जीसस धर्म को आमूल-चूल हिला देते हैं। प्रेम के नए अर्थ, सत्य के नए अर्थ, प्रार्थना के नए अर्थ सामने आने लगते हैं। सत्ताधीशों के लिए मुसीबत हो जाती है, साज़िश करी जाती है। ऐसा नहीं था कि वो मरना चाहते थे। पर अब मौत सामने आ ही गई है, तो भागना भी कैसा? जीते रहते तो बढ़िया ही रहता, मौज आ रही थी जीने में। पर मर भी गए तो कोई बुराई नहीं, क्योंकि जितना जिए, पूरा जिए। और हँसते-हँसते जीसस एक दिन सूली चढ़ जाते हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: जीसस एक जवान आदमी है। एक साधारण से घर में पैदा हुआ है, पेशे से गड़रिया है और वास्तव में जवान है। और एक जवान आदमी की सारी आग मौजूद है उसमें। उच्छृंखल घूमता है, उन्मुक्त। छोटी-सी उसकी एक टोली है, अपना सड़कों पर इधर-उधर जनता की बजा रहा है घूम-घूम के। जो बात जैसी दिखती है जस-का-तस बोल देता है।
जो भौतिक, पार्थिव बाप है उसका, उसको लेकर के उसे बहुत मज़ा नहीं है। तो बोलता है, “हम तो ‘उसके’ बेटे हैं। कौन इन बापू जी से अपनी पहचान बाँधे, पसंद ही नहीं आते हमें। इस जहाँ के हैं ही नहीं हम, क्योंकि इस जहाँ का तो हम जिसको भी देखते हैं बेड़ियों में जकड़ा हुआ ही देखते हैं। तो यहाँ के नहीं, हम कहीं और के हैं। हम पर नियम-क़ायदे मत थोपने आना।”
अपनी बात कहनी है उसे; पाँच लोग मिले पाँच। और जाकर बैठ जाता है एक छोटे से टीले पर और दस-बीस लोग इकट्ठा हुए तो ठीक है उनसे बोल दिया। जो प्रचलित धर्म है उसको बहुत अहमियत नहीं देता। किस धर्म का? यहूदी है जीसस। बहुत उसको महत्त्व देते ही नहीं।
यहूदियों के कमांडमेंट्स होते हैं, अनुदेश; दस प्रमुख अनुदेश हैं। उनका पालन ही नही करता, पालन क्या नहीं करता धज्जियाँ उड़ा देता है। कहता है, “छोड़ो ये पुरानी बातें हैं, मैं नई बताता हूँ। तुम कहाँ पुरानी किताब के चक्कर में पड़े हो,




