आदमी कहता है, “मैं ठीक हूँ। बस हालात कुछ ऐसे बने कि मैं फिसल गया।” ग्लानि सिद्ध करती है कि तुम आदमी बढ़िया हो; बस संयोग से असफल रह गए। तुम्हारी ग्लानि ये थोड़ी है कि तुम आदमी ही गड़बड़ हो। तुम्हारा केंद्र ही गड़बड़ है। तुम्हारी ग्लानि तो धोखे से मिस्टेक वाली होती है। वास्तविक ग्लानि तो अग्नि होती है। तुम बचोगे ही नहीं जैसे हो, अगर ग्लानि हो जाए तो।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आज आपने बताया कि जो योगी होता है, जो चीज़ों को समझ लेता है, वो ऐसे ही जीता है।
आचार्य प्रशांत: समझ लेता है, कुछ नहीं होता है। समझता?
प्रश्नकर्ता: समझता है।
आचार्य प्रशांत: उसका केंद्र ही है समझने का। समझ लेता है कोई निष्पत्ति नहीं होती कि फ़ुल-स्टॉप।
प्रश्नकर्ता: तो फिर मैं अगर अपना जीवन देखता हूँ और अवलोकन करता हूँ, तो बहुत निराशा होती है, क्योंकि मैं अपने हर काम के पीछे कोई-न-कोई क्षुद्र कारण ही पाता हूँ। तो फिर उसके बाद इतनी निराशा हो जाती है कि लगता है कि सब ख़त्म। इसकी वजह से क्या हो रहा है, कि मेरा कुछ एग्ज़ाम्स में परफ़ॉर्मेंस भी ड्रॉप




