जो एक का नहीं होता, उसे सौ का होना पड़ता है। अपने आप को सौ जगह टुकड़ा-टुकड़ा करके उसको बाँटना भी पड़ता है। असली आदमी होता है, वो काम ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ, और साथी भी ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ। तो जब दोनों को ही 24 घंटे कम पड़ रहे हैं, तो वो 48 से ज़्यादा घंटे कहाँ से लाएगा? क्या करेगा फिर वो? वो काम को ही साथी बना लेता है, या साथी को ही काम बना लेता है, या साथी ऐसा बनाता है जो काम में भी साथ हो।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक्सट्रीमिस्ट वर्ड तीन-चार साल पहले सुना था। और जब कुछ समझ नहीं आता, तो गूगल कर लेता हूँ। तो जब मैंने इसकी डेफिनिशन समझी, उसके बाद से हर जगह चारों ओर एक्सट्रीमिज़्म दिखता रहता है, जैसे ये आज जो बात चल रही है, प्रिय-अप्रिय, ये सब भी। ऐसा लगता है जैसे एक्सट्रीमिस्ट लोगों से घिरा हुआ हूँ मैं, जिसमें से एक मेरी लाइफ़ में भी आ गया है।
उसका ऐसा होता है कि या तो ये चीज़, मतलब पसंद होना और पसंद न होना एक रीजन हो गया है। जैसे हर आर्ग्युमेंट का, कि मैं ऐसे नहीं करूँगी या फिर मैं ऐसे नहीं करूँगा, क्योंकि ये मुझे पसंद नहीं है और मे बी वो मेरे लिए इम्पॉर्टेंट है, या फिर मुझे वो करना है, बट क्योंकि मेरे पार्टनर को वो पसंद नहीं है। तो वो फिर मुझे ऐसा लगता है कि ये वही वाली बात कुछ हो रही है कि उसकी पसंद-नापसंद की वजह से मेरी ज़िंदगी जो है, अफेक्ट होने लग गई है।
आचार्य प्रशांत: देखो, हम ज़िंदगी में ज़्यादातर जो लेकर आते हैं न, वो हमारे लिए अच्छा नहीं होता। लेकिन फिर भी कामना है और मजबूरी है, आदत है, जिसको हम लोग प्यार कहते हैं उसकी बेबसी है, उसको ज़िंदगी में रखना है फिर भी। है न? तो




