लड़ाई आख़िर तक

Acharya Prashant

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लड़ाई आख़िर तक
ये जो विमेन बॉक्सिंग रिंग है, ये सिर्फ़ एक रिंग नहीं है, ये उस संघर्ष की निशानी है, जो महिलाओं ने बहुत शताब्दियों तक किया है। ‘मिलियन डॉलर बेबी’ फ़िल्म है जिसमें एक महिला बॉक्सर चैंपियन कह रही है कि “मुझे मृत्यु तक मंज़ूर है, लेकिन गरिमाहीन जीवन मंज़ूर नहीं है।” महिला की उन्नति पर सिर्फ़ महिला की उन्नति निर्भर नहीं करती; पुरुष, राष्ट्र और पूरा विश्व भी इस बात का इंतज़ार कर रहा है कि महिला अपने आप को महिला से ज़्यादा मनुष्य जानना शुरू करे। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो आप सबका हार्दिक आभार कि सातवीं एलिट महिला नेशनल बॉक्सिंग चैम्पियनशिप के इस अवसर पर आपने मुझे आमंत्रित किया। और मंच को नमस्कार, सब माननीय गण जो यहाँ पर उपस्थित हैं।

हम सब यहाँ पर बैठे हुए हैं और हमारे सामने ये महिला बॉक्सिंग प्रतियोगिता है, जो आयोजित होने जा रही है, और इस वक़्त यहाँ पर काफ़ी एक उत्सव का माहौल है। तो दो बातें मैं आपसे कहना चाहूँगा, दो दिशाओं से। पहली बात ये कि हम यहाँ तक पहुँचे कैसे हैं, और दूसरी बात ये कि आगे की हमारी संभावना क्या है। कोशिश करूँगा कि संक्षेप में बोलूँ, क्योंकि यहाँ पर जो असली काम है वो तो रिंग के भीतर होने जा रहा है; तो मैं कोशिश करूँगा कि अपनी बात को जल्दी मैं आपके सामने रख दूँ।

देखिए, अभी भले ही हमने यहाँ पर एक बहुत अच्छा, सद्भावना-पूर्ण माहौल बनाया है, जिसमें हम सबको बहुत प्रसन्नता हो रही है; लेकिन हमारी यहाँ तक की राह आसान नहीं रही है।

विमेन बॉक्सिंग तब से अस्तित्व में है, अनौपचारिक रूप से, इन्फ़ॉर्मल रूप से, जब से मेंस बॉक्सिंग है। तो महिलाएँ भी अनौपचारिक रूप से सब खेलों में, जिसमें मुक्केबाज़ी भी शामिल है, अपनी प्रतिभागिता करती रही हैं। लेकिन शायद हम में से ज़्यादातर लोगों को मालूम न हो, कि औपचारिक रूप से महिलाओं को बॉक्सिंग का अधिकार मिले अभी सिर्फ़ कुछ दशक ही हुए हैं।

1927 में लंदन के एक प्रोफ़ेसर ने महिलाओं की बॉक्सिंग प्रतियोगिता आयोजित करने की कोशिश की, वो विश्व में पहला प्रयास था महिलाओं को इस खेल में आगे लाने का। तो लंदन के पास एक शहर था, शायद हैक्नी उसका नाम था, वहाँ की मेयर ने कह दिया कि ये जो आप इवेंट करने जा रहे हैं, इसमें बहुत कुछ अरुचिपूर्ण है, बल्कि अश्लील है, तो हम नहीं करने देंगे। और वो जो पहला अपने तरीके का विश्व में आयोजन था, वो रोक दिया गया, उसे करने नहीं दिया गया। और ये अभी 1927 की बात है, सौ साल से भी कम बीते हैं।

और पास आइए, 1987। 1987 तक भी सरकारों ने और समाज ने महिला बॉक्सिंग को मान्यता नहीं दी थी। और 1987 की बात कर रहे हैं, हम में से बहुत लोग यहाँ ऐसे हैं जो 1987 के पहले के जन्मे हुए हैं, तो हमारे जीवनकाल की बात है। तो सरकारें और समाज हमेशा इसके ख़िलाफ़ रहे।

1987 में दो तेरह वर्षीय लड़कियों के बीच फिर ब्रिटेन में मुकाबला कराने की कोशिश की गई। तो उसमें से जो छोटी लड़की थी उसको इतना डरा दिया गया, वो पीछे हट गई। बाद में दो और लड़कियाँ लाई गईं उनके बीच में मुकाबला हुआ, और ब्रिटेन में भी इस खेल को मान्यता शायद 1988 में मिली है। और बाक़ी जो यूरोपीय देश थे, उनमें और बाद में। और पहली अंतरराष्ट्रीय चैम्पियनशिप, महिला बॉक्सिंग चैम्पियनशिप सन् 2000 के बाद आयोजित हुई। और ओलंपिक खेलों में महिला बॉक्सिंग सिर्फ़ 2012 में आ पाई है।

ये तथ्य है हमारी यात्रा का, कि हम कैसे यहाँ तक पहुँचे हैं। और 2012 में जब महिला बॉक्सिंग ओलंपिक में शामिल की गई तो उसमें बड़ा मुद्दा ये नहीं था कि उसमें प्रतिभागी कौन है, जीतेगा कौन, सोना किसको मिलेगा और चाँदी, कांस्य किसको मिलेंगे। वहाँ बड़ा मुद्दा ये था कि महिलाएँ स्कर्ट पहनेंगी या शॉर्ट्स पहनेंगी। और कुछ लोगों ने ये नियम बनवा दिया कि वो तो स्कर्ट पहनेंगी, फिर उस पर बड़ा विरोध किया गया। तब महिलाओं को ये विकल्प दिया गया कि आप चाहें तो अपनी मर्ज़ी से स्कर्ट पहनें, शॉर्ट्स पहनें, वग़ैरह वग़ैरह।

तो 2012, सोचिए, सिर्फ़ ग्यारह साल पहले। तो ये जो पूरा बॉक्सिंग का हम खेल देख रहे हैं, ये बस अभी हमको पच्चीस साल में मिला है, महिलाओं के लिए; बड़े संघर्ष के बाद, बहुत संघर्ष से हम यहाँ तक पहुँचे हैं। हम यहाँ तक पहुँचे, इस बात की आप सबको बहुत-बहुत बधाइयाँ।

ये जो सामने रिंग है हमारे, ये सिर्फ़ एक रिंग नहीं है ये एक प्रकार की निशानी है, स्मारिका है,सूवेनियर है उस संघर्ष का जो महिलाओं ने बहुत शताब्दियों तक करा है, अपने आप को पूरी तरह से जीवन के सब क्षेत्रों में, समाज में अभिव्यक्त करने के लिए। तो छोटी चीज़ नहीं है रिंग जो हम अपने सामने देख रहे हैं, ये बहुत बड़ी बात है शताब्दियों का संघर्ष लगा है इस रिंग को खड़ा करने में।

और अब मैं आगे की बात करता हूँ, उम्मीद करता हूँ पाँच मिनट होंगे मेरे पास। एक फ़िल्म देखी थी मैंने, फ़िल्म आप लोग भी देखते होंगे। बीस साल पुरानी पिक्चर है, “मिलियन डॉलर बेबी।”

“मिलियन डॉलर बेबी” क्लिंट ईस्टवुड की पिक्चर है, बहुत सारे अकैडमी अवार्ड मिले थे उसको। तो उसमें हिलरी स्वैंक हैं, जिन्होंने मैगी नाम की एक महिला का किरदार निभाया है, और क्लिंटईस्टवुड ने ख़ुद जो रोल अदा किया था, वो था फ़्रैन्की का। तो फ़्रैन्की एक जिम के कोच हैं, बॉक्सिंग जिम के कोच हैं और ये जो महिला है मैगी, ये लगभग चालीस वर्ष की हो रही है। और ये ज़िंदगी में बहुत मात खाई हुई, चोट खाई हुई महिला है; लेकिन ये कहती है, मुझे बॉक्सिंग सीखनी है।

ये जाती है उस कोच के पास और कोई बहुत बड़ा जिम नहीं है, बॉक्सिंग जिम नहीं है जो वो रन करते हैं। उस कोच के पास जाती है कहती है, “फ़्रैन्की, मुझे बॉक्सिंग सिखाओ।”

फ़्रैन्की उसी आधार पर उसको मना कर देते हैं, जिस आधार पर महिलाओं को आज तक देखा गया है; एक शरीर और एक उम्र। महिला के लिए ये दो चीज़ें बहुत बड़ी मानी जाती हैं, कि आपकी उम्र क्या है; आप युवा हो तो आपकी कीमत है, युवा नहीं हो तो कीमत नहीं है। दूसरा, शरीर, आपका लिंग क्या है।

तो ये जो बॉक्सिंग कोच हैं, ये मैगी से बोलते हैं, कि “पहली बात तो तुम महिला हो, मैं लड़कियों को सिखाता नहीं। इट्स अ मेंस जिम। आइ ऐम अ मेंस कोच। और दूसरी बात, तुम्हारी उम्र ढल रही है, तुम क्या रिंग में उतरोगी?”

वो लड़की, वो महिला हठ पकड़ लेती है। बोलती है, “मुझे तो लड़ना है।” और एक दिन वो उसके हठ के सामने मजबूर होकर कोच उसको स्वीकार कर लेते हैं और उसको सिखाना शुरू कर देते हैं। उसको सिखाना शुरू करते हैं, वो उनकी उम्मीदों से ज़्यादा मेहनत करके दिखाती है। और वो दुनिया में जो बड़ी से बड़ी बॉक्सर है, फ़िल्म ही है, कहानी है पर हम समझते हैं, क्योंकि इससे हमें आगे की एक संभावना मिल रही है, एक आदर्श का पता चल रहा है।

वो दुनिया की बड़ी से बड़ी बॉक्सर्स को हराना शुरू कर देती है। लेकिन एक दिन एक जर्मन बॉक्सर होती है और उसका कुछ नाम होता है। वो जर्मन बॉक्सर पीछे से वार कर देती है, पीछे से वार कर देती है मैगी एक स्टूल पर गिरती है, उसकी गर्दन टूट जाती है वो पैरालाइज़ हो जाती है। ये वही मैगी है जो बॉक्सिंग की दुनिया में राज कर रही होती है, एक चढ़ी हुई उम्र में। उसकी गर्दन टूट जाती है, वो अस्पताल में भर्ती हो जाती है। उसे लकवा मार जाता है, वो चल-फिर नहीं सकती, उसकी एक टाँग काटनी पड़ती है और वो बिल्कुल अब अपाहिज हो चुकी है।

वो अपने कोच से प्रार्थना करती है, कहती है, “तुमने मुझे जीना सिखाया, तुमने मुझे नई ज़िंदगी दी, मुझे मौत दे दो।” कोच कहता है, “नहीं, मौत नहीं दूँगा; हमें लड़ना है, हमें इस स्थिति से भी लड़ना है।” लेकिन डॉक्टर एक-के-बाद-एक जवाब देते जाते हैं। और अंततः वो कोच से फिर पूछती है, “तुमने ही कहा था कि मैं एक महिला बाद में हूँ, मैं एक मनुष्य पहले हूँ। और एक मनुष्य के लिए सबसे ज़रूरी होती है उसकी गरिमा। इस अस्पताल पर ऐसे बिस्तर पर पड़ी हूँ, मेरी बताओ, क्या गरिमा है?”

अंततः कोच ही उसको एड्रेनलिन का इंजेक्शन दे देता है, उसको मरने देता है। मरते हुए मैगी, बॉक्सर, चैंपियन बॉक्सर, दुनिया पर राज करने वाली बॉक्सर उससे पूछती है, आप मुझे प्यार से कुछ बोला करते थे। वो शब्द ठीक से याद नहीं आ रहा है, शायद “मो ख़ुश्ले,” किसी अन्य भाषा का शब्द है। वो बहुत प्यार से “मो ख़ुश्ले” करके उसको संबोधित करते थे। बोलती है, “मैं जा रही हूँ, ये मेरी आख़िरी साँसें हैं इनका मतलब बता दीजिए, ये आप मुझे क्या बोला करते थे?”

उसकी आँखें बंद हो रही हैं। कोच कहते हैं, “उसका अर्थ था, मेरे दिल की धड़कन।” दिल की धड़कन रुक जाती है, रात के अंधेरे में उसको विदा करके कोच स्वयं भी विदा हो जाते हैं, उसके बाद उस कोच को कभी किसी ने नहीं देखा।

इस अंत को दुखद मत मानिए, मैं मृत्यु की बात नहीं कर रहा, मैं पुनर्जीवन की बात कर रहा हूँ। मैं उस जीवन की बात कर रहा हूँ जो गरिमा से परिपूर्ण है, जिसमें एक महिला कह रही है कि मुझे मृत्यु तक मंज़ूर है लेकिन गरिमाहीन जीवन मंज़ूर नहीं है।

मैं इस बात को आप सबके सामने, विशेषकर महिलाओं के सामने एक संभावना के रूप में रखना चाहता हूँ। हम अपनी बेड़ियों को काटें, और महिलाओं की बेड़ियों से पुरुषों की बेड़ियाँ भी जुड़ी हुई हैं।

दुनिया में कोई विकसित देश ऐसा नहीं है जहाँ महिलाएँ पीछे हों, और दुनिया के जिन–जिन देशों में महिलाएँ पीछे हैं, वो विकसित नहीं हो पाए।

और दुनिया के आप ज़्यादातर सबसे पिछड़े हुए देशों को देखेंगे, तो उसमें महिलाओं की हालत बहुत ख़राब है, महिलाओं की बड़ी दुर्दशा है। आबादी का पचास प्रतिशत हैं महिलाएँ, महिलाएँ पीछे रहेंगी तो पुरुष आगे कहाँ से निकल जाएँगे। तो महिला की उन्नति पर सिर्फ़ महिला की उन्नति निर्भर नहीं करती; पुरुष भी, और राष्ट्र भी, और पूरा विश्व भी इस बात का इंतज़ार कर रहा है कि महिला अपने आप को महिला से ज़्यादा मनुष्य जानना शुरू करे।

लिंग बाद में आता है, देह बाद में आती है, चेतना पहले आती है। हम अपने आप को इंसान की तरह देखें, जो कुछ भी एक पुरुष के लिए संभव है। इंसान की पहचान उसकी चेतना होती है न। जो कुछ भी किसी भी चेतनाधारी मनुष्य के लिए संभव है, वो महिलाओं के लिए भी संभव है।

और महिला के जीवन का भी वही उद्देश्य है जो किसी पुरुष के जीवन का उद्देश्य है; अपने जीवन को सार्थक ऊँचाइयाँ देना, देह को अपना कटघरा बना लेना नहीं।

अपनी चेतना को अधिकतम ऊँचाई देना, अपनी पूरी संभावना को साकार करना।

तो मैं आशा करता हूँ, प्रार्थना करता हूँ कि ये जगह, ये आयोजन, राष्ट्र पूरा और विश्व पूरा सब मनुष्यों की संपूर्ण संभावना की सार्थकता का उत्सव मनाएगा। सब मनुष्य, जिसमें जितने पुरुष शामिल हैं उतनी ही महिलाएँ भी। धन्यवाद।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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