह से मिडिल ईस्ट में युद्ध हो रहा है, इसका असर किस तरह से हो सकता है भारत पर? और सबसे ज़्यादा प्रभावित कौन हो सकता है? क्या यूथ प्रभावित हो सकती है इस तरह की?
आचार्य प्रशांत: नहीं, यूथ तो प्रभावित होती ही है। अब आप संदेश ये दे रहे हैं कि “जिसकी लाठी, उसकी भैंस।” तो अहंकार के लिए तो ये सबसे पसंदीदा वचन है। वो तो यही सुनना चाहता है। उसके कानों के लिए तो अमृत है ये, कि साहब, आपको दूसरे को दबा के रखने के लिए अब कोई तर्क भी नहीं चाहिए, कोई जस्टिफिकेशन भी नहीं चाहिए। इतना ही काफ़ी है कि मेरे पास बल है और बल सबसे बड़ा तर्क हो जाता है। और कोई डिफ़ेंस नहीं चाहिए, और कोई सबूत, साक्ष्य, तर्क, प्रमाण, कुछ भी नहीं चाहिए। सिर्फ़ क्या चाहिए? ब्रूट फ़ोर्स, पशु-बल, बाहुबल, मिसाइल-बल, बम-बल। अगर आपके पास ये सब कुछ है, तो आप जो चाहें करें।
तो इससे जो युवा पीढ़ी है, उनको यही संदेश जाएगा, कि न ज्ञान की ज़रूरत है, न समझदारी की, न विवेक की। ज़रूरत किसकी है? धन-बल की, बाहुबल की, लठ्ठ-बल की, मिसाइल-बल की। तो वो भी फिर ज़िंदगी में यही करेंगे, कि येन-केन प्रकारेण, किसी तरीके से बस ताक़त हासिल कर लो। उसके लिए ख़ुद को बेचना पड़े, कुछ भी करना पड़े। और एक बार तुमने ताकत हासिल कर ली, तो फिर चाहे अपने रिश्तेदार को दबाना पड़े, अपने पड़ोसी को दबाना पड़े, समाज को दबाना पड़े, तुम किसी के ऊपर भी चढ़ सकते हो; उनकी बाँह मरोड़ करके उनका शोषण कर सकते हो, उनका तेल चुरा सकते हो, उनका पैसा चुरा सकते हो, उनके राष्ट्रपति को उठा के ला सकते हो। और ये सब तुम क्यों कर सकते हो? सिर्फ़ इसलिए क्योंकि तुम्हारे पास ताकत है।
तो कुल मिलाकर के ये ताकत का सिद्धांत है, जो पूरी दुनिया को सिखाया जा रहा है और ये सिद्धांत अंततः आत्मघातक होगा। जितने ज़्यादा लोग ये पाठ पढ़ते जाएँगे, वो उतना ज़्यादा युद्धोन्मादी होते जाएँगे। और इसकी जो परिणति होनी है, वो आत्मघात ही होनी है। पृथ्वी वैसे भी विध्वंस की कगार पर खड़ी हुई है। ये बहुत ग़लत पाठ पढ़ाया जा रहा है पूरी दुनिया की युवाओं को।
आप ऐसे समझो कि दुनिया की जितनी राजधानियाँ हैं न, वहाँ जितने स्ट्रेटेजिक थिंक टैंक बैठे हैं इस वक़्त, तो सब यही सोच रहे हैं कि किस तरीके से हमें भी ICBMs मिल जाएँ, इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल और ऐसी, जिस पर आप न्यूक्लियर वेपन लगा के अमेरिका तक पहुँचा सको। क्योंकि अब सुपरपावर से बचने का एक ही तरीका है कि आपके पास प्रतिकार और प्रतिघात करने की शक्ति हो।
भाई, आप यही तर्क तो लेकर के चढ़ गए हो न वेनेज़ुएला के ऊपर, ईरान के ऊपर, कि उनके पास ऐसा कोई हथियार नहीं जो सीधे अमेरिका तक पहुँच सके। है नहीं। और नॉर्थ कोरिया पर आप नहीं चढ़ रहे, क्योंकि उसके पास है। चीन पर आप नहीं चढ़ोगे, रूस पर आप नहीं चढ़ोगे, क्योंकि आप उन पर चढ़ोगे, तो उनके पास हथियार हैं जो सीधे न्यूयॉर्क और शिकागो भी पहुँच जाएँगे।
तो दुनिया की सब राजधानियाँ अभी बैठकर यही विचार कर रही हैं, कि अगर हम भी अपनी जान बचाना चाहते हैं, तो हमें भी और ज़्यादा अब आणविक हथियार चाहिए और मिसाइलें चाहिए। तो हमने जितनी नाभिकीय अप्रसार की बातें करी थीं, NPT (न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफ़रेशन ट्रीटी), CTBT (कॉम्प्रिहेन्सिव न्यूक्लियर-टेस्ट-बैन ट्रीटी), वो सब अब कचरे के डब्बे में जाने वाली हैं।
मैं ये भविष्यवाणी कर रहा हूँ कि अब आप बड़े पैमाने पर दुनिया में न्यूक्लियर प्रोलिफ़रेशन देखोगे। जिन देशों के पास न्यूक्लियर हथियार हैं, वो अपनी टेक्नोलॉजी बेचेंगे। इसका बड़ा काला बाज़ार खुलने वाला है, मिसाइलों का काला बाज़ार खुलने वाला है। हर देश अपनी रक्षा के लिए तकनीक चुराएगा, संधियाँ करेगा, किसी-न-किसी तरीके से मिसाइलें और न्यूक्लियर वेपंस डेवलप करेगा।