
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। जब मैं कोई किताब पढ़ती हूँ, तो मैं उसे पूरी क्यों नहीं पढ़ पाती हूँ? ऐसा क्यों होता है?
आचार्य प्रशांत: बात यह नहीं है, बेटा, कि कुछ पन्ने अभी उस किताब में बचे रह गए। आप यह कह रहे हो, 100 पेजेस की बुक थी। और आपने 70 तक पढ़ा, 30 पेजेस बचे रह गए। है न? बात यह नहीं है कि उन 30 पेजेस से आप वंचित रह गए। वो 30 पेज आपको पता नहीं चले। असली गड़बड़ यह है कि वो जो 70 पेजेस थे न, आपने वो नहीं समझे।
अच्छा, आप टीवी देखते हो? बता दो। देखते हो? मूवीज भी देखते हो? फिल्में? कौन-सी देखी? पिछली जो अच्छी लगी वो बताना। बता दो।
प्रश्नकर्ता: हीरो नंबर वन!
आचार्य प्रशांत: यहाँ है समस्या, खैर। किसके साथ आए हो, बेटा?
प्रश्नकर्ता: चाचा।
आचार्य प्रशांत: कहाँ हैं? खड़े हो थोड़ा। कहाँ हैं? हीरो नंबर वन!
अच्छा, मान लो वो मूवी 3 आवर्स की थी। आपको अच्छी लगी थी? अच्छी लगी थी? वो 3 आवर्स की मूवी थी और 2 घंटे में वो मूवी बंद कर दी जाती।
आप मूवी देख रहे हो। 3 आवर्स की है। 3 आवर्स, तीन घंटे। और दो घंटे में उसको बंद कर दिया, तो आपको कैसा लगता है? वो मूवी आपको अच्छी लग रही है, और दो घंटे में बंद कर दिया, अभी बची हुई है एक घंटे की। आपको कैसा लगता है? कैसा लगता? अच्छा लगता? अच्छा लगता?
चाचा जी, क्या दिखा रहे हो भतीजी को? हाँ? क्या चल रहा है ये?
आपको सचमुच कुछ अच्छा लगता है, वो बताओ। जो भी हो, कुछ भी बताओ। कोई भी चीज़ बताओ, जिसमें आप बहुत हैप्पी हो जाते हो। कुछ तो होगा।
प्रश्नकर्ता: मूवी और सॉन्ग।
आचार्य प्रशांत: कौन-सी मूवी? अच्छा, सॉन्ग बताओ। सॉन्ग कौन-सा?
प्रश्नकर्ता: सारे।
आचार्य प्रशांत: सारे सॉन्ग्स अच्छे लगते हैं? अच्छा, चलो ठीक है। तुम्हें कोई सॉन्ग अच्छा लग रहा है? वो 5 मिनट्स का है। कितनी देर का है?
प्रश्नकर्ता: 5 मिनट्स।
आचार्य प्रशांत: 5 मिनट्स का है। और अच्छा लग रहा है, लग रहा है, एकदम मज़ा आ रहा है, मज़ा आ रहा है। उसको 3 मिनट्स में ही रोक दें, तो कैसा लगेगा? एकदम मज़ा आ रहा था, 3 मिनट्स में लेकिन सॉन्ग रोक दिया, तो कैसा लगेगा?
प्रश्नकर्ता: तो, बेकार।
आचार्य प्रशांत: बेकार लगेगा? लगेगा न बेकार। पक्का है, बेकार लगेगा? लगेगा? वो 2 मिनट तो तुमने सुने भी नहीं, तो वो मिस हो गए तो कोई बात नहीं न। तुम्हें तो पता भी नहीं उन 2 मिनट्स में क्या था। क्यों बेकार लगेगा? क्योंकि वो 3 मिनट्स तुमको कैसे लग रहे थे?
प्रश्नकर्ता: अच्छे।
आचार्य प्रशांत: अच्छे। जब 3 मिनट्स अच्छे लगते हैं, तो बाक़ी के 2 मिनट भी हम सुन लेते हैं, है ना? वैसे, ऐसे ही बुक में जब 70 पेजेस अच्छे लगते हैं, तो 30 पेजेस भी हम पढ़ते हैं।
आप 30 पेजेस इसलिए छोड़ देते हो, क्योंकि 70 पेजेस भी आपने समझे नहीं।
तो अब से यह नहीं सोचना, कितने पेज छूट रहे हैं। बिल्कुल अप्रोच को, अपने तरीके को बदल देना है। अब से यह पूछना है कि मैं जो भी पढ़ रही हूँ, भले मैंने 2 ही पेज पढ़े हैं, वह मुझे समझ में आए कि नहीं आए। भले ही मैंने 2 ही पेज पढ़े हैं, समझ में आए कि नहीं आए। और बिना समझे आगे नहीं भागना है। ठीक है?
और जब समझ में आने लगती है न कोई चीज़, फिर कोई आपको रोक नहीं सकता। फिर कोई आपसे बुक छीनने आएगा, आपकी बुक बंद करने आएगा, आप कहोगे, “नहीं, मुझे पढ़ना है, क्योंकि अब मुझे यह बात समझ में आने लगी है।” ठीक है?
समझना ज़रूरी है, समझने में बहुत ताकत होती है। फिर कोई आपसे कुछ नहीं छीन सकता।
ठीक है?