छोटे बच्चे हैं; मिर्ची लग गई। मम्मी भाग के आती है तो क्या करती है उसके मुँह में? ले, चीनी खा। ये सुख है। यह जीवन जीने की हमारी आम विधि रहती है। हमें सुख चाहिए ही इसीलिए होता है क्योंकि हम दुख में हैं। पर हम यह नहीं करते कि दुख के कारणों को ही समझ लें। जब दुख हो तो सुख की तरफ़ भागने की अपेक्षा दुख के कारणों की तरफ़ भागो, दुख के भीतर की ओर भागो। और वहाँ पता चलेगा दुख किसलिए है। पता चलते ही दुख घटना शुरू हो जाएगा। तुमने कुछ करा नहीं; तुमने सिर्फ़ जाना और जानने भर से दुख मिट गया।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, मेरा एक्चुअली दो महीने पहले एक्सीडेंट हुआ था, घुटनों में फ्रैक्चर हुआ था। तो जस्ट मेरा एक एक्सपीरियंस मैं बोलना चाहता हूँ, तब मुझे दर्द हो रहा था। मैं जस्ट थोड़ा अवलोकन कर रहा था कि दर्द तो मुझे नहीं चाहिए। लेकिन अभी हुआ है, तो दर्द हो रहा था। लेकिन मैं घर में बैठा था, बिकॉज़ वर्क फ्रॉम होम चल रहा था, तो बहुत न खाने का मन करता था। सो, मैं उस टाइम मैंने सोचा कि मेरा पेन तो नहीं चाहिए, लेकिन प्लेज़र माँग रहा है। शरीर प्लेज़र तो माँग रहा है। तो मैंने कहा, फिर वो भी मुझे नहीं चाहिए, वैसे नहीं है। बिकॉज़ मैं अभी चाह रहा हूँ कुछ खाने के लिए, ऐसा।
तो समझ में आ रहा था कि पेन तो नहीं चाहिए, बट प्लेज़र चाहिए, ये तो प्रकृति का खेल है। वो तो दिख रहा था मुझे। बट कभी-कभी मैं वो रोक नहीं पाता था, मैं जाकर खा लेता था। तो ये फिर समझ में आता है कि जैसे आप बोल रहे थे कि ये प्रेम की कमी है। मैं अननेसेसरी कर रहा हूँ। समझ में आ रहा है, फिर भी कर रहा हूँ।



