अगर मैं कोई माल बेच रहा हूँ, तो वही तो बेचूँगा जो आप ख़रीदना चाहते हो। गुरु जी वही करते हैं। आपको वही सुना देते हैं जो आप सुनना चाहते हो, बस थोड़े सोफ़िस्टिकेटेड तरीके से। तो ज़्यादातर जिसको आप स्पिरिचुअलिटी बोलते हो, वो सेंटिमेंटल कंसोलेशन होती है बस। थोड़ी देर के लिए आपको सुकून मिल जाएगा, पर आपकी ज़िंदगी में वास्तव में कुछ नहीं बदलेगा। अपनी कामना पूरी करने के लिए आप जहाँ भी जाओगे, वह बाज़ार ही होगा। गुरु को भी बाज़ार बना लिया, तो अब क्या बचा।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने एक बात कही यहाँ पर कि बेसिकली जो स्पीकर है, आपने एक पूरा जो सेक्टर है उसको लेकर, कि जो स्पीकर है और जो सुनने वाला है, उसके बीच जो रिश्ता है, वह को-डेवलप जो है, एक्सप्लॉइटेटिव वे में होता है। दोनों एक-दूसरे को एक्सप्लॉइट एक तरह से कर रहे होते हैं। ये चीज़ मुझे आध्यात्म में भी दिखी। क्योंकि मैं 15 साल से सर्च कर रहा था, तो उस दौरान कुछ लोगों से मैं जुड़ा भी। तो वहाँ पर मैंने यह भी देखा कि जो गुरु हैं, वो इन्फ्लुएंस होते हैं अपने ही जो डिवोटीज़ हैं, उनसे, और वो किसी दूसरी दिशा में चले जाते हैं।
और दूसरी तरफ़ एक जो एंड है, वह मुझे लगता है जे. कृष्णमूर्ति का। जहाँ पर वो इंडिपेंडेंस; शायद यह मेरा सोच है, कि इंडिपेंडेंस सोच रखने के लिए उन्होंने पूरा स्ट्रक्चर ही शुरू में मना कर दिया, कि स्ट्रक्चर में ही नहीं जाना है। तो इस पर थोड़ा-सा।




