काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम संस्कृति चतुर्वेदी है और मेरा आज का प्रश्न यह है कि मेरी क्लास टीचर, जब भी स्कूल में कोई कंपटीशन रखती हैं, तो मैं हमेशा फ़र्स्ट आती हूँ। पर हमेशा पेरेंट्स बोलते हैं कि एक ही लड़की हमेशा फ़र्स्ट क्यों आती है? हमारे बच्चे को भी चांस मिलना चाहिए। तो फिर मैम मुझे कोई भी कंपटीशन में सेलेक्ट नहीं करतीं।
और मम्मा भी कहती हैं, आप भी कहते हो कि जो भी कर्म कर रहे हो, उसको अच्छे से करो। मैम मुझे फ़र्स्ट राउंड में ही सेलेक्ट नहीं करतीं, तो मैं कर्म कैसे करूँ?
आचार्य प्रशांत: बेटा, कर्म माने कंपटीशन नहीं होता। कर्म माने होता है जो चीज़ सही लग रही है, जिससे हमें प्यार है, वो करेंगे। किसी से आगे बढ़ने के लिए नहीं, किसी से जीतने के लिए नहीं। इसलिए कि वो हमें पसंद है, हमें प्यार है। ठीक है?




