वास्तविक ग्लानि हमें कहाँ होती है?

Acharya Prashant

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वास्तविक ग्लानि हमें कहाँ होती है?
आदमी कहता है, “मैं ठीक हूँ। बस हालात कुछ ऐसे बने कि मैं फिसल गया।” ग्लानि सिद्ध करती है कि तुम आदमी बढ़िया हो; बस संयोग से असफल रह गए। तुम्हारी ग्लानि ये थोड़ी है कि तुम आदमी ही गड़बड़ हो। तुम्हारा केंद्र ही गड़बड़ है। तुम्हारी ग्लानि तो धोखे से मिस्टेक वाली होती है। वास्तविक ग्लानि तो अग्नि होती है। तुम बचोगे ही नहीं जैसे हो, अगर ग्लानि हो जाए तो। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आज आपने बताया कि जो योगी होता है, जो चीज़ों को समझ लेता है, वो ऐसे ही जीता है।

आचार्य प्रशांत: समझ लेता है, कुछ नहीं होता है। समझता?

प्रश्नकर्ता: समझता है।

आचार्य प्रशांत: उसका केंद्र ही है समझने का। समझ लेता है कोई निष्पत्ति नहीं होती कि फ़ुल-स्टॉप।

प्रश्नकर्ता: तो फिर मैं अगर अपना जीवन देखता हूँ और अवलोकन करता हूँ, तो बहुत निराशा होती है, क्योंकि मैं अपने हर काम के पीछे कोई-न-कोई क्षुद्र कारण ही पाता हूँ। तो फिर उसके बाद इतनी निराशा हो जाती है कि लगता है कि सब ख़त्म। इसकी वजह से क्या हो रहा है, कि मेरा कुछ एग्ज़ाम्स में परफ़ॉर्मेंस भी ड्रॉप हो गया है और सेशन में भी कुछ मन नहीं लग रहा।

आचार्य प्रशांत: जो-जो क्षुद्र है, उसको काहे के लिए पकड़े बैठे हो? जो क्षुद्र है उसको काहे को पकड़े बैठे हो? ये टी-शर्ट है, ये तुम्हें छोटी होती हो तो पहने रहोगे क्या?

प्रश्नकर्ता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: तो उतार दो।

प्रश्नकर्ता: भरोसा नहीं होता कि उतारा जा सकता है।

आचार्य प्रशांत: तो फिर तो तुम्हें छोटी लग नहीं रही, बेटा। ऊपर-ऊपर की बात कर रहे हो।

प्रश्नकर्ता: सर, क्या ये ग्लानि ही तो समझने नहीं दे रही बात?

आचार्य प्रशांत: कोई ग्लानि नहीं। ग्लानि तुम्हें ये है बस कि मैं जैसा हूँ, मेरे वैसा रहे रहे मुझे कोई महान क्यों नहीं बोल रहा। तुम्हें क्षोभ इस बात का नहीं है कि मैं ऐसा हूँ क्यों। तुम्हें क्षोभ इस बात का है कि मैं जैसा हूँ, वैसे ही मैं महान क्यों नहीं कहला रहा; तुम्हें क्षोभ इस बात का है। ग्लानि तुम्हें ज़रूर है, पर बहुत उल्टी दिशा की ग्लानि है।

वास्तविक ग्लानि तो परिवर्तन की आग होती है। जिसको सचमुच अफ़सोस हो गया, वो बंदा वैसा बचता ही नहीं।

अफ़सोस हम सबको भी होता है। पर अफ़सोस हमें ये होता है कि अरे, चोरी सफल हो ही गई होती, बस ज़रा-सा रह गया। हमारा अफ़सोस ऐसा होता है। मेरा धोखा चल ही गया होता, ज़रा-सा अटक गया; नालायक रहकर भी मुझे पदक मिल ही गया होता, इतना-सा चूक गया। ये हमारी ग्लानि होती है। ये हमारा अफ़सोस है।

वास्तविक ग्लानि कहाँ होती है हमें? वास्तविक ग्लानि तो अग्नि होती है। तुम बचोगे ही नहीं जैसे हो अगर ग्लानि हो जाए तो। कोई ग्लानि नहीं है। अभी भी अफ़सोस यही हो रहा होगा, कि अरे, फँस गया, वो भी इतने लोगों के सामने।

प्रश्नकर्ता: तो मतलब कि जो ये नकली ग्लानि है, इसको झेलूँ?

आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं, ये तो मौज ले रहे हो तुम, इसको झेलना क्या है। ये तो तुम रस ले रहे हो नकली ग्लानि का। जैसे मेंढक रस ले, “शिट, यार बस इस बार टेक-ऑफ़ करते-करते रह गया।” कूदा वो कितना था कुल? इतना (थोड़ा)। पर हर बार ऐसे, “यू नो, मैन नेक्स्ट टाइम आई विल मेक इट। जस्ट मिस्ड इट बाय अ विस्कर, आई टेल यू।” ये है तुम्हारी ग्लानि। तुम तो मज़े ले रहे हो। मेंढक अपने आप को मिग मान रहा है। वो सोच रहा है ये जो उछलता है, सीधे वहीं पहुँचेगा।

ग्लानि के बड़े मज़े हैं, भाई। ग्लानि सिद्ध करती है कि तुम आदमी बढ़िया हो, बस संयोग से असफल रह गए। ग्लानि सिद्ध करती है कि तुमने सिर्फ़ गलती कर दी है, “धोखे से मिस्टेक हो गया अपुन से।” ये है तुम्हारी ग्लानि।

तुम्हारी ग्लानि ये थोड़ी है कि तुम आदमी ही गड़बड़ हो, तुम्हारा केंद्र ही गड़बड़ है। तुम्हारी ग्लानि ये कभी नहीं होती; तुम्हारी ग्लानि तो धोखे से मिस्टेक वाली होती है। आदमी कहता है, “मैं ठीक हूँ, बस हालात कुछ ऐसे बने कि मैं फिसल गया।”

क्या हुआ? कैसे तुम सीवर में मुँह डाले पाए गए और मुँह ही नहीं डाल रखा था, गटक रहे थे। केचप माँग रहे थे, कह रहे थे, “बाक़ी सब बढ़िया है, थोड़ा इसमें केचप और डाल दो तो; सॉसेज पूरा।” स्प्रिंग रोल बोलो, सॉसेज बोलो, कटलेट।

किसी ने पूछा, “क्या हुआ?”

“अरे, दोस्तों ने पिला दी थी, आदमी मैं बढ़िया हूँ। और ग्लानि मुझे इस बात की है कि मेरे दोस्त ख़राब निकले। मैं आदमी बढ़िया हूँ, ये तो संयोग है कि मैं गटर में पाया जा रहा हूँ।”

आते हैं, “आचार्य जी, मैं इतना बढ़िया बंदा होकर भी दुख क्यों पाता हूँ? आचार्य जी, मेरे जैसा अच्छा आदमी; तीन डंप कर चुकी हैं मुझे।” वो जैसी हैं, उन्हें अच्छा आदमी नहीं चाहिए। तुम डियोडरेंट लगाया करो, डंप नहीं करेंगी। “मेरे जैसा बंदा, बेवफ़ा निकली।” तुम्हारे जैसा तुम ख़ुद से तो वफ़ा कर नहीं पाए, तुम्हारे साथ कोई और वफ़ा करेगा?

कोई आता है, मैं डाँट देता हूँ। ख़ासकर अगर महिलाएँ हैं, ऐ टप-टप-टप-टप आँसू। वो आँसू ये थोड़ी होते हैं कि “मैं हूँ क्यों ऐसी?” वो आँसू ये होते हैं कि “मुझे डाँट क्यों दिया? मैंने फिर गलती कर दी। देखो, आज मुझे फिर डाँट पड़ गई, मेरा अपमान हो गया।” ये आँसू ही गलत हैं, ये फ़र्ज़ी हैं आँसू। ये आँसू तुम्हें वैसे ही बनाए रखेंगे जैसे तुम हो।

एक बिल्कुल दूसरी कोटि के भी आँसू होते हैं, वो आँसू अपनी करतूत पर नहीं अपनी हस्ती पर गिरता है। “मेरा कर्म नहीं गलत है, मेरा केंद्र गलत है।” वो आँसू चाहिए।

पर वो ग्लानि तुम जानते ही नहीं। तुम तो बस यही कि धोखे से गलत काम हो गया मुझसे। “मौसी, यार मेरा बहुत बढ़िया है, वो तो बस अब जब उन लोगों के साथ बैठ जाता है तो जुआ भी खेलना पड़ता है मौसी। और उन लोगों के साथ बिल्कुल बैठता नहीं लेकिन वो नाचने वाली के यहाँ जाता है, वहाँ वो लोग मिल जाते हैं तो बैठना पड़ता है। यार लेकिन मेरा बहुत बढ़िया है, मौसी, कोई दिक़्क़त नहीं मेरे दोस्त में।” बसंती हो जाएगी इंप्रेस। तुम चिंता मत करो।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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