दुख के कारण को समझो

Acharya Prashant

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दुख के कारण को समझो
छोटे बच्चे हैं; मिर्ची लग गई। मम्मी भाग के आती है तो क्या करती है उसके मुँह में? ले, चीनी खा। ये सुख है। यह जीवन जीने की हमारी आम विधि रहती है। हमें सुख चाहिए ही इसीलिए होता है क्योंकि हम दुख में हैं। पर हम यह नहीं करते कि दुख के कारणों को ही समझ लें। जब दुख हो तो सुख की तरफ़ भागने की अपेक्षा दुख के कारणों की तरफ़ भागो, दुख के भीतर की ओर भागो। और वहाँ पता चलेगा दुख किसलिए है। पता चलते ही दुख घटना शुरू हो जाएगा। तुमने कुछ करा नहीं; तुमने सिर्फ़ जाना और जानने भर से दुख मिट गया। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, मेरा एक्चुअली दो महीने पहले एक्सीडेंट हुआ था, घुटनों में फ्रैक्चर हुआ था। तो जस्ट मेरा एक एक्सपीरियंस मैं बोलना चाहता हूँ, तब मुझे दर्द हो रहा था। मैं जस्ट थोड़ा अवलोकन कर रहा था कि दर्द तो मुझे नहीं चाहिए। लेकिन अभी हुआ है, तो दर्द हो रहा था। लेकिन मैं घर में बैठा था, बिकॉज़ वर्क फ्रॉम होम चल रहा था, तो बहुत न खाने का मन करता था। सो, मैं उस टाइम मैंने सोचा कि मेरा पेन तो नहीं चाहिए, लेकिन प्लेज़र माँग रहा है। शरीर प्लेज़र तो माँग रहा है। तो मैंने कहा, फिर वो भी मुझे नहीं चाहिए, वैसे नहीं है। बिकॉज़ मैं अभी चाह रहा हूँ कुछ खाने के लिए, ऐसा।

तो समझ में आ रहा था कि पेन तो नहीं चाहिए, बट प्लेज़र चाहिए, ये तो प्रकृति का खेल है। वो तो दिख रहा था मुझे। बट कभी-कभी मैं वो रोक नहीं पाता था, मैं जाकर खा लेता था। तो ये फिर समझ में आता है कि जैसे आप बोल रहे थे कि ये प्रेम की कमी है। मैं अननेसेसरी कर रहा हूँ। समझ में आ रहा है, फिर भी कर रहा हूँ।

आचार्य प्रशांत: आपने ये अस्तित्व का बड़ा गहरा तथ्य सबके सामने रख दिया है। हमें प्लेज़र, सुख चाहिए ही इसीलिए होता है क्योंकि हम दुख में हैं। पर हम ये नहीं करते कि दुख के कारणों को ही समझ लें। हम कहते हैं, तराज़ू के एक पलड़े में यदि दुख है, तो उसको संतुलित कर देंगे। बराबर का सुख दूसरे पलड़े में रख कर के। होना ये चाहिए कि ऐसे तराज़ू को ही लात मार दी जाए।

हम जो कहते हैं न, आदमी सुख के पीछे भागता है। आदमी सुख के पीछे इसीलिए भागता है, क्योंकि उसका दुख बहुत भारी और अचीन्हा है, अपरखा है।

छोटे बच्चे हैं, “मिर्ची लग गई।” मम्मी भाग के आती है, तो क्या करती है उसके मुँह में? “ले, चीनी खा।” ये सुख है। और छोड़ो, दाल में नमक ज़्यादा हो गया नींबू मिलाओ, गुजरात में हो तो शक्कर मिला दो, अब तो हर जगह होता है। थोड़ा सा मिला दो अच्छा लगता है। “नमक कम हो गया क्या?” नमक कम हो गया पर अनुभव ठीक हो गया, संतुलन आ गया। ये हमारा तरीका, हमारी आम विधि रहती है जीवन जीने की, जीवन का सामना करने की।

दुख तो है ही। दुख इसलिए है क्योंकि दुख को नहीं समझते, और दुख के बाद दुख को बराबर करने के लिए जो हम सुख लेकर के आते हैं, हम उसको भी नहीं समझते। दुख इसलिए था क्योंकि किसी विषय से कोई उम्मीद लगाई थी। इसके अलावा कोई कारण हो सकता है दुख का? दुख इसलिए था। और उम्मीद वो लगाओ जो वो विषय पूरी कर सकता है, तो दुख नहीं होगा। आप बस से उम्मीद लगाएँ कि वो आपको यहाँ से वहाँ पहुँचा दे, इस उम्मीद में कोई गलती नहीं हो गई। और ये उम्मीद अगर नहीं पूरी हो रही है, तो भी कोई घोर दुख नहीं आ जाएगा। एक बस नहीं आई तो दूसरी बस आ जाएगी। कुछ नहीं होगा, तो कुछ और कर लेंगे।

दुख तब होता है जब आप बस से माँग करते हैं चाँद पर पहुँचाने की। हम दिन प्रतिदिन जो झुँझलाहट होती है, उसकी बात नहीं कर रहे हैं। झुँझलाहट हो सकती है; बस नहीं आई, देर से आई, इसको दुख नहीं कहा जाएगा।

ये जब हम तापत्रय की बात करते हैं, तो उसमें क्या-क्या आता है सबसे पहले? आधिभौतिक। ये सब आधिभौतिक बात हैं। आधिभौतिक बातों के लिए अध्यात्म नहीं होता। उसके लिए आप जाइए और जो भी सरकारी विभाग है, जाएँ, वहाँ पर आप एक अर्जी डाल दीजिए कि आपकी बसें ठीक नहीं चलती हैं। वहाँ पर ये सब करना होता है। अध्यात्म होता है वो जो वास्तविक दुख है उसके लिए; वो कौन सा होता है? आध्यात्मिक। आधिभौतिक, फिर आधिदैविक और फिर आध्यात्मिक। ठीक है?

जब बस से उम्मीद कर ली जाती है कि अब ये टेक ऑफ कर लेगी, बस एयर बस बन जाएगी, तब वो दुख पैदा होता है, जिसका कोई इलाज नहीं होता। और उसी के लिए भगवद्गीता है; उन दुखों के लिए, जिनका दुनिया में कोई इलाज नहीं है। बस नहीं चल रही ठीक, ट्रेन नहीं चल रही ठीक, इसका दुनिया में इलाज है। और जिस चीज़ का दुनिया में इलाज है उसको अगर तुम अध्यात्म में ठीक करने आ जाओगे, तो इसी को क्या बोलते हैं? अंधविश्वास।

फसल सूख रही है, तो जाकर कुछ कर रहे हैं; पूजा-पाठ, मंत्र, प्रार्थना, कि इससे फसल बच जाएगी। फसल का सूखना पूरी तरह एक भौतिक घटना है, उसमें तंत्र-मंत्र, जादू-टोना करके या पूजा-पाठ, प्रार्थना, आरती करके कुछ नहीं मिलने वाला। नहर खोदो, या कोई और काम करो, या ऐसा कुछ उगाओ जिसमें पानी कम लगता हो। भौतिक बात है ये।

भौतिक चीज़ें जब परेशान करें, तो उसका कोई आध्यात्मिक इलाज नहीं होता। बिजली कट गई है तो ध्यान में बैठ गए। बिजली कट गई है तो जाओ और वहाँ जो तुम्हारे कर्मचारी हैं सरकारी, उनको पकड़ो। और वोट सोच-समझ के देना अगली बार, और बिल भी जमा कर दिया करो बिजली कट गई है तो। आ रही है बात?

आध्यात्मिक दुख तब होता है, जब आप अपने आप को जोड़ लेते हो। जिस पेन की आप बात कर रहे हैं न, मैं उस वास्तविक पेन को संबोधित कर रहा हूँ। वो तब होता है जब हम अपने आप को किसी ऐसी चीज़ से जोड़ लेते हैं जो बेचारी हमारी उम्मीदें पूरी कर ही नहीं सकती। और वो कर ही नहीं सकती तो हम उसको और दलते हैं, उसको और ज़्यादा एक्सप्लॉइट करते हैं, उसमें से और उगाहना चाहते हैं जो वो दे ही नहीं सकता।

जैसे कोई गन्ने को डाले बार-बार, वो जो रस निकालने वाली मशीन होती है, ये उम्मीद करके कि इसमें से सेब का रस निकलेगा अब। और गन्ना निचुड़ गया है पूरे तरीके से, और तब भी आप कह रहे हो कि बेवफ़ा निकला। और उसकी हालत देखो कैसी है, चुसा हुआ नहीं, निचुड़ा हुआ गन्ना देखा है? मशीन में तो फिर भी उसकी गरिमा होती है कुछ, उसका आकार वैसे ही बना रहता है। वो जो दाँतों से करके फिर थूका जाता है, वो वाला गन्ना देखा है? ज़्यादातर जिनसे हमने रिश्ते बनाए होते हैं, उनकी वो हालत होती है। और तब भी वो बेचारे गाली खा रहे होते हैं क्योंकि सेब का रस नहीं दे पाए।

अरे, वो सेब का रस दे ही नहीं सकता था। और तुम्हें पसंद भी गन्ना ही आया था। उस समय तो बिल्कुल कहा था, आहा! हा! क्या दंडवत खड़ा है, मस्त गन्ना है, बलिष्ठ गन्ना है, लाठी की तरह भी काम आएगा। और फिर वक़्त बीता। अब क्या माँग है? थोड़ा एप्पल जूस। वो कहाँ से दे बेचारा। तो फिर हम क्या करेंगे? गन्ना, ये दुख है। सेब का रस न पाना दुख है, तो अब जाकर कुछ और करेंगे। कोई कैंड जूस पिएँगे, या कुछ और पिएँगे, बियर पिएँगे। ये हमारे देखे सुख है। यही चक्की चलती रहती है। “दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।”

दुख आएगा क्योंकि मूर्खता करोगे। और जब दुख आएगा, तो और दूनी मूर्खता करके सुख लेकर आओगे। दुख आया क्योंकि मूर्खता करी। होना क्या चाहिए था यदि प्रेम होता? यदि प्रेम होता, तो दुख के कारण का अन्वेषण होता और मूल कारण को हटाया जाता। अकारण नहीं होता दुख, कुछ करा है इसीलिए दुख है। आधिभौतिक और आधिदैविक; आधिभौतिक और आधिदैविक दोनों को भौतिक ही मानो। एक ज्ञात रूप में भौतिक है, एक अज्ञात रूप में भौतिक है, हैं दोनों भौतिक दुखी ही। तो भौतिक दुख है, उसके कारण के आप नहीं ज़िम्मेदार होते।

भौतिक दुख के कारण के आप ज़िम्मेदार नहीं होते। उदाहरण के लिए आप चल रहे हो, कोई पीछे से आकर आपको धक्का मार के गिरा गया। इसके आप ज़िम्मेदार नहीं हो। पर आध्यात्मिक दुख के ज़िम्मेदार हमेशा स्वयं आप होते हो, इसको पकड़ लीजिए अच्छे से। जो भौतिक दुख है, आधिभौतिक, आधिदैविक। जो भौतिक दुख है, उसके लिए अपने आप को गुनहगार मत ठहरा लीजिएगा कि हमारी ही कोई गलती होगी या हमारे पिछले जन्म के पाप होंगे। नहीं, आपकी गलती नहीं है, कोई पाप नहीं है, संयोग मात्र है।

मैं क्या करूँ मैं तो जन्म से ही कमज़ोर हूँ, मेरी कोई पिछले जन्म में…। कुछ नहीं है संयोग है। एक ही घर में दो बच्चे हो सकते हैं; एक बहुत कमज़ोर सा और एक एकदम ऐसा, 6.5 फुट का। बिल्कुल हो सकता है। संयोग है, इसमें कोई आपने कुछ नहीं कर डाला, उसके लिए अपने आप को गुनहगार मत मान लेना। बेकार में ग्लानि लेकर घूम रहे हो।

और जो आध्यात्मिक दुख होता है, उसके ज़िम्मेदार हमेशा आप होते हैं, उसके लिए दूसरे को ज़िम्मेदार मत बना देना। पहचान क्या होती है आध्यात्मिक दुख की? उसमें अंधी कामना बैठी होती है। अंधी कामना माने गन्ने से सेब का रस चाहिए, ये अंधी कामना है। प्रकृति से आनंद चाहिए, ये अंधी कामना है। प्रकृति में कुछ नहीं है जो आनंद दे पाएगा। दुनिया में कुछ नहीं है। दुनिया से भी जैसे आधिभौतिक दुख मिल सकता है, वैसे ही आधिभौतिक सुख भी मिल सकता है।

बिल्कुल एक तल का सुख आपको दुनिया से मिल सकता है। आपको बहुत गर्मी आ रही है, पसीना छूट रहा है, कोई पंखा चला देगा तो सुख की अनुभूति हो जाएगी। दुख भी इसीलिए था क्योंकि दुनिया ने बिजली काट दी थी, और फिर सुख भी मिल जाएगा क्योंकि बिजली वापस आ गई। ठीक है, सुख दुनिया में है लेकिन उसी तल का जिस तल का दुख दुनिया से है।

हमें लेकिन जो चीज़ जीने नहीं देती, वो आधिभौतिक सुख या दुख नहीं होते, वो होते हैं आध्यात्मिक दुख। और आध्यात्मिक दुख हमेशा आता है अज्ञान से, नासमझी से, चीज़ों की प्रकृति को न समझने से।

आपके सामने जो भी विषय है, व्यक्ति है, उसको न समझने से जो संबंध पैदा होगा, वो दुखदाई होगा। क्योंकि समझोगे नहीं तो उससे व्यर्थ उम्मीद बाँधोगे, वो उम्मीद कभी पूरी होगी नहीं। उससे जो दुख आता है, वो आध्यात्मिक दुख होता है। आध्यात्मिक दुख का इलाज कोई प्लेज़र नहीं हो सकता। प्लेज़र की भी उपयोगिता है, बिल्कुल है। आप बहुत दौड़े हो, आपकी टाँगें थक गई हैं, मालिश करने वाली मशीन लगा लीजिए। भौतिक चीज़ ही है न? या कोई आके आपका सिर दबा दे। भौतिक चीज़ ही है न? हाँ, ये बिल्कुल ठीक है। क्योंकि दुख ही कैसा था? भौतिक था। तो ऐसे दुख का इलाज भौतिक सुख से बिल्कुल हो जाएगा।

जो दुख पूर्णतया भौतिक है, उसका इलाज पूर्णतया भौतिक सुख कर देगा, बिल्कुल कर देगा। कर लीजिएगा कोई समस्या नहीं है। शरीर काँप रहा है, ठंड लग रही है, ये भौतिक समस्या है, ये आध्यात्मिक समस्या नहीं है। इसके लिए बाबा जी का नुस्खा काम नहीं आएगा, एक कपड़ा और पहन लीजिए। कपड़ा क्या होता है? भौतिक। ये दुख पूर्णतया भौतिक था; तो भौतिक दुख है उसका इलाज मिल जाएगा।

भगवद्गीता है आध्यात्मिक दुखों के इलाज के लिए। भगवद्गीता है उस ज्ञान के लिए ताकि आप आध्यात्मिक दुख का भौतिक इलाज न करें, और भौतिक दुख का आध्यात्मिक इलाज न करें। आध्यात्मिक दुख का भौतिक इलाज कहलाएगा मटेरियलिज़्म, और भौतिक दुख का आध्यात्मिक इलाज कहलाएगा सुपरस्टिशन। आ रही है बात समझ में? और दोनों ही मूर्खताएँ हैं। और आमतौर पर कोई भी व्यक्ति इनमें से एक मूर्खता नहीं करेगा, वो दोनों करेगा। जो व्यक्ति आप अंधविश्वासी पाएँ, बहुत संभावना है कि वो भोगवादी भी होगा।

तो हम कहते हैं कि रुपए-पैसे की भी जीवन में अहमियत है; बिल्कुल है। वो कौन से दुखों से निपट लेते हैं? भौतिक। भौतिक दुखों से। जो बिल्कुल भौतिक तल की समस्याएँ हैं, उसके लिए रुपया-पैसा चाहिए, बिल्कुल चाहिए। लेकिन बहुत जल्दी एक बिंदु आ जाता है जब भौतिक समस्याएँ ख़त्म हो गईं, बहुत जल्दी आता है वो बिंदु। उसके आगे अगर आप अपने दुख को रुपया बढ़ा कर के कम करना चाहते हैं, तो ये क्या हो जाएगा? अब ये अंधविश्वास हो जाएगा। क्योंकि दुख कौन सा है? अब दुख इसके बाद कौन सा है?

श्रोता: भौतिक।

आचार्य प्रशांत: भौतिक दुख तो आपने सब निपटा दिए। तो अब दुख कौन सा बचा है?

श्रोता: आध्यात्मिक।

आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिक। और अभी आप रुपया बढ़ा रहे हो, तो आप भौतिक तरीकों से आध्यात्मिक दुख का इलाज करना चाहते हो। ये क्या हो जाएगा? बिल्कुल ठीक बोला था, मटेरियलिज़्म हो जाएगा। और बिल्कुल बैठे हुए हैं अपनी स्थितियों के मारे हुए, असली बात ये है कि साहस नहीं दिखा रहे, मेहनत नहीं कर रहे। उद्यम की कमी है और इसलिए ग़रीब हैं और इसलिए बीमारी वाली जगह पर बैठे हैं। इसलिए ऐसे समाज में पंगु हो गए हैं, बंधक हो गए हैं जो आपका शोषण कर रहा है।

और क्या कर रहे हैं जाकर के? बाबा जी या घर में ही पूजा-पाठ कर रहे हैं। उस पूजा-पाठ से कुछ नहीं मिलेगा, हाथ-पाँव चलाओ।

तुम एक बहुत भौतिक समस्या का आध्यात्मिक इलाज करना चाहते हो, ऐसा कोई इलाज होता नहीं। कोई इलाज नहीं होता। जान लगाओ, मेहनत करो।

समझ में आ रही है बात?

आपमें से जो लोग बैठे हैं यहाँ पर, ज़्यादातर आपके पास जो भौतिक दुख हैं आधिभौतिक दुख, आपके पास उनका इलाज है। अगर आप यहाँ उपस्थित हैं तो इसका मतलब आप भारत, कम से कम भारत के प्रिविलेज्ड वर्ग में से हैं। तो आप में से कोई भी ये दावा नहीं कर सकता कि आपके पास यदि दुख है, आपने जैसे कहा, पेन; आपके पास यदि दुख है तो उसकी मूल वजह मटेरियल है, भौतिक है। अगर भौतिक होती तो आपने अब तक निपटा दी होती। अगर आपकी ज़िंदगी में समस्याएँ हैं, आप परेशान रहते हो, शंकित रहते हो, तो उसका कारण नासमझी है।

ये बात मैं अभी उत्तर प्रदेश चला जाऊँ और वहाँ बिल्कुल कोई ग़रीब गाँव हो, वहाँ जाऊँ: जहाँ खाने को कोई नहीं है, जहाँ स्कूल नहीं है, जहाँ बहुत मानसिक पिछड़ापन है। जहाँ गंदगी फैली हुई है चारों ओर, जहाँ तक सरकारी कोई मदद कुछ नहीं पहुँचती है। ये बात मैं वहाँ नहीं कहूँगा कि तुम्हारी समस्या आध्यात्मिक है। वहाँ भौतिक है समस्या और उसका भौतिक इलाज होगा। तुम कुछ भी करो, ये भौतिक दूरी तय करो और जाओ पहले तो पढ़ाई करो। तुम कुछ भी करो और भौतिक दूरी तय करो और जाओ किसी शहर में कॉलेज खोजो, रोज़गार खोजो और भौतिक पैसा कमाओ। आ रही है बात समझ में?

आपकी समस्या लेकिन?

प्रश्नकर्ता: आध्यात्मिक है।

आचार्य प्रशांत: आप अगर परेशान हो और बहुत गहराई से परेशान हो; आध्यात्मिक समस्या वो जिसकी कोई भौतिक इलाज नहीं है, आध्यात्मिक समस्या वो जो लगती तो भौतिक है पर है नहीं। क्योंकि आप कितने भी अभी भूत और भर लो। भूत माने मटेरियल, तत्त्व। आप कितने भी भूत अभी और भर लो, आपका दुख बना ही रहेगा। जो उसकी अब मार्जिनल यूटिलिटी है वो अब ज़ीरो हो चुकी है। और बढ़ाओगे भी पैसा, तो भी आपका दुख नहीं कम होगा। उनके लिए भगवद्गीता है।

नहीं कह रहा हूँ कि जो विपन्न हैं और शोषित हैं, गीता उनके लिए नहीं है, उनके लिए भी है। पर जो अपने भौतिक बंधनों से आगे आ चुका है, उसके लिए तो गीता के अलावा कोई इलाज ही नहीं है। क्योंकि अगर कोई भौतिक इलाज होता तो तुमने अब तक कर लिया होता न। है तो रुपया-पैसा, जाओ कर लो इलाज रुपए-पैसे से जहाँ होता हो। आ रही है बात समझ में?

तो जब दुख हो तो सुख की तरफ़ भागने की अपेक्षा दुख के कारणों की तरफ़ भागें। दुख हो तो दुख के विपरीत की तरफ़ मत भागो, दुख के भीतर की ओर भागो। और वहाँ पता चलेगा दुख किस लिए है, पता चलते ही दुख घटना शुरू हो जाएगा। अगर कोई चमत्कार है तो यही है, कि बिना कुछ करे दुख मिट गया। हम चमत्कार, चमत्कार, जादू कहते हैं न? यही है, तुमने कुछ करा नहीं, तुमने सिर्फ़ जाना और जानने भर से दुख…। ये चमत्कार होना शुरू हो जाता है।

प्रश्नकर्ता: सो, बेसिकली सुख और दुख दोनों अनुभव ही हैं। जैसे आपने बोला, जानने के बाद दुख हट जाएगा। वैसे ही सुख को जानने के बाद सुख भी कम होगा। मीन सुख का जो अहंकार के ऊपर होता है, वो कम होगा।

आचार्य प्रशांत: दिक़्क़त बस ये है कि दुख जब तक बना हुआ है भीतर; तो सुख तो आया ही था दुख की क्षतिपूर्ति करने को, सुख आया ही है दुख के मुआवजे के रूप में। दुख अभी बना हुआ है, और सुख को जानोगे तो सुख कम होगा। आप कभी सुख को जानने की कोशिश भी करोगे?

इसीलिए ज्ञान की तरफ़ लाना सबसे मुश्किल उनको होता है जिनका सुख का दौर चल रहा होता है। जिनका सुख का दौर चल रहा है, उन्हें बड़ा मुश्किल है लाना। क्योंकि सुख का दौर चल रहा है मतलब भीतर दुख तो धड़क ही रहा है। दुख धड़क रहा है, उसको बराबर करने के लिए सुख ले आए हैं। सुख को जानेंगे सुख घटेगा, कम से कम शुरुआत सुख के घटने से होगी। और दुख बैठा हुआ है, तो ये तो फिर से दुख का पलड़ा भारी होने लगेगा। तो आदमी सुख को नहीं जानेगा, बहुत मुश्किल है। हालाँकि सैद्धांतिक रूप से बात ठीक है आपकी। जैसे दुख को जानने से दुख हवा हो जाता है, वैसे ही सुख को जानोगे तो सुख हवा हो जाएगा। वो बात ठीक है।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। मेरा नाम महेंद्र है, मैं लखनऊ से आया हूँ। मैं तीन साल से आपके सानिध्य में हूँ और ढाई साल से निरंतर गीता सत्रों में जुड़ा हुआ हूँ। नियमित सत्र अटेंड करना, नियमित परीक्षा देना और जो रिपोर्ट कार्ड है, वो वैसे अच्छा है। जीवन चाहे अच्छा है नहीं है, लेकिन रिपोर्ट कार्ड काफ़ी अच्छा है।

आचार्य जी, एक हो सकता है ये मेरा सवाल थोड़ा बचकाना हो क्योंकि लोग सोचेंगे कि ढाई साल, तीन साल हो गया तो ऐसा सवाल पूछ रहे हैं। जैसे अभी तक हमने आपसे समझा है कि जो भी हमारे जीवन में बंधन होते हैं, दुख होते हैं और विषय होते हैं, ये बोध से और समझ से सॉल्व हो जाते हैं, छूट जाते हैं या हट जाते हैं। लेकिन जैसे अभी आपने दो लोगों के प्रश्नों में बोला कि झेलो या बर्दाश्त करो। तो इससे मुझे थोड़ा कन्फ्यूज़न हो रहा था कि कहीं ये दमन का विषय तो नहीं है। क्योंकि दमन जो है; सप्रेशन के विरुद्ध जाकर आप बोध की बात करते हैं, समझ की बात करते हैं। तो मैं ये कन्फ्यूज़ हो जाता हूँ कि जब झेलो और बर्दाश्त करो वाली बात आती है कि बड़ी माँ से हम नहीं जीत सकते हैं, तो वो कहीं दमन तो नहीं है।

आचार्य प्रशांत: दमन कर दिया जाता है सुनी-सुनाई बात से, कि सुन लिया कि कोई आचरण गलत होता है, तो आचरण बता दो, बंद कर दो वो काम करना। वो होता है। हम बात ये कर रहे हैं कि तुम्हें सब समझ में आ भी जाएगा, तो शरीर को नहीं समझ में आएगा। उसके बाद अगर यादें आती हैं, दुख आता है, तो कुछ नहीं कर सकते। बर्दाश्त करो। बर्दाश्त करने की बात हो रही है, दबाने की बात थोड़ी हो रही है।

दबाया जाता है हमेशा बोध की अनुपस्थिति में। दबाने की ज़रूरत ही तभी पड़ती है जब समझा ही नहीं, और दबाने में और बर्दाश्त करने में अंतर है। दबाने का ये मतलब है कि घर में कुत्ता है भौंकता बहुत है, उसका मुँह बाँध दिया। और बर्दाश्त करने का मतलब है कि कुत्ता है तो भौंकेगा, झेलो। दमन का क्या मतलब है? उसके मुँह में बाँध दिया, बिना समझे कि कुत्ता क्या चीज़ है और मेरा कुत्ते से रिश्ता क्या है। समझा कुछ नहीं है, पर परंपरा में चला आ रहा है कि मौन चाहिए, शांति चाहिए, तो कुत्ते का मुँह बाँध दिया। तो ये है दमन।

और झेलने को एक अर्थ में धृति भी बोलते हैं। इसका कुछ आप कर नहीं सकते, आप इसको धारण करिए अब। ये तो रहेगी चीज़। इसका क्या इलाज करोगे? वो बोध के बाद की बात है कि सब समझ लिया, लेकिन समझने के बाद भी एक टीस बाक़ी है। उस टीस का क्या करें? कुछ नहीं कर सकते, सहो।

दमन और तितीक्षा में कुछ अंतर समझ में आया है आपको कि नहीं? परीक्षा पत्र तो अच्छा है। अब ये रहा मेरा प्रश्न। बताइए, परीक्षा में दमन में और तितीक्षा में क्या अंतर है? अर्जुन को कहते हैं, तितिक्षस्व। उसका क्या मतलब है? तितीक्षा तो हिस्सा है साधन चतुष्टय का। तितीक्षा का मतलब होता है कि अब सुख-दुख, यश-अपयश, सर्दी-गर्मी, इन सबको समभाव से लेंगे और क्या कर सकते हैं। ये तितीक्षा है। मैं तितीक्षा समझा रहा हूँ, दमन नहीं।

हालाँकि, एकदम शुरुआत में कुछ चीज़ों में दमन की भी ज़रूरत पड़ जाती है, कभी-कभार उसकी कुछ उपयोगिता रह जाती है। तो इसलिए दम-शम को भी यदि विवेक के साथ इस्तेमाल किया जाए, तो वो भी उपयोगी हो सकते हैं। पर तितीक्षा और आगे की बात है। ठीक है?

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आचार्य जी।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं दो साल से आपको सुन रहा हूँ। मुझे पेंटिंग का शौक है, तो एक बार मैं शांत जगह ढूँढते-ढूँढते श्मशान घाट में पहुँच गया। गाँव में एक श्मशान है, उधर लाशें जलाई जाती हैं। उसके बीच में मैंने स्टैंड रख के वहाँ पर पेंटिंग शुरू कर दिया। तो तीन साल तक मैं पेंट कर रहा था। कुछ डर एक सेकंड के लिए भी नहीं लगा। और लैंडस्केप बनाया वहाँ का एक झरना वग़ैरह, सब बहुत अच्छे से। और कुछ दिन बाद उसी जगह से रात में गुज़र रहा था, तो बहुत डर लगा। मतलब, जगह भी वही थी, वहाँ के पशु-पक्षियों की आवाज़ भी सेम थी। मगर डर बहुत लगा। तो ये किस वजह से?

आचार्य प्रशांत: अब जब चीज़ें बदल रही हैं, तो बदलती हुई चीज़ों पर इतना ध्यान क्या देना? पहली बार डर नहीं लगा, दूसरी बार लगा। एक बार और गुज़र जाओ, कुछ और हो जाएगा। जो चीज़ बदल ही रही है, उसके बारे में जान लो बदल रही है, उस पर इतना क्या ध्यान देना है? इसका उत्तर यही है कि जाओ छह बार गुज़रो। छह बार अलग-अलग तरह के अनुभव होंगे। तो जान लो, आते-जाते, गुज़रते अनुभव हैं; इन पर इतना ध्यान नहीं देते। आगे बढ़िए।

मैं किस सहने की बात कर रहा हूँ? मैं आपसे बात कर रहा हूँ, मुझे पता है ये बात ज़रूरी है। अब ये बात करते हुए आप बैठे हैं। हो सकता है, आप लोगों को दोपहर में कुछ कहा गया हो कि थोड़ा चल लिया करो, पर आप बैठे हैं। ठीक है? आप में से कई लोगों का दोपहर में खाने का समय होगा, हो सकता है आपने न खाया हो, आप बैठे हैं। ये तितीक्षा है।

मैं खड़ा हूँ, हो सकता है इससे अब खड़े-खड़े पीठ में कुछ हो रहा हो। ये तितीक्षा है। और दमन क्या होता है? नहीं पता है कि क्या होगा, पर बिटिया इस मंगलवार को तू कुछ नहीं खाएगी, और खाएगी तो पापिनी कहलाएगी। ये क्या है भूख का?

श्रोता: दमन।

आचार्य प्रशांत: अंतर समझिए। ठीक है?

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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