वैलेंटाइन डे: प्रेम का वास्तविक अर्थ

Acharya Prashant

32 min
1.6k reads
वैलेंटाइन डे: प्रेम का वास्तविक अर्थ
जिसको तुम कहते हो रोमांटिक लव, इसका बाज़ारवाद से बहुत सीधा ताल्लुक है। अच्छे कपड़े पहन लिए, तोहफ़े दे लिए और मज़े कर लिए, लेकिन कुछ पूरा नहीं पड़ रहा; एक अधूरापन, एक कसक रह जाती है। आपकी बेचैनी वैसी की वैसी है। प्रेम का मतलब है कि जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोल दो; वो ख़ुद को जानने लगे, मन को समझने लगे, यही प्रेम है। लेकिन ये करना आसान नहीं होता। ये करने की क़ीमत चुकानी पड़ती है। ये करने के लिए तुम्हें अपना सर्वस्व भी निछावर करना पड़े, तो कर दो। यही है वैलेंटाइन डे। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

आचार्य प्रशांत: हाँ भाई, क्या चल रहा है?

प्रश्नकर्ता: देखिए आप। (टेबल पर कुछ उपहारों को इंगित करते हुए।)

आचार्य प्रशांत: मैं तो देख ही रहा हूँ ये सब चौपाल समझ में तो मुझे आ रही है, लेकिन इसने मुझे क्यों बुलाया है?

प्रश्नकर्ता: एक सेकंड चॉकलेट खोल लूँ।

आचार्य प्रशांत: चॉकलेटें खुल रही हैं, तोहफ़े, गुब्बारे। इसमें क्या है, भाई?

प्रश्नकर्ता: ज्वेलरी है।

आचार्य प्रशांत: ज्वेलरी है? हाँ? उसने दी है?

श्रोता: किसी ने दिलाई।

आचार्य प्रशांत: अच्छा अच्छा।

प्रश्नकर्ता: शर्मा रही है।

आचार्य प्रशांत: शर्मा रही है।

प्रश्नकर्ता: बहुत दिनों से माँग रही थी।

आचार्य प्रशांत: वो क्या है उधर?

श्रोता: छोटे टैडी बेयर्स हैं, फ़ॉर समवन स्पेशल।

आचार्य प्रशांत: अच्छा, फ़ॉर समवन स्पेशल। तो क्या है ये मिला है या देने वाले हो?

श्रोता: ये देने वाले हैं।

आचार्य प्रशांत: अच्छा, देने वाले हो। तो ये प्रदर्शनी यहाँ क्यों लगाई है?

श्रोता: सवाल थे।

प्रश्नकर्ता: हमें मिला पूरे दिन और देने के लिए ख़रीदा है। तो सर, आपको भी दिखाएँ। उसमें घड़ी है वैसे, मुझे मिली है।

आचार्य प्रशांत: मिल गई है।

प्रश्नकर्ता: तो महँगी है बहुत। तो हम सब बैठे ही थे, पता चला आप भी यहीं पे हैं, आसपास। तो आपको बुला लिया। ये सब मिला ही है, त्यौहार है आज प्रेमियों का, वैलेंटाइन डे है। हमारे लिए तो बहुत इम्पॉर्टेंट है। तो सोचा आपसे भी राय-मशवरा कर लें, आपको भी कुछ गिफ्ट दे दें। वैसे आपको क्या पसंद है?

आचार्य प्रशांत: भाई, मुझे तो प्रेम पसंद है।

प्रश्नकर्ता: हमें भी पसंद है।

आचार्य प्रशांत: तो इसमें प्रेम कहाँ पर है? इसके अंदर होगा शायद, खोलें ज़रा, प्रेम निकालना, भाई।

प्रश्नकर्ता: उसमें ज्वेलरी है।

आचार्य प्रशांत: अरे, उसमें ज्वेलरी है! ओ-हो-हो। और इसमें क्या है?

प्रश्नकर्ता: इसमें गुब्बारा है, फूट जाएगा।

आचार्य प्रशांत: हवा है। अच्छा, अच्छा। ये, भाई साहब, इसके भीतर होगा शायद प्रेम।

प्रश्नकर्ता: उसके पीछे है।

आचार्य प्रशांत: उसके पीछे है।

प्रश्नकर्ता: गिफ्ट देने के पीछे प्रेम है।

आचार्य प्रशांत: गिफ्ट देने के पीछे प्रेम है।

प्रश्नकर्ता: वो ऐसे ऑब्जेक्ट नहीं होता न, वो एक फीलिंग है। तो वो जिस भाव से हमने दिया है उनको या जिस भाव से उन्होंने हमें दिया है, वो लव है। ऐसे बताते नहीं हैं मतलब, पर वो होता है।

आचार्य प्रशांत: इसके पीछे जो भावना है, उसका नाम प्रेम है।

प्रश्नकर्ता: इसके पीछे कुछ कुर्सी है, लेकिन जिसने दिया, वो जिस फीलिंग से दे रहा है, वो लव हुई न? क्योंकि वो “आई लव यू” भी बोलता है, तो वो आउट ऑफ लव दे रहा है वो। मतलब थोड़ा सा ट्रिकी है।

आचार्य प्रशांत: तो इतना तो ज्ञान लेकर के तुम लोग आए ही हो। अब इसमें मेरी क्या ज़रूरत है?

प्रश्नकर्ता: अरे, आजकल बहुत क्रिटिसिज़्म चल रहा है वैलेंटाइन डे का। इतने मीम्स बन रहे हैं।

आचार्य प्रशांत: कौन-सा डे बोला?

प्रश्नकर्ता: वैलेंटाइनडे।

आचार्य प्रशांत: ये कौन हैं, महोदय?

प्रश्नकर्ता: उससे मतलब नहीं है। मतलब जो मनाया जाता है, उससे।

आचार्य प्रशांत: उससे मतलब क्यों नहीं है, भाई? वो तो ऐसे तो, तुम ऐसे बोलो, दिवाली का राम से मतलब नहीं है।

प्रश्नकर्ता: पटाखों से भी तो है।

आचार्य प्रशांत: पटाखे तो फिर ठीक है। लेकिन पटाखों से तुम्हें संतुष्टि मिलती होती, तो मुझे थोड़ी बुलाते। मैं कौन-सा तुम्हारा वैलेंटाइन हूँ? अगर जो कर रहे थे वही ठीक होता, तो इतने सारे तोहफ़े बाँधे घूम तो रहे हो, इसी में मज़े लेते रहते। अब साफ़ बताओ, दोनों तरफ़ की नहीं चलेगी, कि बात समझ में भी नहीं आ रही है, दुविधा में भी हो और मेरे सामने ऐसे बता रहे हो जैसे कि बड़े होशियार हो।

प्रश्नकर्ता: आपने नहीं मनाया कभी वैलेंटाइन डे?

आचार्य प्रशांत: मैंने तो मनाया और ज़बरदस्त तरीके से मनाया।

प्रश्नकर्ता: आज भी मनाएँगे?

आचार्य प्रशांत: क्या मनाऊँगा?

प्रश्नकर्ता: वैलेंटाइन।

आचार्य प्रशांत: कौन है ये भाई? वैलेंटाइन डे माने श्रीमान वैलेंटाइन का दिवस। ठीक? तो ये कौन हैं?

प्रश्नकर्ता: एक सेंट हैं, मैंने सुना है।

आचार्य प्रशांत: एक सेंट हैं। अच्छा, तो कौन है श्रीमान संत?

प्रश्नकर्ता: कुछ कहानियाँ हैं उनके पीछे? नेवर बॉदर्ड टू फ़ाइंड आउट।

आचार्य प्रशांत: नेवर बॉदर्ड टू फ़ाइंड आउट। ओह, टू इनसिग्निफ़िकेंट टू बी नोन। कौन है, भाई? ये वैलेंटाइन महोदय, कौन है? या नहीं पता करना, यही सब काफ़ी है?

प्रश्नकर्ता: थोड़ी कमी लग रही थी, इसलिए।

आचार्य प्रशांत: हाँ, ये लड़की ईमानदार है। क्या कमी लग रही है?

प्रश्नकर्ता: कि गिफ्ट्स तो दे दिए और मिल भी गए, और आसपास भी लोग बहुत खुश दिख रहे हैं। पर ऐसा लगता है पूरा-पूरा नहीं है, कुछ कम है।

आचार्य प्रशांत: कुछ कम है। इन्हीं से शुरू करें, संत वैलेंटाइन से? क्या जानते हो इनके बारे में? कुछ जानते हो इनके बारे में?

प्रश्नकर्ता: शायद वो रोम के थे, रोम में थे, एंड ही यूज़्ड टू डू गुड थिंग्स फ़ॉर पीपल। ही वॉज़ अ काइंड मैन।

आचार्य प्रशांत: तो उनके नाम पर प्रेम-दिवस क्यों मना रहे हैं?

प्रश्नकर्ता: बिकॉज़ ही यूज़्ड टू बी काइंड टू एवरीबडी। वो हर किसी से अच्छे से व्यवहार करते थे। तो उससे वैलेंटाइन डे शुरू हुआ। फिर धीरे-धीरे करके वो सिर्फ़ रोमांटिक लव की तरफ़ चला गया।

आचार्य प्रशांत: अच्छा, और क्या पता है किसको?

प्रश्नकर्ता: मैंने एक कहानी सुनी थी कि वो एम्परर था वहाँ पर, उन्होंने शादियों के लिए मना कर दिया था, कि शादियाँ नहीं होंगी। क्योंकि जो सोल्जर्स हैं, वो बेहतर लड़ते हैं अगर उनकी शादी न हुई हो। तो उन्होंने शादियों पर बैन कर दिया। पर इन्होंने तब भी उस सेरेमनी को मेंटेन रखा, कि मैं करवाऊँगा, कोई चिंता नहीं है तुम मेरे पास आओ। कपल्स को बुलाते थे। और तो इससे थोड़ा-सा कि वो टुवर्ड्स लव, मतलब वो प्रेम को तब भी मानते थे।

श्रोता: मुझे पता नहीं है, पढ़ा नहीं। काइंड आदमी हैं, शादी करवाना चाहते हैं।

आचार्य प्रशांत: विवाह के पक्ष में नहीं थे। ऐसा नहीं था कि उनको कोई विशेष अनुराग था कि चलो भाई, शादियाँ ही होनी चाहिए लोगों की। बहुत स्पष्ट नहीं है, ऐतिहासिक दृष्टि से, कि क्या हुआ था। तीसरी शताब्दी की बात है ये आज से 1800 साल पहले की। एक नहीं, तीन संत हुए हैं वैलेंटाइन नाम से, और तीनों की कहानियाँ आपस में अब मिश्रित हो चुकी हैं। वर्ष के कैलेंडर में वैलेंटाइन डे भी तीन होते हैं, एक नहीं। एक है जो ज़्यादा प्रचलित हो गया है, तीन होते हैं।

लेकिन हमें जितना कुछ उनके बारे में पता है, वो ये है कि राजा युद्ध का उन्मादी था। उसको लड़ाइयाँ करवानी थीं, हिंसा चाहिए थी, रक्तपात चाहिए था, ताकि उसका अपना साम्राज्य बड़ा हो सके। तो सब जवान लोगों को पकड़-पकड़ के भेजा करता था लड़ाई में, ताकि वो लड़ सकें। और लड़ इसलिए नहीं सकें कि कोई बहुत पवित्र या सार्थक उद्देश्य है युद्ध का, लड़ इसलिए सकें ताकि राजा की जो धन-पिपासा है, राजा की जो पद-पिपासा है, राजा का जो पूरा लालच है कि मैं और बड़ा बादशाह कहलाऊँ, वो पूरा हो सके।

तो उसने कर रखा था कि नहीं भाई, शादी-वादी नहीं करना; तो लड़ो, जाके। प्रेम के समर्थक थे संत वैलेंटाइन, और ये जो राजा था ये ईसाइयत को मानने वाला नहीं था। इनको पगान कहते हैं। तो उन्होंने धीरे-धीरे, चुपके-चुपके जोड़ों के विवाह कराने शुरू कर दिए। और जो विवाह कर ले, वो फिर लड़ाई-वग़ैरह पर बहुत ध्यान न दें।

विवाह से अर्थ नहीं है, प्रेम से अर्थ है। तो इन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया, इन्हें गिरफ़्तार करके डाल दिया गया कारागार में। वहाँ पर कहते हैं कि जो जेलर था, या कि शायद जो न्यायाधीश था, जो इनका मुक़दमा सुनने वाला था उसकी एक बेटी थी और बेटी अंधी थी। तो संत साहब को उस बेटी से प्रेम हुआ। जबकि वो किसकी बेटी है? वो उस व्यक्ति की बेटी है जो उन्हें जेल में रखे हुए है। उस प्रेम के चलते कहानी बताती है कि उन्होंने उस बेटी की आँखें ठीक कर दीं। उसको देखने की ताक़त दे दी।

अब ये सब गुब्बारे और ये टैडी लेके घूम रहे हो, तो मैं थोड़ा विस्तार में बता रहा हूँ ताकि समझ भी जाओ। विस्तार से पूरा दिन तो तुम लोगों ने इसमें लगा ही दिया है, तो कहानी भी थोड़ी-सी विस्तार में पता होनी चाहिए।

तो बेटी की आँखें ठीक कर दीं। और बेटी को पत्र लिखा, अपने प्रेम की अभिव्यक्ति करते हुए। और उस पत्र में नीचे उन्होंने लिखा, योर वैलेंटाइन, तुम्हारा वैलेंटाइन। अपना नाम लिखा, योर वैलेंटाइन। तो वहाँ से अपने प्रेमी को अपना वैलेंटाइन कहने की प्रथा शुरू हुई, कि जो प्रेमी है, उसको बोल दिया: यू आर माय वैलेंटाइन, तुम मेरे वैलेंटाइन हो।

और ये उन्होंने पत्र लिखा, और इसके थोड़ी देर बाद उनका सिर काट दिया गया। उन्हें पता था, उनको मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी थी। लेकिन आगे कहानी कहती है कि उस लड़की की, उस महिला की, जो उन्होंने आँखें ठीक कर दीं, जिसको जो दृष्टि दे दी, उसका नतीजा ये हुआ कि ना सिर्फ़ वो लड़की, बल्कि उसके पिता समेत उसके घर के 40–50 लोग सब ईसाई हो गए। वो पहले जीसस को नहीं मानते थे, एक तरह से कह लो तो पहले वो विधर्मी थे। फिर उन्होंने जो रोशनी का रास्ता था, वो पकड़ लिया।

तो ये है हमारे नायक वैलेंटाइन की कहानी। अब इस कहानी से समझ क्या आता है? ये सब क्या चल रहा है? इस कहानी में जो मूल बात है, वो क्या देख पा रहे हो?

प्रश्नकर्ता: इसमें मिरेकल कैसे हुआ? वो तो मिरेकल जैसी स्टोरी।

आचार्य प्रशांत: मिरेकल नहीं हुआ है, ये बात सांकेतिक है। दोनों-तीनों ही चीज़ें सांकेतिक हैं: लड़की की आँखों का ठीक हो जाना, उसके पूरे कुनबे का धार्मिक हो जाना, और संत साहब का सिर कलम कर दिया जाना, उनका सिर काट दिया जाना। ये तीनों ही बातें सांकेतिक हैं, सिंबॉलिक हैं। वो नहीं देख पा रही थी, लड़की। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब ये है कि उसको दुनिया समझ में नहीं आ रही थी। हम कौन हैं? संसार क्या है? दुनिया क्या है? उसे कुछ समझ में नहीं आता था। और ये तो धार्मिक आदमी हैं, संत हैं। तो इनके स्पर्श ने, इनकी संगति ने उस लड़की को दुनिया को देखने की दृष्टि दे दी। ये आशय है ये कहने का कि उन्होंने जादू से उसकी आँखें ठीक कर दीं।

ये जितने भी जादू वग़ैरह बताए जाते हैं न पुरानी कहानियों में, तो ये मत मान लेना कि वास्तव में कोई भौतिक घटना घटी थी। कि कोई पानी पर चलने लग गया था, या कोई हवा में उड़ने लग गया था। ये सब नहीं हुआ। ये सब बातें थोड़ी नाज़ुक होती हैं, थोड़ी सूक्ष्म होती हैं। तो उनको उसी तरह से देखा जाना चाहिए। तो लड़की को उन्होंने प्रेम किया, तो लड़की को दुनिया को देखने की नज़र दे दी, नज़र दे दी। अब वो देख पा रही है। पहले वही जेलर के घर की बेटी थी और जेलर भी आतताई, वो भी राजा का ही दुमछल्ला। राजा जिसको बोलता था, “ले भाई, इसको जेल में डाल दे”, फिर जिसको बोलता था “मार दे” वही सब काम जेलर कर रहा है।

तो उसके घर में जो लड़की पली-बढ़ी है, वो कैसी रही होगी? वो भी ऐसे ही पगली, मूर्ख। पर ऐसी लड़की को भी संत वैलेंटाइन ने अपनी संगति से, अपने स्पर्श से दृष्टि दे दी। ये पहली बात हुई।

दूसरी बात, उन्होंने उसको दृष्टि दे दी, ये उनका प्रेम था। और अपने प्रति उन्होंने क्या किया? उसको दृष्टि देने के लिए उनका अगर अपना गला कट रहा है, तो उन्होंने कटने दिया। गला कटना भी ऐसा नहीं है कि तुम यही मानो कि वास्तव में सर धड़ से जुदा हो जाए, तो ही गला कटा। सर जो है, वो अहंकार का सूचक होता है। सर, अकड़ा हुआ सर, अहंकार का प्रतीक होता है। तो सर का कट जाना माने, अपने लिए, अपने ही हित के लिए, अपने ही स्वार्थ के लिए “मुझे करना है, जीना है,” इस भावना का कट जाना।

बात समझ में आ रही है?

तो प्रेम क्या होता है? ये वो बता गए। प्रेम का मतलब है कि जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोल दो। और जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोलने के लिए अगर अपनी जान भी देनी पड़े, तो दे दो।

और आँखें खोलने का क्या मतलब है? उसको धर्म की तरफ़ भेज दो, जैसा उन्होंने स्वयं किया। तो प्रेम का जो वास्तविक अर्थ है, वो फिर आध्यात्मिक है। तुम जिसके साथ हो, उसको तुम अध्यात्म की दिशा भेज दो। वो ख़ुद को जानने लगे, मन को समझने लगे, यही प्रेम है। लेकिन ये करना आसान नहीं होता। ये करने की क़ीमत चुकानी पड़ती है। ये करने के लिए तुम्हें अपना सर्वस्व भी निछावर करना पड़े, तो कर दो। ये प्रेम है। समझ में आ रही है बात?

तो इसलिए ये दिवस महत्त्वपूर्ण है। इसलिए मुझे भी वैलेंटाइन डे पसंद है। दो कारण हैं वैसे वैलेंटाइनडे को मैं क्यों पसंद करता हूँ। एक तो तुमने सुन ही लिया, दूसरा अगर किसी को याद रहे तो अंत में पूछ लेना। दूसरा भी बता दूँगा। पर जो मुख्य कारण है, वो समझ गए न? प्रेम क्या है? इसकी उन्होंने वास्तविक और जीवंत परिभाषा हमारे सामने रखी है।

कोई लड़की आ जाए ज़िंदगी में, तो ये नहीं करना है कि उसको भोग डाला, या उसको अनुमति दे दी कि वो तुमको भोग डाले। उसको आँखें दे दो, ये प्रेम है। आसान नहीं होगा। उसको आँख देने के लिए तुम्हें जान देनी पड़ सकती है, दे देना। लड़की भी कहाँ चाहती है कि उसे आँख मिले, उसे दस और चीज़ें चाहिए। आँखें थोड़ी चाहिए। ये सब (गिफ्ट्स) चाहिए, भाई। बात समझ में आ रही है? तो वो आँख लेगी, लेकिन तुम्हारी जान लेके, कोई बात नहीं। आ रही है बात समझ में?

ईसाइयत यूँ ही आगे नहीं बढ़ी। और बहुत कारण रहे होंगे। तलवार भी एक कारण है, जिससे बढ़ी है ईसाइयत आगे। लेकिन संतों के बलिदान का भी उसमें महत्त्व रहा है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे वैलेंटाइन वीक होता है, एक पूरा। हम उसमें अलग-अलग डेज़ मनाते हैं। अलग-अलग दिन अलग-अलग तरह की चीज़, गिफ्ट्स देना। लाइक टैडी डे है, तो टैडी दे दिया। चॉकलेट डे है, तो चॉकलेट दे दी। वैलेंटाइन डे पर फ़ाइनली उसको प्रपोज़ किया जाता है। तो इन सारे डेज़ का महत्त्व आख़िर है क्या? कि इतने सारे डेज़ क्यों डिफ़ाइन हुए?

आचार्य प्रशांत: एक दिन में कितना भोग सकते हो? पहले तो भोगने के लिए एक दिन भी नहीं था। संत महाराज थे हमारे तीसरी शताब्दी के और जैसा कह रही थी न रोमांटिक लव। रोमांटिक लव से तो इस दिन का संबंध ही बना है, 1000–1100 साल बाद जाकर, चौदहवीं शताब्दी में। और इसका इस तरीके से व्यापक तौर पर क़रीब-क़रीब त्यौहार के तौर पर प्रतिष्ठित होना तो अभी दो सौ साल पहले की बात है। इसका बाज़ारवाद से बहुत सीधा ताल्लुक है। इसका आदमी के भीतर और ज़्यादा घने हुए भोगवाद से बहुत ताल्लुक है। अब भोगना है, तो एक ही दिन तो नाकाफ़ी पड़ता है न। एक दिन में कितना कर लोगे, ख़रीदने भी जाओगे, तो एक दिन में कितना ख़रीद लोगे। ठीक है?

तो उसको पूरा हफ़्ता ही बना दिया। हफ़्ता ही है या और ज़्यादा है? हफ़्ता, दस दिन जो भी है पूरा बना दिया, कि अब इस दिन ये करो, अब ये ले, अब वो दे, अब ये ले, अब वो दे। मैं लेकिन उसमें जोड़ना चाहूँगा, उसके पहले के हफ़्ते का तो विवरण खूब चलता है, रोज़ ले, रोज़ दे। ठीक है? चॉकलेट ले, चॉकलेट दे; और क्या? तोहफ़े ले, तोहफ़े दे; टैडी ले, टैडी दे; हग ले, हग दे। तो इतना हग लेने और हग देने के बाद जो दुर्गंध उठती है, उसकी भी तो बात होनी चाहिए न? वो 14 तारीख़ के बाद है, तो 14 तारीख़ के बाद के दिनों के कोई नाम क्यों नहीं रखे गए? कभी सोचा ही नहीं तुमने?

14 तारीख़ के बाद भी तो पूरा हफ़्ता चलता है न। उसमें भी तो दिनों के नाम होने चाहिए न, चमाट दे, भाग ले; घूँसा दे, गाली दे; ब्रेकअप डे ये सब भी है। तो ये सब तो देखो, बाज़ारवाद है और कुछ नहीं है, कि दिन को हफ़्ता बना दो। बस चले तो हफ़्ते को महीना बना दो। और जो चाहते हैं कि तुम इस तरह की चीज़ें ही ख़रीदते फिरो, वो तो ये चाहेंगे कि तुम साल के 365 दिन किसी-न-किसी नशे में रहो। और उस नशे में तुम अपना पैसा, अपना ध्यान, अपनी ऊर्जा, अपनी जवानी बहाए जाओ।

मैं बिल्कुल ये नहीं चाह रहा हूँ कि तुम लोगों का मूड वग़ैरह ख़राब हो, या ये सब जो तोहफ़े मिले हैं तुम इनका अपने मन अनुसार उपयोग न कर पाओ। लेकिन अब, भाई, तुम ही लोगों ने आफ़त मोल ली है मुझे बुलाकर के। नहीं तो आमतौर पर इस तरह की जगहों पर तो मैं पाया जाता नहीं। तो पूछो, जो पूछना हो।

प्रश्नकर्ता: सर मेबी, इन सेलिब्रेटिंग वैलेंटाइन्स डे, यू आर लुकिंग फ़ॉर द रोमांटिक एलिमेंट, विच इज़ मेबी नॉट देयर इन द स्पिरिचुअल काइंड ऑफ़ लव।

आचार्य प्रशांत: रोमांस क्या होता है? रोमांस माने क्या? जिसको आप बोलते हो, रोमांटिक लिटरेचर, ये सब। रोमांस की परिभाषा क्या होती है? एकेडमिकली भी रोमांस माने क्या होता है? क्या होता है, भाई?

प्रश्नकर्ता: इट इज़ लुकिंग बियोंड वनसेल्फ़?

आचार्य प्रशांत: नॉट ऐट ऑल। नॉट ऐट ऑल। रोमांस इज़ द बिलीफ़ दैट द हाईएस्ट कैन बी हैड थ्रू एक्सपीरियंस। ये रोमांस की शास्त्रीय परिभाषा है, कि जीवन में ऊँचे से ऊँचा जो सच है, वो सुख है। इसको रोमांस कहते हैं। सुख का अनुभव ही आख़िरी बात है, इसको रोमांस कहते हैं। तो रोमांस का मतलब होता है अपने आपको ज़्यादा-से-ज़्यादा, बढ़िया-से-बढ़िया सुख के मौके देना। जो भी चीज़ें तुम्हें सुख देती हों, उनका अनुभव लेना, ये कहलाता है रोमांटिसिज़्म, रोमांस।

जिसको तुम कहते हो रोमांटिक लव वो और कुछ नहीं है। वो यही है कि दूसरे का उपभोग करो, दूसरे का अनुभव लो। क्योंकि अनुभव लेने के लिए क्या करना पड़ेगा? दूसरे का इस्तेमाल ही तो करना पड़ेगा न। इसीलिए रोमांस में फिर ये सब बातें भी शामिल हो जाती हैं, कि पहाड़ों पर गए। पहाड़ों का क्या ले रहे हैं? अनुभव ले रहे हैं। मस्त हवा चल रही है, झीने-झीने कपड़े पहन रखे हैं। ये सब क्या है? ये अनुभव से संबंधित बातें हैं। और सब अनुभव किसको होते हैं? इंद्रियों को होते हैं। इसीलिए रोमांस माने इंद्रियगत सुख। सेंसुअल प्लेज़र।

जहाँ सेंसुअल प्लेज़र आएगा, वहाँ आपको क्या मिलेगा? इंद्रियाँ तृप्त हो जाएँगी, अच्छी बात है। शरीर को कुछ मज़ा आ गया, ये सब हो गया। आपकी जो दैहिक वृत्तियाँ हैं, जो आपकी सदा चली आ रही वासनाएँ हैं, आपने उनको चारा डाल दिया। उनकी मौज आ गई। आपको क्या मिला? आपकी तो जो बेचैनी है, उदासी है वो वैसी की वैसी है। ये बातचीत शुरू हुई तो ये बोली कि कुछ अधूरा है, कुछ पूरा नहीं पड़ रहा। ये सब हो गया, अच्छे कपड़े पहन लिए, घूम-घाम आए, तोहफ़े दे लिए, और मज़े कर लिए लेकिन कुछ पूरा नहीं पड़ रहा। ये रोमांस का ही नतीजा है कि बात कभी पूरी नहीं पड़ती। एक खलिश रह जाती है, एक अधूरापन, एक कसक रह जाती है।

जिनके नाम पर ये पर्व है, उन्होंने कैसे सेलिब्रेट करा था?

प्रश्नकर्ता: जीवन में रोशनी लाकर।

आचार्य प्रशांत: जिस पर दावा हो कि उससे प्यार है, उसको आँखें दे दो। यही है वैलेंटाइन डे। जिससे प्यार का दावा करते हो, उसको आँखें दे दो, यही वैलेंटाइन डे है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वो लड़की जिसके पास आँखें नहीं थीं, वो जेलर के यहाँ पलती-बढ़ती थी। तो उसको जो आँखें मिली होंगी, उसका परिप्रेक्ष्य अलग होगा। आज जो आँख दी जाएगी, और भविष्य में जो आँख दी जाएगी प्रेमी द्वारा, वो संदर्भ के हिसाब से अलग-अलग होगी। रोमांसवाद का जन्म अठारहवीं शताब्दी के अंत में, इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन के बैकड्रॉप में हुआ था। तब आदमी की चेतना को आगे रखना, भावनाओं को आगे रखना, इंडिविजुअलिज़्म को सेंटर में लाना, अनुभव ऐसा जो सुख दे, जो किसी फ़ैक्ट्री पर या किसी मालिक पर डिपेंडेंट न हो। आप गए, आप नदी के किनारे बैठे, आपने फूल को देखा और आप ख़ुद ही इंडिविजुअली आप प्लेज़र एक्सपीरियंस कर सके। वो उसका एक भाव रहा।

मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ, जब आप कह रहे हैं कि इंद्रियगत ही तो है, तो उसमें गलत क्या है? मैं कह रहा हूँ, वो सीमित भी कहाँ है।

आचार्य प्रशांत: सीमित अगर नहीं है, तो कोई बात नहीं। तुम्हें अगर उससे पूरी तृप्ति, संतुष्टि मिल जा रही है तो बहुत खूब।

प्रश्नकर्ता: उस लड़की को आँख देने की प्रक्रिया में भी तो रोमांस इन्वॉल्व होगा न?

आचार्य प्रशांत: अगर रोमांस इन्वॉल्व होता, तो वो उसको भोगने के लिए ज़िंदा रहते या सर कटा लेते? रोमांस का तो मतलब ही है न सुख का अनुभव, चाहे जिस भी तरीके से कहना चाहते हो। वो अनुभव पाने के लिए ज़िंदा तो रहना चाहिए। यहाँ तो उन्हें दिख रहा है कि अनुभव छोड़ो अनुभोक्ता की ज़िंदगी से भी आगे कुछ है। तो संत वैलेंटाइन जो भी कुछ थे रोमांटिक तो बिल्कुल नहीं थे।

प्रश्नकर्ता: मैं ये कहना चाह रहा हूँ कि कीट्स की एक कविता है, जिसमें वो एक पंछी को बहुत समय से देख रहे हैं। फिर वो अंत में उड़ जाता है। तो पंछी को जब देख रहे थे, उस प्रक्रिया में वो कहते हैं कि वो जो टाइमलेस है, उसको छूकर आ पाए। उन्होंने टाइम की सीमा को अनुभव किया, पर अंत में जब पंछी उड़ गया तो बड़ा दुख हुआ।

आचार्य प्रशांत: सब पंछी उड़ेंगे।

प्रश्नकर्ता: सब पंछी उड़ेंगे, और अंत में सर कट के ही प्रेम आप दे पाएँगे। पर उस प्रक्रिया का तो अपना महत्त्व है न, जहाँ पर आप उस पंछी को भोग रहे हैं, देख रहे हैं।

आचार्य प्रशांत: क्या महत्त्व है? वो उड़ गया, अब?

प्रश्नकर्ता: पर जितने समय में वो रहा, उसने ये एहसास दिलाया कि…।

आचार्य प्रशांत: पंछी ज़्यादा देर रहता है या ज़्यादा देर उड़ा हुआ रहता है। कौन-सा ऐसा पंछी है जो बैठा रहेगा कि तुम उसका इंद्रियगत सुख पान करते रहो? और इतना और बता दो कि पंछी मान लो नहीं उड़ता, तो भी क्या इस कविता के पात्र को उससे सतत सुख मिलता रहता? पंछी का सुख तो निहित ही इस बात में है कि अभी है, अभी नहीं रहेगा।

प्रश्नकर्ता: जिस समाज में, आचार्य जी, हम हैं अभी 2026 में, 14 फ़रवरी है आज सतत सुख या वैसा प्रेम, जो संत वैलेंटाइन ने दिया उस संधी लड़की को, तो एकमात्र आदर्श ही मालूम होता है। कम से कम इन त्योहारों के माध्यम से ऐसे सूखे समाज में, जहाँ पर सब अवसाद की ओर जा रहे हैं, युवक-युवतियाँ एक-दूसरे से मिलते हैं, आलिंगन करते हैं, कुछ गिफ़्ट्स इत्यादि देते हैं। थोड़ा कल्चरल इंटरैक्शन होता है।

आचार्य प्रशांत: मार्च के महीने में मेडिकल एसोसिएशंस की रिपोर्ट के मुताबिक साल में सबसे ज़्यादा गर्भपात होते हैं। अवसाद बढ़ेगा या घटेगा? वैलेंटाइन डे के महीने के बाद गर्भपातों में अचानक वृद्धि हो जाती है, मार्च में। तुम कह रहे हो कि वैलेंटाइन डे से लोगों को तात्कालिक सुख मिलता है और अवसाद कम होता है। जिस लड़की का अबॉर्शन हो रहा है, वो अवसाद से बाहर आ रही है या उसमें और डूब रही है?

ये जो पूरी भावना है न कि ज़िंदगी तो हारा हुआ खेल है, उसमें पल-दो-पल का ही जो सुख मिलता हो लूट लो, ये भावना ही ज़िंदगी को हारा हुआ खेल बनाती है। जिसने इस भावना को स्वीकार करके इसी को सत्य मान लिया कि ज़िंदगी तो है ही बर्बाद, अब इसमें भागते भूत की लंगोटी भली। चलो, आज शाम को ऐश करने का मौका मिल रहा है, कर लो। क्योंकि कल तो वैसे भी काला ही है। कल क्या है? काला। तो आज रात को रंगीन कर लेते हैं। अब कल काला हो या न हो, लेकिन तुम्हारी इस भावना ने कल को निस्संदेह काला बना दिया।

ये सिनिसिज़्म, ये नैराश्यवाद, अध्यात्म में बिल्कुल नहीं होता। वहाँ मुक्ति स्वभाव है, वहाँ आनंद स्वभाव है। वहाँ इस भावना का कोई स्थान नहीं है कि दो-चार दिन का मेला है, दुनिया खेल ले जो खेला खेल सकता है। ये नहीं है।

अध्यात्म का मतलब है जीवन। अगर न समझो तो सज़ा है, और अगर समझ लो तो आनंद का अवसर।

तो जो लोग कह रहे हैं कि जीवन सज़ा मात्र है, उन्होंने तो पहले ही ये मान लिया है कि वो समझ ही नहीं सकते जीवन को। ये मानना भी गलत है क्योंकि अध्यात्म जानता है, समझता है और समझाता है कि बोध तो तुम्हारा स्वभाव है। बोध तुम्हारा स्वभाव है, तुमने कैसे कह दिया कि जाना नहीं जा सकता, समझा नहीं जा सकता? तो ये कहकर कि जीवन जाना नहीं जा सकता, या जीवन तो कालीमा काली की है तुम ख़ुद ही अपने लिए गड्ढा खोद रहे हो।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रकृति ने कुछ ऐसा विधान रचा है कि एक आयु के बाद पुरुष या तो स्त्री को, या पुरुष-पुरुष के प्रति ही, या स्त्री-स्त्री के प्रति आकर्षित होने लग जाते हैं। बहुत जगह ऐसा भी कहा गया है और उदाहरण भी रहे हैं इतिहास में, कि जो इश्क़-मिज़ाजी है, जो मिज़ाज का इश्क़ है, वो हक़-ए-इश्क़-ए-हक़ीक़ी तक भी ले जाता है। तो जो प्रकृति ही हमें इस तरफ़ प्रेरित कर रही है कि आप एक-दूसरे के साथ संबंध बनाएँ, तो क्यों न जो बिल्ड-अप है, वो यहीं से।

आचार्य प्रशांत: बिल्कुल बनाओ। संत थे वैलेंटाइन, लेकिन एक औरत से ही तो प्रेम करते थे। ठीक? औरत से प्रेम करने में पाबंदी कहाँ है?

प्रश्नकर्ता: पर जिस तरह का प्रेम धर्म सिखाता है, वो तो इतना एब्स्ट्रैक्ट होता है।

आचार्य प्रशांत: एब्स्ट्रैक्ट क्या है? ज़िंदगी दे दी तुमने किसी को, इसमें एब्स्ट्रक्शन क्या है? तुम किसी की ज़िंदगी बर्बाद करो, ये तुम्हें एब्स्ट्रैक्शन नहीं लगता? लेकिन तुमने किसी की आँखें खोल दीं उसको ज़िंदगी दे दी। इस बात को तुरंत कह देते हो कि अरे ये बात तो थोथी है, काल्पनिक है। ये तो आदर्शवाद है।

प्रश्नकर्ता: तो इसको फिर प्रैक्टिकली कैसे अप्लाई?

आचार्य प्रशांत: प्रैक्टिकली बर्बाद कैसे कर लेते हो किसी को? जब मैं कहता हूँ किसी को आबाद करना प्रेम है, तो कहते हो, नहीं, नहीं, ये तो आपने बहुत दूर की बात कर दी। ये तो अव्यावहारिक है। बर्बादी तुमको बड़ी व्यवहारिक लगती है, वो पल-पल कर लेते हो, वो बिना मेरे सिखाए कर लेते हो। ज़रूर ये बात नासमझी की नहीं, बेईमानी की है न।

प्रश्नकर्ता: आपने तो आचार्य जी ग्लानि में डाल दिया, तो ये सब अब बर्बादी का कार्यक्रम।

आचार्य प्रशांत: नहीं, नहीं, इसका तो पूरा भोग होना चाहिए अच्छे से। दिक़्क़त क्या है?

प्रश्नकर्ता: सूँघ लिया मैंने।

आचार्य प्रशांत: तुम्हें क्या लगा? ये पहला था?

प्रश्नकर्ता: तो हर उस चीज़ में जिसमें मज़ा आ जाए, वो नहीं करनी है बेसिकली।

आचार्य प्रशांत: भाई, मज़ा तो उस लड़की ने पूरा लिया होगा न जीवन का, क्योंकि उसे वैलेंटाइन जैसा प्रेमी मिला। धर्म तो मज़ा लेना सिखाता है, हम ज़िंदगी को सज़ा बनाए बैठे हैं। और चूँकि हम असली मज़े से बहुत दूर हैं, तो हम एक बेईमानी और करते हैं, अपनी सज़ा को ही नाम दे देते हैं मज़े का। ये तो दोहरी बेईमानी हो गई न, वो भी अपने ही साथ। इसमें क्या मज़ा है?

इतना मुश्किल क्यों है कि अगर तुम किसी से संबंध बनाओ, तो उस संबंध में कीचड़ में लौटने की जगह आकाश-सी पवित्रता हो। गंगा भी कभी नहा आओ।

प्रश्नकर्ता: कभी?

आचार्य प्रशांत: एक बार ही कर लो, भाई, तुम।

प्रश्नकर्ता: क्योंकि ये तो अपवाद ही दिखता है कि दो युवा एक साथ हुए और आँख दे दी, कुछ और ही आदान-प्रदान कार्यक्रम दिखता है वहाँ।

आचार्य प्रशांत: वो तुम्हारी नियत पर है, तुम क्या करना चाहते हो। ऊँचाइयाँ जितनी होती हैं, उन पर सब पर लोग कम ही पाए जाते हैं। और जितनी दुनिया की ऊँचाइयाँ हैं, उनको पाने के लिए तो बड़े लालायित रहते हो। तब तो नहीं कहते कि करोड़पति तो कम ही लोग होते हैं, तो मैं क्यों हो जाऊँ। तब तो तुम भी लक्ष्य बनाते हो, मुझे भी होना है। किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में प्रवेश सबको नहीं मिलता। हज़ारों में किसी एक को मिलता है। तब तो नहीं कहते कि जो काम 999 कर रहे हैं, वही मैं भी करूँगा। 999 क्या कर रहे हैं? वो विश्वविद्यालय की प्रवेश-परीक्षा में असफल हो रहे हैं। तब तो नहीं कहते कि जैसा सब असफल हो रहे हैं, मैं भी होऊँगा। तब तो कहते हो, नहीं, इसमें तो मुझे सबसे अलग होके दिखाना है।

इन सब चीज़ों में अलग होने को सहर्ष तैयार हो। लेकिन जब बात आती है कि ज़िंदगी में जो लोग अपने जोड़ीदार का शोषण कर रहे हैं, भोग कर रहे हैं, तुम उनसे अलग हो जाओ, उन 999 लोगों से अलग हो जाओ, तुम्हारा रिश्ता ज़रा दूसरे तरह का हो; तो वहाँ कह देते हो, नहीं, नहीं, मुझे तो भीड़ जैसा ही रहना है। अब ये बात नाकाबिलियत की नहीं है। ये तो कुछ और है।

प्रश्नकर्ता: अकॉर्डिंग टू यू, व्हाट इज़ ऐन आइडियल रिलेशनशिप?

आचार्य प्रशांत: व्हाट इज़ लव?

प्रश्नकर्ता: टू बी सेल्फ़लेस, वी डू समथिंग फ़ॉर द अदर पर्सन।

आचार्य प्रशांत: इट्स अ चॉइस। चुनना है न, संबंध तो है ही। एक रिश्ता तो है ही। उस रिश्ते को कैसा रखना है ये हमारा चुनाव है या नहीं है?

तो जो आप ऊँचे से ऊँचा चुनाव कर सकते हो किसी रिश्ते में, उसका नाम प्रेम है।

रिश्ता ऐसा भी हो सकता है कि तेरा सर फोड़ दूँगी, तू मेरा सर फोड़ दे। हो सकता है, चुनाव की बात है। रिश्ता ऐसा भी हो सकता है कि तू अपने काम से काम रख, मैं अपने काम से। वो भी चुनाव हो सकता है। रिश्ता हम जैसा बनाना चाहें, वैसा हो सकता है न। तो जो सबसे सुंदर रिश्ता हो सकता है, उसको प्रेम कहते हैं।

प्रश्नकर्ता: इसमें सौंदर्य नहीं है?

आचार्य प्रशांत: नहीं है बिल्कुल। इसमें सौंदर्य न होता, तो दुनिया इसके पीछे क्यों भागती? दो तरह के सौंदर्य होते हैं, एक वो जो दरवाज़े खोलता है अपने से आगे किसी और बड़े सौंदर्य के, और एक वो जिसमें जब तुम प्रवेश करते हो, तो वो तुम्हें अपनी क़ैद में ले लेता है, गिरफ़्तार करके तुम्हें आगे कहीं बढ़ने से पूरी तरह रोक देता है।

सौंदर्य दोनों में है। एक सौंदर्य है जो सीढ़ी की तरह होता है, वो कहता है, मुझ में प्रवेश करो, मेरे पास आओगे तो मैं तुम्हें अपने से आगे और ऊँचा कहीं भेजूँगा। मैं सीढ़ी हूँ, मैं वाहन हूँ। मुझ में अगर आओगे, तो मैं तुम्हें और आगे पहुँचा दूँगा। एक ये होता है सौंदर्य। और एक सौंदर्य होता है, आओ, मैं काल-कोठरी हूँ, मुझ में घुस जाओ फिर मैं तुम्हें कहीं घुसने नहीं दूँगा।

एक गाड़ी में घुसने में और एक काल-कोठरी में घुसने में क्या अंतर है? गाड़ी में घुसते हो तो गाड़ी तुम्हें कहीं और पहुँचा देती है और फिर पहुँचा के दरवाज़ा खोल भी देती है, उतरो। और जेल में घुसते हो तो, घुसते तो दोनों में ही हो, लेकिन जेल में घुसते हो तो क्या होता है? बस, फँस गए अब। तो ये दो तरह के सौंदर्य होते हैं। अगर ज़िंदगी प्यारी है तो दोनों तरह के सौंदर्यों में अंतर करना सीखना।

प्रश्नकर्ता: आपने एक दूसरा रीजन बताया था कि आपको वैलेंटाइन डे बहुत पसंद है।

आचार्य प्रशांत: वैलेंटाइन डे नहीं होगा, तो तुम लोग मुझे इस तरह बुलाओगे नहीं। तुम लोग मुझे इस तरह बुलाओगे नहीं, तो कहीं मैं आराम न करता रह जाऊँ। जब यहाँ बुला लेते हो और पता चलता है कि भाई, तुम लोग इतने पहुँचे हुए ख़यालात रखते हो, तभी तो फिर मुझे प्रेरणा मिलती है न कि बेटा, अभी काम बहुत बाक़ी है, लगे रहो। साल के बाक़ी दिनों में तो तुम्हारी करतूतें छुपी रहती हैं, कुछ पता ही नहीं चलता। जब ये वैलेंटाइन डे वग़ैरह आता है, तब गीदड़ अपनी गुफ़ा से बाहर निकलता है, तो पता चलता है कि अच्छा अंदर का हाल ऐसा है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मतलब सच, सही सच बोल रहा हूँ, एकदम जी इकट्ठा हो गया। पर एक बात बताइए, कम से कम मुझे, ये घड़ी मुझे मिली है। ठीक है आपने जो बोला कि आँख दे दो, पर जब कोई कुछ देता है, कोई तुम्हें रिकॉग्नाइज़ करता है, जब कोई तुम्हें स्पर्श करता है, भाई, अच्छा तो लगता ही है। तो अकेले-अकेले पड़े रहो, काम करो, अकेले में सो जाओ। फिर दूसरा आता है जब तुम्हें ये एहसास दिलाता है कि हाँ, भाई, तुम महत्त्वपूर्ण हो। तो ये सबको ही अच्छा लगता है, हाँ, भाई। सबको अच्छा लगता है।

आचार्य प्रशांत: घड़ी मिली है न?

प्रश्नकर्ता: घड़ी मिली है, अब ये बताइए, ये मतलब गाड़ी है या काल-कोठरी है?

आचार्य प्रशांत: तुम पर निर्भर करता है। तुम जब उसे कलाई में बाँध रहे हो, तो वो तुम्हारी कलाई पर हथकड़ी की तरह है या वो तुम्हें बता रही है कि समय क्या है। दोनों बातें हो सकती हैं, या तो तुम उसका इस्तेमाल सगाई की अंगूठी की तरह कर सकते हो, कि उँगली में बँध गई। या तुम उसका इस्तेमाल सुमिरन करने के उपकरण की तरह कर सकते हो, कि पल-पल टिक-टिक, टिक-टिक, टिक-टिक, समय बीत रहा है।

प्रश्नकर्ता: मतलब समझिए न? आप समझ नहीं रहे, मतलब समय तो ₹150 वाली घड़ी भी बता देगी। ₹20,000 की है। मुझे पता है कि गड़बड़ है लेकिन।

आचार्य प्रशांत: नहीं, तो ₹20,000 की है, तो क्या होगा उसको तुम अब उबाल के विटामिन, प्रोटीन तो पाओगे नहीं। ₹20,000 की हो, ₹150 की हो, बताएगी तो समय ही न। समय का सदुपयोग कर लो, यही उस घड़ी की सार्थकता है।

प्रश्नकर्ता: ऐसा तो नहीं है न कि अगर सेंट वैलेंटाइन जैसा वैलेंटाइन नहीं मनाएँगे, तो प्रेम नहीं मिलेगा। कोई गारंटी है इसकी?

आचार्य प्रशांत: तुम अपनी नज़र में जो ऊँचे से ऊँचा मना सकते हो, वैसा मनाओ। नकल करने की कोई ज़रूरत नहीं है, लेकिन कम से कम अपनी नज़र में तो गिरे हुए मत रहो न। ऐसा तो नहीं है कि हमें अपनी नियतें पता नहीं होतीं। ऐसा तो नहीं है कि जब हम किसी की ओर बढ़ रहे होते हैं, उससे रिश्ता बनाने, उसे छूने, तो हमें अपने इरादों की भनक नहीं होती। जानते तो हम सब हैं न। तुम कम से कम अपनी नज़रों में जो ऊँचे से ऊँचा कर सकते हो, वो करो। मत सुनो किसी संत वग़ैरह की।

प्रश्नकर्ता: माफ़ करिएगा, पर उपभोग करने में गलत क्या है?

आचार्य प्रशांत: तुम्हारा कोई उपभोग करे, उसमें गलत क्या है?

प्रश्नकर्ता: उपभोग तो ट्रेड होता है। आप मेरा उपभोग करिए, हम आपको कुछ देंगे, हम आपका करें। सब दुनिया ही ऐसे चलती है।

आचार्य प्रशांत: जो उपभोग कर रहा होता है, वो ज़्यादा यही चाह रहा होता है कि लूटूँ और दूँ कम से कम। उपभोग की एक पहचान ये होती है कि उसमें आप मुनाफ़ा कमाना चाहते हो, दूसरे से लूँ ज़्यादा और दूँ कम। कोई तुम्हारा अगर कंज़म्पशन कर रहा है, तो उसमें क्या बुराई है? करवा लो अपना भी।

चलिए, भाई, प्रेम दिवस की शुभकामनाएँ। सांझ के बाद समय आपका है। आप अपना देखो, मैं अपना देखता हूँ।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories