गुरु को भी बाज़ार बना लिया

Acharya Prashant

6 min
559 reads
गुरु को भी बाज़ार बना लिया
अगर मैं कोई माल बेच रहा हूँ, तो वही तो बेचूँगा जो आप ख़रीदना चाहते हो। गुरु जी वही करते हैं। आपको वही सुना देते हैं जो आप सुनना चाहते हो, बस थोड़े सोफ़िस्टिकेटेड तरीके से। तो ज़्यादातर जिसको आप स्पिरिचुअलिटी बोलते हो, वो सेंटिमेंटल कंसोलेशन होती है बस। थोड़ी देर के लिए आपको सुकून मिल जाएगा, पर आपकी ज़िंदगी में वास्तव में कुछ नहीं बदलेगा। अपनी कामना पूरी करने के लिए आप जहाँ भी जाओगे, वह बाज़ार ही होगा। गुरु को भी बाज़ार बना लिया, तो अब क्या बचा। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने एक बात कही यहाँ पर कि बेसिकली जो स्पीकर है, आपने एक पूरा जो सेक्टर है उसको लेकर, कि जो स्पीकर है और जो सुनने वाला है, उसके बीच जो रिश्ता है, वह को-डेवलप जो है, एक्सप्लॉइटेटिव वे में होता है। दोनों एक-दूसरे को एक्सप्लॉइट एक तरह से कर रहे होते हैं। ये चीज़ मुझे आध्यात्म में भी दिखी। क्योंकि मैं 15 साल से सर्च कर रहा था, तो उस दौरान कुछ लोगों से मैं जुड़ा भी। तो वहाँ पर मैंने यह भी देखा कि जो गुरु हैं, वो इन्फ्लुएंस होते हैं अपने ही जो डिवोटीज़ हैं, उनसे, और वो किसी दूसरी दिशा में चले जाते हैं।

और दूसरी तरफ़ एक जो एंड है, वह मुझे लगता है जे. कृष्णमूर्ति का। जहाँ पर वो इंडिपेंडेंस; शायद यह मेरा सोच है, कि इंडिपेंडेंस सोच रखने के लिए उन्होंने पूरा स्ट्रक्चर ही शुरू में मना कर दिया, कि स्ट्रक्चर में ही नहीं जाना है। तो इस पर थोड़ा-सा।

आचार्य प्रशांत: देखिए, वो जो पहली बात है आपकी, वो तो बहुत सीधी है ही। अगर मैं कोई माल बेच रहा हूँ, तो वही तो बेचूँगा जो आप ख़रीदना चाहते हो। डिमांड पहले आती है न? आप में से जो लोग एम.बी.ए. वग़ैरह किए हों, वो जानते हैं कि न्यू प्रोडक्ट लॉन्च से पहले मार्केट सर्वे किया जाता है। देखा जाता है कि लोगों को क्या चाहिए, और जो लोगों को चाहिए, वही एक नए पैकेट में, या बेहतर तरीके से, या कम प्राइसिंग में लोगों तक पहुँचा दो, लोग ख़रीद लेंगे।

तो जो पूरा गुरु-बिज़नेस है, वह भी यही होता है। कंफ़र्ट देने के लिए होता है। आपके ही जो इल्यूज़न्स हैं, वो बने रहें, बचे रहें, उसका होता है। आप आते हो, आप कहते हो, “मेरा धंधा ठीक नहीं चल रहा है।” गुरु जी कहते हैं, “कोई बात नहीं, तू ऐसा कर ले, तेरा धंधा ठीक चलेगा।” उसमें यह बात थोड़ी कभी होती है कि “तेरा धंधा गलत है, बंद कर।” यह बात थोड़ी होती है। और गुरु जी ये बोल दें, तो गुरु जी का धंधा बंद हो जाएगा।

ज़्यादातर जो जिसको आप स्पिरिचुअलिटी बोलते हो, वो सेंटिमेंटल कंसोलेशन होती है बस। इसीलिए आप पाते हो कि गुरुओं का और उनके भक्तों का जो रिश्ता होता है, वो बोध पर नहीं, अक्सर भावना पर आधारित होता है।

क्योंकि वहाँ काम ही चल रहा होता है सेंटिमेंट का। और सेंटिमेंट में भी क्या? कि किसी तरीके से उसको कंसोल कर दो, कंफ़र्ट कर दो, उसको थपथपा दो, उसको सहला दो।

तो गुरु बिकम्स द फ़ादर फ़िगर, जिसका काम है कहना, “नहीं बच्चे, कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा। कुछ नहीं होगा, कुछ नहीं होगा। सब ठीक है।” और बड़ा अच्छा लगता है, वाइब्स तो अच्छी आती हैं, वाइब्स। कि आप आश्रम से आ रहे हो और आपको लगता है कि थोड़ी देर के लिए लगता है कि बिल्कुल तनाव कम हो गया, सुकून मिल गया, शांति मिल गई। और सचमुच उस वक़्त पर तो ऐसा होता भी है।

आप बहुत डरे हुए हो, और कोई आकर के आपको ऐसे छाती से लगा ले और कहे, “डरो मत, कुछ नहीं होगा।” तो उस वक़्त तो अच्छा लगता ही है न? लेकिन उससे कुछ होना-हवाना नहीं है। वो एक तरह की स्लीपिंग पिल है, एक सिडेटिव है। थोड़ी देर के लिए आपको सुकून मिल जाएगा, पर आपकी ज़िंदगी में वास्तव में कुछ नहीं बदलेगा, बल्कि नुक़सान और हो गया। आपका भ्रम और गहरा कर दिया गुरु जी ने। पर वह सब चलता रहा है हमेशा से। ठीक है?

देखिए, आप जो सुनना चाहते हैं, वो सुनाने वाले बहुत मिल जाएँगे आपको क्योंकि आप जो कुछ भी चाहते हैं, आप उसके दाम चुकाने को तैयार हो जाएँगे। आप जो पहनना चाहते हैं, आप उसके दाम देते हो कि नहीं? आप जो खाना चाहते हो, उसके दाम देते हो कि नहीं? तो आप जो सुनना भी चाहते हो, उसके दाम दे दोगे। गुरु जी वही करते हैं। आपको वही सुना देते हैं जो आप सुनना चाहते हो, बस थोड़े सोफ़िस्टिकेटेड तरीके से, थोड़े और एक्सपर्ट तरीके से। पर ले-दे के आप ग़ौर करना, सुनाया वही जा रहा होता है जो सुनने की आपकी इच्छा होती है।

यह आपको देखना है कि आपको पेलिएटिव केयर (दर्द कम करने वाली देखभाल) चाहिए, कि “मैं मरने को तो तैयार हो गया हूँ, बस मरने से पहले मुझे थोड़ा कष्ट कम हो” या आपको क्योर चाहिए। एक केयर वो भी होती है कि जहाँ पर हो जाता है कि यह मरीज़ अब बचेगा नहीं, तो अब उसको ठीक करने के लिए दवाई नहीं दी जाती। अब उसका बस दर्द कम करने के लिए कुछ-कुछ दवाइयाँ देते रहते हैं। कहते हैं, कुछ दिनों तक दवाई दे दो, फिर ख़ुद ही मर जाएगा।

तो आपको अपने आप को क्या मानना है? कि मृत्यु आसन्न है। ख़त्म हूँ, ज़िंदगी किसी लायक नहीं है। बस मुझे कुछ दिनों के लिए, पल-भर के लिए कोई मुझे झूठ बोल दे। या आपको कहना है, कि ज़िंदा हूँ। झूठ से लड़ सकता हूँ। सच्ची ज़िंदगी जी जा सकती है। अगर सच्ची ज़िंदगी जी जा सकती है, तो अपनी कामनाओं का पीछा करने की जगह अपनी कामनाओं के स्रोत को जाँचें। कामना में कोई बुराई नहीं है।

कामना बहुत अच्छी चीज़ भी हो सकती है, अगर उसका स्रोत ठीक हो।

वही बात जो हमने भावना के लिए करी थी, कि भावना में क्या बुराई हो गई। पर हमारी सब भावनाओं को गंदा कर रखा होता है उसके ड्राइवर ने। गाड़ी में कोई बुराई नहीं है, पर ड्राइवर नशे में हो, तो गाड़ी तो मारेगी। वैसे ही कामना है। कामना बहुत अच्छी भी हो सकती है। अगर अहंकार प्रकाशित है, तो कामना ही निष्कामता बन जाती है।

अब आप देखिए, श्रीकृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्म पढ़ा रहे हैं। लेकिन ऊपर-ऊपर से देखने में यह भी तो लग सकता है ना कि श्रीकृष्ण कामना कर रहे हैं कि अर्जुन युद्ध करे, और वो कामना है भी। पर चूँकि वो कामना एक सही जगह से आ रही है, तो वैसी कामना को ही निष्कामना कहते हैं। ठीक है?

तो अपनी कामना पूरी करने के लिए आप जहाँ भी जाओगे, वह बाज़ार ही होगा। गुरु को भी बाज़ार बना लिया, तो अब क्या बचा।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories