लोग अपनी राय की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वह सत्य है, बल्कि इसलिए क्योंकि भीतर से उन्हें उसकी कमजोरी का पता होता है। झूठ सबसे जल्दी आहत होता है और सच से डरता है। इसलिए सत्य बोलने पर यदि कोई टूटता है, तो उसके झूठ के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानना चाहिए। जहाँ वास्तव में गलती हो, वहाँ विनम्र बनें; लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए अपराधबोध या दूसरों की नाराज़गी का बोझ उठाना आवश्यक नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: सर, मेरा सवाल सोशल मीडिया को लेकर है। सोशल मीडिया पर ज़रा-सी बात पर लोग टूट जाते हैं। एक साधारण पोस्ट के कारण लोग आपस में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हो जाते हैं। तो मेरा सवाल यह है कि लोग अपनी राय पर इतने अड़े हुए क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: राय पर अड़े हुए नहीं हैं। सच्चाई बिल्कुल विपरीत है, उन्हें पता है कि उनकी राय दो कौड़ी की है। उन्हें पता है कि उनकी राय दो कौड़ी की है, इसीलिए इतनी जल्दी आहत हो जाते हैं। उसको पता होता है कि उसकी बात में दम है, वह इतनी जल्दी टूट थोड़ी जाता है। इसी शब्द का इस्तेमाल किया न आपने कि लोग जल्दी टूट क्यों जाते हैं?
“दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एकै धक्का दरार।” नहीं सुना है? और “सोना सज्जन साधु जन, टूट जुड़े सौ बार।।” आपको पता होता है कि आप बिल्कुल व्यर्थ की और बेवकूफ़ी की बात बोल रहे हो। आपको पता होता है, आप झूठ बोल रहे हो। और फिर भी ज़िंदगी से आपकी उम्मीद यह होती है कि आपके झूठ को सम्मान मिले। और जब आपके झूठ को सम्मान नहीं मिलता, कोई उसमें खोट निकाल देता है, कोई उसकी दरार दिखा देता है, तो आप बिल्कुल दरक जाते हो, ढह जाते हो।




