टीचर ने मौका नहीं दिया… अब क्या करें?

Acharya Prashant

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टीचर ने मौका नहीं दिया… अब क्या करें?
काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम संस्कृति चतुर्वेदी है और मेरा आज का प्रश्न यह है कि मेरी क्लास टीचर, जब भी स्कूल में कोई कंपटीशन रखती हैं, तो मैं हमेशा फ़र्स्ट आती हूँ। पर हमेशा पेरेंट्स बोलते हैं कि एक ही लड़की हमेशा फ़र्स्ट क्यों आती है? हमारे बच्चे को भी चांस मिलना चाहिए। तो फिर मैम मुझे कोई भी कंपटीशन में सेलेक्ट नहीं करतीं।

और मम्मा भी कहती हैं, आप भी कहते हो कि जो भी कर्म कर रहे हो, उसको अच्छे से करो। मैम मुझे फ़र्स्ट राउंड में ही सेलेक्ट नहीं करतीं, तो मैं कर्म कैसे करूँ?

आचार्य प्रशांत: बेटा, कर्म माने कंपटीशन नहीं होता। कर्म माने होता है जो चीज़ सही लग रही है, जिससे हमें प्यार है, वो करेंगे। किसी से आगे बढ़ने के लिए नहीं, किसी से जीतने के लिए नहीं। इसलिए कि वो हमें पसंद है, हमें प्यार है। ठीक है?

कोई एक-आध बात बताइए जो आपको अच्छी लगती है, आप करते हैं, जिसमें आप जीत जाते हो। कौन-सी चीज़ें हैं जैसे?

प्रश्नकर्ता: सिंगिंग।

आचार्य प्रशांत: सिंगिंग। किसी से कंपटीशन में गाना गाओगे क्या? ऐसे ही गा दो। गाओ, गाओ, गाओ।

प्रश्नकर्ता: पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। पायो जी मैंने वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु, वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु, कृपा कर अपनायो। पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।

आचार्य प्रशांत: अब एक बात बताओ। ये ट्रॉफ़ी दूँ? ज़रूरत लगी कि तुम्हें इसके लिए कोई प्राइज़ दे, मेडल दे, ट्रॉफ़ी दे? ऐसा लगा? या गाने में ही मज़ा आया?

प्रश्नकर्ता: गाने में ही मज़ा आया।

आचार्य प्रशांत: यही होता है सही कर्म।

टीचर तुम्हें कंपटीशन से रोक सकती हैं, गाने से थोड़ी रोक सकती हैं। और मज़ा तुम्हें गाने में आया।

गाने में आया न? बस हो गया। यहाँ तो फिर भी लोग सुन रहे थे, ताली वग़ैरह भी बजा दी। कोई भी नहीं है, अकेले में हो, तो भी गा सकते हैं। कोई नहीं सुन रहा, हमारी अपनी बात है, हमें अच्छा लगता है। कभी कोई आ भी गया कंपटीशन में, तो भी गा देंगे। कभी कोई नहीं आया कंपटीशन में, हम तो भी गाएँगे, क्योंकि हमें गाना अच्छा लगता है। हमारे दिल की बात है। ठीक है?

सिर्फ़ कंपटीशन के लिए थोड़ी करते हैं। सिर्फ़ कंपटीशन के लिए जो करें, वो लोग फिर एग्रेसिव हो जाते हैं। वो वायलेंट हो जाते हैं, वो हमेशा बस इसी होड़ में रहते हैं कि किसी से आगे निकल जाएँ, आगे निकल जाएँ।

किसी से आगे निकलने के लिए काम नहीं करना है। हमें प्यार है, इसलिए काम करना है।

ठीक है?

तो टीचर नहीं भी गाने दे रही, तुम यूँ ही गाओ। दूसरे लोग कंपटीशन के लिए गा रहे हैं। तुम नीचे खड़े हो जाओ। उन्हें स्टेज मिला है, तुम्हें स्टेज नहीं मिला। तुम नीचे ही गा दो।

पायो जी मैंने...

तुमको क्या मिला है? तुमको तो ट्रॉफ़ी वाला रतन मिला है। मुझे तो राम-रतन मिला है।

ठीक है? बस।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू।

आचार्य प्रशांत: गोल क्या है? कर्म है। है न? तो कर्ता अगर ठीक है, तो गोल सेट कर लो। कर्ता ठीक नहीं है, तो बिना गोल सेट किए भी प्रॉब्लम होगी। तो गोल में कंपटीशन क्यों होगा? तो टारगेट में कंपटीशन कहाँ से आ गया? इट्स बिटवीन यू एंड द टार्गेट। कॉम्पिटिशन इज़ बिटवीन यू एंड द अदर। तो टारगेट में कंपटीशन कहाँ से आ गई?

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम अविरल बरनवाल है। और मैंने आपका एक वीडियो देखा था, जिसमें कि आप बोल रहे थे कि, "मैं एक दिन सत्र नहीं लूँगा, तो इतनी मोटी किताब ख़त्म कर दूँगा।" मैं तो नहीं ख़त्म कर पाता हूँ, तो आप कैसे ख़त्म कर देते हैं?

आचार्य प्रशांत: बेटा, ऐसा कोई नियम नहीं होता कि, "सत्र नहीं लूँगा, तो किताब ख़त्म कर दूँगा।" ऐसा होता भी नहीं है। ऐसा कुछ नहीं है कि सत्र नहीं लेता, तो किताब ख़त्म हो जाती है। पर हाँ, सत्र नहीं है, तो कुछ और होता है जो ज़रूरी होता है, हम उसको करते हैं।

देखो, सब काम बहुत अच्छे से हो जाते है, काम की समझ और प्रेम होना चाहिए।

ठीक है? और कोई भी काम ज़बरदस्ती करोगे, बिना समझे करोगे, तो बोझ की तरह ही लगेगा। अगर कोई किताब दी जा रही है पढ़ने को, तो पूछो पहले, “अच्छा, क्यों पढ़ें? क्या बात है? जब बिल्कुल समझ में आ जाएगा, स्पष्ट कि ये किताब इसलिए ज़रूरी है, तो अपने आप पढ़ोगे, मज़े में पढ़ोगे।” ख़ुद ही नहीं देखना चाहोगे?

पूछा करो। ठीक है? “ये आप मुझे ये करवा रहे हो? क्यों करवा रहे हो?"

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम स्मृति है। मैं कक्षा पाँच में पढ़ती हूँ। आचार्य जी, मेरा प्रश्न था कि जब मैं कोई नई चीज़ करने जाती हूँ, तो मुझे एक्साइटमेंट से ज़्यादा डर लगता है।

आचार्य प्रशांत: जब मैं क्या करने जाती हूँ?

प्रश्नकर्ता: कुछ नई चीज़ करने जाती हूँ, तो मुझे एक्साइटमेंट से ज़्यादा डर लगता है। तो आचार्य जी डर को अपनी लाइफ़ से कैसे हटाएँ?

आचार्य प्रशांत: मत हटाओ। रहने दो उसको, डर को क्यों हटाना है? दोषी डर थोड़ी ही है। दोषी तुम हो, जो डर के आगे रुक जाओ। डर है, तो है। हम नहीं रुकते। डर का काम है होना, हमारा काम है काम करना। डर है, तो है। तो क्या करना है? डर तुमसे पूछ के नहीं आया था न? तो तुमने तो कोई गलती नहीं कर दी। कोई ज़बरदस्ती आ गया, तो आ गया। तुम क्या करोगे? डर है, बिना बुलाए ऐसे ही घुस आया, डर लग रहा है। कभी डर लगता है, कभी कुछ और। थकान भी लगती है, ये सब हमसे पूछ के तो नहीं होते। अपने आप हो रहे हैं।

जो अपने आप हो रहा है, उस पर हमारा कोई बस नहीं। जिस पर हमारा बस नहीं, उसमें हमारा कोई दोष भी नहीं। पर डर आया और डर के मारे हम सही काम से भी रुक गए, तो गड़बड़ है। जिस काम को जानो कि सही है, उसमें मत रुको, भले डर हो, थकान हो, कुछ भी हो। और ये आएँ, तो इनको कारण मत बनने दो, इनको बहाना मत बनने दो कि, "हाँ, काम तो ज़रूरी था पर मुझे इतना डर लगा, मैं रुक गई।" अरे, डर था तो था, डर के साथ करो।

नहीं समझ में आ रहा तो नासमझी के साथ करो। बार-बार हार रहे हो, तो हार के साथ करो। पर जो ज़रूरी है, वही करो।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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