अब सोशल मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दौर है; बहुत ही व्यर्थ तरीक़े का राष्ट्रवाद। आज जो जितना ज़्यादा अज्ञानी है, वो उतनी ऐंठ में घूम रहा है। एक बहुत अनपढ़ क़िस्म की भीड़ है, जो भारत के राष्ट्रीय जीवन पर छाती जा रही है। गंदी आदतें जगह बदलने से छूट नहीं जातीं। बाहर हिंदुस्तान को इज़्ज़त भी ख़ूब मिली है, पर बाहर उन भारतीयों को इज़्ज़त मिली है जो इज़्ज़त पाने के लायक़ हैं। जो वहाँ पर जाकर गंदगी मचाएँगे, उनको थोड़ी इज़्ज़त दे देंगे? हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम दोबारा हर क्षेत्र में दुनिया में चमकें। पर वो सब करना ध्यान और श्रम का काम है, नारेबाज़ी का काम नहीं है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा सवाल लैक ऑफ़ सिविक सेंस के ऊपर है, इंडियन्स का स्पेशली। अभी रिसेन्टली बहुत सारे वीडियोज़ मैंने फ्लोट होते हुए देखे हैं, यूट्यूब या फिर अदर सोशल मीडिया चैनल्स ऑल्सो।
आइ वुड लाइक टू ब्रेक इट इन थ्री पॉइण्ट्स। सो देयर आर सम वीडियोज़ ऑफ़ ट्रैवल ब्लॉगर्स जो फ़ॉरेन कंट्रीज़ जाते हैं। ऐण्ड देन दे आर बिहेविंग लिटिल अब्यूसिव विद द गर्ल्स आउट देयर। ऐण्ड वो लोग क्या करते हैं, उसका वीडियो भी निकाल करके उसको, दे पुट इट ऑन देयर सोशल मीडिया। तो *वन वीडियो व्हिच इज़ गोइंग वेरी वायरल, टू वीडियोज़ एक्चुअली, वन इज़ फ्रॉम टर्की ऐण्ड वन इज़ फ्रॉम थाईलैण्ड।
टर्की* वाले में वो बंदा है, जो साइड में फ़ोन लेके एक टर्किश वुमन के साइड




