बँटी हुई ज़िंदगी

Acharya Prashant

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बँटी हुई ज़िंदगी
जो एक का नहीं होता, उसे सौ का होना पड़ता है। अपने आप को सौ जगह टुकड़ा-टुकड़ा करके उसको बाँटना भी पड़ता है। असली आदमी होता है, वो काम ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ, और साथी भी ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ। तो जब दोनों को ही 24 घंटे कम पड़ रहे हैं, तो वो 48 से ज़्यादा घंटे कहाँ से लाएगा? क्या करेगा फिर वो? वो काम को ही साथी बना लेता है, या साथी को ही काम बना लेता है, या साथी ऐसा बनाता है जो काम में भी साथ हो। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक्सट्रीमिस्ट वर्ड तीन-चार साल पहले सुना था। और जब कुछ समझ नहीं आता, तो गूगल कर लेता हूँ। तो जब मैंने इसकी डेफिनिशन समझी, उसके बाद से हर जगह चारों ओर एक्सट्रीमिज़्म दिखता रहता है, जैसे ये आज जो बात चल रही है, प्रिय-अप्रिय, ये सब भी। ऐसा लगता है जैसे एक्सट्रीमिस्ट लोगों से घिरा हुआ हूँ मैं, जिसमें से एक मेरी लाइफ़ में भी आ गया है।

उसका ऐसा होता है कि या तो ये चीज़, मतलब पसंद होना और पसंद न होना एक रीजन हो गया है। जैसे हर आर्ग्युमेंट का, कि मैं ऐसे नहीं करूँगी या फिर मैं ऐसे नहीं करूँगा, क्योंकि ये मुझे पसंद नहीं है और मे बी वो मेरे लिए इम्पॉर्टेंट है, या फिर मुझे वो करना है, बट क्योंकि मेरे पार्टनर को वो पसंद नहीं है। तो वो फिर मुझे ऐसा लगता है कि ये वही वाली बात कुछ हो रही है कि उसकी पसंद-नापसंद की वजह से मेरी ज़िंदगी जो है, अफेक्ट होने लग गई है।

आचार्य प्रशांत: देखो, हम ज़िंदगी में ज़्यादातर जो लेकर आते हैं न, वो हमारे लिए अच्छा नहीं होता। लेकिन फिर भी कामना है और मजबूरी है, आदत है, जिसको हम लोग प्यार कहते हैं उसकी बेबसी है, उसको ज़िंदगी में रखना है फिर भी। है न? तो बैलेंस्ड रहना या सेंटर्ड रहना गलत चीज़ को ज़िंदगी में बनाए रखने की एक विधि होता है। समझे बात को?

तुम कोई घटिया काम करते हो, तुम कर सकते हो बस एक्सट्रीम्स पर मत करो। एक्सट्रीम्स पर क्यों न करें? क्यों एक्सट्रीमिज़्म बुरा है? इसीलिए बुरा है क्योंकि वो काम ही गड़बड़ है, वो काम होना ही नहीं चाहिए था, वो विषय भी जीवन में होना ही नहीं चाहिए था। पर इतनी हिम्मत है नहीं कि उखाड़ फेंको, क्योंकि लत लग गई। इतनी हिम्मत तो है नहीं कि उखाड़ फेंको, तो फिर उसका एक सस्ता समाधान निकाला जाता है। क्या? एक्सट्रीम्स में मत जाना। बाक़ी मैं कह रहा हूँ, जो चीज़ है जीवन में अगर वो सचमुच जीवनदायिनी है तो क्यों न जाएँ एक्सट्रीम्स में।

एक और वजह है कि एक्सट्रीम्स पर आपको न जाने की सलाह दी जाती है। हम जीवन में ऐसी चीज़ें रखते हैं अपनी बेहोशी में, जो आपस में बेमेल होती हैं। म्यूचुअली इनकंपैटिबल, या म्यूचुअली एक्सक्लूसिव। एक के साथ अगर एक्सट्रीम पर चले जाओगे, तो दूसरी बाहर हो जाएगी। काम से बहुत प्यार हो गया, तो घर टूट गया। क्यों? क्योंकि जीवन में जो नौकरी ले आए थे और जो साथी ले आए थे, पति या पत्नी, ये दोनों म्यूचुअली एक्सक्लूसिव और अनकंफ़र्टेबल थे।

तुम्हारी नौकरी ने बस तुम्हारा ब्रेन देखा था कि इसको स्किल्स कौन सी आती हैं; और तुम्हारी पत्नी ने तुम्हारे ब्रेन के अलावा बाक़ी सब कुछ देखा था। समझ रहे हो, दो एक्सक्लूसिव हिस्से हैं ज़िंदगी के। एक पर एक्सट्रीम पर जाओगे कि बहुत काम करने लग गए, तो घर से पत्नी भाग जाएगी या पति भाग जाएगा। तो इसलिए कहा जाता है, एक्सट्रीम नहीं। क्या? बैलेंस रखो ताकि दोनों ही; दो अलग-अलग तरह के ज़हर हैं, दोनों ही बचे रहें।

असली आदमी की ज़िंदगी तो आउटराइट एक्सट्रीम्स में चलती है। और क्यों न चले, कौन होता है हम पर बंदिशें, वर्जनाएँ लगाने वाला। हम ज़िंदगी में लाते ही उसको हैं, जिसके साथ अतियों पर जाया जा सके। जिसके साथ कहीं जाकर सीमा खींचनी पड़े, बाउंड्री खींचनी पड़े, उसको ज़िंदगी में लाएँ क्यों? ये नियम रोटी पर लागू हो सकता है कि साहब, तीन या चार रोटी से आगे मत जाइए, सीमा खींच दीजिए। पर ये नियम प्रेम पर और काम पर तो नहीं लागू होना चाहिए न।

बहुत सारे रिश्ते हैं। आप जाएँगे ये रिलेशनशिप काउंसलर्स के पास, “रिश्ता बहुत अच्छा चलेगा, हफ़्ते में एक बार मिला करो बस। एक बार से ज़्यादा मिलोगे तो रिश्ता टूट जाएगा।” असली आदमी होता है, वो काम ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ, और साथी भी ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ। तो जब दोनों को ही 24 घंटे कम पड़ रहे हैं, तो वो 48 से ज़्यादा घंटे कहाँ से लाएगा? क्या करेगा फिर वो? वो काम को ही साथी बना लेता है, या साथी को ही काम बना लेता है, या साथी ऐसा बनाता है जो काम में भी साथ हो।

हमारी कटी-फटी, सेगमेंटेड, फ्रैगमेंटेड ज़िंदगी में ये सब करना पड़ता है, राशनिंग: इसको इतने घंटे दे दो, इसको इतने घंटे दे दो, इसको इतने घंटे दे दो। पापा जी काम से वापस आते हैं, तो पहले आधे घंटे बाहर वाले कमरे में दादा जी के साथ बैठ जाते हैं, उनका कोटा निपटा दिया। उसके बाद जाकर एक-दो घंटे चाचा और ताऊ लोगों के साथ बैठकर कुछ कर लेते हैं। और फिर 10:00 बजे के बाद किवाड़-कुंडी लगाकर माता जी के साथ। सबका कोटा निपटा देते हैं। सुबह उठते ही भगवान जी का कोटा निपटाते हैं, बीस मिनट में पूजा, प्रार्थना, आरती सब कर डालते हैं। बिल्कुल बैलेंस्ड लाइफ़ है। सोचो ये एक्सट्रीम में चले जाएँ, कहीं दिन भर भजन करूँगा। सब ख़त्म हो जाएगा।

ये चालाकी हमें करनी इसीलिए पड़ती है क्योंकि हमारी निष्ठा कहीं पर भी शत-प्रतिशत नहीं होती।

जो एक का नहीं होता, उसे सौ का होना पड़ता है। तो फिर अपने आप को सौ जगह टुकड़ा-टुकड़ा करके उसको बाँटना भी पड़ता है।

तो फिर सौ जगह उसको रेखाएँ भी खींचनी पड़ती हैं कि तुम्हारे हिस्से में बस इतना ही दे सकता हूँ। तुम्हें इतना ही दे सकता हूँ। तुम्हें इतना ही दे सकता हूँ। “यू नो, एव्री सेकंड, सैटरडे, आई टेक आउट टू आवर्स टू स्पेंड क्वालिटी टाइम विद माय किड्स।”

बंटी हुई ज़िंदगी!

बहुत सारे, बहुत सारे वर्क प्लेसेस ऐसे होते हैं, जहाँ आप अगर एक सीमा से ज़्यादा अपने काम को भी डेडिकेशन दिखाओ, तो ये गड़बड़ बात हो जाती है। इससे ज़्यादा मत करो, पूरे डिपार्टमेंट के लिए ख़तरा आ जाएगा। सब कुछ ल्यूकवॉर्म होना चाहिए। सब कुछ बिल्कुल औसत, मीडियोकर होना चाहिए। चार तरफ़ से तुम बंधे रहो और उन बंधनों के बीच में जो दायरा है उसमें तुम घूम-फिर सकते हो, यहाँ तक कि नाच भी सकते हो, पर किसी भी दिशा में बेलगाम होकर मत भाग जाना। और अगर बचपन से यही आपके साथ हुआ है तो इसकी आदत भी पड़ जाती है, सुरक्षा लगने लगती है। अच्छा है, किधर को भी एक्सट्रीम में नहीं जाना है।

जो लोग अतियाँ कर देते हैं न, वो ऊपर-ऊपर से ख़तरनाक होते हैं। वो कोई छोटा-मोटा नुकसान कर देंगे क्योंकि अतियाँ कर रहे हैं, पर वो भीतर से प्राण देने वाले लोग होते हैं; लाइफ़-गिविंग, प्राणदायक। और जो लोग अतियाँ नहीं करते वो ऊपर से बड़े सुरक्षित लगते हैं वेल-बैलेंस्ड जेंटलमैन, और वो भीतर ही भीतर लाइफ़-सैपिंग होते हैं, वो जान ले लेंगे आपकी। एक्सट्रीम्स में जीने वाला आदमी ऊपर से ख़तरनाक लगेगा; और जो ये वेल-बैलेंस्ड जेंटलमैन होता है ये भीतर से ज़हरीला होता है।

एक्सट्रीम से याद आया। एक्सट्रीम का मतलब जानते हो क्या होता है? एक्सट्रीम का मतलब होता है ऐसे (पेरिफ़री पर), कि हो भी इस दुनिया के और नहीं भी हो, हमेशा छोड़ने को तैयार भी हो। कोई ऐसा आग्रह नहीं है कि यहाँ बीच में बैठे हैं, सेंटर में डेरा जमा के, अड्डा मार के। यहाँ पर हैं एक्सट्रीम में है, जब बोलोगे, चल देंगे।

आप अगर किसी रिश्ते की सीमाओं का परीक्षण नहीं कर सकते, रिश्ते में सीमाओं को टटोलने की अनुमति ही नहीं है, रिश्ते में बाउंड्रीज़ को आप एक्सप्लोर ही नहीं कर सकते; तो रिश्ता थोड़ी है, कैद है न। और ज़्यादातर रिश्ते ऐसे ही होते हैं। ये है एक गोल वृत्त, घेरा, दायरा, उसके भीतर-भीतर सब कुछ अच्छा है, नाइस, स्वीट, पोलाइट। और जैसे ही आप उसकी लिमिट्स, बाउंड्रीज़ को टेस्ट करना शुरू करिए, वैसे ही एवरीथिंग इज़ क्रम्ब्लिंग डाउन।

रिश्ता कितना मजबूत है, ये बात उसकी सीमाओं की मजबूती से तय होती है।

क्या आप सीमाओं से छेड़छाड़ करने के लिए स्वतंत्र हैं? और नहीं हैं तो। रिश्ता होता है आपको लिमिटलेस तक ले जाने के लिए, है न? अच्छे संबंध का यही औचित्य होता है न, कि वो आपको असीम तक ले जाए, लिमिटलेस तक। रिश्ता होता है आपको लिमिटलेस तक ले जाने के लिए, और रिश्ते में आपको दिन में पाँच बार सुनना पड़ता है, "रिमेन इन योर लिमिट्स।" तो ये रिश्ता किस काम का है?

असली रिश्ता तो आपके पागलपन को और प्रोत्साहित करने के लिए होना चाहिए। ये वो रिश्ता है जहाँ हम उतने पागल हो सकते हैं जितना अन्य जगहों पर, अन्य लोगों के सामने नहीं हो सकते। यहाँ वो जो बेचैनी है भीतर हमारी, वो पूरी उड़ान ले सकती है। यहाँ हमारी बेचैनी पूरी अभिव्यक्ति पा सकती है, ये होता है सार्थक रिश्ता। यही होता है सार्थक काम।

और इसीलिए जो साधारण संसारी होता है, वो कितना घबराता है एक्सट्रीम्स से, अतियों से। बाप रे बाप! उसका तो ऐसा है जैसे गधहवा चार दिशाओं से लदा हुआ चल रहा है, इतना उसने बोझ उठा रखा है। वो तो एक-एक क़दम संभाल-संभाल के रखता है। क्योंकि ज़रा सा कुछ कंपन हुआ नहीं, कि कुछ गिरेगा। अपनी एक्सट्रीम्स को तो कोई जॉनाथन (किताब जॉनाथन लिविंगस्टन सीगल से) ही टेस्ट कर सकता है न। या फिर कोई उन्मुक्त घोड़ा जिस पर कुछ लदा हुआ नहीं है, वो कहेगा, "मुझे एक्सट्रीम्स पर जाना है।" बोझ उठाने वाला गधा थोड़ी एक्सट्रीम्स को टेस्ट करेगा, वो तो जेंटलमैन है। वो तो द ऑनरेबल, रिस्पेक्टेबल हाउसहोल्डर है।

वो पागलपन जिसे हम आम ज़िंदगी कहते हैं, उससे मुक्ति पाने के लिए उनको सैनिटी नहीं, शांति नहीं, एक और ऊँचे दर्जे का पागलपन चाहिए। और अगर वो पागलपन आपकी ज़िंदगी में नहीं है तो जिसको आप अपनी साधारण, संतुलित, सेन एंड बैलेंस्ड, नॉर्मल लाइफ़ बोलते हो, वो है नारकीय पागलपन।

नाम मत लो, श्रीकृष्ण और अर्जुन का। मत बताओ, नाम बस मत लेना, ठीक है। ऐसे ही कहना कि एक व्यक्ति है जो किसी दूसरे व्यक्ति को कह रहा है कि, "सच्चाई की ख़ातिर तू अपने घर, परिवार, दोस्त, यार, जा इनसे सबसे भिड़ जा।" तो लोग क्या बोलेंगे? “पागल है क्या?” वैसा ही पागलपन चाहिए, जिसके पास वो पागलपन नहीं है नरक उसी की ज़िंदगी का नाम है।

कोई अच्छा काम बिना उस इन्सैनिटी के, पागलपन के, बिना उस एक्सट्रीम स्टेट के नहीं हो सकता। दस-बीस-चालीस साल एक्सट्रीम्स में रह लीजिए, उसके बाद तो करोड़ों साल मिलेंगे शांत पड़े रहने के लिए। अभी मौका है राइट एक्साइटमेंट का। अभी मौका है अतियों को तलाशने का, तराशने का, उसके बाद तो बहुत सुरक्षा रहती है। मुर्दे को कोई ख़तरा? एक बार ताबूत में कीलें गड़ गईं, उसके बाद कोई ख़तरा? तो अभी ख़तरा उठाना सीखिए।

लोकभाषा के चक्कर में मत आ जाया करिए। लोकभाषा में ये गाली की तरह होता है, “अरे यार, वो आदमी बेकार है। एक्सट्रीम्स में रहता है। ये तुम किनको सुनते रहते हो? हमेशा एक्सट्रीम बातें करते हैं।”

सत्य एक्सट्रीम ही होता है। और जिसको लोकभाषा एक्सट्रीमिज़्म कहती है, वो एक्सट्रीमिज़्म है ही नहीं, वो अज्ञान है बस।

कोई कट्टरपंथी हो जाए, बिगॉट्री वग़ैरह को क्या बोल देते हैं? एक्सट्रीमिज़्म। वो एक्सट्रीमिज़्म नहीं है, वो तो अज्ञान है। उसे क्यों एक्सट्रीमिज़्म बोल रहे हो? बड़े गलत शब्द हैं एक्सट्रीमिज़्म, फंडामेंटलिज़्म।

फंडामेंटलिज़्म तो अपने आप में अच्छी बात होती है क्योंकि फंडामेंटल माने बुनियादी। अगर कोई रिलिजियस फंडामेंटलिस्ट है, तो इसका शुद्ध अर्थ तो ये होना चाहिए। मान लो सनातन को लें, शुद्ध ये होना चाहिए कि वो फिर उसका धर्म वेदान्त से आ रहा है। पर लोकभाषा में ऐसा नहीं है, उनके हिसाब से ये गड़बड़ शब्द है, फंडामेंटलिस्ट। तो अच्छा, अगर कोई फंडामेंटल्स पर न चले, तो फिर किस पर चले? इमारत फंडामेंटल्स पर न खड़ी हो तो किस पर खड़ी हो? फंडामेंटलिस्ट होना बुरा कैसे हो गया?

और विज्ञान में तो तुम सब तरह के एक्सट्रीम्स को तलाश रहे हो। कितने खुश हो जाते हो जब बोलते हो कि अभी फ्रांस में हमने एक्सपेरिमेंट किया एंड देयर वी कुड एक्सलरेट अ फोटोन टू 99.9999% ऑफ लाइट। ये एक्सट्रीम नहीं है? वहाँ एक्सट्रीम चल रही है। पर मैं अपनी ज़िंदगी में सच्चाई के लिए एक्सट्रीम लाना चाहूँ, तो मैं इनसेन हो गया। कैसे? फोटोन में कोई और पार्टिकल था। फोटोन तो लाइट पर ही चलता है। समझ में आ रही है बात कुछ?

“सबसे बना के चलो, बीच का रास्ता पकड़ो।” अच्छा, ये सब करोगे तो क्या होगा? मरोगे नहीं? सबके साथ अच्छी-अच्छी रखोगे, तो क्या बचा के ले जाओगे? भाई, जिनके साथ अच्छा-अच्छा रिश्ता रख रहे हो, इसमें से तो आधे तुम्हारे साथ श्मशान भी न आएँ। तो इन सबके साथ अच्छा-अच्छा रखना? अच्छे हो, तो किसी के साथ बुरा-बुरा रखना भी सीखो। सबके साथ अच्छा-अच्छा रखोगे, तो बुरे हो जाओगे। जो बात गलत है, उसको मुँह पर गलत बोलना भी सीखो।

ये थोड़ी कि हम अति में नहीं जाते। “देखिए, ये बात थोड़ी सी गलत है, थोड़ी सी सही भी होगी। सब कुछ थोड़ा सही और थोड़ा गलत होता है। कोई भी पूरी तरह सही और पूरी तरह गलत नहीं होता। तो ले-दे के हम पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। किसी को भी समर्पित होने की, न किसी से भी संघर्ष करने की। किसी से क्यों संघर्ष करें, जब कोई पूरी तरह गलत ही नहीं होता। और किसी को क्यों समर्पण दें, जब कोई पूरी तरह सही नहीं होता। तो ले-दे के हमें कुछ नहीं करना, हम सुरक्षित बैठे हैं। लाओ समोसा।”

किसको बेवकूफ़ बना रहे हो? ब्रह्मांड का भी सत्य है। वो कभी भी मिडिल रेंज में नहीं मिलेगा। वो या तो कॉस्मोलॉजिकल रेंजेस में मिलता है या फिर सब एटॉमिक। बीच में जो है, वो माया है सारी। जो न्यूटोनियन यूनिवर्स है, वही माया है। क्योंकि इस यूनिवर्स में स्पेस-टाइम इंडिपेंडेंट है, ये द्वैतात्मक है न्यूटोनियन थ्योरी पूरी; वो कहती है आप अलग हो, ये दुनिया अलग है। स्पेस-टाइम बैकग्राउंड है जिसमें घटनाएँ घट रही हैं, आप उनके ऑब्जर्वर हो।

लेकिन जब आप यूनिवर्स की भी लिमिट्स तलाशने जाते हो, तो पता चलता है कि मामला तो कुछ और है। ये नहीं बात है कि स्पेस-टाइम तो कांस्टेंट्स हैं और *मैटर से इंडिपेंडेंट हैं। ऐसा तो है नहीं। यही बात जब घुस जाते हो बिल्कुल न्यूक्लियस के अंदर, तो वहाँ भी पता चलती है, दोनों एक्सट्रीम्स हैं। यही दोनों एक्सट्रीम्स फिर मॉडर्न फिजिक्स कहलाती हैं, इन दोनों एक्सट्रीम्स के बीच में आम संसारी की ज़िंदगी है।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, मुझे जैसे प्रिय और जैसे प्रिय की ओर जाते, उससे निर्लिप्त रहते हैं। जैसे मुझे कोई कामना का विषय बुलाता है, मतलब उसकी तरफ़ आकर्षण होता है, तो उसमें एक चीज़ जो मुझे हेल्प करती है, वो ये है कि मैं इतना छोटा नहीं हूँ कि वो मुझ पर बहुत छा जाए।

तो यहाँ पर मुझे वही बात जैसे अभी आपके हाल ही सत्र में आपने कहा था कि बल कर्तव्य है। तो यहाँ पर वो बात मुझे सुनाई देती है कि किसी प्रिय की ओर जाते हो, तो उसे निरलिप्त रहने का ये है कि उससे कुछ जुड़ नहीं जाएगा। और इसमें एक समझ हमेशा बना के रखनी पड़ती है कि कुछ बल है भीतर, जो उससे, जो प्रिय है, उसके आगे झुकेगा नहीं। तो ये बात मुझे, ये अवलोकन साझा करना चाहता हूँ कि ये समझ मुझे हेल्प करती है किसी विषय की ओर जाने पर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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