
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, गिग वर्कर्स का एक प्रोटेस्ट चल रहा है। जो भी इंस्टेंट डिलीवरी ऐप्स और जो इंडिविजुअल कॉन्ट्रैक्टर्स हैं, उनका एक प्रोटेस्ट चल रहा है। उनकी माँग है कि हमें एक डिग्निटी वाली पोज़ीशन चाहिए, जिसकी वजह से ये जो मार्केट लीडर्स हैं, कई सारे जो इन्हीं गिग वर्कर्स की वजह से चल रहे हैं, वो उनको एक डिग्निफ़ाइड पोज़ीशन दें और उनका एक स्ट्रक्चर्ड एम्प्लॉयमेंट जैसे उनको मिल सके। अभी सोशल मीडिया में उनको काफ़ी सपोर्ट भी मिल रहा है।
लेकिन एक कैपिटलिस्टिक पर्सपेक्टिव यह रहता है यूज़ुअली, कि हमने ये ऑपर्च्युनिटी आपको दिया। यू आइदर टेक इट ऑर लीव इट। तो इन दो पर्सपेक्टिव्स को हम कैसे देख सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: आदर्शों और तथ्यों का घर्षण है यह। आदर्श यह है कि मनुष्य को उदार होना चाहिए, समाज में समानता होनी चाहिए। और तथ्य यह है कि मनुष्य पाशविक होता है, लालची होता है, स्वार्थी होता है। अहंकार उदारता का, समानता का ढोंग तो कर सकता है, पर वह उदार या समान हो नहीं सकता।
चलो समझते हैं, जो कैपिटलिस्ट है वह एक ऐसे माहौल में मौजूद है जहाँ पर लोग बहुत कम पैसों पर, बहुत सस्ती दरों पर काम करने को तैयार हैं। क्यों? क्योंकि जनसंख्या और बेरोज़गारी दोनों बहुत ज़्यादा हैं। एक आदमी मना करेगा तो चार कतार में खड़े हैं उसकी जगह लेने के लिए। एक आदमी मना करेगा कि मुझे इन स्थितियों में, इतने पैसों में काम नहीं करना है, तो चार आदमी खड़े हैं। यह ओवरऑल सिचुएशन है, ये स्थिति पर हम एक विहंगम दृष्टि ले रहे हैं, ये मैक्रो सिचुएशन है। ठीक है?
यह समाज ऐसा है। यह समाज ऐसा है जिसमें खूब आबादी है। खूब आबादी है और इसके मूल्य ऐसे हैं कि इस समाज में ज़्यादातर पैसा चंद हाथों में सीमित है, केंद्रित है। ठीक है? यह समाज ऐसा है। आप कह रहे हो, “आदर्श यह है कि आप किसी से काम करा रहे हो तो उसे और ज़्यादा पैसा दो और उसके लिए काम करने की बेहतर स्थितियाँ बनाओ।” बहुत सुंदर आदर्श बताया आपने। अब यह करेगा कौन? कौन करेगा? कोई दूसरा देश आकर करेगा? कौन करेगा? जो होना है, इसी देश में, इसी देश के लोगों द्वारा होना है। तो आप बताइए, यह कौन करेगा? मुझे बताइए तो हम चाह क्या रहे हैं? कौन करेगा यह?
हम माने कौन? जो आपके ख़याल में रहता है न, जब आप बोलते हो, ऐसा होना चाहिए। “गिग वर्कर्स के साथ बेहतर सुलूक होना चाहिए।” सुंदर आदर्श है, बिल्कुल होना चाहिए। पर करेगा कौन? कौन करेगा?
श्रोता: एम्प्लॉयर।
आचार्य प्रशांत: एम्प्लॉयर क्यों करेगा? वह नहीं करना चाहता। वह दान-दक्षिणा करने, मानवता की सेवा करने, करुणा बरसाने नहीं आया है। वह तो सीधे कह रहा है, मैं कोई लंगर डालने थोड़ी आया हूँ, मैं पैसा कमाने आया हूँ। तो कौन करेगा फिर?
श्रोता: सरकार।
आचार्य प्रशांत: सरकार, अच्छा। सरकार को वोट मिलता है ज़्यादातर ऐसे लोगों से जो कुछ जानते नहीं, अँधेरे में हैं, बेहोश हैं और पैसा मिलता है उसी कैपिटलिस्ट से। यही सरकार है। सरकार जिनसे वोट भी लेती है, अक्सर उनको पैसा देकर लेती है; और पैसा भी उस कैपिटलिस्ट से मिलता है। ज़्यादातर लोग जो वोट डाल रहे हैं, वह पैसा लेकर डाल रहे हैं। यही हो रहा है न? फ़्रीबीज़ मिल जाएँगी, यह मिल जाएगा, वह मिल जाएगा।
पहले तो सीधे-सीधे नोट वग़ैरह ट्रक भर-भर के पकड़े जाते थे चुनावों से पहले। फिर उस पर चुनाव आयोग ने और अदालत ने रोक लगा दी। तो अब दूसरे तरीकों से जनता तक पैसा पहुँचाया जाता है। तो सरकार जो पैसा देकर लोगों से वोट ख़रीद रही है, वह पैसा ही किससे आ रहा है? कैपिटलिस्ट से। तो यह सरकार उस कैपिटलिस्ट पर रोक लगाएगी? या यह सरकार चाहेगी कि और ज़्यादा पैसा उस कैपिटलिस्ट के पास कंसन्ट्रेट हो जाए और लोग और ग़रीब हो जाएँ, ताकि उससे पैसा लेकर इन्हें और सस्ते दाम पर ख़रीदकर इनका वोट ले लें?
जल्दी बोलो।
आदर्श तो बहुत अच्छा है, इगैलिटेरियन आइडियल। लोग आएँ, लोग काम करें। मिनिमम वेजेज़ होनी चाहिए। मिनिमम माने, एट लीस्ट मिनिमम, कम से का इतने स्तर की उनको वेजेज़ मिलनी चाहिए, यह होना चाहिए। कितना सुंदर आदर्श है। “आ ले के चलें एक ऐसे गगन के तले। आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ, एक ऐसे गगन के तले जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो बस प्यार ही प्यार खिले।” आहा हा!
यह सब तो ठीक है, सर, पर यह करेगा कौन? कौन करेगा? जनता करेगी? जनता करेगी, जिसने सदा से कभी दारू की एक बोतल के लिए, कभी ₹100 के लिए, कभी फ़्रीबीज़ के लिए अपना वोट बेचा है। जनता करेगी? जनता, उसी जनता द्वारा चुनी गई सरकार करेगी? जो उन्हीं कैपिटलिस्ट से पैसे लेकर इलेक्शन में जनता में बाँटती है। यह कौन करेगा? कोई नहीं करेगा। बस तमाशा अच्छा बनेगा। कुछ दिन और शोर मचा लो, “गिग वर्कर्स, हम तुम्हारे साथ हैं।” “गिग वर्कर्स, हम तुम्हारे साथ हैं।” मचा लो शोर।
और अगर मैं अब बोलूँ कि दुख जहाँ भी है, जिस रूप में भी है उसका कारण अज्ञान है, तो कहोगे, “ये बात को जलेबी की तरह घुमा देते हैं। यह डायरेक्ट मुद्दे पर बात नहीं करते। एक्सप्लॉइटेशन हो रहा है कि नहीं? हो रहा है न? तो उस पर रोक लगनी चाहिए न? हाँ। तो उसकी बात करो न।”
मैं पूछ रहा हूँ, कर रहा हूँ मैं बात, बताओ, कौन रोकेगा? रोक के दिखाओ। रोक के दिखाओ न। कौन रोकेगा? ऊपर से कोई शक्ति आ नहीं सकती, और सीमा पार से हम किसी शक्ति को आने नहीं देंगे, तो कौन रोकेगा? हमें ही रोकना है, ले-देकर हम ही हैं। क्या बोलता है हमारा संविधान? “वी द पीपल, गिव टू अवरसेल्व्स दिस कॉन्स्टिट्यूशन।” किसी बाहरी ताक़त ने हमें नहीं चला रखा, हम स्वयं अपना संविधान निर्धारित करते हैं। हमें ही रोकना है, हम कैसे रोकेंगे?
न हमें पढ़ने में रुचि, न लिखने में रुचि, न हमें तथ्य जानने में रुचि, हमें टीवी पर बेहूदा शोर सुनने में रुचि है समाचार के नाम पर। हम पढ़ नहीं सकते कुछ भी, तो कोई आकर हमें ज्ञान देकर चला जाता है, 15 मिनट में वह आएगा और बताएगा, “मैं आपको बताने जा रहा हूँ कि दुनिया में क्या चल रहा है।” वह क्या, वह फील्ड रिपोर्टिंग कर रहा है? कुछ नहीं कर रहा। वह जाकर विकिपीडिया पढ़कर, इधर-उधर करके 15 मिनट का वीडियो बना देता है। आप खुश हो जाते हो।
ज्ञान; वह जो कुछ वह पढ़ रहा है आप ख़ुद भी पढ़ सकते हो, बेहतर पढ़ सकते हो, ज़्यादा विस्तार में पढ़ सकते हो। यह तो हम लोग हैं। हम रोकेंगे शोषण? हम रोकेंगे? बस यह है कि शोर मचा के हम अपने आप को सांत्वना दे लेंगे, कि “हम अच्छे लोग हैं, नैतिक लोग हैं। देखो, गिग वर्कर्स का एक्सप्लॉयटेशन हो रहा था, हमने भी आवाज़ उठाई। हमने कैसे आवाज़ उठाई? हमने वह जो एक वीडियो बनाया था हमारे फ़ेवरेट इन्फ्लुएंसर ने, “सी, गिग वर्कर्स आर बीइंग एक्सप्लॉयटेड। हमने जाकर उसको लाइक कर दिया। और हमने कमेंट भी लिख दिया, “डाउन विद कैपिटलिज़्म, टू हुड्स टू एक्सप्लॉइटेशन।”
यह अलग बात है कि वो जितनी एक्सप्लॉयटेटिव फ़ोर्सेस हैं, मेरे सब पसंदीदा सेलिब्रिटीज़, बाबाजी, नेताजी, सब उसी एक्सप्लॉयटेटिव ताक़त के हिस्से हैं। उसी एक्सप्लॉयटेटिव स्ट्रक्चर के हिस्से हैं। वो सब, जिन्हें मैं अपना फ़ेवरेट बोलता हूँ, यह अलग बात है। पर जब गिग वर्कर्स की बात आएगी तो मैं जाकर वहाँ लाइक बटन दबा दूँगा।
जहाँ समाज की बुनियाद ही अज्ञान की बनी हुई है, मान्यताओं की बनी हुई है, धारणाओं की बनी हुई है, अंधविश्वास की बनी हुई है, बहुत झूठे सिद्धांतों की जहाँ बुनियाद है, वहाँ इमारतों में शोषण होगा कि नहीं होगा? बोलो। तो हो रहा है। उस पर तुम शोर मचा के खुश हो लेना हार तो हो लो।
कुछ दिन शोर मचाओ, खुश हो लो, फिर एक नया मुद्दा आएगा उस पर शोर मचा लेना, खुश हो लेना। पर जब तक बुनियाद को ठीक नहीं करोगे, यह शोषण का खेल चलता रहेगा।
और आउटरेज के लिए हमें मुद्दे तो मिल ही जाते हैं हर दूसरे दिन। 150 करोड़ लोगों का देश है रोज़ ही कुछ-न-कुछ ऐसा हो रहा होता है कि आप तरक़्क़ी-पसंद, उदार, लिबरल लोग उस पर आउटरेज कर सकते हैं। सुबह उठिए, अख़बार खोलिए, कहिए, “सो व्हाट्स देयर टू आउटरेज टुडे?” कुछ-न-कुछ मिल ही जाएगा। किसी का रेप हो गया है, किसी की लिंचिंग हो गई है, किसी का एक्सप्लॉयटेशन हो गया है। किसी को फ़ालतू फ़ायर कर दिया गया। कोई किसी का कुछ कर रहा है, कहीं सड़क में गड्ढा निकल आया। कर लीजिए आउटरेज। आउटरेज भी इंडस्ट्री है पूरी।
सचमुच बुरा लगता है जब किसी के साथ अन्याय होता देखो तो अन्याय की जड़ तक पहुँचो। व्यक्ति अन्यायी नहीं है, यह व्यवस्था ही अन्यायी है। क्योंकि यह व्यवस्था मान्यताओं, धारणाओं, परंपराओं, अंधविश्वासों पर आधारित है। आप जिन चीज़ों को बहुत महत्त्व देते हैं, जो कहानियाँ आपके चित्त को बड़ी प्यारी और बड़ी पवित्र लगती हैं, ज़रा ग़ौर से देखिए उन कहानियों को। क्या उनमें भयानक असमानता नहीं है? क्या उनमें शोषण नहीं है? वही सब तो हमारे सामाजिक जीवन की बुनियाद भी है न।
आप सब बहुत सम्मान देते हो उन्हीं तरीकों को, जैसे घर में चलते आए हैं, जैसे बाप-दादाओं ने किया। तो यह बताओ, वहाँ समानता चलती थी क्या? वहाँ तो आज आप जितनी असमानता देख रहे हो उससे और ज़्यादा थी। आज तो फिर भी क़ानून और संविधान ने यह कर दिया है कि किसी की जाति वग़ैरह पूछकर उसके साथ आप बदतमीज़ी नहीं कर सकते।
जिन चीज़ों को हम बहुत सम्मान देते हैं, उन चीज़ों को देखो ग़ौर से और बताओ उनमें भयानक असमानता है कि नहीं? और शोषण है कि नहीं? अब एक ओर आप शोषण का विरोध करना चाहते हो। देखो, सवाल में कितनी उग्रता थी, कितना असंतोष था, “गिग वर्कर्स के साथ बुरा हो रहा है।” एक ओर तो आप शोषण का, असमानता का विरोध करना चाहते हो, दूसरी ओर आप उन्हीं सब परंपराओं को पूजते भी हो। ऐसा कैसे चलेगा? बोलो।
आपको कितना अच्छा लगता है, आप कहते हो, “हम जा रहे हैं अपनी धरोहर देखने। ये देखो, ये विराट महल यहाँ हमारे पुराने राजा ने यह कर रखा था, वह कर रखा था। ये मुग़ल बादशाह, उसने यहाँ इतना बड़ा खड़ा कर दिया ताजमहल। यहाँ देखो, यहाँ चाँदी मढ़ी हुई थी। वह गुंबद, वह शिखर, वह सोने का था।” कैसे हुआ था? वह इगैलिटेरियन था क्या समाज? बोलो न। वह उतना बड़ा महल, जिसमें सोने के गुंबद हैं और ऊँची ये है प्राचीर है। और ये जो ताजमहल संगमरमर का, ये इगैलिटेरियन सोसाइटी के गवाह हैं? ये तो प्रमाण हैं भयानक शोषण के, कि नहीं हैं?
उस समय तो इंडस्ट्री भी नहीं थी। खेती चलती थी और कुछ आर्टिसन्स थे जो हैंडीक्राफ़्ट्स था। ज़्यादातर आबादी क्या करती थी? खेती करती थी। बाक़ी आबादी क्या करती थी? कुछ-कुछ, कोई कपड़ा बना रहा है, कोई लोहे की चीज़ें बना रहा है, कोई लकड़ी का काम कर रहा है। और उसके अलावा मुट्ठी-भर लोग थे जो ट्रेडिंग करते थे।.पर 90-95% आबादी क्या करती थी? उसके पास कितना पैसा रहा होगा? तो ये ताजमहल कैसे बन गया? जल्दी बोलो।
आज का कैपिटलिस्ट तुम्हें बुरा लगता है, पर वहाँ जाकर खड़े होकर सेल्फ़ी लेते हो और बहुत खुश हो जाते हो। “हमारे ऐसे राजा थे, राजाओं ने यह किया, राजाओं ने वह किया।” राजा तो ठीक हैं, आम आदमी का क्या हाल था? वह इतिहास न हमें जानना है, न सामना करना है। ब्रिटिश एम्पायर वॉज़ द रिचेस्ट, एंड इंडिया वॉज़ द बिग पार्ट ऑफ़ इट। वॉज़ इट नॉट? और उसी रिचेस्ट और मोस्ट पावरफ़ुल एम्पायर में दुनिया का आज तक का सबसे बड़ा अकाल पड़ा था, 1941-42 में, बंगाल में।
आप खुश होते रहिए, क्योंकि टेक्निकली अगर भारत ब्रिटिश एम्पायर का पार्ट था, तो भारत भी एक बहुत अमीर एम्पायर का हिस्सा था। ब्रिटिश किताबें मालूम है क्या बोलती हैं? बोलती हैं, “व्हेन द वर्ल्ड वॉर टू स्टार्टेड, द मेजॉरिटी ऑफ़ द किंगडम वॉज़ हिंदू। वास्तव में हिटलर को हिंदुओं ने हराया है। क्योंकि ब्रिटिश एम्पायर ने हराया है, और ब्रिटिश एम्पायर में सबसे ज़्यादा आबादी हिंदुस्तान की थी। तो ब्रिटिश एम्पायर में 50% से ज़्यादा हिंदू थे। तो हिटलर को किसने हराया? हिंदुस्तान ने।
या तो अपने आप को इस तरह के भुलावे और दिलासे देते रहिए, या यह देख लीजिए कि तुम्हारी ब्रिटिश एम्पायर कुछ भी रही होगी, भारत तो अकाल से मर रहा था। और तुम्हारे वर्ल्ड वॉर टू की वजह से ही बंगाल में उतना अकाल पड़ा था। तुमने धान नहीं रोपने दिया। और जब लोग मरने लगे, तो भी तुमने कहा, कि नहीं-नहीं सप्लाई सारी वॉर एफ़र्ट में जाएँगी, फ़ैमिन रिलीफ़ में नहीं जाएँगी। या तो खुश होते रहो कि इतना पैसा था, इतना पैसा था; या यह देख लो कि आम आदमी की क्या हालत थी।
आम आदमी से तो आम आदमी को ही मतलब नहीं है। आम आदमी को भी राजाओं से मतलब है, “वाह, क्या महल है!” महल तो है वह पहाड़ के ऊपर बनाया है और वहाँ नीचे जो लोग रहते थे, उनके बारे में? तू आम आदमी है? अपने भाई-बिरादरों के बारे में भी तो पूछ ले कि वे कैसे रहते थे।
आम आदमी भी जाकर ऐसे मेस्मराइज़्ड, “वाह, क्या महल है!” अरे, वो तेरा ही शोषण करके बना था वो महल। “यह उस समय की रानी जी की ख़ास साड़ी है 17.5 किलो की। क्योंकि उसमें सोना है, चाँदी है, हीरे हैं, ऑल काइंड्स ऑफ़ फ़ाइनरीज़।” और आप ऐसे, “ओ..!” तुम्हारी परदादी को लूटकर ही उन रानी जी ने वह साड़ी पहनी थी। यह तुम्हें नहीं दिखाई देता। तो हमारे यहाँ तो यह धारा बहती आ ही रही है, जहाँ पूजा ही उसको जाता है बस जिसके पास सारी दौलत, सारी ताक़त केंद्रित हो गई है। तो आज का भारत भी अगर बस उनको ही पूज रहा है जो दौलतमंद हैं, ताक़तवर हैं, तो इसमें आपको ताज्जुब क्या हो रहा है।
वह जो गिग वर्कर है, वह तब भी लुट रहा था, आज से 500 साल पहले भी, 1000 साल पहले भी, 1500 साल पहले भी, वह आज भी लुट रहा है। आपको इसमें ताज्जुब क्या है? बल्कि हम तो दुनिया के उन चंद देशों में से हैं जिन्होंने शोषण को संस्थागत बना दिया, एक्सप्लॉइटेशन को इंस्टीट्यूशनलाइज़ कर दिया। यह बोलकर कि “तेरी तो जात ऐसी है तेरा तो शोषण होना ही चाहिए।” और “तेरा लिंग ऐसा है, तू पैदा ही हुई है पति-परमेश्वर के पाँव दबा, और वो जो बोले उनकी माँग पूरी कर, बच्चे पैदा कर। ये कर वो कर।”
अब आपको ताज्जुब क्यों होता है कि गिग वर्कर्स के साथ अन्याय हो रहा है? क्यों होता है? जिस ताजमहल पर इतना फ़ख़्र करते हो, बहुत अच्छी बात है, आर्किटेक्चर बहुत सुंदर है उसका। वह सब बढ़िया है, आर्किटेक्चर के तौर पर उसकी तारीफ़ कर लो। पर कभी यह भी सोचना कि आज की दरों पर उसको बनवाने की लागत कितनी है? वह रुपया आया कहाँ से? वो हमारे ही परदादे थे, जिनका ख़ून चूसकर इस तरह की इमारतें बनी हैं, और व्यवस्थाएँ बनी हैं, और बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी गई हैं।
कितने फ़ख़्र से कहते हो, “और फिर हमारे फ़ेवरेट राजा ने, बादशाह ने फलानी लड़ाई लड़ी।” तुम्हें पता है लड़ाई लड़ने में कितना पैसा लगता है? तुम्हें पता है उनके साम्राज्य, उनकी एम्पायर के विस्तार में, एक्सपैंशन में कितना पैसा लगता है? उसकी फ़ाइनेंसिंग कौन कर रहा था? कौन कर रहा था? हमारे पुरखे, गाँव के लोग, साधारण खेतिहर, किसान, मज़दूर, ये लोग। ताकि राजा जी अकड़ के कह सकें, “अब हमने दक्खन भी जीत लिया।”
और कितना अच्छा लगता है न, मूवी बनती है वहाँ राजा आ रहा है, कह रहा है, “दक्खन जीतना बाक़ी है।” अपनी पॉकेट मनी से जीत रहा है तू? यह सब जो पूरा चल रहा है तेरा, इतना लंबा-चौड़ा एक्सपिडिशन, हू इज़ द फ़ाइनेंसर?
बहुत कम देश होते हैं जो अपने शोषकों को पूजना शुरू कर दें। हम बिरले हैं। प्रथम विश्व युद्ध ख़त्म हुआ, वर्साय की संधि की गई, उसमें जर्मनी से कहा गया, जितना नुकसान हुआ है सब देशों का, चलो तुम मुआवज़ा भरोगे। जितने पैसे लगे हैं लड़ाई में, वह सब तुम भरोगे। और उसके जो क्षेत्र थे जर्मनी के, वह भी तीन-चार देशों में बाँट दिए गए। किसी ने थोड़ा ले लिया, किसी ने कुछ ले लिया, किसी ने कुछ ले लिया।
जो भी था, उन्हें क्रोध आया, कि “यह हमसे क्या कहा जा रहा है?” कि हम अपने ही अपमान की फ़ाइनेंसिंग ख़ुद करें? वह क्रोध एक अँधेरी दिशा की ओर बढ़ गया; उससे फासीवाद का जन्म हुआ, उससे द्वितीय विश्व युद्ध हो गया। वह अलग बात है। लेकिन इतना तो जर्मनी ने करा न कि अपने ही शोषण को पूजना नहीं शुरू कर दिया। जब तक हमारी यह परंपरा क़ायम रहेगी कि जो तुम्हारा शोषण कर रहा है, जानते हुए भी कि वह शोषक है, वह अन्यायी है तब भी उसके सामने सिर झुकाते चलो। भारत में जो हो रहा है, वह होता रहेगा। चाहे गिग वर्कर्स के साथ, चाहे किसी और के साथ।
वह इंसान चाहिए, जिसमें इतनी गरिमा हो, कि कहे “प्यार दोगे तो तुम्हारे लिए सिर भी कटा सकते हैं; पर डराओगे, धमकाओगे, शोषण करोगे, तो इतना-सा भी नहीं झुकेंगे।” वह इंसान चाहिए।
मैं आपसे पूछूँ, अच्छा बताइए, पिछले हज़ार साल में भारत में किन-किन वंशों ने राज किया है? राजाओं के नाम बताइए। आप बता दोगे। बता दोगे न? काफ़ी कुछ बता दोगे। सब लोग मिलकर अपना दिमाग लगाओगे तो काफ़ी विस्तार के साथ बता दोगे, सचमुच। ठीक है न, बता दोगे न?
हम कहेंगे, चलिए, पानीपत की पहली लड़ाई से शुरू करते हैं और 1947 तक आते हैं। पूरा बता दो। सब लोग मिल जाओगे तो बता दोगे, उत्तर से दक्षिण तक पूरा सब बता दोगे। अब मैं आपसे पूछूँ, इस पूरे अंतराल में, लगभग हज़ार साल, आम आदमी की दशा क्या रही है? यह बताना। बताओ। बताओ न।
पृथ्वीराज चौहान ने जब लड़ाई करी थी, तो कितनी थी प्रति व्यक्ति आय भारत की? बताओ। और क्यों नहीं पता आपको? आप बार-बार बोलते हो, मोहम्मद गौरी आया था, ये लड़ाई हुई, इतनी बार हराया, फिर हार गए। ये सब आप जानते हो। उस समय आम आदमी की क्या दशा थी, वो क्यों नहीं जानते? वो आम आदमी आप हो। आपको आक्रांताओं से मतलब है, आपको राजाओं से मतलब है; आपको अपने आप से मतलब नहीं है। आप अपनी दशा नहीं जानना चाहते।
जो लोग आपको इतिहास की किताबें देते हैं, उनसे यह क्यों नहीं पूछते हो? लिखो इसमें, हाउ वास द कॉमन मैन डूइंग एट दैट टाइम? व्हाट वर द सोशल कंडीशंस एट दैट टाइम? महिलाओं की क्या स्थिति थी? जातिवाद कितना था, कम था, ज़्यादा था? शिक्षा की संस्थाएँ कितनी थीं? बताओ। पब्लिक हेल्थ कैसी थी? यह भी बताओ। यह सब क्यों नहीं पूछते? बस इतने में ही खुश हो जाते हो, लड़ाई हुई थी, 13 बार लड़ाई हुई थी। यह आपके लिए हिस्ट्री है। यह आपकी हिस्ट्री ही नहीं, तो किसकी हिस्ट्री है? ये तो उन दो लोगों की हिस्ट्री है। आप अपनी हिस्ट्री तो कभी पूछते ही नहीं, क्योंकि आप आम आदमी हो, आम आदमी जानना ही नहीं चाहता मेरी क्या दशा रही है इस पूरे काल में।
“अकबर द ग्रेट।” ठीक। बताओ, तुम्हारा क्या हाल था तब? अकबर तो ग्रेट हो गया, तुम अपना भी तो हाल बताओ। या तुम्हारा हाल कुछ भी रहे, अकबर फिर भी ग्रेट। यह कौन-सी ग्रेटनेस है? तुम मर रहे हो, तुम बर्बाद हो रहे हो। यदि तुम मर रहे हो, तुम बर्बाद हो रहे हो, तो अकबर ग्रेट कैसे हो सकता है? बताओ न। जहाँगीर का न्याय, कैसे पता? तुम्हारे साथ हुआ? तुम्हें कैसे पता? किसी को भी यूँ ही ग्रेट बोल दोगे, सेल्फ-रिस्पेक्ट, सेल्फ-लव कुछ होता है कि नहीं? इमारतें इतनी बड़ी-बड़ी बन गईं, और दक्षिण की ओर आओ तो वहाँ और बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हैं। “ओ!” ऐसे देखते हो, इमारतें बड़ी, आदमी छोटा ही रह गया। ये ग्रेटनेस है क्या? जल्दी बोलो।
तो वैसे ही जो कैपिटलिस्ट है, वो भी अपने बड़े-बड़े भवन बना लेता है, तुम उसके आगे छोटे रह जाते हो और तुम्हें फ़र्क़ भी नहीं पड़ता। न शर्म आती, न दुख होता। “ग्रेट ब्रिटिश एंपायर।” क्यों अंग्रेज़ों को गाली देते हो? सचमुच ग्रेट थी। हम गाली इसलिए देते हैं कि रही होगी ग्रेट, हमें तो बर्बाद कर गई न। इसलिए देते हैं न गाली, तभी तो हमने कहा कि हमें स्वाधीनता चाहिए। तुम होओगे ग्रेट, यार, अपने घर में रखो ग्रेटनेस। यहाँ से तो पैसा लूट-लूट के ही ले जा रहे हो। बने रहो ग्रेट, हमें छोड़ दो। हमें स्वतंत्र होना है।
तो फिर आप आज के कैपिटलिस्ट को रोल मॉडल क्यों बोलते हो? अगर यह रोल मॉडल है, तो अंग्रेज़ भी रोल मॉडल हैं। द ब्रिटिश एंपायर वाज़ द बिगेस्ट कैपिटलिस्ट ऑफ़ इट्स टाइम। सो मच सो कि लंदन आज भी दुनिया का फ़ाइनेंशियल सेंटर है, सबसे बड़ा। ब्रिटिश एंपायर भी कैपिटलिस्ट ही थी। वो यहाँ पर वॉर वेज करने नहीं आए थे, वो पैसा कमाने आए थे। उनको बुरा बोल दिया और बिल्कुल ठीक किया उनको बुरा बोल दिया, तो जो आज का कैपिटलिस्ट है, वो आपका रोल मॉडल क्यों है?
कैपिटल अपने आप में बुरी नहीं है। पर भीतर वो अहंकार बैठा है जो कह रहा है कि जीवन का लक्ष्य यही है, बस कैपिटल बढ़ाते रहना। ये पागलपन है। किसी कैपिटलिस्ट से पूछो, “अच्छा, बता, तेरी फ़िनिश लाइन क्या है?” वो बता सकता है क्या? दिख नहीं रहा, यह वही अहंकार है, जिसकी बात सब बोध-ग्रंथों ने करी है। एक अंधा कुआँ, जो कभी भर नहीं सकता।
साल-दर-साल एबिट्डा बढ़ाना है। साल-दर-साल सब बॉटम लाइन बढ़नी चाहिए, बढ़नी चाहिए, नहीं बढ़ेगी तो शेयर प्राइज़ क्रैश कर जाएगा। सिर्फ़ यही नहीं कि मुनाफ़ा कमाना है; पिछले साल जितना प्रॉफ़िट आया था, इस साल उससे ज़्यादा आना चाहिए। प्रॉफ़िट में भी ग्रोथ होनी चाहिए। अच्छा, ठीक है, फ़िनिश लाइन तो बता दे। कहाँ तक जाएगा, फिर रुक जाएगा? कहीं नहीं रुकूँगा। तू कहीं नहीं रुकेगा, पर इस पृथ्वी को तो रुकना है न यार; रिसोर्सेज़ ही नहीं हैं।
और तुझे अगर कहीं नहीं रुकना, अगर तुझे साल-दर-साल अपनी बॉटम लाइन और फैलानी ही है, तो उसके लिए तू एक्सप्लॉयटेशन तो करेगा ही करेगा। सिर्फ़ अपने वर्कर्स का ही नहीं करेगा, आप सोचते हो गिग वर्कर्स का हो रहा है; कस्टमर्स का नहीं हो रहा होगा क्या? जो दिमाग गिग वर्कर्स का एक्सप्लॉयटेशन कर रहा है, क्या वो अपने कस्टमर्स का नहीं कर रहा होगा? क्या वो इकोलॉजी का, पृथ्वी का, रिसोर्सेज़ का नहीं कर रहा होगा एक्सप्लॉयटेशन?
एक्सप्लॉयटेटिव माइंड तो एक्सप्लॉयटेटिव है। वो सबका करेगा, क्योंकि उसको तो बस मुनाफ़ा बढ़ाना है। कैपिटल नहीं बुरी चीज़ है, कैपिटल को चलाने वाला दिमाग अगर होश में हो तो। कैपिटलिज़्म की समस्या ये है कि उसमें कोई लक्ष्मण-रेखा होती ही नहीं। किसी भी बिंदु पर व्यक्ति ये कहता ही नहीं कि बस, बहुत हुआ। एक अनंत खाई है, जिसको मुनाफ़े से भरते जाना है और भर नहीं सकती, क्योंकि वह मटेरियल नहीं, साइकोलॉजिकल है। सब कुछ भरा जा सकता है अगर वो मटेरियल हो। पर एक साइकोलॉजिकल वॉइड को, एक साइकोलॉजिकल सिकनेस, जो एम्प्टिनेस बनकर आ गई है उसको कैसे भर दोगे? यह समस्या है कैपिटलिज़्म के साथ।
किसी के पास कैपिटल है और वह उस कैपिटल का उद्देश्य लगा रहा है कि दुनिया को आगे बढ़ाना है, पृथ्वी को बचाना है, बढ़िया वाले काम करने हैं। विज़डम हो, कंपैशन हो, कैपिटल का ऐसा इस्तेमाल किया जाए तो क्या बुराई है? हमें चाहिए ऐसे कैपिटलिस्ट्स। लेकिन ज़्यादातर जो कैपिटल है, वह ऐसे लोगों के हाथ पड़ती है जो कहते हैं कि कैपिटल का उद्देश्य है और कैपिटल बढ़ाओ, कैपिटल फ़ॉर द सेक ऑफ़ कैपिटल। कैपिटल फ़ॉर द सेक ऑफ़ मोर कैपिटल।
पैसा किस लिए है? और पैसे से पैसा बनाने के लिए। दुनिया में जो ज़्यादातर बिलियनेयर हैं वो मालूम है न, किस क्षेत्र से हैं? वो बैंकिंग ऐंड फ़ाइनेंस। वो फ़ाइनेंस के क्षेत्र से हैं, माने उन्होंने क्या किया है? उन्होंने कुछ नहीं किया है, उन्होंने पैसे से पैसा बनाया है। कैपिटल है अब उसको इधर-उधर इन्वेस्ट करेंगे, यह करेंगे, पैसा लगाएँगे, उससे और पैसा बनाएँगे। कितना बनाना है? इसकी कोई लिमिट नहीं है, कोई लिमिट नहीं है। इसका मतलब तुम जानते ही नहीं कि तुम पैसा क्यों कमा रहे हो।
तुम्हारे भीतर एक पागलपन है, एक बेहूदा अंधकार है, जिसमें तुम पैसा ठुँसे जा रहे हो, ठुँसे जा रहे हो, और पैसे से वह अंधेरा कभी रोशन नहीं होने वाला। वह खाई कभी भरने नहीं वाली, बस तुम पूरी पृथ्वी को खा जाओगे। बात सिर्फ़ गिग वर्कर्स के शोषण की नहीं है। तुम दुनिया की आधी प्रजातियाँ ख़त्म करके खा चुके हो। तुम अब पूरी पृथ्वी को खा जाओगे, फिर भी तुम्हारा पेट नहीं भरेगा।
और ऐसी चीज़ों को हम क्या देते आए हैं परंपरा में? सम्मान। क्या है? “महान! बड़े महान! उनकी ख्याति देखो, उनकी सेना देखो, उनका राज्य देखो, उनका महल देखो।” दो बैठ जाएँगे झुन्नू, दोनों के खाने के लाले पड़े हुए हैं और दोनों बैठकर कहेंगे, “पता है, फलाने की जो नेटवर्थ है न, चार बिलियन हो गई अब। क्या बात है! क्या बात है!” अबे, तुझे क्या मिल रहा है इसमें? और तुझे ही लूटकर हुई है उनकी इतनी। देखा है ऐसे लोगों को?
घर में चाय की पत्ती भी पाँच बार इस्तेमाल होती है, और टीवी के सामने बैठे हैं, और पाँचवीं बार उबाली गई पत्ती की चाय पीकर कह रहे हैं, “ये देखिए, आप स्टॉक मार्केट को देखिए, क्या बात है! क्या बात है!” इसमें तुझे क्या मिल रहा है? जाओ पाँव पूज लो उसके, वो ट्रिलियनर हो गया, जाकर चरणामृत पी लो अब।
जहाँ इतिहास के नाम पर बस राजाओं और सेठों की कहानियाँ चलाई जाएँ, वहाँ जान लीजिए कि इतिहास ही पूरा शोषण का इतिहास है।
यह पूरी दुनिया में हुआ है। यह तब तक होता रहेगा जब तक इंसान चकाचौंध को पूजता रहेगा, जब तक इंसान शोषित होने के बावजूद अपने शोषक जैसा ही बनना चाहेगा, इसलिए उसे पूजेगा। समझ में आ रहा है न, वो दोनों झुनू बैठकर क्यों उसे पूज रहे होते हैं? इनके पास चाय पीने के पैसे नहीं हैं, पर पूज रहे हैं कि “वाह! वाह! उसके तो यूनिकॉर्न निकल गया।” उसको पूजो। क्यों पूज रहे हैं, समझ रहे हैं न? क्यों? क्योंकि है ये झुन्नू, है ये शोषित, पर बनना इन्हें भी शोषक जैसा ही है।
जब तक तुम्हारे दिमाग में अपने शोषक जैसा ही बन जाने की इच्छा रहेगी, शोषण चलता रहेगा। आप एक्सप्लॉइटेड हो क्योंकि आप ख़ुद वैसा ही बनना चाहते हो जैसा आपका एक्सप्लॉइटर है। आपका एक्सप्लॉइटर ही तो आपका रोल मॉडल है, है कि नहीं?
एक बहुत साधारण सा सवाल है, तुम्हें इज़्ज़त देनी भी है तो किसको देनी चाहिए? जो बहुत बड़ा है, या जो तुम्हें बड़ा बनाना चाहता है?
श्रोता: जो बड़ा बनाना चाहता है।
आचार्य प्रशांत: अच्छे से पकड़ो इस सवाल को। तुम पूजते किसको हो? जो बहुत बड़ा है। यह मालूम है न क्या है? यह आत्म-अपमान है, यह लैक ऑफ़ सेल्फ़-एस्टीम है। तुम यह नहीं पूछते, कि “क्या यह मुझे बड़ा बनाना चाहता है?” तुम बस यह देखते हो कि कौन कितना बड़ा है। भले ही वह बड़ा बना हो तुम्हें लात मारकर, तुम्हें गिराकर, तुम्हारे ऊपर अपना बूट रखकर बना हो। पर तुम उसे पूजोगे क्योंकि वह बड़ा है।
यह अपने आप से अच्छे से पूछो, “मुझे बड़े को पूजना है या उसको जो मुझे बड़ा बनाना चाहता है?”
संतों ने तो कह दिया था:
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
~संत कबीर
जो मुझे बड़ा बनाना चाहता है, मेरे लिए वह पहले आता है, गोविंद से भी ज़्यादा बड़ा है। गोविंद होंगे बड़े पर मेरे काम तो गुरु आया न, क्योंकि वह मुझे बड़ा बनाना चाहता था; तो गोविंद से पहले गुरु का स्थान है। जिन्हें समझ थी, उन्होंने कहा, ठीक है, होगा कोई पारमार्थिक तल पर या व्यवहारिक तल पर; किसी भी तल पर ऊँचा होगा, श्रेष्ठ होगा। होगा श्रेष्ठ, मुझे तो अपनी ज़िंदगी जीनी है न, मेरा वास्ता तो मेरे दुख से है न। तो मैं सम्मान उसे दूँगा जिसने मेरा हाथ थामा और मुझे ऊपर उठाया।
हम सम्मान किसको दे रहे हैं? नादिर शाह दिल्ली पर चढ़ आया, “नादिर शाह! वाह, क्या बात है नादिर शाह!” हमारा बस चलता तो हम “तैमूर द ग्रेट” भी बोल देते। क्यों? क्योंकि उसने आकर खूब मारा था हमें।
आपने देखा है, फ़िल्में बनती हैं। जितनी भी फ़िल्में गैंगस्टर्स पर बनती हैं, उनमें गैंगस्टर्स कैसे ग्लैमराइज़ किए जाते हैं। जो हमारा शोषक होता है, जिसने हमें मारा होता है। हमें उसके चरण चाटने की आदत लग गई है। अभी भी एक फ़िल्म आई है, उसमें वही लोग ग्लैमराइज़ किए जा रहे हैं जिन्होंने आकर आपको खूब मारा। अंडरवर्ल्ड की पिक्चरें याद कर लो न, उन सारी फ़िल्मों में यही हो रहा होता है।
वो जो नमूने होते हैं अंडरवर्ल्ड के, उनको यह नहीं दिखाया जाता कि “ये देखो, हास्यास्पद, अम्यूज़िंग, व्हाट ए जोक।” ऐसे नहीं दिखाया जाता, उनको कैसे दिखाया जाता है? “करारा आदमी है, मर्द आदमी है, ये मूँछें देखो उसकी, स्टाइल देखो, अदा देखो, उसका नाचना देखो।” अच्छा, एक बात बताओ, उसके नाचने का उस फ़िल्म से ताल्लुक़ क्या है? क्यों उसका नाच इतना ग्लैमरस तरीके से कोरियोग्राफ़ किया गया? तुमने कभी सोचा?
उस पूरी स्टोरीलाइन में उस नाचने की स्टेप की कोई ज़रूरत थी क्या? पर वह इसलिए ताकि ये गिरे हुए लोग ही, एक्सप्लॉइटेड लोग, अब इसको पूजें। और तुमने पूजा भी। यह हमने खूब किया है, पूरी दुनिया ने किया है पर भारत में तो यह ऐतिहासिक परंपरा ही बन गई।
जो आपको बचाने आए उसको आप दिखा दोगे सीधा-साधा; और जिसने शोषण किया हो, जिसने पददलित किया हो, जिसने गले काटे हों, जिन्होंने बलात्कार करे हों, उनको कैसा दिखाओगे? स्टड, टशन, “जलवा है भाई का जलवा।” उसका जलवा है? उसका तो वर्णन और चित्रण ऐसा होना चाहिए कि जैसे मुँह पर जूता छपा हो उसके। और उसे आप दिखाओगे ऐसे कि, “वाओ! क्या बात है, क्या स्टाइल है, क्या अदा है!” नहीं?
चलो, मैं बताऊँ नहीं। मैं बताऊँ नहीं, यहाँ पर एक गिग वर्कर लाकर खड़ा कर दूँ, और यहाँ पर एक वो टशनी कैपिटलिस्ट। ईमानदारी से बोलना, किसको देखोगे, किसको चाहोगे, किसके पास जाओगे? जल्दी बोलना।
श्रोता: कैपिटलिस्ट।
आचार्य प्रशांत: बस यही बात है। तुम बिल्कुल भूल जाओगे कि शायद उस गिग वर्कर का ख़ून चूसकर यह कैपिटलिस्ट इतना टशनी, इतना स्मार्ट दिख रहा है। बिल्कुल भूल जाओगे। और गिग वर्कर तो गिग वर्कर। “यह गंदा आदमी, स्टेज से हटाओ, इसका क्या, कुछ नहीं बेकार।”
तुम यह पूछोगे भी नहीं कि अगर यह दुर्बल दिख रहा है, दीन दिख रहा है, भूखा दिख रहा है, तो इसको भूखा छोड़ा किसने। तुम यह पूछोगे भी नहीं। बस यही बात है। ऐसे कितनी भी आउटरेज कर लो, गिग वर्कर, ये-वो; कुछ भी कर लो, जब मौका आएगा न चुनोगे तुम भी कैपिटल को ही। और यह बात कैपिटलिस्ट?
श्रोता: जानता है, तो कहता है, “कर लेने दो इनको आउटरेज। दो-चार दिन में मेढ़क टराएँगे, फिर चुप हो जाएँगे।”
झटका मत खा जाइएगा आप सब तो गीता कम्युनिटी के हैं। किसी दिन मैं खड़ा हूँ, और बगल में अगर बिल्कुल नेम-फेम, कैपिटलिज़्म-सपोर्टेड बाबाजी आके खड़े हो जाएँ, सेलिब्रिटी वाले। तो फिर अपनी ही प्रतिक्रिया से हैरान मत हो जाइएगा, कि, “अरे, हम ऐसे निकले!” हम ऐसे ही हैं, निकले नहीं।
“आचार्य जी, आई लव यू।” अभी नेताजी आकर यहाँ खड़े हो जाएँ, तो लव का बाजा बज जाएगा आपके। फिर बाद में भले रो लेना, “आचार्य जी, मैंने बेवफ़ाई की आपसे। मैं नेताजी को देखकर बह गई।” उसे ऊँचा खड़ा होना चाहिए, भले ही वह हमारे ऊपर जूता रखकर ऊँचा खड़ा हुआ है। हम उसका जूता चाट लेंगे।
इसलिए अब समझो अध्यात्म में सबसे ऊँचा किसको बोला गया। न देवी, न देवता, न कोई पारलौकिक शक्ति, न आसमानी ताक़त। कहा गया, आत्म। वेदान्त सिखाता है आत्मसम्मान; कहता है, सबसे ऊँचा कौन है? क्या नाम देता है? आत्म। आत्म है सबसे ऊँचा। हमने सीखा नहीं, हमारे लिए सबसे ऊँचा वह है जो हमें लात मारे।
जो आपको न प्रेम देता, न आपके लिए सद्भावना रखता, न दिल से आपके कल्याण की कोई इच्छा रखता। कब छोड़ोगे उसे इज़्ज़त देना? बताओ, बोलो। यह इम्प्रेस होना, इन्फ़्लुएंस होना कब बंद करोगे? चकाचौंध दिखी नहीं कि लोट गए। बोलिए, बोलिए।