
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा एक हमारी राष्ट्रीय महिला क्रिकेटर है। उनकी अभी; मुझे लगता है, यहाँ सबको वो ख़बर छाई हुई है सोशल मीडिया पर, राष्ट्रीय मीडिया पर। तो उनकी शादी टूटी और उसको समाज में देख रहे हैं, सोशल मीडिया पर देख रहे हैं। बहुत तूल पकड़ी हुई है ख़बर। तो मेरा सवाल एक्चुअली इसी बात को लेकर है कि क्यों इस तरह की बातें हमारे समाज में बहुत तूल पकड़ती हैं, जबकि वो बहुत ही एकदम निजी ख़बर है, उनके जीवन को लेके क्या हुआ, कैसे हुआ।
इसी ख़बर को मैं थोड़ा-सा और एनालाइज़ कर रहा था। जिस दिन इसी महिला क्रिकेट टीम ने वर्ल्ड कप जीता था, उसके अगले दिन मैंने एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल है। उसका सोशल मीडिया पर एक सुबह उठते ही ख़बर पढ़ा, और उस ख़बर का टाइटल था कि फलानी-फलानी खिलाड़ी इस घर की बहू बनेगी या किस घर की बहू बनेगी। ये उसका एक टैगलाइन था। उसी दौरान, एक्चुअली इतनी सारी खिलाड़ी हैं हमारी टीम में, उन्होंने क्या किया? किसका क्या संघर्ष रहा? किसकी क्या टेक्निकलिटीज़ हैं? मतलब ऐज़ अ क्रिकेटर वो किस तरह की चीज़, *यू नो, कैपेबिलिटीज़ हैं?
इसके ऊपर किसी भी न्यूज़ चैनल पर, अनफ़ॉर्चूनेटली, मैंने तो किसी तरह का कोई ऐसा एनालिसिस नहीं पढ़ा अभी। हो सकता है कुछ ऐसे स्पोर्ट्स-स्पेसिफ़िक कोई ऐसा स्पोर्ट्स चैनल हो, उधर शायद इस तरह का कोई डिस्कशन हुआ हो, बट एक राष्ट्रीय स्तर पर हमारे समाज में इस तरह की बिल्कुल भी मैंने वो चर्चा होते नहीं देखी। तो इस थोड़ा-सा मतलब हमारे समाज की इस मनोदशा के ऊपर थोड़ा आपसे सुनना चाहते हैं। धन्यवाद।
आचार्य प्रशांत: तुम मुझसे सुनना नहीं चाहते, तुम चाहते हो मैं समाज को सुनाऊँ। जानते तुम भी हो, जानते ही ये सब लोग हैं। मैं उसमें क्या बोलूँ? सबको पता है, क्या बात है। सब जानते हैं, इसमें तो क्या है। सत्य हमारे पास है नहीं, शरीर है और उसी शरीर की वृत्तियाँ हैं। सत्य से हमें डर लगता है। शरीर है तो सेक्स में हमारी रुचि रहती है। बस यही है।
कोई भी ऐसी चीज़ जो हमें सच्चाई की ओर, मुक्ति की ओर ले जाए, उसमें हमें बहुत-बहुत कुछ लेना-देना होता नहीं। उसमें हम कोई बहुत रुचि दिखाने वाले नहीं हैं। बाक़ी किसी की निजी ज़िंदगी में, विशेषकर सेक्सुअल लाइफ़ में क्या चल रहा है, ये झाँकने को हमेशा तैयार रहते हैं। उससे बस यही पता चलता है कि हमारी ज़िंदगी में भी सत्य से कहीं-कहीं ज़्यादा सेक्स है, बस यही है और कुछ नहीं है। और वो सेक्स भी बस एक गुब्बारे की तरह है, एक अरमान है जो बहुत बड़ा है, जिसके भीतर कुछ नहीं है। उसको बड़ा किसने कर दिया है? लोकधार्मिक मान्यताओं ने। कैसे बड़ा कर दिया? उसका दमन कर-करके।
कोई जानवर सेक्स को लेकर के उतना सोचता नहीं, उतना ऑब्सेस्ड नहीं होता जितना मनुष्य है। जानवरों के किसी समाज में सेक्स इतनी बड़ी बात होती नहीं है कि उसको लेकर सौ तरह की कहानियाँ बनाई जाएँ, वर्जनाएँ बनाई जाएँ, डूज़ ऐंड डोंट्स बनाए जाएँ। उसका संबंध व्यक्ति के पूरे-पूरे मूल्य से, व्यक्ति की श्रेष्ठता से जोड़ दिया जाए, सामाजिक उसके कद से जोड़ दिया जाए। किसी भी प्रजाति में ये होता नहीं। ये मनुष्य मात्र में होता है। हम सेक्सुअली ऑब्सेस्ड हैं, और कोई बात नहीं है।
आपके सामने आइंस्टीन की भी अभी रख दी जाए स्पेशल थ्योरी है ये। आप उसकी ओर देखना नहीं चाहेंगे। भले कह दिया जाए कि ये बिल्कुल आसान तरीके से समझा करके आपके सामने रखी है, आपको उसमें बहुत रुचि नहीं होगी। लेकिन आपसे कहा जाए कि अभी-अभी आइंस्टीन की पर्सनल लाइफ़ का, लव लाइफ़ का या सेक्स लाइफ़ का एक सनसनीखेज़ खुलासा हुआ है, ये देखो। देखिए आप कैसे टूट पड़ेंगे। किसी वेबसाइट पर ये सब लोड कर दिया जाए तो साइट क्रैश कर जाएगी।
और जितने ये टीवी पर एंकर होते हैं, चिल्ला-चिल्ला के बता रहे होंगे, “आइंस्टीन के बड़े बालों का राज़ पता चल गया। ये भी पता चल गया कि उनके बाल हमेशा खड़े क्यों रहते थे? ये देखिए, यही है वो महिला।” हो गया बस सोशल मीडिया पर एक के बाद एक, एक्सपोज़्ड, एक्सपोज़्ड, आइंस्टीन एक्सपोज़्ड बनने लग जाएगा। ये वो लोग हैं जिन्हें रिलेटिविटी का ‘R’ न समझ में आए ज़िंदगी में। ये वो लोग हैं जिन्हें क्वांटम मैकेनिक्स का ‘Q’ लिखना भी न आए, पर ये बिल्कुल जाकर के आइंस्टीन के कपड़ों के भीतर घुस जाएँगे।
कारण सीधा है न, इतनी बड़ी बात बना दी गई सेक्स, सेक्स, सेक्स, कि हर आदमी उसी के लिए मर रहा है। जल्दी से शादी करा दो, सेक्स में क्या चल रहा है? उसका क्या हो रहा है? इसका क्या हो रहा है? और जीवन में जैसे कोई काम, कोई लक्ष्य, कोई एजेंडा ही न हो। कुछ नहीं है और, यही है। तो आपके सामने एक ऊँचा खिलाड़ी भी आ जाए, तो आपके लिए वो क्या है? विशेषकर महिला खिलाड़ी। तो कुछ नहीं है वो सेक्सुअल ऑब्जेक्ट है और क्या है।
आप में से जो लोग टेनिस देखते होंगे, आपसे कहा जाए कि अपनी ज़रा पसंदीदा महिला खिलाड़ियों के नाम बताइए, तो आपको मार्टिना नवरातिलोवा बाद में याद आएँगी; आपको पहले कौन याद आएँगी?
श्रोता: स्टेफी ग्राफ।
आचार्य प्रशांत: नहीं, स्टेफी ग्राफ तो फिर भी बहुत जीती हैं भाई, ग्रैंड स्लैम। आपको याद आएँगी कोर्निकोवा, वो तुरंत याद आ जाएगी। कुछ नहीं जीता था उसने, एना कोर्निकोवा। किस-किस ने इमेजेस सर्च करनी शुरू कर दी? कईयों के लिए तो बंदोबस्त हो गया, बोल रहे हैं पैसा वसूल, बढ़िया। जबकि खिलाड़ी वो भी अच्छी थी, ग्रैंड स्लैम नहीं जीता होगा तो भी शायद सेमीफाइनल, क्वॉर्टर-फाइनल तक तो पहुँचती थी। पर उसकी पॉपुलैरिटी बहुत ज़बरदस्त थी, बहुत ज़बरदस्त थी।
जो सीधे दिखने वाली प्लेयर्स थीं, मार्टिना हिंगिस वग़ैरह, वो कभी उसका मुकाबला नहीं कर सकतीं मॉडलिंग असाइनमेंट्स में और फ़ीस में। क्योंकि हमें कहाँ मतलब है इस बात से कि एक व्यक्ति या एक महिला अपने बंधनों को, अपनी शारीरिक सीमाओं को चुनौती देकर टेनिस के कोर्ट पर कुछ जीत रही है! हमें इस बात से कोई मतलब नहीं है। हमें इस बात से मतलब है कि सेक्सी कितनी है।
आप अभी भी जाकर के किसी भी टेनिस प्लेयर को ले लीजिए और आप उसका सर्च करना शुरू कर दीजिए। मैं फ़ीमेल टेनिस प्लेयर्स की बात कर रहा हूँ, क्योंकि आप ने ‘स्पोर्ट्स पर्सन्स’ की। सर्च करना शुरू कर दीजिए, इमेजेज़, बस इमेजेज़ लिख दीजिए, तो दो-चार इमेज तो ऊपर से ऐसे आ जाएँगी, ट्रॉफी-वॉफी हाथ में ले के; उसके बाद वो सब शुरू हो जाएगा कि वो सर्विस रिसीव करने के लिए झुककर खड़ी हुई है, तो आगे से क्लीवेज़ की फ़ोटो ले ली। या उछलकर शॉट मार रही है, तो नीचे से अंडरगार्मेंट का कोई शॉट आ गया वो चिपका हुआ। उस पर मैक्सिमम लाइक्स, मैक्सिमम हिट्स होंगे।
हमारे लिए श्रेष्ठता, उत्कृष्टता, एक्सीलेंस कुछ नहीं मायने रखती। सेक्स, सेक्स इन ऑल इट्स वेरिएंट्स। सेक्स माने बस यही नहीं कि किसी का शरीर दिख रहा है; सेक्सीनेस भी। हाउ सेक्सी डू यू लुक? व्हाट आर द वाइब्स यू एक्स्यूड? हाउ सेक्सी आर दे? सेक्सीनेस।
सेक्सीनेस माने क्या? बस यही, कि मैं ज़िंदगी की सतह पर जी रहा हूँ, जहाँ मुझे बस जिस्म दिखाई देता है, चेतना से कोई मतलब नहीं है मुझे। कोई, कोई मतलब ही नहीं है।
और जो समाज जितना रिप्रेस्ड होगा न, वो उतने मज़े लेगा, उतने चटखारे लेगा इस तरह की घटिया मसालेदार ख़बरों में कि किसका किससे ब्रेकअप हो गया, किसका किससे हुकअप हो गया, कौन कहाँ किसके साथ पाया गया। जो हमारी टॉप न्यूज़ वेबसाइट्स हैं, आप उन पर भी चले जाइए, तो शुरू की 8-10 ख़बरें तो इधर-उधर की, पॉलिटिकल वग़ैरह होंगी; और उसके बाद पूरा यही सेक्शन शुरू हो जाता है।
अजीब-अजीब नाम आ जाएँगे कि; कोई भी नाम आएगा, जिसको आप जानते भी नहीं। व्हाई यू मस्ट नो? कोई एक नया नाम आ गया; कोई भी नया नाम बोल दो। अजीब नाम, जो कि दुनिया की किसी भाषा का नहीं है, पर वो नाम सुनने में सेक्सी-सा लग रहा है। व्हाई शी इज़ सेटिंग द रैम्प ऑन फायर, कुटिका विल स्ले यू टु!
तो मुझे क्यों बता रहा है? ये क्यों बता रहा है मुझे?
वो लेकिन फिर आप उसको खोलोगे, तो उसमें पूरा वहाँ पर एक क्रूज़ल शुरू हो जाएगा, जहाँ पर वो आपको स्ले कर रही होगी। और आप जाकर के मीडिया वालों से पूछें कि क्यों करते हो? तो बोलेंगे, “व्यूज़ ही इसी पर आते हैं, लोग यही देखने आते हैं। इसके बहाने हम उन्हें दो-चार ढंग की ख़बरें भी पढ़ा देते हैं। देखने तो यही आते हैं वो।”
किसी ने आपको ग़ुलाम बनाने के लिए सेक्सुअल रिप्रेशन की विधि निकाली और जो सेक्सुअल रिप्रेशन है, वो हमारी ज़िंदगी बन चुका है। वो हमारे रेशे-रेशे से फट रहा है। वो हमारे एक-एक निर्णय का आधार बन चुका है, कुछ और नहीं है।
अच्छी गाड़ी क्यों चाहिए? लड़की नहीं मिलेगी। ऑटो एक्सपो वग़ैरह होते हैं, वहाँ आप चले जाइए तो एक गाड़ी खड़ी होगी; उसके बगल में एक फ़ीमेल मॉडल होगी।
जॉब क्यों चाहिए? बड़ी अच्छी जॉब होगी, तो अच्छी लड़की मिलेगी। ज़िंदगी के एक-एक फ़ैसले में यही घुसा हुआ है, सेक्स। कुछ और नहीं।
हम तो संस्था में भी देखते हैं न, लोग छोड़कर चले जाते हैं। द गर्लफ़्रेंड इज़ नॉट हैपी विद द ऐसेटिक नेचर ऑफ़ द जॉब।
अभी हमने शुरू करा कि जो महिलाएँ नहीं आ सकतीं, वो घर पर ही रहकर संस्था के लिए काम कर लें। चलिए, आप जितना भी समय दे सकती हैं अपना। आप नहीं निकल सकतीं घर से, कोई बात नहीं। कुछ शुरू करो, घर से ही शुरू करो। वो उन्होंने भी छोड़ना शुरू कर दिया है। बोल रहे हैं, हम बातें करते हैं फ़ोन पर, क्योंकि काम ही है जिसमें फ़ोन पर बात काफ़ी करनी पड़ती है। बात करते हैं, अब या तो ऐसा काम होता है कि लैपटॉप पर चुपचाप कर लिया कहीं। फ़ोन पर बात करते हैं तो सबको सुनाई देती है। उनको सुनाई देती है तो बोलते हैं, “अरे, तुम तो अभी गृहस्थन हो।” इस तरह की बातें करोगी तो फिर मतलब पति का काम कैसे चलेगा? तो पति ने उनकी नौकरी छुड़वा दी।
नौकरी में भी सेक्स। रेज़िग्नेशन में भी सेक्स। हर चीज़ में सिर्फ़ यही है, कभी प्रकट, कभी अप्रकट। कभी सीधे-सीधे दिखाई दे जाता है, कभी दिखाई नहीं देता है। “मैं तो सेक्स के लिए नौकरी नहीं करता। मैं तो वैसे भी अब डिस्फ़ंक्शनल हो चुका हूँ। मैं तो बस अपने बच्चों की ख़ातिर करता हूँ।” और बच्चे किसकी ख़ातिर किए थे? “नहीं, नहीं, मैं तो ज़िम्मेदार इंसान हूँ। आप क्यों बोल रहे हैं कि सेक्स, सेक्स, सेक्स?” आई ऐम इन माय फ़ॉर्टीज़ नाउ, ऐंड आई ऐम डूइंग इट ऑल फ़ॉर माय पप्स।
पर ये पप्स पैदा क्यों किए थे?
“नहीं, वो शादी हुई तो।”
अच्छा, शादी किस लिए की थी? किस लिए की थी? तुमको एक उत्कृष्ट चेतना की महान विदुषी मिली थी? और तुमने उससे घुटनों पर जाकर याचना करी थी, कि “देवी, क्या आप मुझे जीवन-पर्यंत संगति दे सकती हैं?”
कुछ नहीं करा था। फ़ोटो देखी थी, जाकर उसके आँखों से उसका एक्स-रे लेकर जिस्म नापा था। और कहा था, ये ठीक है, ये चलेगी। और दहेज-वहेज भी आ रहा है? “हाँ, वो भी है तो ये चलेगी।” और उससे फिर तुमने खटाखट तुरंत बच्चे पैदा कर दिए। और अब तुम बहुत संत और महंत बन रहे हो, कि “मैं सेक्स के लिए थोड़ी मेहनत करता हूँ; मैं तो अपने बच्चों को एक उज्ज्वल भविष्य देने के लिए मेहनत करता हूँ।”
और ये बच्चे तुम्हारी अंधी वासना की पैदाइश नहीं हैं, तो कहाँ से आए हैं? ये बच्चे कोई तुम्हारे होश से आए हैं? तुम्हारे प्रकाश से आए हैं? जो कर रहे हो, उसी के लिए कर रहे हो। जितनी जीवन-ऊर्जा है, वो बस एक ही दिशा में बह रही है, मूलाधार। और बह ही जा रही है वहीं से, बह रही है, बह रही है।
वास्तव में हमें सचमुच ब्रह्मचर्य चाहिए, पर ब्रह्मचर्य वो नहीं होता जो बाबा लोग बताते हैं। वास्तविक ब्रह्मचर्य ये होता है कि ये जो फ़िज़िकल टेंडेंसीज़ हैं उनको ज़िंदगी में कोने पर रख दो।
तुमने उनको 80% जगह दे रखी है मन में, डायरेक्टली या इनडायरेक्टली। और वो हक़दार है 2-5-8% की।
इतना बड़ा हमारा शरीर है महिला-पुरुष का एक जैसा ही होता है। सेक्सुअल डिफ़रेंसेज़ अगर एनाटॉमिकल बेसिस पर भी कैलकुलेट करोगे तो 5% होंगे बॉडी में, 10% होंगे, 15% होंगे। इससे ज़्यादा तो सेक्स हमारे अटेंशन का हक़दार है भी नहीं। पर जिसको हम आम आदमी कहते हैं, उसके दिमाग में सिर्फ़ सेक्स ही सेक्स चलता है। फिर बोल रहा हूँ, डायरेक्टली या इनडायरेक्टली। जिनको लग रहा है हमारे नहीं चलता, वो इनडायरेक्टली पर ग़ौर कर लें।