राष्ट्र क्यों लड़ते हैं?

Acharya Prashant

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राष्ट्र क्यों लड़ते हैं?
राष्ट्रों की लड़ाई असल में अहंकार की लड़ाई है। देश माने वहाँ के लोग, और लोग जैसे हैं वैसे ही उनके नेता। दुनिया में जो गुंडागर्दी दिखती है वो बाहर से नहीं आई, हम ही उसका स्रोत हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंध हों या व्यक्तिगत, यहाँ वफ़ा नहीं ताक़त चलती है। अहंकार की भूख अनंत है इसलिए युद्ध रुकता नहीं। समाधान केवल एक है कि जनसंख्या को स्वयं की शिक्षा मिले। जब तक इंसान अपने अहंकार को नहीं पहचानेगा तब तक विनाश जारी रहेगा। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ईरान के बारे में ही, तो दुनिया में आजकल माहौल ऐसा है कि बिल्कुल खुलेआम गुंडागर्दी चल रही है। आप किसी के प्रेसिडेंट को उठवा ले रहे हो। आप किसी के कंट्री हेड को मिसाइल से मार दे रहे हो। आपकी अगर कोई बात नहीं सुनता तो आप टैरिफ की धमकी देते हो और इकोनॉमी उनकी बर्बाद करने की धमकी देकर उन पर चढ़ना चाहते हो। तो एक तरह से आप कह रहे हो कि हमारी बात सुनो, नहीं तो उड़ा देंगे, इकोनॉमी ख़त्म कर देंगे या फिर आपको ख़त्म कर देंगे।

तो इस बीच हर देश घबराया हुआ है, किसी को पता ही नहीं कि इस सिचुएशन को नेविगेट कैसे करें। तो ऐसी सिचुएशन में इंडिया या बाक़ी कंट्रीज़ का स्टैंड कैसा होना चाहिए, सर?

आचार्य प्रशांत: कंट्री का कोई स्टैंड क्या होगा भाई, कंट्री माने क्या होता है? इमारतें, सड़कें? आप कंट्री हैं, मैं कंट्री हूँ, ये सब लोग कंट्री हैं। हम हैं न, हमारे अलावा कौन है कंट्री? यूएस माने क्या? यूएस सिटिज़न्स। ईरान माने क्या? इंडिया माने क्या? हम ही तो हैं। हमारे जो संविधान की प्रस्तावना है, प्रीएंबल; वो शुरू ही क्या बोलकर होती है? “वी, द?”

श्रोता: पीपल ऑफ इंडिया।”

आचार्य प्रशांत: गिव टू अवरसेल्व्स दिस कॉन्स्टिट्यूशन। हम ही हैं, हमारा ही देश है और हम ही ने संविधान बनाया है, और हम ही ये संकल्प लेते हैं कि इसका अब हम पालन करेंगे। और थोड़ी कोई ऊपर से आ गया है, हम ही हैं।

तो गुंडागर्दी अगर दुनिया में चल भी रही है, तो गुंडा कौन है? हम ही हैं। आप लगातार अपने-अपने घर में, मोहल्ले में, गली में, शहर में, सोसाइटी में गुंडागर्दी होते देखते हो; तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वही चीज़ दिखे, तो फिर आश्चर्य क्या। बस आपने एक उम्मीद लगा रखी है कि ऊँचे पदों पर लोग बैठे हैं, तो ऊँचे होंगे। आपको तो कृतज्ञ होना चाहिए ट्रंप जैसे लोगों का कि उन्होंने दर्शा दिया कि ऊँचे पदों पर भी आप ही बैठे हुए हो। हाँ, वो व्यक्ति पाखंडी नहीं है कम-से-कम। वो ये नहीं कर रहा कि ऊपर-ऊपर से तो बिल्कुल सभ्य बनकर चल रहा है एकदम सोबर, क्लिंटन की तरह।

क्लिंटन को देखा था? कितना मोहक व्यक्तित्व था क्लिंटन का! या ओबामा, कि नोबेल भी मिल गया है और बमबारी भी जारी है। ट्रंप ने जितनी बमबारी करी है, इससे बहुत ज़्यादा करी, किसने?

श्रोता: ओबामा।

आचार्य प्रशांत: ओबामा ने। लेकिन व्यक्तित्व बड़ा सौम्य था, और बातें बड़ी सोफिस्टिकेटेड, मँजी हुई। पता है न उनको क्या मिला था?

तो ट्रंप अगर बुली है, गुंडा है, तो उसने सीधे दिखा दिया है, “हाँ, हूँ,” क्योंकि यही इस दुनिया का दस्तूर है। ये जंगल है, भाई। जंगल तो फिर भी एक शांत जगह होता है; वहाँ कुछ तो नियम चलता है, वहाँ प्रकृति का नियम चलता है कि पेट अगर भरा है तो कोई किसी को नहीं मारने वाला। यहाँ तो अहंकार का खेल चल रहा है जिसमें कि पेट कभी भर ही नहीं सकता। तो मारना कभी रुक ही नहीं सकता।

आप सब न बड़े-बड़े शब्दों में फँस जाते हो, डिप्लोमेसी बड़ा शब्द आ गया, इंटरनेशनल रिलेशंस आ गया, जिओपॉलिटिक्स आ गया। ये आपको ऐसा लगता है कि आई कुछ ऊँचे तल की बात हो रही है। ऊँचे तल की नहीं बात हो रही है, ये वही लॉन्ग लहसुन है जिसमें आपकी ज़िंदगी दिन-रात बीत रही है। आप क्यों मान रहे हो कि वहाँ ऊँचे तल की कोई बात हो रही है, क्यों मान रहे हो। हम जैसे हैं वैसे ही हमारे नेता। और चूँकि व्यक्ति वोट देते समय अपने से ऊँचे को वोट देने में बहुत कतराता है, क्योंकि वो अपमान की बात होती है। एक तो वैसे ही व्यक्ति ऊँचा, ऊपर से मैं उसको वोट देकर और ऊँचा कर दूँ।

तो इसीलिए आपके नेता आपके तल के भी नहीं होते, वो आपके तल से भी नीचे के होते हैं। किसी ऊँचे व्यक्ति को वोट देना बड़े अपमान की बात लगती है मतदाता को, क्योंकि वो व्यक्ति वैसे ही बुद्धि में, विचार में, विवेक में तुमसे ऊँचा है; और फिर तुम उसे वोट देकर राष्ट्रपति और बना दो, तो ये तो दोहरा अपमान हो गया। तो इसीलिए वोट हमेशा किसको दिया जाता है?

श्रोता: निचले तल।

आचार्य प्रशांत: जो एकदम ही तुमसे भी गया-गुज़रा हो, उसी को वोट दिया जाता है।

आज जो दुनिया में हो रहा है, हम तो कह रहे हैं उसका हमें एहसानमंद होना चाहिए कि सच्चाई बिल्कुल खुलकर के एकदम नंगे स्वरूप में दिखा दी गई है। कोई अब बहाना भी नहीं बनाया जाता कि कोई ऊँचा नैतिक कारण था इसलिए हमने आक्रमण किया। कोई ऊँचा नैतिक कारण कुछ नहीं, मारना है तो मारना है, बस हो गया। अच्छा है न, बहाने भी नहीं बना रहे। क्यों मारा? “मारना था।” क्यों मारा? “पसंद नहीं था, तो मार दिया।”

पहले क्या होता था कि किसी को मारना है, तो यूएन सेक्रेटरी सिक्योरिटी काउंसिल में जाकर रेज़ोल्यूशन पास हो रहा है, उस पर बहस हो रही है, ये हो रहा है, वो हो रहा है। उसको बायपास करा तो कम-से-कम जो नाटो की असेंबली है, वहाँ पर जाकर आपको चर्चा करनी पड़ रही है। कुछ तो आपको अपने कृत्य को मान्य दिखाने के लिए, नैतिक दिखाने के लिए, लेजिटिमेट दिखाने के लिए मेहनत करनी पड़ रही है। अब तो फ्री-फ़ॉर-ऑल, खुला मैदान, हम अपने काम को लेजिट दिखाने की भी कोशिश नहीं करेंगे।

मैं गुंडा हूँ, हाँ हूँ। “गुंडा” से याद आया, एक फ़िल्म आई थी “गुंडा।” उसमें वो बोलता है, “मैं हूँ बुल्ला…” हँसते ही रहोगे पूरा नहीं करोगे? तो वही चल रहा है पूरी दुनिया में। और उसमें और भी कई प्रकार के रोचक चरित्र थे, एक फटेला, एक कटेला, एक कई तरह के थे वो; एक थी उसकी बहन मर जाती है। अरे, वो कल्ट-फ़ेवरेट थी कैंपस में! जब बिल्कुल लगता था कि पढ़ाई का तनाव ऐसा हो गया है कि भेजा बाहर आ जाएगा तो फिर हम बैठकर वो फ़िल्म देखा करते थे, और सारा तनाव उतर जाता था। क्योंकि सच्चाई थी वहाँ और सत्य तो तनाव उतार ही देता है, वो किसी भी रूप में आ सकता है। देखो, वही सच्चाई आज हमें दुनिया भर में दिखाई दे रही है।

कोई भी नेता, ये वास्तव में न पोस्ट-ट्रुथ एज ही नहीं है, पोस्ट-स्ट्रक्चर एज ही नहीं है; ये पोस्ट-वर्च्यू एज है, वेयर इट इज़ नो मोर वर्चुअस टू बी वर्चुअस। इट इज़ नॉट ईवन नीडेड टू बी गुड। यू कैन ओपनली फ़्लॉन्ट योर वाइसेज़। ये एक पोस्ट-वर्च्यू एज है, मैं पोस्ट-मॉरैलिटी भी नहीं बोल रहा, पोस्ट-वर्च्यू। कोई नहीं आपको रोकेगा आपके पास पैसा है आप उससे खुलेआम सरकार खरीद लीजिए, वो ठीक है अच्छी बात है। बल्कि लोग आपके फ़ैन हो जाएँगे, कहेंगे, “भाई, इसमें ताक़त देख, कितनी है भाई! पूरी सरकार खरीद ली इसने अपने पैसे से। आप फ़िल्म बना दीजिए, जहाँ पर कोई अंडरवर्ल्ड डॉन जाता है और सरकार ही खरीद लेता है, तो “केजीएफ” जैसी हो जाएगी बिल्कुल। उसमें भी वो दिखाते हैं वो जाता है प्रधानमंत्री के सामने बैठता है, बोलता है।

ज़रूरत ही नहीं है अच्छाई दिखाने की भी। नीत्शे ने गॉड को मार दिया और रैशनलिस्ट्स ने विज़डम को मार दिया। तो अब बची क्या है? ईगो। और उसका कोई ईमान नहीं है, कोई मालिक नहीं, उस पर कोई बंधन नहीं।

ये तो रैशनलिज़्म का युग है न सब, इनसे पूछो कि एक बात बताओ लॉजिक और विज़डम में क्या अंतर है? विज़डम क्या चीज़ होती है? ये बता नहीं पाएँगे। इनसे पूछो कि तुम दुनिया में हर जगह कहते हो, “नो बिलीफ़, नो बिलीफ़, नो बिलीफ़,” लेकिन पहली बिलीफ़ तो स्वयं अहंकार है। द ईगो इज़ द फ़र्स्ट सुपरस्टिशन। इसको कब काटोगे? तो सब कुछ कट गया, बचा क्या है खड़ा हुआ सिर्फ़? अहंकार। और उसको अब संयमित रखने वाला कोई है नहीं, तो उसी का आप नंगा नाच पूरे विश्व में देख रहे हैं।

कोई कुछ भी कर सकता है, और जवाबदेही भी नहीं है, अकाउंटेबिलिटी नहीं है। किसी जस्टिफिकेशन की ज़रूरत ही नहीं है। बम क्यों गिराया? “मेरी मर्ज़ी।” ग्रीनलैंड क्यों चाहिए? “मेरी मर्ज़ी, मैं वहाँ से लूँगा।” नहीं, पर कुछ तर्क होगा? आपकी बात का जस्टिफिकेशन क्या है? “माय पावर इज़ द जस्टिफ़िकेशन।” मेरे पास ताक़त है, मैं जाकर के उसको डेनमार्क से, यूरोप से हड़प लूँगा, वही जस्टिफिकेशन है।

आप चीन से पूछिए जाकर के न,अक्साई चिन क्यों है तुम्हारे पास? कोई कारण तो बाद में आप आविष्कृत कर लेते हो। अभी वो बोल रहे हैं कि हमें ईस्टर्न साउदर्न तिब्बत बोल रहे हैं, कह रहे हैं, “अरुणाचल भी चाहिए।” पूछो कि भाई, कैसे? ये तुम्हारा कैसे हो गया? और अभी पिछले दस साल में, बीस साल में ही तुम्हारे दावों में इतनी तीव्रता कैसे आ गई? तो कारण सीधा है, दस-बीस सालों में चीन के पास ताक़त ज़्यादा आ गई, आर्थिक भी, सामरिक भी। सो द पावर इज़ द जस्टिफ़िकेशन। और कोई जस्टिफिकेशन की ज़रूरत ही नहीं है। जिसकी लाठी…

श्रोता: उसकी भैंस।

आचार्य प्रशांत: इतनी-सी तो बात है। दुनिया के ज़्यादातर नेताओं की चूँ करने की हिम्मत भी नहीं हो रही है। ये तो छोड़ दो कि वो इसमें कोई प्रभावी कदम उठाएँ, वो मुँह से भी नहीं बोल पा रहे हैं। क्योंकि पता है ये मारेगा, बोलेंगे तो मारेगा। किसी ने बहुत पते की बात कही थी, बोले, “इसको दे ही दो न नोबेल पीस प्राइज़, झंझट ख़त्म हो! पूरी दुनिया में किसी तरह शांति आए।”

वो वेनेज़ुएला की एक दीदी को मिल गया तो वो जाकर वहाँ का राष्ट्रपति उठा लाया। दीदी से कहलवा रहा है कि “मैं अपना नोबेल प्राइज़ इनको दान करना चाहती हूँ।” नोबेल कमेटी को आकर कहना पड़ा कि, “भाई, ये ऐसे दान-वग़ैरह नहीं होता, ट्रांसफ़रेबल नहीं है ये।” दुनिया की हर राजधानी में इस समय जितने रणनीतिकार बैठे हैं, बैठकर यही मंत्रणा कर रहे हैं कि किस तरह से हम भी एक आईसीबीएम निर्मित कर लें न्यूक्लियर वॉरहेड के साथ, ऐसी आईसीबीएम जो अमेरिका पहुँच सकती हो, क्योंकि इससे बचने का बस यही तरीका है, डिटरेंस।

वास्तव में दुनिया में अब न्यूक्लियर वेपन्स की एक नई होड़ शुरू होने वाली है, क्योंकि पूरी दुनिया को दिख गया है कि इंटरनेशनल लॉ जैसी कोई चीज़ बची नहीं है। बस एक ही चीज़ बची है और वो नॉर्थ कोरिया के पास है, एक आईसीबीएम चाहिए, इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल, और जिस पर लगे हों न्यूक्लियर वॉरहेड, बस वही चीज़ है जो अमेरिका को तुम्हारे यहाँ पर घुसने से रोक सकती है। वो भी एमआईआरवी वाले हों तो अच्छा है, ताकि ये भी न रहे कि हम इस पर कोई शील्ड-डोम लगाकर रोक लेंगे। वो एक मिसाइल जाए, उसमें से बहुत सारे वॉरहेड्स निकलकर छितरा जाएँ तो तुम सबको काट भी नहीं सकते।

बस यही चीज़ है जो आपको बचा सकती है, नहीं तो कोई क्या बिगाड़ लेगा एसिमिट्रिक बैटल है न। आप उसके घर में घुसकर उसको मार सकते हो और उसके पास वेपन-डिलिवरी सिस्टम ही नहीं है। वो अधिक से अधिक करेगा भी तो क्या करेगा, उसने कुवैत, बहरीन, दुबई, ओमान, उनको। वो कह रहा है, “हमें काहे को मार रहे हो?” सऊदी अरब को। वो कह रहा है, “हमारी मिसाइल वहीं तक जाती है, तो हमने तो फ़ायर करी थी। सच पूछो तो इरादा यही है कि अमेरिका पर गिरे पर वो जाती ही सऊदी अरब तक है। तो तुम पर गिर गई, तो हम क्या करें।” वो मारे पड़ा है उनको।

प्रश्नकर्ता: सर, इसी गुंडागर्दी का दूसरा एग्ज़ाम्पल है, ईयू और यूएस की रिलेशनशिप अभी ख़राब है।

आचार्य प्रशांत: यूक्रेन भी अभी तक बस क्यों बचा हुआ है? नहीं तो रूस तो राजधानी को ही निस्तनाबूत कर चुका होता बहुत पहले, चार साल हो गए उस लड़ाई के। क्योंकि नाटो का ख़तरा है, नहीं तो घर में घुसकर रौंद दिया होता। भाई, ज़मीनी लड़ाई में किसी को हराने में वक़्त लगता है और अपनी भी डैमेज होती है, पर आप ऊपर से बम ही बम गिरा दो खेल ख़त्म कर दो। और ज़मीनी ऑक्यूपेशन, वो एक्सपेंसिव चीज़ होती है। ये कुछ भी नहीं है, इससे अभी नहीं हुआ तो आगे होगा पर ये सारे इशारे एक ही ओर के हैं, न्यूक्लियर प्रोलिफरेशन होगा ज़बरदस्त तरीके से।

क्लाइमेट की आपदा हमारे सामने खड़ी ही है, उसके साथ ये न्यूक्लियर वाली चीज़ अब, इन दोनों में होड़ लगेगी कि पहले पृथ्वी को बर्बाद कौन करेगा क्लाइमेट कैटस्ट्रॉफ़ी या कि फुल-ब्लोन न्यूक्लियर वॉर। हर देश को अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है कि अगर हमारे पास न्यूक्लियर वेपन्स नहीं हैं; और न्यूक्लियर वेपन होना काफ़ी नहीं है प्लेटफ़ॉर्म चाहिए जो उसको वहाँ पहुँचा सके; चाहे तो सबमरीन हो, कुछ भी हो। और अगर ख़ुद विकसित नहीं कर सकते तो किसी से ख़रीद लो न, नॉर्थ कोरिया ने ख़रीदा ही है। और जो ख़रीद नहीं सकते हैं, चीन और रूस उनको सप्लाई करेंगे, सब्सिडाइज़ करके सप्लाई करेंगे।

भाई, क्यूबन क्राइसिस क्या थी 1962 की? कि सोवियत संघ भेज रहा था कि क्यूबा में अपनी मिसाइल्स लगा देंगे। अब क्यूबा के पास अपनी मिसाइल नहीं है पर क्यूबा बगल में है अमेरिका के, तो वहाँ पर अपनी मिसाइल लगा देंगे। क्यूबा ख़ुद नहीं विकसित कर सकता, तो यूएसएसआर वहाँ पर मिसाइल अपनी दे रहा था कि तुम हमारी मिसाइल ले लो। वही काम करने को अब रूस और चीन मजबूर होने वाले हैं। तो ज़बरदस्त तरीके से आप अब इन चीज़ों का प्रसार देखने वाले हैं। सीटीबीटी, एनपीटी ये सब अब इतिहास की धूल हो गए। ज़बरदस्त तरीके से अब ये होगा कि हर छोटे से छोटे देश ने अपना कुछ सिक्योरिटी जुगाड़ कर रखेगा। कुछ भी सुरक्षित नहीं रह जाएगा।

तो ये चीज़ ऐसी है कि एक चिंगारी काफ़ी होती है। जो स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ है, जो ऐसा निकला हुआ है न, वो एक नैरो स्ट्रेट है जहाँ से बहुत सारा दुनिया भर का तेल निकलता है। ईरान ने कहा, “मैं दुनिया में कहीं को तेल नहीं जाने दूँगा यहाँ से। हाँ, चीन को जा सकता है।” तो वहाँ से अमेरिका वाले बोल रहे हैं, “चीन को भी नहीं जाएगा, जब कहीं को नहीं जा सकता तो चीन को भी नहीं जाएगा। तुम दूसरों के टैंकर डुबोओगे तो हम तुम्हारा टैंकर डुबोएँगे।”

आप चीन के टैंकर डुबो दीजिए, आप चीन को मजबूर कर रहे हैं कि अब वो युद्ध में आ जाए। वहाँ चीन इनको एंटी-एयरक्राफ्ट और एंटी-एयरक्राफ्ट कैरियर मिसाइल्स बेचने को तैयार है। अगर ये लंबा खिंच गया तो देगा, ईरान के बगल में ही एक्सटेंडेड नेबरहुड में रूस आता है, रूस कब तक दूर रह लेगा। सारी जो लड़ाई है वो तो अहंकार की है, अहंकार कह रहा है मुझे एनर्जी चाहिए, रिज़र्व्स चाहिए, ऑयल, गैस, पेट्रोलियम ये चाहिए। वो सब तो रूस को भी चाहिए न, रूस ये कैसे बर्दाश्त कर लेगा कि सब कुछ अमेरिका ही ले जाए।

और आप कुछ भी बोलते रहिए आम अमेरिकन खुश है। ऐसा कुछ नहीं हो गया है कि ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग्स बिल्कुल गिर गई हैं, बिल्कुल भी नहीं। आम अमेरिकन खुश है कि, “देखो, मागा, वी आर एक्चुअली मेकिंग अमेरिका ग्रेट अगेन। और हमारा तो कुछ बिगड़ भी नहीं रहा, हमारा क्या बिगड़ रहा है? अमेरिका में कोई बम गिरा? खरोंच भी आई? कुछ नहीं हुआ और वहाँ जाकर हमने बिल्कुल सब देखो, बर्बादी करा दी है, और ये सब आपस में लड़ रहे हैं, हा-हा-हा! अब ये सब आपस में लड़ रहे हैं, ये सब एक-दूसरे को ख़ुद ही बर्बाद कर लेंगे। देखो, हमें तो कुछ भी नहीं हुआ।”

तो ऐसा नहीं है कि आप एक राष्ट्रपति को ही दोष दे सकते हो। पूरी जनसंख्या ही ऐसी है, वो राष्ट्रपति बिल्कुल वैसे ही है जैसे जनसंख्या, जनता, जनता खुश है। जनता तो कह रही है, “और करो।” इस तरीके से अगर तुम हमारी एनर्जी को चीप कर सकते हो तो हमें और मज़ा आएगा, हम और ज़्यादा कंज़्यूम कर पाएँगे। एनर्जी अगर चीप होगी तो अमेरिका के लिए जितने प्रोडक्ट्स और सर्विसेज़ हैं सब चीप हो जाएँगे। तो लोग और ज़्यादा फिर भोग सकते हैं।

सारा खेल इसी का है कि भीतर जो अहंकार बैठा है उसको अनलिमिटेड कंज़म्प्शन करना है, क्योंकि कुछ भी वो खा ले कभी उसकी भूख मिटती नहीं। तो उसको जितने भी दुनिया के ऑब्जेक्ट्स हैं, विषय हैं, सब चाहिए उसे अनंत। इसलिए एनर्जी चाहिए, जो एनर्जी के पीछे सारी लड़ाई चलती है न, वो इसलिए; क्योंकि कुछ भी करने के लिए इंसान को क्या चाहिए? एनर्जी। कोई भी ऑब्जेक्ट है, उसे कंज़्यूम करने के लिए क्या चाहिए? एनर्जी।

तो ये सारा खेल ईगो का है, ‘E’ फ़ॉर एनर्जी नहीं, ‘E’ फ़ॉर एनर्जी से पहले ‘E’ फ़ॉर ईगो। पूरा ब्रह्मांड मिल जाए तो भी पूरा नहीं पड़ेगा, कनाडा चाहिए, ग्रीनलैंड चाहिए, ग़ाज़ा भी चाहिए, उसको हम एक टूरिस्ट रिज़ॉर्ट बना देंगे अंडर अमेरिकन कंट्रोल। अफ़ग़ानिस्तान चाहिए था बीच में बीस साल तक वहाँ घुसे रहे, अब ईरान चाहिए। न जाने दुनिया भर में कितने सारे मिलिट्री बेस बना रखे हैं, कितने ही देशों में अपने अड्डे बना रखे हैं। डिएगो गार्सिया है यहाँ भारत के ही पास, वो भारत के लिए ख़तरा; अतीत में उस पर बड़ा बवाल मचा हुआ था।

और वहीं के उद्योगपति हैं जो कह रहे हैं मार्स भी चाहिए। राष्ट्रपति को पृथ्वी का एक-एक देश चाहिए, और उद्योगपति को पृथ्वी पूरी नहीं पड़ रही तो मार्स चाहिए, क्योंकि अहंकार की भूख अनंत होती है। राष्ट्रपति को सारे देश दो तो भी भूख नहीं मिटेगी। उद्योगपति को मार्स नहीं, पूरा सोलर सिस्टम नहीं, पूरी मिल्की वे गैलेक्सी दे दो तो भी भूख नहीं मिटेगी। और मैं भूल गया नोबेल पीस प्राइज़ तो चाहिए ही।

प्रश्नकर्ता: सर, हमने खुलकर गुंडागर्दी की बात करी थी। तो अब क्योंकि यूएस और यूके के रिलेशंस ख़राब हो रहे हैं अभी, तो परसों फ़्रेंच प्रेसिडेंट मैक्रन ने एक न्यूक्लियर सबमरीन के बैकड्रॉप पर एक स्टेटमेंट दिया, दिखाने के लिए कि मैं भी लोकल गार्जियन बन सकता हूँ यूरोपियन नेशंस का। और उन्होंने कहा, आई ऐम क्वोटिंग हिम, “टू बी फ़्री, वन मस्ट बी फ़ियर्ड।”

आचार्य प्रशांत: बिल्कुल सही बोला। देखो, रिश्ते नहीं ख़राब होते, कोई किसी को धोखा नहीं देता; बस, आपकी अब इतनी औक़ात नहीं बचती कि उसको ख़रीद सको। और फ़्रेंच इस बात को समझते हैं। जो यूरोप में सबसे व्यावहारिक लोग हैं ना, वो फ़्रेंच हैं। सबसे ज़्यादा व्यवसायिक लोग ब्रिट्स हैं, और सबसे आइडियलिस्टिक लोग जर्मन हैं। तो फ़्रेंच से ज़्यादा इस बात को कोई नहीं समझता कि रिश्ते नहीं होते, ताक़त होती है जो चलती है। अलायंसेज़ या रिलेशनशिप्स नहीं टूटते, बस एक पक्ष कमज़ोर हो जाता है।

देखो, अंतरराष्ट्रीय संबंध हो या व्यक्तिगत संबंध, कोई किसी से रिश्ता नहीं तोड़ता, न कोई किसी को डिच करता है, न धोखा देता है। बस, अब तुम्हारी इतनी हैसियत नहीं बचती कि उसको ख़रीद सको। यहाँ हर इंसान दुनिया में इस बाज़ार में बिकने के लिए खड़ा है। तुम जब तक उसको ख़रीद सकते हो, तब तक तुम कह सकते हो, “अरे, एलआई है,” या “जान-ए-मन है,” जो बोलना है बोलो।

जिस दिन तुम्हारी उसको ख़रीदने की औक़ात नहीं बचेगी रिश्ता टूट जाएगा, चाहे वो इंटरनेशनल अलायंस हो, और चाहे मैट्रिमोनियल अलायंस हो।

यूरोप ने गड़बड़ ये करी कि वो पूरे तरीके से आश्रित हो गया अपनी सिक्योरिटी नीड्स के लिए अमेरिका पर आश्रित हो गया, नाटो का 3/4 बजट ही अमेरिका से आता है। बात आ रही है समझ में? यद्यपि जो ईयू है उसकी आबादी अमेरिका से ज़्यादा है, उसका जीडीपी भी अमेरिका की टक्कर का है, लेकिन सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद से यूरोप ने अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उठाकर दे दी कि तुम संभालो। तो अमेरिका ढोता रहा, ढोता रहा, अब उसको दिखाई दे रहा है कि ये जर्मनी, ये फ़्रांस, ये तो छोड़ो अरे इस यूके की भी हमें अब क्या ज़रूरत है इनको अब धक्का लग गया बेचारों को, कह रहे हैं, “बेवफ़ा निकला यूएस।”

बेवफ़ा नहीं निकला, तुम इंसान की हैवानियत को समझते नहीं हो। तुम्हें क्या लग रहा था, तुम्हारा एलआई है? नहीं। जब तक तुम उसके काम आ रहे थे, वो तुम्हारे काम आया। अब देखो ऐसा नहीं है कि उसने दुश्मनों को ही धोखा दिया, वो दोस्तों को भी डंप कर रहा है। फ़्रांस वाले एक सबमरीन क्या दिखा रहे हैं, दुनिया भर में जितनी सबमरीन्स हैं उससे ज़्यादा सबमरीन्स अमेरिका के अकेले के पास हैं। अमेरिका का नेवल पावर अनमैच्ड है, क्योंकि अमेरिका की लैंड बाउंड्रीज़ तो किसी के साथ है ही नहीं, ऊपर कनाडा है नीचे मेक्सिको, तो अमेरिका का कोई लैंड-बेस्ड नेबर तो है ही नहीं न।

तो अमेरिका तो जाता है दूसरे देशों से लड़ने ही अपने नेवल पावर के दम पर। पूरी दुनिया के पास जितने एयरक्राफ्ट कैरियर्स हैं कुल मिलाकर, उससे ज़्यादा एयरक्राफ्ट कैरियर्स अकेले अमेरिका के पास हैं। सबमरीन में भी वही बात लागू होती है। और ये तो वो है जो एक्सिस्टिंग नंबर्स हैं, अगर मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी देखो तो ये रेशियो और ज़्यादा *स्क्यूड है, यद्यपि चाइना इज़ कैचिंग अप नाउ।

तो आप ये सोचो कि “अरे, पुराना साथ है, 1944–45 में ड्रेसडेन में अमेरिकन और यूरोपियन फ़ोर्सेज़ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी थीं जर्मन्स के ख़िलाफ,” तो आप मूर्ख हो। वो बात बहुत पुरानी हो गई, आज अमेरिका को यूरोप की कोई ज़रूरत नहीं है।

अगर अलायंस की बात है, तो पहली अलायंस तो सोवियत संघ और जर्मनी की थी, वो मुझे बड़ी मज़ेदार लगती है। और सिर्फ़ अलायंस नहीं थी, जर्मनी को फ़्यूल की, फ़ूड की लगभग 1/3 सप्लाई यूएसएसआर से ही आ रही थी। जब जर्मनी लड़ाई लड़ रहा था शुरू के तीन साल, ’39, ’40, ’41 तक, समर तक, तो ये सब कुछ उसको यूएसएसआर से ही मिल रहा था। वो एकदम ऐसे थे कि “भाई है, भाई-भाई, भाई! भाई ईस्टर्न यूरोप पर भाई मिलके क़ब्ज़ा करेंगे भाई, आधा तेरा, आधा मेरा” और सब चल रहा था, बढ़िया चल रहा था।

उसके बाद हिटलर ने कहा, “जब सबको ही निपटा दिया है, तो इसको काहे को छोड़ दें?” स्टालिन को झटका लग गया। बोल रहे हैं, “ये दोस्त दोस्त ना रहा, यार यार ना रहा, ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा।” और लगभग क़ब्ज़ा कर ही लिया था हिटलर ने मॉस्को के दरवाज़े तक पहुँच गया था, वो तो रूस की लंबाई ने और सर्दियों ने बचा दिया सोवियत संघ को।

कुछ नहीं है, इस दुनिया में, अहंकार की दुनिया में, प्यार, वफ़ा, निष्ठा जैसी कोई चीज़ नहीं होती। यहाँ बस एक चीज़ होती है, क्या? ताक़त।

और वही आपके पास भी नहीं है, सौ बार समझाता हूँ। जो कहते हो न, सुनता नहीं कोई, क्योंकि तुम्हारे पास या तो ताक़त है नहीं या तुम उसे प्रदर्शित नहीं करते। अच्छा, ताक़त प्रदर्शित करना भी बहुत ज़रूरी होता है। हाँ, हाँ, एक मिनट, एक मिनट, ये अच्छा है, बढ़िया। तो पीछे चलते हैं जो ये लड़ाइयों की बात हो रही है, सेकंड वर्ल्ड वॉर; कोई तरीका नहीं था कि हिटलर ब्रिटेन को हरा सकता था, असंभव था, असंभव। क्योंकि बीच में क्या है? समुद्र है, इंग्लिश चैनल है। और फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद से जर्मनी की नेवल कैपेसिटी पर कैप लगा दी गई थी, कि इससे ज़्यादा आप प्रोड्यूस कर ही नहीं सकते।

और जो रॉयल नेवी थी, जो रॉयल ब्रिटिश नेवी थी, वो दुनिया की सबसे बड़ी नेवी थी, अमेरिका से ज़्यादा बड़ी नेवी थी वो। तो हिटलर के पास सच पूछो तो कोई तरीका नहीं था कि वो ब्रिटेन को हरा सके कभी भी। बस एक उसके पास उम्मीद थी, कि मैं इतनी बॉम्बिंग करूँगा लंदन की कि लंदन वाले डर के आत्मसमर्पण कर देंगे, या फिर मुझसे कोई ट्रीटी कर लेंगे।

इसी तरीके से जिन देशों के ख़िलाफ़ हिटलर लड़ने निकला था उनका जीडीपी जर्मनी के जीडीपी से कई गुना ज़्यादा। जब रूस पर भी अटैक किया हिटलर ने, तो रूस का जो एम्युनिशन आउटपुट था, वो जर्मनी से उस वक़्त भी तीन गुना ज़्यादा। पर क्यों अटैक कर लिया? क्योंकि वो अपनी ताक़त दिखा नहीं रहे थे। अहंकार अगर किसी को देखता है कि उसके पास ताक़त है पर ताक़त दिखा नहीं रहा, तो सोचता है वो कमज़ोर है।

हिटलर न जाने क्या कर रहा था, वर्ल्ड वॉर शुरू होने से चार-पाँच साल पहले से वो गुंडागर्दी दिखा रहा था इधर-उधर। पर ब्रिटेन और फ़्रांस उसको अकोमोडेट करते रहे, टोलरेट करते रहे, झेलते रहे। तो हिटलर ने क्या सोचा? कि ये कमज़ोर हैं। ताक़त प्रदर्शित करनी भी ज़रूरी है, ताक़त का होना भी और ताक़त का प्रदर्शित करना भी। ये दुनिया ऐसी ही है, ताक़त रखे रहो तो उससे डिटरेंस नहीं होता, ताक़त दिखानी भी पड़ती है। ब्रिटेन ने सही समय पर ताक़त दिखा दी होती तो वर्ल्ड वॉर टू नहीं होता। बात आ रही है समझ में?

आपके पास कुछ ताक़त की कमी है उससे ज़्यादा कमी ये है कि आप ताक़त दिखाते नहीं हो अपनी। “न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।” सोते हुए तो शेर के मुँह में भी मृग अपने-आप आकर नहीं बैठ जाता। आप शेर भी हो, लेकिन अपनी ताक़त दिखा नहीं रहे तो भूखे मरोगे। गीता-कम्युनिटी के संदर्भ में ये बात समझ में आ रही है? एक तो ताक़त बढ़ाओ और दूसरा ताक़त दिखाओ। अहंकार अंधा होता है उसको जो चीज़ साफ़-साफ़ चिल्लाकर दिखाई न जाए, उसकी दृष्टि में वो चीज़ है ही नहीं।

प्रश्नकर्ता: वॉर-रिलेटेड एक और डायमेंशन है, आज मैं न्यूज़ पढ़ रहा था तो ये था कि यूएस आर्मी के जो सीनियर ऑफ़िसर्स हैं, वो एक क्रिश्चियन-नेशनलिस्ट रेटोरिक चला रहे हैं। वो अपने सोल्जर्स को बोल रहे हैं कि ये बिब्लिकल मैनडेट है, या आर्मगेडन है। तो सो-कॉल्ड पावरफ़ुल डेमोक्रेसी भी थियोक्रेसी के लाइन्स पर जा रही है वॉर को प्रमोट करने के लिए। ये फिर किसी मिलिटेंट ग्रुप से क्या डिफ़रेंट है, सर?

आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं, अहंकार माने अंधविश्वास, उसको मानना है। मुस्लिम देशों का मानना है कि वो जो पूरा-पूरा क्षेत्र है, वो इस्लाम की दृष्टि से पवित्र है इसलिए उनका होना चाहिए। जेरूसलम की सारी लड़ाई इसी लिए, वहाँ पर अल-अक़्सा है। और इज़राइल का कहना है, कि नाइल से लेकर यूफ़्रेटीस तक वो जो पूरा इलाक़ा है वो बाइबल में लिखा है कि ग्रेटर इज़राइल बनेगा। वहाँ इजिप्ट से लेकर इधर इराक तक, ये जो पूरा इलाक़ा है ये बनेगा ग्रेटर इज़राइल। और कैसे बनेगा? हमें पता है, हमारे ओल्ड टेस्टामेंट में लिखा है।

अहंकार माने अंधविश्वास। जैसे पाकिस्तान बोलता है, “कश्मीर इज़ द मिसिंग की इन पाकिस्तान।” तुक क्या है? तर्क क्या है? लॉजिक क्या है ये? बाक़ी बातें हटा दो, ये बात क्या है? इसमें तर्क क्या है? उसको कुछ भी मानना है। हाँ, जो कुछ भी वो मानेगा,म वो उसके स्वार्थ के अनुरूप होगा, ये पक्का है।

अभी अगर ये आ जाए कहीं से कोई सिद्ध कर दे कि, “देखो, तुम्हारे ग्रंथ में लिखा है कि यहूदियों को तो बस कुल मिलाकर के 100 कि.मी. स्क्वायर की ज़मीन मिलनी चाहिए,” तो कहेंगे, “अरे, ग्रंथ में ही तो लिखा है हम नहीं मानते, ग्रंथ पुराना हो गया।” अहंकार को कुछ भी मानने में कोई ऐतराज़ नहीं होता, बशर्ते वो बात उसके स्वार्थ के अनुकूल बैठती हो।

और कह रहे हो कि मिलिटेंट ग्रुप से, तो मिलिटेंट ग्रुप ये सब आर्मीज़ ही तो हैं। और कई बार हम देख रहे हैं, अभी हाल के इतिहास में कि एक मिलिटेंट ग्रुप होता है, सीरिया में क्या हुआ था? एक मिलिटेंट ग्रुप होता है, वो वहाँ के जो शासक होता है उसको टॉपल कर देता है; वो मिलिटेंट ग्रुप वहाँ की ऑफ़िशियल आर्मी बन जाता है। तालिबान क्या था? मिलिटेंट ग्रुप ही तो था। वहाँ पर वो गिरा दिया शासक को, तो तालिबान वहाँ की ऑफ़िशियल आर्मी बन गया। तो क्या अंतर है?

प्रश्नकर्ता: इस बीच, अगर चाइना को देखा जाए, अभी पावर सेंटर्स बहुत सारे खड़े हो रहे हैं। यूएसए, अभी फ़्रांस कोशिश कर रहा है, रूस तो था ही। चाइना एक तरह से अपनी तरक़्क़ी काफ़ी तेज़ी से कर रहा है एआई के सेक्टर में, टेक्नोलॉजी के सेक्टर में। मतलब, उनका स्ट्रेटेजिकली ये भी है कि अपने लैंड पर कोई वॉर होने नहीं दे रहा है। तो इस पिच चाइना वाला मॉडल, या वो जो कंट्री ने स्टैंड है, क्या वो सही डायरेक्शन में है?

आचार्य प्रशांत: देखो, सही-वग़ैरह कुछ नहीं, ये तो सारे खेल ही काले हैं। हम इतनी देर से यही बात कर रहे हैं कि ये सब अहंकार के गंदे खेल हैं, जिनका परिणाम सिर्फ़ विनाश में होता है। तो इसमें सही-ग़लत क्या है? एक गुंडा, दूसरा मवाली, मैं क्या बताऊँ इनमें से सही कौन है? एक बुल्ला, एक खुल्ला। अब आप मुझसे पूछो, “इनमें क्या कोई बुद्ध के समकक्ष है?” तो इसका क्या जवाब दे कोई? इनमें से कोई भी ठीक नहीं है, और ये सब मिलकर के पूरी पृथ्वी को बर्बाद करके मानेंगे।

इसका जो समाधान है, वो है शिक्षा। जब तक दुनिया की जनसंख्या को ही आप शिक्षित नहीं बनाओगे, स्वयं के विषय में, एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ, इनर एजुकेशन; ख़ुद को जानने की शिक्षा जब तक इस दुनिया की आबादी को नहीं दोगे, बर्बादी को कोई नहीं रोक सकता।

अहंकार यदि स्वयं को नहीं जानेगा, तो वो स्वयं के ही इशारों पर चलता रहेगा। आप जब तक समझोगे नहीं कि आपके विचार, भावनाएँ, आपके इंस्टिंक्ट्स, आपका आवेग कहाँ से आ रहा है, तब तक जो हो रहा है वो आप होने दोगे।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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